राजमहल की अंतरकथा
मेवाड़ के राजमहल का एक शांत कक्ष — ऊँची छतों पर टंगे दीपकों की हल्की लौ में झिलमिलाती परछाइयाँ जैसे इतिहास की परतें खोल रही थीं।
रानी जयवंता बाई धीरे-धीरे एक बड़ा सा संदूक खोलती हैं। अंदर रखे हैं शाही वस्त्र, मणि-मोती जड़े आभूषण और सुगंधित रेशमी कपड़े।
यह देखकर कुँवर प्रताप विस्मय से बोले
“रानी माँ, हम आपसे अपने मीरामाँ के बारे में जानना चाहते हैं। ये शाही वस्त्र और ये आभूषण… क्या ये उन्हीं के हैं?
जब हम उनसे मिले थे, तो वे तो भक्ति और सादगी की मूर्ति प्रतीत हुईं। इन्हें देखकर तो लगता है जैसे वे किसी भिन्न लोक की थीं।”
बगल में खड़े राणा उदयसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा
“कुँवर प्रताप, ये सभी राजसी वस्त्र और आभूषण मीरा भाभी के वैवाहिक जीवन की स्मृतियाँ हैं।
जहाँ उनका मन भक्ति और सरलता में रमा रहता था, वहीं मेवाड़ की बहू होने के नाते उन पर राजघराने की मर्यादाओं का बंधन भी था।”
कुँवर प्रताप ने धीरे से कहा
“एकलिंगजी की शपथ, ऐसे दो विपरीत भावों के बीच तालमेल बिठाना उनके लिए कितना कठिन रहा होगा…”
राणा उदयसिंह ने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया
“कुँवर प्रताप, आप स्वयं भी अपने जीवन में कई बार ऐसी दुविधा का अनुभव कर चुके हो।”
कुँवर प्रताप ने कहा
“हाँ दाजीराज… हमने भी दुविधा देखी है और उसके उपचार का अंतरद्वंद्व भी जिया है।
इसलिए ही हम मीरा माँ की पीड़ा को समझ पा रहे हैं।”
राणा उदयसिंह ने गहरी साँस ली
“किंतु कुँवर प्रताप, दुविधा और पीड़ा के बावजूद उन्होंने अपने मन की सुनी…
और भक्ति का मार्ग चुना।”
इतना कहते हुए उनका मन कहीं अतीत में लौट गया — उस दिन की ओर, जब मीरा भाभी राजमहल के आँगन से बाहर जा रही थीं।
मीराबाई ही वे द्वार तक पहुँचीं, सामने कुछ लोग आ खड़े हुए।
उनमें से एक स्त्री, जो शाही वस्त्रों में सजी थी, क्रोध में चिल्लाई —
“बहुत हठी निकलीं आप, मीरा बाई!
कितनी बार चेतावनी दी कि आप मेवाड़ राजघराने की बहू हैं।
और आप? जब मन आया, गलियों में जाकर गाने-नाचने लगती हैं उन साधारण जनों के साथ!
क्या परिवार की मर्यादा को पूरी तरह मिटा देना चाहती हैं आप?”
मीरा बाई ने शांत स्वर में उत्तर दिया —
“उदा बाई, हमारा विश्वास कीजिए, हम अपनी इच्छा से नहीं गाते।
जब हमारे भीतर गिरधर गोपाल का भाव उमड़ता है, तब हमारा शरीर, हमारी नस-नस…
मानो स्वयं कृष्ण में विलीन हो जाती है।
हमने उनसे विनती की है — ‘कन्हा, अब बस करो… हमें इस देह की पीड़ा से मुक्ति दो।’
पर वे हैं कि सुनते ही नहीं।
बताइए, जब कोई भक्त पुकारे और भगवान न सुनें… तो वह भक्त जिएगा किसके लिए?”
