द्वारका जाने के रास्ते में दोपहर ढल चुकी थी।
कुँवर प्रताप, राजपुरोहितजी और उनके कुछ साथी एक छोटे से गाँव के बाज़ार में रुक गए।
थोड़ी देर के लिए सबने अपने घोड़े रोक दिए ताकि लोग पानी पी सकें और आराम कर लें।
गाँव का माहौल बहुत सादा था मिट्टी की गलियाँ, इधर-उधर बच्चे खेल रहे थे, और औरतें चूल्हे के पास बैठी बातें कर रही थीं।
कुँवर प्रताप घोड़े से उतरे ही थे कि उनकी नज़र एक छोटे बच्चे पर पड़ी।
वह बच्चा धीरे-धीरे प्रताप के घोड़े के पास जा रहा था, उसे छूना चाहता था लेकिन डर के मारे हाथ पीछे खींच लेता।
कुँवर प्रताप मुस्कराए और बोले,
“क्या हुआ? छूना है इसे?”
बच्चा बोला, “हाँ, पर डर लगता है।”
कुँवर प्रताप हँसकर उसे अपनी गोद में उठाते हैं और कहते हैं,
“डरना नहीं, ये किसी को नुकसान नहीं करता।”
उन्होंने बच्चे का हाथ घोड़े की अयाल पर रख दिया।
बच्चा जैसे खुशियों से भर गया, उसकी आँखें चमक उठीं।
थोड़ी देर बाद कुँवर प्रताप ने उसे नीचे उतारा।
वह बोला, “मैं माँ को बताने जाऊँगा कि मैंने वीरों के घोड़े को छू लिया!”
और फिर हँसते हुए भाग गया।
कुँवर प्रताप हल्के से मुस्कराए उस मासूमियत में उन्हें कुछ अपना-सा लगा।
उसी समय दूर से तेज़ घोड़ों की टाप सुनाई दी।
कुछ सवार धूल उड़ाते हुए आ रहे थे उनके आगे थे शहंशाह जलालुद्दीन , साधारण कपड़ों में, और साथ में मियाँ तानसेन व कुछ और लोग।
तानसेन बोले,
“हुज़ूर, गाँव आ गया है, ज़रा रफ़्तार कम कर लीजिए।”
जलालुद्दीन ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा,
“क़माल करते हो मियाँ तानसेन! पहले तो ये रफ़्तार पकड़ते नहीं थे, अब कहते हो कम कर दें?
हमें ऐसे घोड़े पसंद हैं जो लगाम की नहीं, जज़्बे की सुनें।”
इतना कहकर उन्होंने और तेज़ घोड़ा दौड़ा दिया।
गाँव की गली में घुसते ही उनका घोड़ा काबू से बाहर हो गया।
उसी वक्त वही बच्चा अचानक सड़क पार कर रहा था।
तानसेन चिल्लाए, “हुज़ूर, बच्चा!”
लेकिन उससे पहले ही कोई नौजवान कूदा और बच्चे को अपनी बाँहों में लेकर सड़क के दूसरी ओर कूद गया।
धूल हटते ही सबने देखा — वह कुँवर प्रताप थे।
बच्चा सुरक्षित था, मगर कुँवर प्रताप खुद ज़मीन पर गिर चुके थे।
कुँवर प्रताप उठे और गुस्से में बोले,
“जब घोड़े को काबू में रखना नहीं आता तो दौड़ाते क्यों हो?”
जलालुद्दीन भी तमतमाए, बोले,
“हमसे ऐसे बात करने की जुर्रत?”
लेकिन तभी तानसेन बोले,
“हुज़ूर, यह इलाका हमारा नहीं है, बेहतर होगा हम आगे बढ़ जाएँ।”
जलालुद्दीन ने गुस्से से कुँवर प्रताप को देखा, पर कुछ बोले बिना आगे निकल गए।
पीछे केवल धूल और सन्नाटा रह गया।
वहीं, उस बच्चे की माँ दौड़ती हुई आई और अपने बेटे को सीने से लगाकर रो पड़ी।
कुँवर प्रताप शांत खड़े थे, आँखों में एक अजीब सोच थी
कभी-कभी किस्मत लोगों को ऐसे टकरा देती है, जैसे दो धाराएँ अचानक मिल जाएँ।
रात का समय।
कुँवर प्रताप का डेरा लगा हुआ था।
सामान्य सा तंबू, पर चारों तरफ उनके साथी, रक्षक और कुछ साधु बैठे थे।
कहीं कोई भजन गा रहा था, कहीं कोई ग्रंथ पढ़ रहा था।
राजपुरोहितजी पास बैठे थे।
कुँवर प्रताप ने गंभीर होकर पूछा,
“राजपुरोहितजी, मीरा माँ को चित्तौड़ से निर्वासित किए जाने के बाद
उसके बाद भोजराज जी का क्या हुआ?
सुना है, उन्होंने अंत में अपनी भूल स्वीकार की थी?”
राजपुरोहितजी ने गहरी साँस ली,
“हाँ, कुँवर प्रताप। भोजराजजी को बहुत देर से समझ आया कि
उन्हें देर से समझ आया कि मीराबाई कोई साधारण स्त्री नहीं थीं। वे भक्ति की साक्षात ज्योति थीं।
उनके जाने के बाद चित्तौड़ पर जैसे दुख का साया छा गया।
राणा साँगा का देहांत, फिर लगातार विपत्तियाँ
भोजराजजी समझ गए कि यह सब उस अन्याय का परिणाम है।”
कुँवर प्रताप की आँखें गंभीर हो उठीं
“ मीरा माँ ने जो किया, ठीक ही किया।
जहाँ सम्मान न मिले, वहाँ लौटना ही क्यों?
आत्मसम्मान से बड़ा कोई धर्म नहीं।”
राजपुरोहितजी ने धीमे स्वर में कहा,
“परन्तु मीराबाई फिर लौटी थीं,
कुँवर प्रताप चौंक गए,
“क्या? वो लौटी थीं?”
राजपुरोहितजी ने मुस्कराकर कहा,
“हाँ, भोजराज खुद उन्हें लेने वृंदावन गए थे…
लेकिन भोजराज के रूप में नहीं