प्रेम न हाट बिकाय - भाग 18 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 18

18---

 "मई जापान जाता हई  -----" एक दिन जापानी लड़के ने सीढ़ियों पर बैठते हुए कहा | 

"क्यों ---? आर यू गोइंग बैक ---?” बासु दी ने अचकचाकर पूछा | 

"नो---नो --मई अपने पिता को मिलने को जाता, ही कॉल्ड मी  -----" 

"ओह ! " सबके तने हुए चेहरे ढीले पड़ गए, अब वह इस ग्रुप का एक अहम हिस्सा बन चुका था |वह अपने जापान की बातें बताता,  परिवार की बातें शेयर करता, कोई छोटी–मोटी समस्या होती, उसकी भी चर्चा कर लेता | वह भारतीय परिवेश को और यहाँ के लोगों को काफ़ी समझने लगा था और कुछ बातें अपने भीतर पचा लेने की कला सीख रहा था, यद्धपि यह उसके लिए कठिन था |लेकिन यह भी सच है कि हर जगह सब प्रकार के लोग होते हैं, कहीं अधिक ---कहीं कम ! 

" कब जाओगे ?"

"नैक्स्ट मंथ ----" 

"मैं तो चला जाऊँगा ----अपनी नौकरी पर---"राजेंद्र उदास था | 

       उस समय वह वाक़ई बहुत उदास हो गया था | स्वाभाविक भी होता है इतने वर्षों एक साथ रहने पर मित्रों को, माहौल को छोड़कर जाना  लेकिन उसकी इस तरह नौकरी लग जाना बहुत बड़ी व उसके लिए बड़ी सुकून देने वाली बात थी | घर से तो कुछ लेता नहीं था, पिता के न होने से घर की परिस्थिति भी कोई इतनी सुदृढ़ नहीं थी, उसे अपना सारा प्रबंध  खुद ही करना होता था | ट्यूशन्स  करके उसने अपना खर्चा निकाला था | हाँ, स्कॉलरशिप थी यह उसके लिए अच्छा था लेकिन  काम  तो चाहिए ही था |पीएच. डी की मौखिक परीक्षा से पहले ही उसे स्वराष्ट्र विश्वविद्यालय के नामी कॉलेज में  शिक्षक की हैसियत से काम मिल जाना, उसका भाग्य  ही था, और सब भी उसके लिए खुश  थे |   

"हमारा भी देखो न --सब्मिशन टाइम हो रहा है | थीसिस टाइप होकर लगभग पूरा होने को है ----" बासु दी ने भी कहा | 

" तो किया हुवा ---हम लोग तो मिलेंगे न आपसे ----बाद में भी ----" शीनोदा इतनी अच्छी हिंदी, इतनी जल्दी सीख गया था, गुजराती में भी बोलने की कोशिश करता सो दोनों भाषाएँ गड्डमड्ड  होकर एक बहुत ही प्यारी सी तीसरी बोली को जन्म दे देतीं | स्वाभाविक था उसकी दोनों भाषाएँ कच्ची-कच्ची सी थीं जैसे अधपका सा आम जो खट्टा-मीठा स्वाद देता है  | सबको बहुत प्यारी लगतीं उसकी बातें !उसकी सादगी, सरलता और स्पष्ट बातें अपनी ओर आकर्षित करतीं | 

      कुंजबाला दीदी और रेखा बहन वैसे भी अधिक समय नहीं दे पाती थीं | हाँ, जब कभी मौका मिलता वो दोनों उस एन्जॉयमेंट को न छोड़तीं जो इस उम्र में उनके जीवन में सहजता से आ गया था |

" मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा, 

बड़ों की देखकर दुनिया, बड़ा होने से डरता है |" 

      अनामिका सबके बीच राजेश रेड्डी साहब के इस शेर को गुनगुनाते हुए हँसती |  विवेक घर पर शरारतें करते हुए इसको अक़्सर गुनगुनाते थे, उसके मुख पर भी यह शेर चढ़ गया था |अब इस उम्र में सच में सबको यही महसूस होने लगा था कि सबके दिल का बच्चा एक बार फिर से निकलकर शरारत करने लगा है | ज़िंदा रहने की सबसे पहली शर्त कि अपने मन के बच्चे का गला न घोटें |  

        सब अपने-अपने काम से फ़्री होकर अपनी मनपसंद जगह पर आकर नाश्ता करने बैठे थे |गिलहरियों ने छोटे, नन्हे बच्चों की भाँति कूद-फाँदकर उधम मचा रखा था, मयंक व अशोक उनको इधर-उधर भगाकर रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े खिला रहे थे | सब उनकी मस्त अदाओं पर फ़िदा थे | कैसी टुकुर टुकुर मासूम बच्चों की सी आँखों से देखती थीं वो !

