Maharana Pratap - Chapter 3 Aarushi Singh Rajput द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Maharana Pratap - Chapter 3

चित्तौड़ 

(राजमहल में)

राणा उदय सिंह जी गंभीर स्वर में बोले 
“कुँवर प्रताप, आज जब भी इतिहास में झांकेंगे, तो दादा भाई के लिए हमारे मन में सदा आदर रहेगा। उन्हीं इसी महल में, मीरा भाभी की भक्ति के लिए एक छोटा-सा द्वीप बनवाया जाए। 

अब वह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, वह तो मीरा भाभी के जीवन का आधार बन गया था  जैसे उस जगह में उनकी आत्मा बसती हो।”

यह सुनकर रानी जयवंता बाई जी प्रसन्न हो उठीं,
“वह अपने समय के सच्चे सहचर थे, राणा जी  ऐसे पति जो अपनी पत्नी की श्रद्धा में सहभागी बने।”

राणा उदय सिंह मुस्कुराकर बोले 
“अच्छा, तो हमने कब किसी को कुछ करने से रोका है?”

रानी जयवंता बाई तुरंत सँभलते हुए बोलीं 
“नहीं नहीं राणा जी! मेरा वह अर्थ नहीं था।”

राणा साहब ने हल्के व्यंग्य में कहा 
“हमें तो ऐसा लगा मानो हमारे पीछे सब रानियाँ यही सोचती हों कि हम एक कठोर, आदेश देने वाले पति हैं!”

इतना कहकर उन्होंने अपने हाथ जोड़ लिए 
“यदि आपको ऐसा लगता है, तो हम क्षमा माँगते हैं।”

रानी जयवंता बाई थोड़ा घबरा गईं, बोलीं 
“कैसी बातें कर रहे हैं आप, राणा जी! आप तो हमारे दृष्टि में सर्वोत्तम पति हैं। भगवान ने हमें आपका साथ देकर आशीर्वाद दिया है, ऐसा सौभाग्य सबको कहाँ मिलता है।”

यह सुनकर राणा उदय सिंह हल्के से मुस्कुराए,
“आपके मुख से ये शब्द सुनकर मन प्रसन्न हो गया।”
उनकी मुस्कान देख सब हँस पड़े।

उधर, जलाल के शाही महल में

जलाल गलियारों से होते हुए द्वार की ओर जा रहे थे। उनके पीछे कुछ खास सिपाही चल रहे थे। तभी सामने से एक स्त्री आई, जिसके पीछे कई दासियाँ थीं। वह रुककर सीधे जलाल के सम्मुख खड़ी हो गई।

जलाल ने कदम रोक लिए 
“अली जान, आदाब। रुख़्सत से पहले हम आपके आरामगाह में आपसे इजाज़त लेने ही आ रहे थे।”

स्त्री ने शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा 
“जलाल, हमने आज तक तुम्हें किसी बात के लिए नहीं रोका। पर अभी महा माँगा और दरबारी बता रहे थे कि तुम द्वारका जाने की तैयारी में हो। द्वारका गुजरात में है, और वहाँ की हुकूमत बहादुर शाह के अधीन है — जो हमारे घोर शत्रुओं में से एक है। यह यात्रा तुम्हारे लिए ख़तरनाक हो सकती है। हमें तुम्हारी फ़िक्र है।”

जलाल ने क्षणभर के लिए कुछ नहीं कहा। तभी पीछे से महा माँगा भी वहाँ आ पहुँची।
उन्हें देखकर जलाल हल्की हँसी के साथ बोले 
“ठीक है, जब आप दोनों हमारे लिए इतनी चिंतित हैं, तो आपके सुकून के लिए हम यह यात्रा एक मुग़ल बादशाह बनकर नहीं, बल्कि एक आम इंसान बनकर करेंगे।”

यह सुनकर उनके सामने खड़ी स्त्री उनकी अम्मी जान  मुस्कुरा उठीं।
“ठीक है जलाल, बस अपना ख़याल रखिएगा ।”

जलाल ने ऊँची आवाज़ में कहा 
“हम कल प्रातः द्वारका के लिए प्रस्थान करेंगे। और हमारे साथ केवल मुट्ठीभर लोग रहेंगे।”

अगली सुबह, चित्तौड़ मे 

महल के द्वार पर अनेक पंडित खड़े थे। उनके सामने कुँवर प्रताप साधारण वेशभूषा में उपस्थित थे — गले में रुद्राक्ष की कई मालाएँ, सफ़ेद कुर्ता, नीचे धोती, लाल पगड़ी और कंधे पर लाल गमछा।
उनके समीप राजपुरोहित जी खड़े थे।

कुँवर प्रताप ने अपने परिवार से विदा लेकर जैसे ही बाहर कदम रखा, सभी पंडितों ने एक स्वर में कहा 
“कुँवर प्रताप की जय हो!”

