शानवी अब उसे सिर्फ प्यार से नहीं देखती थी…वो उसे ध्यान से देखने लगी थी। हर हरकत। हर प्रतिक्रिया। हर नज़र।
और ये बात…कार्तिकेय समझ चुका था।
उस रात…कमरे में अजीब सी चुप्पी थी। शानवी बिस्तर पर बैठी थी। उसकी आँखें बिल्ली पर टिकी थीं।
वो अचानक बोली —
अगर तुम सच में इंसान होते ना…तो शायद… ऐसे ही देखते…।
कार्तिकेय के भीतर कुछ काँप गया। उसने तुरंत नज़रें फेर लीं।
लेकिन उसकी सांसें तेज़ हो चुकी थीं। बेचैनी बढ़ती गई जब शानवी पास आती उसका दिल असामान्य रूप से तेज़ धड़कने लगता। जब वो उसे गोद में लेती उसे डर लगता कहीं वो उसकी धड़कन महसूस न कर ले।
जब वो मज़ाक में कहती —
तुम्हें सब समझ आता है ना?
तो वो सच में जवाब देना चाहता था। लेकिन वो दे नहीं सकता था।
रात के करीब 3 बजे…कार्तिकेय जाग रहा था। चार बजने में अभी एक घंटा था। उसने शानवी को सोते हुए देखा। उसकी माँग में हल्का सा लालपन अब भी था।
वो बोला -
ये सब… मेरे कारण है।
अगर मैं पास रहूँगा… तो इसका जीवन उलझ जाएगा।
लेकिन दूर जाऊँगा… तो शायद ये टूट जाएगी…।
उसका मन दो हिस्सों में बँट चुका था। डर....और चाहत।
घड़ी की सुइयाँ जैसे चुभ रही थीं। टिक…टिक…टिक…
वो बोला -
या तो सच बता दूँ…या हमेशा के लिए चला जाऊँ…।
कार्तिकेय की बेचैनी अब अपनी चरम सीमा पर थी।और तभी…
शानवी ने नींद में उसका नाम बुदबुदाया —
कार्तिकेय…
उसका दिल जैसे रुक गया। वो जानती नहीं थी। लेकिन उसका दिल....सब जान चुका था।
घड़ी ने जैसे ही 4 बजाए…कमरे में हल्की सी ठंडी हवा चली।
कार्तिकेय का शरीर फिर से धीरे-धीरे बिल्ली में बदल गया।
उसने एक बार सोती हुई शानवी को देखा। उसकी माँग में हल्का सा लाल रंग अभी भी था। उसके चेहरे पर मासूम शांति। कार्तिकेय की आँखों में दर्द था।
वो बोला -
अगर मैं यहीं रहा…तो इसका जीवन उलझ जाएगा…।
मुझे जाना होगा…।
और बिना कोई आवाज़ किए…वो खिड़की की तरफ बढ़ा। छोटा सा शरीर…लेकिन दिल भारी। वो खिड़की से बाहर कूदा और सड़क की तरफ निकल गया। सुबह की हल्की धुंध थी। सड़क लगभग खाली। एक सफेद बिल्ली…धीरे-धीरे दूर जाती हुई।
🌅 सुबह
शानवी की नींद खुली। उसने हाथ बढ़ाया…
वो नींद में बुदबुदाई -
इधर आओ…
लेकिन…उसकी बाँहें खाली थीं। वो तुरंत उठ बैठी।
वो बोली -
कहाँ गया?
उसने बिस्तर के नीचे देखा। सोफे के पीछे देखा। किचन में देखा।
कुछ नहीं। उसका दिल घबराने लगा।
वो रोते हुए बोली -
नहीं… ये ऐसे नहीं जाता…
उसने दरवाज़ा खोला। सीढ़ियाँ देखीं। गली में झाँका। खामोशी।
उसकी आँखें भर आईं।
वो बुदबुदाई -
तुम… मुझे छोड़कर नहीं जा सकते…।
उसने फोन उठाया…तनय को कॉल करने का सोचा…फिर रुक गई। आँखों से आँसू गिरने लगे। कमरे में वापस आकर वो उसी जगह बैठ गई जहाँ वो रोज़ बिल्ली को गोद में लेकर बैठती थी।
आज…वो जगह खाली थी।
और उसे पहली बार एहसास हुआ—
ये सिर्फ बिल्ली नहीं थी…ये… मेरा हिस्सा थी…।
उधर…सड़क के मोड़ पर वही सफेद बिल्ली रुककर एक बार पीछे मुड़ी। दूर से उस खिड़की को देखा। और फिर…धीरे-धीरे आगे बढ़ गई।
शानवी के हाथ काँप रहे थे। आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
उसने फोन उठाया…और तुरंत तनय को कॉल किया।
वो बोली -
त… तनय…
उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
वो बोली -
मेरा टुक-टुक… नहीं मिल रहा…
फोन के उस पार कुछ सेकंड सन्नाटा रहा। फिर तनय गंभीर हो गया।
वो बोला -
क्या? कैसे? तुम रुको… मैं आता हूँ।
कुछ ही देर में तनय अपने भाई मानव के साथ शानवी के घर पहुँच गया।
दरवाज़ा खुला… और सामने शानवी सूजी हुई आँखें, बिखरे बाल, काँपते हाथ। वो फूट-फूटकर रो पड़ी। तनय ने उसे संभाला।
तनय बोला -
अरे… शांत हो जाओ… हम ढूँढ लेंगे…
लेकिन शानवी की हालत बुरी थी।
वो बार-बार एक ही बात दोहरा रही थी—
कहाँ होगा मेरा टुक-टुक?
उसने कुछ खाया भी होगा या नहीं?
कहीं डर तो नहीं गया होगा?
कहीं उसे चोट तो नहीं लगी?
उसकी आवाज़ में ऐसा दर्द था जैसे कोई अपना बहुत करीब वाला खो गया हो।
मानव ने धीरे से पूछा—
दरवाज़ा खुला था क्या?
वो फिर रो पड़ी और बोली -
नहीं… मुझे नहीं पता कैसे गया…?
वो कभी ऐसे नहीं जाता था…वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता…।
🐾 दूसरी तरफ…
गली के मोड़ पर एक सफेद बिल्ली कूड़े के डिब्बे के पास बैठी थी।
उसने रात से कुछ नहीं खाया था।
लेकिन भूख से ज्यादा उसे एक चीज़ सता रही थी—
वो रो रही होगी…
कार्तिकेय का दिल टूट रहा था। हर गुजरती गाड़ी की आवाज़ पर
वो सहम जाता। लेकिन वापस जाने की हिम्मत…उसमें नहीं थी।
🌧️ घर के अंदर
तनय ने कहा —
चलो… आसपास देखते हैं।
मानव ने तुरंत मोबाइल निकाला।
मानव बोला -
मैं गली के सीसीटीवी देखता हूँ।
शानवी दरवाज़े पर खड़ी थी। आँखें सड़क पर टिकी हुई। उम्मीद… और डर… दोनों साथ।
वो बोली -
टुक-टुक… बस एक बार आ जाओ…।
उसकी आवाज़ हवा में घुल गई।
आपको क्या लगता है -
क्या शानवी कार्तिकेय उर्फ टुक टुक को ढूंढ पाएगी?
या फिर वो दूर चला जाएगा?