प्रेम न हाट बिकाय - भाग 2 Pranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 2

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       आज विवेक का जन्मदिवस था और अकेली बैठी वह गुज़रे रास्तों की धूल फाँक रही थी, आँसुओं की लड़ियाँ मोतियों सी उसके गालों पर फिसल रही थीं | एक समय ऐसा होता है जब सब अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं और पीछे छुटी हुई अकेली  ज़िंदगी के पास धुंध भरी गहराती गलियों में चक्कर काटने  के अलावा कोई चारा नहीं रहता |एकाकीपन कुछ ऐसे चुभने लगता है जैसे कोई बहुत बारीक काँच जो हाथ से छूट जाता है और उसकी किरचें शरीर से अधिक मन की दीवार में भीतर और भीतर जाकर चुभती चली जाती हैं जिन्हें निकालना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है |इन्हीं किरचों को बहुत सहजता से, सरलता से निकाल, मन को सँभालने का विकट काम कर देते हैं ऐसे मित्र और रिश्ते जो किसी अपेक्षा और उपेक्षा के बिना जीवन की धुरी के साथ चलते ही तो रहते हैं |आना इस मामले में बहुत भाग्यशाली थी, उसके पास कई रिश्ते ऐसे ही थे –बिना किसी अपेक्षा, उपेक्षा के !’अनकंडीशनल’ ! कितना रईस होता है न ऐसा व्यक्ति!उसके चेहरे पर एक संतुष्टि की लुनाई की  रेखा उसके मन की स्लेट पर खुदी सच्चाई बयान करती रहती |            

        अचानक ही गिरीश के फ़ोन से  अनामिका असहज हो उठी;

“आपको पता है आपकी फ्रेंड डॉ.रेखा मेहता नहीं रहीं ---“ 

      पति के जाने के बाद भी बहुत से अन्य मित्रों की भाँति गिरीश भी उसके  पास आता-जाता रहता था  | वह परिवार का दोस्त तबसे था  जबसे  वह शादी होकर आई थी यानि केवल बीस वर्ष की थी | यूँ तो गिरीश लगभग अनामिका की ही उम्र का है लेकिन हुआ कुछ यूँ कि जिस सोसाइटी में वह  पति  के साथ किराए पर रहने आई थी वहीं एक मसूरी का परिवार था | श्री उपेन्द्र शर्मा और उनकी पत्नी  पूर्णिमा! जो कुछ ही दिनों में अनामिका यानि आना के भाई साहब-भाभी बन गए थे  ! देहरादून से गुजरात आने पर वह पूरा परिवार ही उसके साथ संवेदनात्मक रूप में  बहुत करीब हो गया था | जीवन में अक्सर ऐसा ही होता है, हम कुछ लोगों से बिना प्रयास के ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे न जाने कितने जन्मों की पहचान हो और कुछ लोगों से कोशिश करके भी एक अजीब सी दूरी बनी रहती है जिनके साथ हम न जाने कितने लंबे समय तक एक ही छत के नीचे शरण ले चुके हों | शायद ये संबंध समय, सरलता और साझेदारी से बस बन ही जाते हैं, ये पूर्व सुनिश्चित होते हैं और बिना किसी प्रयास के हमसे आ जुड़ते हैं |

     पूर्णिमा भाभी भी कुछ ऐसी ही सरलता, तरलता से उससे, उसके परिवार से आ जुड़ीं थीं | अनामिका से कुछेक वर्ष ही बड़ी होंगी |जब वे बोलतीं, उनके मुख से जैसे फूल झरते | बोलते-बोलते उनके मुख से उसके लिए बेटा निकल जाता और शब्दों में प्यार घुलकर उसके दिल को मीठा कर जाता जैसे किसी  गुड़ की भेली से नन्हा सा टुकड़ा तोड़कर उन्होंने उसके मुख में रख  दिया हो |उनकी बातों से उसका चेहरा खिल जाता और मुख में मिठास पिघलने लगती !  

     उन पूर्णिमा भाभी के  देवर का दोस्त  गिरीश धीरे-धीरे विवक के पास भी आने लगा था | पूर्णिमा भाभी के दो बहुत प्यारे बच्चे भी थे जो उसके अपने बच्चों के बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे |आना के अपने बच्चे पूर्णिमा भाभी के  बच्चों  से छोटे थे और उनका जन्म भाभी के सामने ही हुआ था |उम्र में कोई बहुत फ़र्क नहीं था, रहा होगा कोई दो-एक वर्ष का ! 

