अन्तर्निहित - 37 Vrajesh Shashikant Dave द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अन्तर्निहित - 37

[37]

“राहुल, तुमने वत्सर को छोड़ दिया? हमें अपने साथ लेकर चलना था।”

“सोनिया, तुम जानती हो कि वहाँ सारा गाँव जमा हो गया था। वहाँ से भागते नहीं तो हम फंस जाते।”

“अब क्या? वह मंगलवार को न्यायालय नहीं पहुँचा तो क्या होगा?” 

“वह अवश्य आएगा।”

“नहीं आया तो?”

“वत्सर सामान्य नागरिक है भारत का, कोई विशिष्ट व्यक्ति या राजनीति करनेवाला नहीं है। अत: वह अवश्य आएगा।”

“सो तो है।”

“वैसे तो हम उस मंदिर से खाली हाथ लौट आए हैं, अभी हम यहीं छिपकर ही रहेंगे। देखते हैं कि वत्सर क्या करता है। थोड़ा सा भी संदेह हुआ तो पकड़ लेंगे।”

“उस समय गाँव वाले होंगे तो?”

“रात को जब सारा गाँव सो रहा होगा, तब जाकर उठा लेंगे।”

“अभी क्या करें?”

“वत्सर पर दृष्टि बनाये रखो।”

दोनों वत्सर की गतिविधियों को देखने लगे।”

मंदिर बंद कर वत्सर घर आया। यात्रा की तैयारी कर निकल पडा न्यायालय के आदेश का पालन करने। राहुल सोनिया भी पीछे पीछे चल पड़े। 

“वत्सर समीप के नगर से ट्रेन पकड़ेगा। ट्रेन में चड़े उससे पूर्व ही पकड़ लेते हैं।”

“नहीं, सोनिया। अभी नहीं।”

“क्यों नहीं? इस मार्ग पर उसे बचाने कौन आएगा?”

“पकड़ तो सकते हैं किन्तु हमें ऐसा नहीं करना है। इसके दो कारण है, एक, वह स्वयं न्यायालय में उपस्थित होने जा रहा है। दूसरा, विधि के अनुसार यदि हमारे पास पर्याप्त प्रमाण होते कि मीरा का वध वत्सर ने ही किया है तो सीधे ही पकड़ लेते।”

“प्रमाण तो है। उस शिल्प के साथ वत्सर के चित्र, चलचित्र हैं। वह प्रमाण नहीं तो और क्या है?”

“वह पर्याप्त नहीं है, सोनू।”

“तो न्यायालय में अभियोग किस आधार पर लड़ेंगे?”

“तर्क और अनुमान पर।”

“किन्तु न्यायालय इसे मानेगा?”

“न्यायालय हमारा ही तो है।”

“क्या होगा वहाँ?”

“न्यायालय में ही देख लेना।”

वत्सर जिस ट्रेन में चड़ा वह दिल्ली जा रही थी। राहुल सोनिया भी उसीमें चड गए। वत्सर इस बात से अनभिज्ञ था। 

“पूरी यात्रा में हमें उस पर दृष्टि बनाये रखनी होगी।” सोनिया ने कहा, राहुल ने सम्मति दी। ट्रेन चलने लगी, चलते चलते दिल्ली आ पहुंची। वाहन से वत्सर फिरोजपुर चल पड़ा। फिरोजपुर जा कर किसी होटल में चला गया। वत्सर पर दृष्टि रखने के लीये सोनिया ने अपने व्यक्तियों को होटल में नियुक्त कर दिया। 

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फिरोजपुर न्यायालय का प्रांगण। प्रात: दस बजे का समय। सारा और शैल न्यायालय क्रमांक सत्रह पर जा पहुंचे। दोनों उद्विग्न थे, ‘किस निर्दोष पर अभियोग चलेगा?’ दोनों ने यह जानने के लिए प्रयास किया किन्तु विफल। अधीर होकर प्रतीक्षा करने लगे। कुछ ही क्षणों में राहूल  – सोनिया भी आ गए। उन्होंने सारा शैल को देखा, तिरस्कृत दृष्टि से। सारा – शैल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। 

“हमें अपने भावों को अप्रकट ही रहने देना है। किसी भी बात से हमें विचलित नहीं होना है, शैल।”

“जी, मैं पूरा प्रयास करूंगा।”

“मैं जानती हूँ कि तुम किसी भी प्रकार के असत्य को सह नहीं पाओगे। हमें धैर्य बनाये रखना है। अपने क्रोध को नियंत्रण में रखकर उचित समय पर ही उसे शक्ति के रूप में प्रयोग करना है। गुरुजी के शब्दों का स्मरण तो है न, शैल?”

“गुरुजी के शब्दों पर इतना विश्वास है आपको?”

