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दिन तय करके ग्रुप के सब लोग शीनोदा के कमरे में पहुँचे | उसने अतिथियों के स्वागत की पूरी तैयारी कर रखी थी | पड़ौस के कमरों से वह तीन-चार प्लास्टिक की कुर्सियाँ ले लाया था |एक तख़्त था जिस पर उसने खादी की श्वेत, शुभ्र चादर बिछा रखी थी | वैसे हॉस्टल में सबको ये सारी सुविधाएं नहीं थीं किन्तु उसे बिजली का हीटर प्रयोग करने की आज्ञा भी दे दी गई थी जिसका उसे अतिरिक्त पैसा देना होता था |
मांसाहार की आज्ञा नहीं थी किन्तु अपने लिए जापानी तरीके की चाय व नूडल्स आदि बनाने की उसे पूरी आज्ञा लिखित में दी गई थी|जो वाक़ई में उसके लिए बहुत आवश्यक थी | वह पहली बार जापान से निकला था और यहाँ का खाना एकदम से खाना उसके लिए मुश्किल था |वह गाँधी जी के विचारों पर पूरी तरह उतरना चाहता था इसलिए वह ‘वेजेटेरियन’ ही रहना चाहता था |
शीनोदा ने दो तरह के नूडल्स बना रखे थे | एक पतीले में से नूडल्स के साथ रंग-बिरंगी सब्ज़ियाँ झाँक रही थीं और दूसरे में केवल लंबी-लंबी, मोटी सेवइयों जैसे नूडल्स थे जो बिना किसी साज-सजावट के थे, उनमें से कुछ अलग सी सुगंध आ रही थी |शायद वे ठेठ जापानी तरीके से बनाए गए थे | उन दिनों भारत में नूडल्स से बहुत कम लोगों का परिचय था |
बासु दी के अलावा शायद ही किसी ने अब तक नूडल्स चखे भी होंगे | शीनोदा ने सबके बाउल्स में गर्मागर्म नूडल्स परसे और हीटर पर अब जापान से लाई हुई चाय के लिए पानी रख दिया था|उसका गोरा चेहरा अतिथियों के आगमन से उत्साहित व प्रफुल्लित दिखाई दे रहा था |
नूडल्स शायद अभी बनाए गए थे | साथ में कई तरह की जापानी सॉसेज़ थीं, जिन्हें वह जापान से लाया था|उसने साथ में कई प्रकार के कोल्ड-ड्रिंक्स भी लाकर रखे थे |
शीनोदा ने बहुत प्रेम से सबको छोटे छोटे प्यालों(काँच के कटोरों) में नूडल्स सर्व किए, उसके पास खाने वाली चॉपिंग-स्टिक्स भी थीं, उसने सबको खाकर दिखाया और सबसे उन स्टिक्स से खाने का अनुरोध किया किन्तु बासु दीदी एकाध ग्रास खा सकीं, और सबसे तो एक नूडल भी उन स्टिक्स पर संभाला तक नहीं गया |
खाने की कोशिश करने में सबके मुख तक पहुँच ही नहीं पाते थे नूडल्स, बीच में ही स्टिक पर से फिसल जाते |
"ऐ --छोड़ो न, क्या तमाशा करता तुम लोग ?" बासु दीदी ने प्यार भरी लताड़ लगाई और मेज़ पर रखे स्पून स्टैंड से काँटा उठाया तो और सबने भी देखा-देखी यही किया ।सबकी जान में जान आई | उसके कमरे में कुछ अजीब सी चीजें लटक रही थीं | अभी तक किसी ने बासु दीदी के अलावा यहाँ पर तो इन्हें नहीं देखा था|
"व्हाट इज दिस ?" मयंक ने पूछा |
शीनोदा ने लटकते हुए एक सुंदर से रंग-बिरंगे घंटियों वाले गोल से घेरे को देखकर मुस्कुराकर बताया कि इसे 'विंड चाइम' कहते हैं और इसका लटकाना शुभ माना जाता है| "ये चीनी नज़रबट्टू है-----”बासुदी ने ज्ञान-वर्धन किया और खिलखिलाकर हँस पड़ीं |
“मि. बासु जब चीन गए न, जे --बहुत सारे गिफ़्टस में मिले उनको ----- "बासुदी ने हँसकर बताया |
सब बड़े खुश थे और आराम से अपने हाथ में पकड़े हुए बाउल में से नूडल का व कोल्ड ड्रिंक का स्वाद लिया जा रहा था| इधर-उधर की गप्पें मारते हुए न जाने दो घंटे कहाँ बीत गए |
उस दिन सबने भर पेट नूडल्स खाए | बातें कीं, जापान व भारत की संस्कृति की !