प्रताप ने हाथ उठाकर सबको शांत किया और गंभीर स्वर में बोले 

इस अभियान में मैं न हम कोई राजकुमार नहीं है हम आप सब की तरह एक साधारण यात्री हूँ — जिसके हृदय में केवल यही इच्छा है कि मेवाड़ की पवित्र आत्मा, हमारी मीरा माँ, को फिर से न्यायपूर्ण स्थान ला सके।”

इतना कहकर उन्होंने अपने घोड़े की लगाम संभाली।
राजपुरोहित जी और कुछ पंडित उनके साथ यात्रा पर निकल पड़े।

महल की मुख्य द्वार पर खाड़ी रानी जयवंता बाई जी भगवान से प्रार्थना कर रही थीं 
“हे भगवान, इनकी यात्रा सफल हो।”

उधर, आगरा से द्वारका की ओर

जलाल अपने घोड़े पर सवार हुए। उनके बगल में मियाँ तानसेन थे।
जलाल ने व्यंग्य भरे स्वर में कहा 
“मियाँ तानसेन, याद रखिएगा  जैसे-जैसे हमारे घोड़े द्वारका की ओर कदम बढ़ाएँगे, वैसे-वैसे आपकी मौत आपके करीब आती जाएगी। 

तानसेन हल्का-सा मुस्कुराए 
“हुज़ूर, आपने अनेक युद्ध लड़े हैं, तलवारों को झुकाया है। मृत्यु से भयभीत चेहरा भला आपसे ज़्यादा कौन पहचान सकता है? पर देखिए, क्या मेरी आँखों में मृत्यु का डर दिखता है?”

जलाल ने तीखी नज़रों से उनकी ओर देखा 
“तुम्हारी इन बेख़ौफ़ आँखों के पीछे का राज़ मीरा बाई पर तुम्हारा विश्वास ही है, है न? देखेंगे, जब हम उनके सामने आपका सिर कटवाएँगे, तो क्या वह तुम्हें बचा पाती है।”

तानसेन ने शांत किंतु अटल स्वर में कहा 
“मुझे पूर्ण विश्वास है, हुज़ूर, यह यात्रा आपको  स्वयं से मिलवाएगी। आपके भीतर जो आत्मा छिपी है  जो न शहंशाह-ए-हिंद है, न स्वयंभू वही आत्मा मीरा माँ की भक्ति से आपके सामने आ खड़ी होगी। और उस क्षण आप जानेंगे कि सच्ची शक्ति तलवार में नहीं, श्रद्धा में है।”

महल के द्वार पर रानी जयवंता बाई जी और रानी सज्जा बाई जी आरती की थाल लिए खड़ी थीं। अभी भी 
उनके पीछे अनेक दासियाँ खड़ी थीं।

रानी जयवंता बाई जी ने दासी से कहा 
“ये तीनों थालियाँ पूजा-कक्ष में रखवा दो।”

रानी सज्जा बाई  
“जिजा, तीन नहीं... अब केवल दो थालियाँ हैं।”

रानी जयवंता बाई ठिठकीं, उनकी आँखों में एक क्षण को उदासी छा गई 
“हाँ... एक थाली अब खाली रह गई है...”

सज्जा बाई बोलीं 
“मुझे पता है, जिजा  आप बहना के लिए कह रही हैं। अगर वह आज हमारे साथ होती, तो कुँवर प्रताप के द्वारका जाने पर यह शून्यता महसूस न होती।”

जयवंता बाई कुछ नहीं बोलीं। बस उनकी आँखों में आशीर्वाद और चिंता एक साथ झलक रहे थे।

महल के भीतर का कक्ष

महल का सबसे विशाल कक्ष स्वर्णजटित द्वारों वाला  इस समय बंद था।
अंदर दीपक की मद्धम लौ काँप रही थी, और उसके प्रकाश में एक स्त्री बैठी थी 
धीरे-धीरे झूलती हुई, मानो किसी बेचैन विचार की लहरों पर हो।

उनके सामने एक दासी खड़ी थी, जिसने धीमे स्वर में कहा 
“राणा जी ने मीरा बाई को वापस लाने के लिए बाबूजी राजप्रताप को द्वारका जाने की अनुमति दे दी है। वे अभी-अभी निकले हैं।”

यह सुनते ही वह स्त्री, जो अब तक अस्थिर थी, अचानक रुक गई।
उसकी साँसें थम गईं, शरीर तन गया।
दीपक की लौ ने क्षणभर उसका चेहरा दिखाया  आँखों में तड़प, चेहरे पर स्थिरता की चादर।

वह बुदबुदाई 
“तो प्रताप सचमुच निकल पड़ा... मीरा के लिए...”

उसके होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी, पर कुछ ही पल में बुझ गई।