प्रेम न हाट बिकाय - भाग 43 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 43

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‘कमाल ही है !’ यह सब पढ़ते हुए अनामिका के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई | हमारे यहाँ तो शादियों में एक-दूसरे के साथ सजने का कॉमपिटिशन चलता है | भला यह क्या बात हुई कि सजना–सँवरना भी किसी नियम के तहत हो !लेकिन जो है, सो है –वह आगे जानने के लिए और भी उत्सुक हो उठी –

रंजु ने इसमें जापान के उपहारों के बारे में लिखा था, वह आगे पढ़ने लगी--

“जापानी लोग उपहार लेन-देन को बहुत पसंद करते हैं।जापान में  साल में दो बार उपहार देने का सीज़न होता है। गर्मियों में इसे ‘चयुगेन’ कहते हैं । इसकी कीमत 500 रु. से शुरू होती है |इसका औसत खर्च 1 हजार रु. तक होता है। यह अपने से बड़ों को दिया जाता है। जैसे अपनी कम्पनी का बॉस, शिक्षक, माता-पिता, दादा-दादी आदि-- कभी-कभी अपने दोस्त को भी जिसने आपकी काफ़ी मदद की हो उसको धन्यवाद देने के लिए देते हैं । यह धन्यवाद उस व्यक्ति को भी दिया जाता है जिसको कहना हो कि ‘आपकी कृपा से मेरा काम अच्छा चल रहा है।‘उपहार का अर्थ इस प्रकार का कोई संदेश देना होता है। 

दूसरा उपहार देने का मौसम सर्दियों में होता है ।
उपहारों में दिए जाने वाले सीज़न्स में बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स में बहुत भीड़ और उत्साह दिखाई देता है | भारत में हम जैसे दीपावली में एक-दूसरे को उपहार देते हैं कुछ इसी प्रकार का मौसम यहाँ पर उपहारों का होता है। 
बच्चे के जन्म पर भी उपहार भेजे जाते हैं। जब भी उपहार दिया जाता है। या किसी ने हमको उपहार भेजा उसके एक सप्ताह के अंदर-अंदर धन्यवाद के रूप में हमें भी उसकी आधी कीमत का कुछ भेंट भेजनी चाहिए।यहाँ पर हम ‘रिटर्न गिफ्ट्स’ दिए जाते हैं |कोई कुछ देता है का नियम है किसी ने कुछ दिया उसका आदर करके उसको भी कुछ दिया जाना चाहिए।“

     अनामिका को उपहारों की बात पढ़ते ही पुरानी बातें याद आने लगीं, वह उन पिछले दिनों की गलियों में खो गई जब पीएच.डी के दिनों में उन सारे शैतानों ने उसे रक्षाबंधन पर राखी बांधने का फैसला किया था |राखी के दिन वे सारे मिलकर अनामिका के घर पहुँच गए थे | शीनोदा को उनके ग्रुप में मिले हुए कुछ ही दिन हुए थे | वह यहाँ के त्योहारों के बारे में, खास रक्षाबंधन त्योहार के बारे में तो कुछ अधिक नहीं जानता था |

   वह पहला रक्षाबंधन था जो वह इन्जॉय करना चाहता था |वह जानना चाहता था आखिर यह त्योहार कैसे मनाया जाता है?उसने अपने सभी दोस्तों से इसके बारे में बात कर ली और सब दोस्तों से कह दिया कि उसे साथ लेकर ही आना दीदी के घर जाएँ| सब दोस्त आपस में सलाह कर रहे थे कि अनामिका दीदी से सब पहली बार राखी बँधवा रहे हैं तो उनके लिए कुछ अच्छी सी गिफ़्ट लेकर जाना चाहिए |कब से उनके हाथ का बना खाते रहते हैं |कभी उनके यहाँ से अचार उठा लाते हैं तो कभी कोई मिठाई या कुछ बनवाकर ले आते हैं |अक्सर सारे ही तो रामी से खासतौर पर कुछ न कुछ बनवाकर खाते रहते हैं| इसलिए उनके मन में उस बार रक्षाबंधन का त्योहार आना के साथ मनाने की तीव्र उत्कंठा थी, सभी उत्साहित थे| 

   अनामिका के लिए कोई अच्छी सी साड़ी खरीदने का निर्णय लिया गया|जितने की साड़ी होगी, उस एमाउंट को राजेन्द्र और अशोक बाँट लेंगे, मयंक ने कहा वह भी उन लोगों के साथ साझा करेगा|शीनोदा भी कहना चाहता था कि वह उनके साथ कंट्रीब्यूट करेगा लेकिन न जाने क्यों संकोचवश कह नहीं सका |त्योहार के दिन सब मिठाई, फल, बच्चों के लिए चॉकलेट्स लेकर आना के घर पहुँच गए, उनमें शीनोदा भी था |आना और विवेक का हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया था कैसे पहुँचे थे सकुचाते से सारे के सारे जैसे पहली बार आए हों और वो भी आना के मायके से जैसे सिंधारा लेकर आए हों| 

“सच्ची !आज तो लग रहा है कि अनामिका के मायके से उसके भाई आए हैं | एक बात बताओ, तुम ये सारी फॉर्मैलिटीज़ कहाँ से सीखकर आए हो ?” विवेक ने पूछा था | 

“क्या गौड़ साहब, आप भी---हम कोई शीनोदा हैं जो हमें कुछ पता नहीं है | बस, ज़रा सा संकोच हो रहा था | हम अपनी आना दीदी के लिए कभी कुछ नहीं ले न ?”राजेन्द्र ने उत्तर दिया|

   सोफ़े में घुसे हुए शीनोदा ने अपना नाम सुनकर थोड़ा सा मुँह ऊपर उठाया जिसे वह सामने मेज़ पर रखे हुए अखबार में गड़ाकर बैठा था, एक बार हल्का सा  मुस्कुराया और फिर से उसी अखबार में आँखें गड़ाकर बैठ गया जैसे सारे अखबार को अभी घोलकर पी जाएगा|    

“कमाल हो ! इस सबकी ज़रूरत थी ?वैसे भी आना दीदी तुम सबसे बड़ी नहीं है ?” 

