Maharana Pratap - Chapter 6 Aarushi Singh Rajput द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Maharana Pratap - Chapter 6

कुछ दूरी पर खड़े कुँवर प्रताप शांत स्वर में बोले

“मीरा माँ के मंदिर का मार्ग विश्वास और धैर्य से मिलता है।”
जलाल क्रोध से उनकी ओर मुड़ा

“हमें उपदेश मत दीजिए! आपको लगता है सब कुछ धैर्य से मिलता है? हमें भी नसीहत देना आता है… बस हमारा तरीका थोड़ा अलग है।”

अनेक प्रहार करने के बाद भी वे लोग मीराबाई का कुछ बिगाड़ न सके।

राजपुरोहित जी की बात सुनकर कुँवर प्रताप प्रसन्न होकर बोले,

“वाह, पुजारी जी! यह सुनकर ही आनंद आ गया। इसे कहते हैं   जैसे को तैसा। उन्होंने मीरा माँ को मारने के कितने ही प्रयास किए, परंतु वे सब के सब असफल रहे।”

यह सुनकर राजपुरोहित जी अपने घोड़े को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए बोले,

“कहते हैं न, जब भक्त सच्चा हो और भगवान के प्रति उसका अटूट विश्वास हो, तो उसे जन्म और मरण की चिंता नहीं रहती। वह सब कुछ छोड़कर अपनी भक्ति में ही डूबा रहता है। और तब स्वयं भगवान को अपने भक्त की चिंता करनी पड़ती है।

भगवान श्रीकृष्ण को भी मीराबाई की सदा चिंता रहती थी। परंतु यह तो सर्वविदित है कि मनुष्य का सब कुछ बदल सकता है, पर उसकी प्रकृति नहीं बदलती।

उदाबाई और विक्रमादित्य के साथ भी कुछ ऐसा ही था। इतना कुछ हो जाने के बाद भी वे लोग शांत नहीं बैठे।

मीराबाई को मारने के सारे प्रयास असफल हो जाने के बाद भी दोनों ने मीराबाई की पूजा-भक्ति में बाधा डालने के अनेक प्रयास किए।

इन सब से मीराबाई इतनी व्यथित हो गईं कि उन्होंने संत तुलसीदास जी को पत्र लिखा और उनसे मार्गदर्शन माँगा कि ऐसी परिस्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए।”

यह सुनकर कुँवर प्रताप ने अपने घोड़े को आगे बढ़ाते हुए पूछा,

“तो फिर तुलसीदास जी ने उत्तर में क्या कहा?”

“सर्वे सम्बन्धाः प्रियजनाश्च तदा एव सार्थकाः भवन्ति,
यदा ते अस्मान् श्रीरामस्य चरणकमलयोः समीपं नयन्ति।”

उधर दूसरी ओर जलाल और मियाँ तानसेन आपस में बातें कर रहे थे। मियाँ तानसेन उन्हें समझाते हुए कह रहे थे,
“तुलसीदास जी भगवान राम के बड़े भक्त थे।

इसलिए जब मीराबाई ने उनसे प्रश्न किया, तो उन्होंने उन्हें ऐसा उत्तर दिया जो उन्हें भगवान की भक्ति के मार्ग की ओर ले जाता है।

जो रिश्ता हमें भगवान राम के करीब ले जाए, वही सच्चा और पवित्र होता है।

बाकी सारे रिश्ते मृगतृष्णा की तरह होते हैं  दिखते तो हैं, पर असली नहीं होते।

रिश्ते हमें भगवान राम से दूर ले जाएँ,
वे वास्तव में भ्रम और छल के समान होते हैं।

वे वैसे ही नुकसान पहुँचाते हैं, जैसे काजल यदि आँखों को ही दुख पहुँचा दे।”

“जो आँखों को ही नुकसान पहुँचाए, उसे आँखों में लगाना उचित नहीं होता। इसलिए मीराबाई को चित्तौड़ छोड़ देना चाहिए।”

