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“प्रात: काल की नूतन ऊर्जा और गुरुजी के आशीष से मैं अपने मार्ग पर चलने को सज्ज हूँ। तुम सज्ज हो न, शैल?”
“जी। गुरुजी को प्रणाम कर चलते हैं।”
दोनों गुरुजी की तरफ चलने लगे। एक वृक्ष के नीचे गुरुजी किसी ग्रंथ का अध्ययन कर रहे थे।
“प्रणाम गुरुजी। हमें अनुमति दें।”
“आपका मंगल हो।”
दोनों चल पड़े।
“रुको।” दोनों रुक गए।
“आज आप उस मार्ग पर नहीं चलोगे जहां जाने की आपकी योजना है।”
“तो?”
“आज विपरीत मार्ग पर जाना पड़ेगा आपको।”
“अर्थात?”
“अपने कार्यालय लौटना पड़ेगा।”
“वह तो हमारा लक्ष्य नहीं है। उस मार्ग पर तो. . ।”
“उस मार्ग से ही लक्ष्य का मार्ग निकलेगा। बस लौट जाओ।”
“कैसे गुरु जी? क्यों गुरुजी?”
“बस वह समय आ ही गया है।” गुरु जी ने कहा।
उसी क्षण आश्रम के द्वार पर एक जीप रुकी। उसमें से उतरकर नदीम शैल – सारा की तरफ बढ़ा। गुरुजी ने दोनों को उस तरफ देखने का संकेत किया। दोनों ने देखा। गुरुजी की बातों का अर्थ अब दोनों की समज में आया।
नदीम ने गुरुजी को देखा। उसने उनकी अवगणना की और सीधे सारा और शैल के पास जाकर उन्हें एक पत्र पकडा दिया।
“क्या है?”
“स्वयं पढ़ लो।”
दोनों ने पत्र पढ़ा।
“यह तो न्यायालय का बुलावापत्र है। किस घटना में हमें प्रस्तुत होना है?”
“वही, मीरा मृत्यु घटना। जिसका अन्वेषण आप दोनों कर रहे थे।” नदीम ने व्यंग किया।
“अब तो हम इस घटना से मुक्त कर दिए गए हैं तो हमें क्यों बुलाया है?”
“वह तो न्यायालय ही बताएगा। दो दिन पश्चात फिरोजपुर न्यायालय में उपस्थित हो जाना।”
“हमें क्यों बुलाया जा रहा है? उस घटना से अब हमारा कोई संबंध नहीं रहा है।”
“मेरा काम था आप दोनों तक यह पत्र पहुंचना, सो हो गया। मैं तो चला।” नदीम चलने लगा।
क्षणभर रुका, पलटा।
“इस पर आप दोनों हस्ताक्षर कर दीजिए।”
“कैसे हस्ताक्षर?”
“न्यायालय का पत्र प्राप्त हो चुका है उसकी पुष्टि के लिए यह आवश्यक है। यह प्रक्रिया से तो आप दोनों भली भांति अवगत हो।”
नदीम ने पत्र दिया, कलम भी। दोनों ने हस्ताक्षर कर दिए, नदीम चला गया।
दोनों ने गुरुजी तरफ देखा। उनके मुख पर मंद हास्य था। आँखों में दिव्यता थी। उसे देख दोनों के उद्विग्न मन को सांत्वना मिली।
शांत होकर सारा ने पुछा, “यह कैसी नियति है गुरुजी?”
“यही नियति है, सरिता। यह विपरीत मार्ग ही आप दोनों को सही मार्ग पर ले जाएगा। धैर्य रखना। नियति पर विश्वास रखन।”
“यहाँ तक आकर लौट जाने से मन अधीर हो उठा है। यह कैसी विडंबना है?”
“यह विडंबना ही विजय की चाबी है। इस मार्ग से आप जो प्राप्त करोगे वह इतना मूल्यवान एवं दुर्लभ होगा जिसे आज तक कोई भी मनुष्य नहीं पा सका है।”
“इतना विशिष्ट है क्या वह?”
“क्या आप जैसे ऋषियों के लिए भी वह दुर्लभ है?”
“जिस रहस्य को प्राप्त करोगे उसे प्राप्त करना ऋषियों के लिए भी दुर्लभ होता है।”
“कैसा रहस्य है गुरुजी?”
“उचित समय आने तक उसे भी रहस्य ही रहने दो। अब दोनों लौट जाओ। विलंब न करो। न्यायालय आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।”
मन में अनेक प्रश्न, अनेक दुविधा लेकर शैल और सारा फिरोजपुर के लिए निकल पड़े।
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“शैल, गुरुजी की बातों का अर्थ अब समज में आ रहा है।”
“क्या?”