अनामिका ने उन्हें घूरकर देखा| 

“तो—बहन तो बहन होती है, छोटी-बड़ी क्या हुआ ?”अशोक जी ने अपना मुँह खोला था |

“देखो ! बहनें तो हम सभी बड़ी हैं तुम सबसे लेकिन अभी स्टूडेंट हो तुम सब –कोई ज़रूरत नहीं इतनी फॉरमैलिटीज़ की –”अनामिका ने कहा तो सब बच्चों की तरह मुँह फुलाने लगे| 

“पता नहीं, पसंद आएगी या नहीं ?”उन्होंने उसके सामने साड़ी रख दी|

पगले ! रॉ सिल्क की खादी की बहुत सुंदर साड़ी लाए थे|साड़ी देखते ही आना और विवेक ने एक-दूसरे के चेहरे पर निगाह घुमा दी | गलत था, दोनों की दृष्टि यही कह रही थी | 

“राखी बाँधो न दीदी—” मयंक बोला|

“देखो, राखी तो अभी बाँधती हूँ पर ये गिफ़्ट नहीं लूँगी |ये सब नहीं---” आना ने कहा | 

“दीदी! अब तो ले आये हैं, आपको पसंद नहीं है तो बदली जा सकती है पर वापिस तो लेंगे नहीं स्टोर वाले ---फिर ---?”राजेन्द्र ने उदास होकर कहा था | 

शीनोदा बेचारा सोफ़े में धंसा सबकी बात सुनकर समझने की कोशिश कर रहा था|

“देखो! एक बात सुनो, कोई रिएक्ट मत करना –” आना ने बारी-बारी से उन्हें  राखी बाँधते हुए कहा|  

“आज लेकर आए हो, तुम्हारी भावनाओं की कद्र है मुझे पर बाई चांस तुम कभी मुझसे राखी बँधवाने आओ और गिफ़्ट लेकर न आ पाओ तो मुझे बुरा लग जाएगा न?”उसने हँसकर पूछा|   

    शीनोदा राखी बँधवाए या नहीं लेकिन हॉस्टल में उसके अकेले पड़े रहने का कोई मतलब तो था नहीं | उसकी दोस्ती इस ग्रुप से हो गई थी, बाकी हॉस्टलर्स से वह इतना खुला नहीं था | अधिकतर सब लोग पास के गाँवों में रहने के कारण अपने घर में परिवार के साथ त्योहार मनाने, बहनों से राखी बँधवाने चले गए थे | 

   जैसे सब हाथ बढ़ाकर राखी बँधवा रहे थे, उसने भी अपना हाथ आगे कर दिया, मुस्कुराकर आना ने उसके हाथ में भी राखी बाँधकर मिठाई खिला दी|आना ने सबके जैसे उसके मुँह की ओर भी मिठाई ले गई, वह ‘ओ—ओ’करता रह गया|सब उसकी इस हरकत पर हँस पड़े| राखी कैसे और कब से मनानी शुरू हुई थी, उसकी सारी कहानी शीनोदा जानता था लेकिन बस बँधवा पहली बार रहा था|वैसे भी तब तक वह संकोची तो था ही |

    साड़ी या कोई भी गिफ़्ट लाने की समस्या का समाधान यह निकाला गया कि जब भी संभव होगा, वे सब राखी तो आना से बँधवाने आएंगे लेकिन ‘नो गिफ्ट्स’| बहुत ही होगा तो बूंदी के लड्डू ले आया करेंगे, वो भी बहुत कम|

    कहाँ कि बात कहाँ पर जाकर खुलती है |रंजु की लिखी हुई बातें पढ़ते हुए वह न जाने कितने बरसों पीछे जा पहुंची थी|कुछ भी कहो, पुरानी सुखद स्मृतियों से मन में तरंगें तो बहने ही लगती हैं|अच्छा लगता है, ऐसे जैसे अब भी सब वही बातें चल रही हों | 

अब आना का मन काफ़ी हल्का हो रहा था, सोचा –आगे क्या लिखा है रंजु ने, पढ़ा जाए –आगे हैडिंग था ‘गाडियाँ’–रंजु ने बहुत सी बातें पहले भी आना के साथ शेयर की थीं जैसे वह जब जापान जाने के कुछ दिनों बाद जापानी पढ़ने के लिए जाती थी, उसे काफ़ी दूर जाना पड़ता था, उसके बारे में बहुत मज़ेदार और सूचनावर्धक बातें बताईं थीं |फिर भी उसने जो लिखा था। आना वह पढ़ना चाहती थी इसलिए उसने फिर से उन पन्नों पर नज़र घुमानी शुरू कर दी|