“समय आने पर तुम भी विश्वास करने लगोगे।”

न्यायाधीश के आगमन की सूचना होते ही कक्ष में स्थित सभी व्यक्ति मौन हो गए। खड़े होकर न्यायाधीश का अभिवादन किया। जब उसने अपना स्थान ग्रहण कर लिया तब सभी ने अपने अपने आसन ग्रहण किए। 

प्रथम एक घंटे में अन्य तीन घटनाओं पर न्यायायले ने कार्य किया। मीरा वध का क्रमांक चौथा था। 12.17 बजे उसका क्रम आया। सारा – शैल जागृत हो गए, प्रतीक्षा करने लगे। अभियुक्त को प्रस्तुत किया गया। उसे देखते ही सारा – शैल चकित रह गए। 

“वत्सर !” दोनों के होंठों से अति मंद स्वर में शब्द निकले। न्यायालय की गरिमा को बनाये रखते हुए शांत ही रहे, मौन हो गए। सारा ने शैल को देखा। उसके मुख पर क्रोध के भाव थे। सारा ने उसे संकेतों से ही शांत रहने को कहा। शैल ने स्वयं के भावों पर नियंत्रण रखा। वत्सर एक कुर्सी पर बैठ गया। 

अधिवक्ता कपिल सिंघवी ने पक्ष रखते हुए कहा, “मी लॉर्ड।” शीघ्र ही न्यायाधीश ने उन्हें रोका, “महोदय, मेरे लिए आप यह ‘मी लॉर्ड’ सम्बोधन नहीं करेंगे।”

“क्यों मी लॉर्ड?”

“यह संबोधन अंग्रेजों का है, हमारा नहीं। स्वतंत्रता प्राप्त हुए हमें 75 से अधिक वर्ष हो गए हैं।”

“यही सम्बोधन का प्रयोग सभी न्यायालयों में होता आ रहा है।”

“मेरे लिए प्रयुक्त नहीं होगा। कब तक दासता की मानसिकता साथ रखोगे?”

“तो आपको क्या संबोधन करें?”

“महाशय शब्द का प्रयोग कर सकते हो।”

“ठीक है महाशय।” कपिल रुका, न्यायाधीश की सम्मति के पश्चात बोला, “महाशय, नदी के प्रवाह में एक मृतदेह प्राप्त हुआ है। मीरा का।”

“क्या मृतदेह की परख हो गई है?”

“नहीं महाशय। पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट, डीएनए रिपोर्ट आदि से कुछ विशेष ज्ञात नहीं हो सका है।”

“किस आधार पर कह सकते हो कि उसका वध हुआ है? कौन है यह मीरा? किसने की है हत्या?” 

“उस मृत कन्या के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। वह कौन है? कहाँ से आई है? किस देश - प्रदेश की है? मृत्यु कैसे हुई? किसने मारा आदि सभी प्रश्न अनुत्तरित ही है, महाशय।”

“तो उसका नाम मीरा है वह कैसे ज्ञात हुआ?” 

“यह नाम तो उसे शैल ने दिया है।”

“शैल कौन है? उसे प्रस्तुत करो।” शैल प्रस्तुत हुआ। 

“कहो, इसका नाम मीरा कहाँ से आया?”

“उसके विषय में कुछ भी ज्ञात न होने पर उसे बार बार मृत लड़की कहना उचित नहीं लग रहा था अत: उसे कोई नाम देना चाहा तो मीरा नाम दे दिया।”

“मीरा ही क्यों? अन्य कुछ क्यों नहीं है।”

“मीरा नाम प्राय: सभी धर्मों में, सभी देश – प्रदेशों में सामान्य रूप से पाया जाता है। बस यही कारण था।” 

“क्या इस घटना का अन्वेषण तुम कर रहे हो?”

“यह घटना का अन्वेषण मुझे सौंपा गया था किन्तु अब मुझे हटाकर राहुल – सोनिया को दिया गया है।”

“श्रीमान कपिल महोदय, जब डीएनए रिपोर्ट, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट यदि से मृत्यु के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है तो फोरेंसिक जांच क्यों नहीं करवाई?”

“महाशय, उस पर काम चल रहा है।”

“अभी तक क्या प्रगति है?”

“कुछ खास नहीं।”

“जब आपको यह व्यक्ति कौन है? कहाँ से आई है? किस प्रदेश की है? नाम क्या है? मृत्यु कब और कैसे हुई? कहाँ हुई? किसने हत्या की? कैसे की? क्यों की.. ..?”

“महाशय, इसकी हत्या ..।”

“महोदय, जब मैं अपनी बात पूर्ण न कर लूँ तब तक उसे सुनने का और समझने का धैर्य रखना सीखो, श्रीमान कपिल जी। आप वरिष्ठ अधिवक्ता हो।”

“जी महाशय। क्षमा चाहता हूँ।”

“इस हत्या का कारण क्या है? आदि जो भी मैंने प्रश्न किये उसमें से किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं है तो न्यायालय में आप क्यों आए हो?” न्यायालय में कुछ क्षण मौन व्याप्त हो गया। न्यायाधीश ने आगे कहा, “किस आधार पर इस व्यक्ति पर अभियोग चला रहे हो?”

“महाशय, मीरा की हत्या इसी व्यक्ति ने की है।”

“किस व्यक्ति ने?”

“इसने, वत्सर ने।” अधिवक्ता कपिल ने वत्सर के प्रति संकेत किया। वत्सर न्यायाधीश के सम्मुख उपस्थित हो गया।