इतना कहकर मीरा ने उदा बाई के हाथ पकड़ लिए
“हमें इस देह के बंधन से मुक्त कर दो, उदा बाई…”
उदा बाई ने क्रोध में हाथ झटकते हुए कहा
“दूर हटो! हम तो पहले से ही जानते थे कि आप पागल हो गई हो।
जैसे वृंदावन की गोपियाँ कृष्ण के लिए पागल थीं, वैसे ही आप भी हो!”
मीरा बाई की आँखों में उदासी उभरी। उन्होंने धीरे से कहा
“वृंदावन की वे गोपियाँ कितनी सौभाग्यशाली थीं…
जिन्हें अपने गिरधर गोपाल के संग कुछ पल बिताने का अवसर मिला।”
इतना कहकर वे शांत भाव से बाहर की ओर चली गईं — जैसे किसी और ही लोक की ओर प्रस्थान कर रही हों।
पीछे उदा बाई और उनके भाई क्रोध में तिलमिला उठे।
राजमहल में पुनः वर्तमान
इतना कहकर राणा उदयसिंह कुछ क्षण मौन रहे।
कुँवर प्रताप ने आदरपूर्वक कहा
“तो मीरा माँ राजपरिवार की अनुमति के बिना ही आम जनता के बीच जाकर भजन गाया करती थीं?”
राणा उदयसिंह ने खिड़की से बाहर दूर के आकाश की ओर देखते हुए कहा —
“हाँ, कुँवर प्रताप।
वे सारी रात साधारण जनों के साथ भक्ति में डूबी रहतीं।
उनकी दृष्टि में सब एक समान थे — राजा हो या रंक।
जो भी उनके संग कृष्ण भक्ति में जुड़ जाता, वह उनका अपना बन जाता।
जहाँ वे खड़ी होतीं, वहीं सत्संग प्रारम्भ हो जाता।
और उस क्षण लगता मानो वे किसी और ही लोक में विचर रही हों।
उनका शरीर यहीं रहता था, पर आत्मा कृष्ण में लीन रहती थी।”
फिर वे धीमे स्वर में बोले
“और हाँ प्रताप… कई बार तो भगवान कृष्ण स्वयं उन्हें साक्षात दर्शन देते थे।”
कुँवर प्रताप चौंक उठे
“पर दाजीराज, रानी माँ ने तो कहा था कि किसी साधारण व्यक्ति में भगवान के दर्शन का सामर्थ्य नहीं होता।”
रानी जयवंता बाई ने कोमल स्वर में कहा
“कुँवर प्रताप, मीरा भाभी साधारण व्यक्ति नहीं थीं।
वे तो ऐसी भक्ति की मूर्ति थीं जिन्होंने अपना तन, मन और प्राण सब कुछ कृष्ण को अर्पित कर दिया था।”
राणा उदयसिंह ने आगे कहा —
“कुँवर प्रताप, मीरा भाभी को न केवल साधारण जन, बल्कि छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े
सब सम्मान देते थे।
उनका स्नेह, उनका भजन, उनकी भक्ति — सबमें एक अद्भुत तेज था।
जब वे गाती थीं, तो मानो स्वयं कृष्ण उनके स्वर में उतर आते थे।”
कुछ समय बाद महल के भोजन-कक्ष में चार लोग बैठे थे
कुँवर प्रताप, राणा उदयसिंह, रानी जयवंता बाई और रानी सजा बाई।
सुगंधित धूप और थालों में सजे व्यंजन वातावरण में राजसी गरिमा घोल रहे थे।
कुँवर प्रताप मुस्कराए
“दाजीराज, कभी-कभी हमारा भी मन करता है कि हम भी उन्हीं भक्ति-भाव में डूबे बच्चों में होते।
कितना अद्भुत होता न — जब संसार भूलकर केवल कन्हा का नाम लिया जाए!”
राणा उदयसिंह ने स्नेहभरी दृष्टि से पुत्र को देखा।
उनके हृदय में गर्व और अपनापन एक साथ उमड़ आया —
एक ऐसा पुत्र, जो राजसी रक्त का वारिस होते हुए भी भक्ति की गहराई को समझता था।
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