“अपने महल-महलात छोड़कर अपना समय भगवान की पूजा और भक्ति में लगाओ।

फिर देखना — मन और आत्मा दोनों में प्रभु भक्ति की परम शांति व्याप्त हो जाएगी।”

यह कहते हुए राजपुरोहित जी घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़ते गए और बोले,

“और संत तुलसीदास जी की सलाह मानकर मीराबाई द्वारका चली गईं। उसके बाद वे फिर कभी चित्तौड़ वापस नहीं लौटीं।”

राजपुरोहित जी की बातें सुनकर कुँवर प्रताप दुखी स्वर में बोले,

“हमारी रानी माँ हमेशा कहा करती थीं 

जब से मीरा माँ ने चित्तौड़ छोड़ा है, तभी से चित्तौड़ का भाग्य भी उसका साथ छोड़ चुका है।”

इतना कहकर वे कुछ देर तक राजपुरोहित जी की ओर देखते रहे, फिर पूछने लगे,

“आपको भी ऐसा ही लगता है क्या, राजपुरोहित जी?”
यह सुनकर राजपुरोहित जी भी दुखी स्वर में बोले,
“हाँ बाबूजी राज… शायद यही सत्य है।

वरना चित्तौड़ पर कभी भी बहादुर शाह का हमला नहीं होता।

वरना रानी कर्णावती को तेरह हजार राजपूत स्त्रियों के साथ जौहर नहीं करना पड़ता।

ऐसा लगता है मानो भगवान ने ही चित्तौड़ की किस्मत उससे रूठ जाने दी हो। बाद में विक्रमादित्य को भी अपने बुरे कर्मों की सजा मिली बनवीर ने उसकी हत्या कर दी।”

“जैसे ही मीराबाई ने चित्तौड़ छोड़ा, उसके बाद समय के क्रोध को कोई भी नहीं रोक सका।

वह तो भला हो पन्ना धाय के अभूतपूर्व बलिदान का, जिसकी वजह से ही आपके पिता जीवित बच पाए।”

राजपुरोहित जी की बातें सुनकर कुमार प्रताप आगे बोले,
“किन्तु इतने प्रयासों के बाद भी नियति के बदलते रंगों के सामने हमारे दाजीराज को भी झुकना पड़ा।

मेवाड़ की प्रजा के हित के लिए उन्हें भी एक अपमानजनक समझौता करना पड़ा और चित्तौड़ किले की चाबियाँ शेरशाह सूरी को सौंपनी पड़ीं।”

उधर दूसरी ओर नदियों और छोटे-छोटे गाँवों से गुजरते हुए मियाँ तानसेन और जलाल आपस में बातें कर रहे थे। जलाल हल्का-सा हँसते हुए बोला,

“लगता है बदकिस्मती का साया चित्तौड़ पर बहुत गहरा है…”

 (Author Note)

आज मैं इससे आगे ज्यादा नहीं लिख पाई। जब मुझे समय मिलेगा, तो मैं इस कहानी को जरूर आगे बढ़ाऊँगी। वैसे भी मैंने इस भाग में बहुत सी बातें संक्षेप में लिखी हैं। मीराबाई को बहुत अधिक कष्ट दिए गए थे, परंतु यहाँ मैंने उनमें से केवल कुछ छोटी-छोटी घटनाएँ ही लिखी हैं।

सच कहूँ तो मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखूँ और क्या छोड़ दूँ। फिर भी जितना मुझसे बन पड़ा, उतना लिख दिया है। आगे मैं इस कहानी को अवश्य जारी रखूँगी।
आप सभी से निवेदन है कि कृपया धैर्य रखें, और यदि आपको यह कहानी अच्छी लग रही हो तो कमेंट, रिव्यू और फॉलो जरूर करें।

इस कहानी में आगे बहुत कुछ होने वाला है। मैं जल्द ही अगले अध्याय के साथ लौटूँगी और इस कहानी को और भी लंबा और रोचक बनाने की कोशिश करूँगी।
तब तक के लिए…

अगले अध्याय में फिर मुलाकात होगी। ✨