लगभग एक घंटे के सफर के बाद त्रिशा अपने मायके लौट आई जहां उसका स्वागत बड़े ही लाड़ प्यार से हुआ। घर के हर एक सदस्य त्रिशा पर लाड़ प्यार ऐसे बरसाने लगा ऐसा लग रहा है कि सारा प्यार आज ही दिखा देगे। कल्पना तो अपनी बेटी को देखकर आज खुशी से इतनी बावली हो रही है कि पूछो मत। उसने तो आज खाना भी सारा त्रिशा की पसंद का ही बनवाया है।
त्रिशा से मिलने के लिए केवल उसके घरवाले ही नहीं बल्कि उसकी चहेती दोस्त महक भी दौड़ी हुई आई है। सब उस से बार बार उसके ससुराल के बारे में, वहां के लोगे के बारे में, उनके व्यवहार के बारे में, राजन के व्यवहार के बारे में पूछ रहे है और त्रिशा भी सबको खुशी खुशी जवाब दे रही थी और सबको बता रही थी कि कैसे वहां सब उसके साथ अच्छे से व्यवहार करते है।
उसकी भाभी और उसकी दोस्त तो उसे राजन के बारे में पूछ पूछ कर, तो कभी उसके दिए गिफ्ट और मोबाइल फोन के लिए बोल कर उसे चिड़ा रही है और त्रिशा बेचारी बस शर्मा के रह जाती है।
उसके चेहरे की खुशी को देखकर आज कल्पना और कल्पेश का मन संतुष्ट हो गया क्योंकि उन्हें इस बात की तसल्ली जो हो गई है कि राजन के रुप में उन्होनें एक सही जीवनसाथी अपनी बेटी के लिए चुना है और उन्हें खुशी है इस बात की उनकी बेटी सुखी है।
हंसी ठिठोली लाड़ प्यार के बीच त्रिशा के यह दिन यहां अपने मायके में बीतने लगे और वैसे भी उसके पास यहीं एक महीना है यहां कानपुर में अपने घरवालों के साथ बिताने को क्योंकि फिर तो वह राजन के साथ पूना चली जाएगी तो फिर पता नहीं इतनी दूर से कब ही उसका यहां आना होगा।
वैसे त्रिशा खुश तो बहुत थी अपने मायके मे और खुश हो भी क्यों ना भला यहां सब लोग उसे बहुत लाड़ प्यार से जो रख रहे है। कोई एक बर्तन तक नहीं उठाने देता उसे। एकदम महारानी वाले ठाट है उसके, पर यहां फिर भी उसे रह रह कर कभी कभी राजन की याद आ जाती। जिसपर या तो वह मुस्कुरा देती या फिर शर्मा देती।
इस एक महीने में ऐसा कोई भी दिन नहीं बिता था जब राजन का फोन ना आया हो और त्रिशा और राजन ने घंटो फोन पर बात ना की हो। सुबह ऑफिस जाने से पहले, दोपहर में लंच ब्रेक के समय और रात में घर आने के बाद यह तीन टाईम पक्के होते थे जब राजन फोन करता ही था और त्रिशा भी घड़ी देखकर राजन का फोन आने से पहले ही फोन हाथ में पकड़ कर अपनी कमरे में एकांत में चली जाती थी ताकी आराम से बात कर सके।
वैसे तो घर में सभी को पता है कि राजन और त्रिशा फोन पर लगे रहते है और सबकी इस पर अपनी अपनी अलग अलग प्रतिक्रिया भी है। जहां कल्पेश और सुदेश इस बात को अनदेखा करते है क्योंकि उन्हें इस जगह बोलना ठीक नहीं लगता वहीं दूसरी ओर उसकी मां और मामी उसपर हंसते और त्रिशा की भाभी, उसके चारों भाई और उसकी सहेली महक इस बात पर उसे दिन भर छेड़ते और सताते।
पर खैर जो भी हो यह एक महीना कितनी जल्दी बीता यह किसी को पता ना चला। आज त्रिशा को लेने राजन आ रहा है जो आज रात की ही ट्रेन से पूना वापिस जाएगा। इसलिए पूरा घर त्रिशा के सामान को पैक कराने और दामाद के स्वागत सत्कार में लगा है। और लगे भी क्यों ना शादी के बाद आज पहली बार दामाद घर जो आया है।
पूरा खानदान आज राजन के आगे पीछे घूमने में लगा है जैसे दामाद नहीं भगवान साक्षात धरती पर आ गए हो। कभी चाय, कभी समोसे, कभी हलवा, कभी पूरी सब्जी, कभी कुछ तो कभी कुछ। खैर पूरे दिन के स्वागत सत्कार के बाद जब वापस जाने का समय आया तो त्रिशे के घर के सभी लोगों ने एक बार फिर से नम आंखों से अपनी लाड़ली गुड़िया को विदा किया।
और त्रिशा भी आज एक बार फिर अपने परिवार के सदस्यों को छोड़कर जाते समय भावुक हो उठी और उसकी आंखे भी नम हो गई। लड़कियां चाहे मायके में कितने दिन क्यों न बिता ले वापस ससुराल जाते समय जो अपने माता पिता से बिछड़ने का दुख होता है वो आंखे नम करा ही देता है। ऐसा त्रिशा ने सुना था पर आज उसने यह अनुभव भी कर लिया। आज फिर जाते जाते उसे लग रहा है कि जैसे आज फिर एक बार जाने से पहले वो अपना एक हिस्सा यहां इस घर में छोड़ कर जा रही है।
रात की ट्रेन से त्रिशा और राजन पुने के लिए वापसी की ट्रेन में बैठ चुके थे। सफर लंबा था लगभग एक दिन पूरा ही मान लो पर दोनों का यह सफर पिछली एक महीने की सारी बातों को करते करते कब पूरा हो गया उन्हें पता ही नहीं चला।
त्रिशा और राजन अपने बीच की उस कड़वी रात की यादों को पूरी तरह भुला चुके थे और अब अगले दिन जब वो पुना पहुंची तो आज से सही मायने में उसके वैवाहिक जीवन का आरंभ हुआ। क्योंकि अब उसे अपने घर की सारी जिम्मेदारियों को निभाना था। उस मकान को घर बनाना है। अपना परिवार बसाना है