अनामिका जब से यहाँ पढ़ने आई थी, तब से महसूस कर रही थी कि जो कोई भी गुजरात आता था वह गाँधी-विद्यापीठ में अवश्य आता |लोग अमरीका से आएँ या इंग्लैंड या किसी भी देश से विद्यापीठ के विज़िट के बिना उनका ट्रिप पूरा न होता |
"वैष्णव-जन तो तेने कहिए जे, पीर पराई जाने रे ---" सबने मिलकर तालियाँ बजा-बजाकर गाया |शीनोदा के इतनी जल्दी हिंदी सीखने से सबको बातों में अधिक आनंद आने लगा था |
एक ओर बासुदी की अफ़लातून भाषा तो दूसरी ओर शीनोदा की मज़ेदार मिक्स भाषा, मयंक का गुजराती मिक्स हिंदी का उच्चारण तो अशोक, राजेन्द्र की गढ़वाली टोन, बड़ा मज़ा आता | एक आना ही थी जो ठेठ खड़ी बोली के संसार में बड़ी हुई थी, पली थी| वैसे, उसके पड़ौस में भी ठेठ जाट रहते थे पर शिक्षित घर के वातावरण के कारण कभी उनका प्रभाव उनके परिवार की भाषा पर नहीं पड़ा|फिर भी जब मूड में होते तो ‘जइयो’, ’आइयो’ तो बोल ही देते | पापा बहुत चिढ़ते थे सही, शुद्ध भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते !
राजेन्द्र इतने मूड में था कि गढ़वाली में गीत गुनगुनाने लगा |फिर उसने शीनोदा से जापानी गीत की फ़रमाइश कर दी | वह गुलाबी हो गया | अभी तक उसको ऐसे शरमाते हुए किसी ने नहीं देखा था | उसका गोरा रंग लाल होने लगा था, झेंप गया वह !
"जापानी सॉन्ग ---"उसने हँसते हुए कहा |
"हाँ भई --गाना और रोना सब जानते हैं और सबको आता है --"राजेंद्र ने हँसते हुए कहा |
"इट्स ओ.के ---यू आर राइट ---बत "यानि शीनोदा इस बात को समझ गया था कि गाना और रोना सबको आता है |
"नो बट-वट, यू सिंग ए जैपनीज़ सॉन्ग। आई विल सिंग बँगला --ओ.के --? सब लोगों को गाना है --अपनी भाषा का गीत ---"
फिर गीतों का सिलसिला शुरू हो गया | शीनोदा ने अपने गीत से पहले उस प्रेम-गीत का अर्थ समझाया | उसका चेहरा लाल हुआ जा रहा था |
"आख़िर इतना क्यों शर्मा रहे हो ?"
"नहीं --नहीं –कोई बात --नहीं ----" वह फिर गाते-गाते शरमाया |
"कुछ तो है ---"
"नो-नो -नॉट वेरी इम्पोर्टेन्ट --बत माई गर्ल-फ्रैंड लव्ज़ दिस सॉन्ग " कहकर वह एक बार फिर लाल हो गया |
उस कमरे में इतना शोर होने लगा कि आस-पास के लड़के दरवाज़े के बाहर एकत्रित होकर अपना मनोरंजन करने लगे |
पता ही नहीं चला कब 'हॉस्टल-इंचार्ज' आकर दरवाज़े के बाहर खड़े हो गए, बाहर खड़े सारे लड़के गधे के सिर से सींग से गायब हो गए लेकिन अंदर वाले लोगों को उनके आने की ख़बर ही नहीं हुई |उनकी कड़वी बातें शीनोदा और सबको सुननी पड़ीं| अनुशासन की बातें! नियमों की बातें ! उनका कहना था कि सब लोग मिलकर इस विदेशी लड़के के सामने नियम तोड़कर विद्यापीठ को बदनाम कर रहे हैं |
सबका बना-बनाया मूड खराब हो गया, सबने सॉरी बोला, वहाँ इक्क्ठे होने की आज्ञा मिलनी ही कठिन थी और यहाँ तो पूरा जश्न हो गया था|सब सीनियर गर्दन झुकाकर वहाँ से चुपचाप उठकर चले गए |अनामिका व बासुदी की आँखें शर्मसार हो रही थीं | वे दोनों तो बड़ी थीं, उन्हें तो समझना चाहिए था |ख़ैर, अब तो बंदूक से गोली निकल चुकी थी, हवा में आवाज़ की प्रतिध्वनि सबका मुँह चिढ़ा रही थी |
शीनोदा 'हॉस्टल-इंचार्ज' को बार-बार सॉरी बोल रहा था |