“लक्ष्य को प्राप्त करने से पूर्व हमारी कड़ी कसौटी होने वाली है। प्रतीत होता है कि उसका प्रारंभ हो चुका है।”
“यही तो गुरुजी का कथन था, हैं न?”
“मैं यही कहना चाहती थी।”
“तो अब गुरुजी के वचनों पर श्रद्धा रखकर जो भी विघ्न आएंगे उसका हम प्रतिकार करेंगे।”
“और उन विघ्नों से विचलित नहीं होंगे।”
“जी, सारा जी।”
“शैल, तुम कह रहे थे कि राहुल और सोनिया मीरा का रहस्य खोज निकालेंगे। किसी न किसी को दोषित सिद्ध कर देंगे। किसको दोषित सिद्ध करने के लिए यह अभियोग चलाया होगा? किसके विरुद्ध न्यायालय में सारी प्रक्रिया होगी?”
“किसी निर्दोष को ही पकड़ा होगा।”
“कौन होगा वह निर्दोष?”
“नहीं जानता।”
“कोई अनुमान?”
“वे दोनों अनुमान से परे हैं।” शैल विचार में पड गया। सारा भी।
“शैल, अपना एक व्यक्ति वहीं कार्यालय में ही है। उससे बात करो न?”
“कौन? विजेंदर?”
“हाँ, वही। फोन लगाओ उसे।”
“यह बात मैं कैसे भूल गया? विजेंदर भी कैसे भूल गया हमें इस बात की सूचना देने से?”
शैल ने विजेंदर को फोन लगाया।
“जी महाशय।”
“विजेंदर, यह बताओ कि राहुल – सोनिया ने किसके विरुद्ध न्यायालय में अभियोग लगा दिया?”
“कोई जानकारी नहीं है।”
“क्यों? क्या हो गया?”
“बड़ी गुप्तता से सब कुछ हुआ है। किसी को कुछ भी जानकारी नहीं है।”
“तो जानकारी प्राप्त कर मुझे बताओ।”
“नहीं कर सकता मैं।”
“क्यों? क्या हो गया है तुम्हें? या तुम भी उसके साथ मिल गए हो और मुझे बताना नहीं चाहते?”
“मैं कभी उन लोगों के साथ नहीं मिल सकता। यह बात आप भी जानते हैं, महाशय।”
“तो क्या बात है? कहो न?”
“राहुल और सोनीया के अतिरिक्त सभी कर्मचारियों को नदीम ने बलात अवकाश पर भेज दिया है। मुझे भी। यही कारण है कि कोई जानकारी नहीं मिल रही है।”
“वह ऐसा कैसे कर सकता है? इतनी चालाकी? ठीक है। वह सब अभी छोड़ो। हम दोनों लौट रहे हैं। तुम्हारे घर पर मिलेंगे। अपना ध्यान रखना।” शैल ने वार्तालाप सम्पन्न किया।
“क्या हुआ?” सारा ने प्रश्न किया।
“सभी को अवकाश पर भेज कर बड़ी गुप्तता से काम कर रहे हैं दोनों।”
“और नदीम का पूरा सहयोग मिल रहा होगा।”
“यही तो।”
“कौन होगा वह निर्दोष व्यक्ति?”
“वह तो अब दो दिन के पश्चात न्यायालय में जाकर ही ज्ञात होगा।” शैल ने कहा, सारा ने गहन नि:श्वास छोड़ा।
“हम क्या कर सकते हैं? हमें क्या करना चाहिए?”
“कुछ समज नहीं आ रहा।”
“हम इतना तो कर सकते हैं कि यदि वह व्यक्ति निर्दोष है तो उसे बचाना होगा। किसी निर्दोष को दंडित नहीं होने देंगे हम। क्या कहना है शैल?”
“हम प्रयास कर सकते हैं।”
“तुम्हारे शब्दों में विश्वास नहीं दिख रहा, शैल।”
“आप नहीं जानती यहाँ की प्रणाली को। यहाँ ऐसी व्यवस्था रची जा सकती है कि किसी भी निर्दोष को दोषी सिद्ध कर दिया जाता है। निर्दोषता स्वयं को ही सिद्ध करनी पड़ती है। जाल में ऐसा फंसा देते हैं कि व्यक्ति निर्दोष होते हुए भी अपराध स्वीकार लेने पर विवश हो जाता है।”
“इसका अर्थ है, सरकार किसी की भी हो प्रणाली तो हमारी ही चलेगी। यही तो कहा करते हैं सपन और निहारिका।”
“उनका कहना सत्य है।”
“जो भी हो, हमें हार नहीं मनानी है। एक बात अच्छी हुए कि न्यायालय ने हमें पक्षकार बनाया है। हमारे रहते हम उनकी योजना को सफल नहीं होने देंगे।”
“यही कर सकते हैं हम। यही नियति होगी। कदाचित गुरजी के शब्दों का यही तात्पर्य होगा।”