         आना को कुछ भी नहीं आता था यानि स्टोव ‘प्राइमस’ जलाने से, खाना बनाने से लेकर घर–गृहस्थी का काम-काज, कुछ भी नहीं |उन दिनों गैस भी नहीं होती थी, विवेक ने काफ़ी पहले गैस बुक करवा दी थी किन्तु आई साल भर बाद ! उसे बस, बातें बनानी आतीं जिनसे वह जल्दी ही सबका मन जीत लेती | लेकिन जब सिर पर पड़ती है कम से कम लड़की तो सब-कुछ जल्दी ही सीखने लगती है, उसे सीखना पड़ता ही है |तब विवेक और पूर्णिमा भाभी ने उसे प्राइमस जलाना, और आटा मलना जैसी  बहुत सी गृहस्थी को चलाने वाली जरूरी  चीज़ें सिखाईं थीं | 

     उसके घर पर माँ, और वे दोनों भाई-बहन थे, पापा सरकारी नौकरी में अधिकतर  दिल्ली ही रहते | नानी भी थीं जो कई कारणों से नाना का घर छोड़ आईं थीं लेकिन हमेशा माँ के पास न रहतीं | उन्होंने अपना रहने का इंतज़ाम हरिद्वार में आर्य-समाज के एक आश्रम में कुटिया  बनाकर कर लिया था | कभी-कभी वे बेटी व नाती-नातिन के पास आती रहतीं | जब अनामिका का विवाह तय किया गया था तब नानी अपनी बेटी यानि अनामिका की माँ से बहुत बिगड़ीं ;

“पता नहीं, कैसी माँ है --- बेटी को इतनी दूर भेजने का मन कैसे होता है –जाने –“?

“माता जी ! शादी तो यहीं पास में ही हो रही है , देहरादून यहाँ से है कितनी दूर ? अब लड़का जहाँ नौकरी करेगा वहाँ तो जाना होगा न ?शादी के बाद जाना पड़ेगा तो नहीं जाएगी क्या? भाग्य किसने देखा है ?”लेकिन बड़ी माता जी (नानी माँ )का मुँह काफ़ी दिनों तक फूला ही रहा था | ख़ैर, बड़े कब तक नाराज़ रह सकते हैं ? 

    विवेक थे तो उत्तर-प्रदेश के ही, काम के कारण गुजरात में रहते, वहाँ से भी उनका बाहर जाना-आना रहता | संस्थान से उन्हें मुंबई में फ़्लैट मिला था लेकिन एक बार जो गुजरात में आ गया, वह कहाँ जाना चाहता है दिल्ली, मुंबई की ओर ! जब वह 1968 में अहमदाबाद आई थी, तब यहाँ कोई हड़बड़ी की ज़िंदगी तो थी नहीं | आराम से सब काम-काज होते रहते, ज़िंदगी ख़रामा–ख़रामा जीते लोग ! बड़ा शहर होने के बावजूद भी ख़तरनाक नहीं था उसके अपने शहर की भाँति ! वह देखती, रात को 11 /12 बजे लड़कियाँ आराम से सड़कों पर दोस्तों के साथ घूमती रहतीं | 

     

     यूँ वह  दिल्ली में भी कुछ वर्ष पढ़ी थी, वहाँ भी स्वतंत्र वातावरण था लेकिन  यहाँ जितनी सुरक्षा तो नहीं थी | शुरू-शुरू में अहमदाबाद का रहन-सहन, चाल-ढाल उसे बड़ा अजीब लगा | ठेठ उत्तर प्रदेश की रहने वाली अनामिका जब यहाँ आई थी तब एक-दो बार रात के लगभग 10/11  बजे कभी विवेक के मित्र के घर से उसे अकेले घर आना पड़ जाता | वह ज़रूरत पड़ने पर अकेली आने-जाने की आदी होती जा रही थी | एक दिन विवेक के किसी दोस्त के यहाँ से वह लगभग दस बजे अकेली अपने घर आई और उसने यह बात माँ से फ़ोन पर साझा कर दी ;

“पागल हो गई है क्या आना ? या पर लग गए हैं ? विवेक कहाँ थे ?” माँ का उत्तेजनापूर्ण, आक्रोशित चेहरा वह मीलों से  देख पा रही थी जैसे –

“माँ, विवेक को अपने दोस्त के साथ कोई फ़िल्म देखने जाना था, आपको पता है अँग्रेज़ी  की मार-काट वाली फ़िल्में मुझसे बर्दाश्त नहीं होतीं| सो, मैंने कह दिया कि आप चले जाइए, मैं घर जाकर सो जाऊँगी –“

“विवेक जी तुझे छोड़कर नहीं जा सकते थे ?”माँ असहज थीं |  

“माँ, थियेटर दूर है, जाने में टाइम लगता है | यहाँ पर कोई परेशानी नहीं है।कोई गुंडागर्दी नहीं अपने वहाँ जैसी ! विवेक समझते हैं न ! आप बेकार चिंता करेंगी तो मैं आपको कुछ नहीं बताऊंगी  ---“वह भी नाराज़ हो गई | 

“ठीक है बेटा –पर माँ हूँ न ! इतनी दूर बैठी हूँ, चिंता तो होगी ही ---|”

अनुज को अहमदाबाद की बातें सुनकर बहुत मज़ा आता था और वह छुट्टियों में बहन के पास मस्ती करने पहुँच ही जाता था |