"सच बात है, जे  बोलो ---इन गिलहरियों से हमारा कैसा रिश्ता जौम गया है ---" बासु दी उनको देखकर बोलीं |

"हाँ, दीदी--सच है, नानी कहा करती थीं दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा रहता है | "

"सच ही तो बोलती थीं वो ---जे --देखो न मानुष ही नहीं जानवर --पशु-पँखी सबका कोई न कोई रिश्ता कैसे जौम जाता है न ---?"बसुदी इतना प्यारा बोलती थीं कि आना उनका सुंदर से चेहरे पर नज़र चिपका लेती | 

“ऐ –आना, ऐसा क्या घूरता है मुजको---” वे मुस्कुराकर पूछतीं | 

“हय-मेरी प्यारी दीदी”आना उनके पास बैठी बैठी चिपक जाती उनसे और वे झेंप जातीं |    

      चाय का ऑर्डर तभी दिया जाता जब सब पहुँच जाते | एक समय तय कर लिया गया था|आज अभी शीनोदा और राजेन्द्र नहीं पहुँचे थे | पाँचेक मिनिट में राजेन्द्र पहुँच गया और उसके पीछे -पीछे शीनोदा !  

"ऐ ---जे-- तुम लोक --एक -दूसरे के पाछु पाछु किदर से आता ? " वो भी कभी बँगला  मिश्रित गुजराती, हिंदी बोलने लगतीं, कभी पूरी तरह से अँग्रेज़ी पर उतर आतीं | कुल मिलाकर पूरा ग्रुप खूब मज़ेदार था और बिछड़ जाने की कल्पना से सबके मन में उदासी छाई हुई थी |  

       शीनोदा लंबे लंबे डग भरता हुआ आया, झोले को सीढ़ियों पर रख दिया और जैसे एक लंबी सी साँस ली | जैसे सबको चौंका दिया था उसने | सब मुख फाड़े उसे घूरने लगे | 

"क्या हुआ है ?" आना ने पूछा | 

"कुच्च  नहीं ---आप  हर रोज़ हम काते हैं न ---मतलब है ---खाते -- ईटिंग ---करते हैं न आपका ?"उसका मतलब था 'आप लोग मुझे खिलाते हैं न '

"तो---?"

"अमने कुछ तो प्लान किया है न, आप सब लोग गर पर आइए----" 

"दिस इस नॉट युअर होम--गर----यू आर इन द  हॉस्टल--" बासु दी ने कहा | 

"मालुम हय न --लेकिन अब्बी तो ये गर है न बारत में !हिंदुस्तान में !फिर इच्चा तो है न ---" उसके मुख पर एक स्नेहमयी मुस्कान पसर गई | उसका कहने का मतलब था कि अभी तो यही घर है उसका जहाँ वह रहता है | 

"आप बी जाने वाले हैं और राजेन्द्र बाई बी ---तो मन तो करता हे न ---मई (मैं )आप लोगों के लिए जापानी नूडल्स बनाकर खिलाएगा--ऊंगा खिलाने की इच्चा हाई (है )----" शीनोदा  ने बहुत ही प्यार व विनम्रता से सबको दूसरी बार निमंत्रण दिया | 

        बॉयज़  हॉस्टल में वैसे भी कहाँ जाने की आज्ञा मिलती है और यह तो गुजरात विद्यापीठ था जहाँ  नियमों के सींग ही उगा दिए जाते थे | तोड़ो और खून न निकले, ऐसा हो ही नहीं सकता था | 

"बट गर्ल्स आर नॉट अलाउड ---हाऊ कैन वी -----?"

“गर्ल्स ---ही—ही---“अशोक ने दाँत फाड़े –“

“ अच्छा ! लड़के कितने बुड्ढे हो जाएँ वो ब्वायज़ हॉस्टल में ही रहते हैं और हम --लड़कियाँ नहीं हैं -?”

  अनामिका ने अशोक  की पीठ पर एक धौल रसीद की ---

"नो---नो---नो--आय एम नॉट तैलिंग यू तू गो आऊत ऑफ़ द वे ----"शीनोदा अपनी ही धुन में बोले जा रहा था, उसने किसी बात पर ध्यान नहीं दिया | 

"तब, कैसे जा सकते हैं हम ?" किसीको समझ नहीं आ रहा था, वह क्या कहना चाहता था | 

"आप, मिसेज़ बासु --हॉस्टल इंचार्ज से परमिशन ले सकते हैं न ?ऑफ़तर ऑल, यू ऑल आर नॉट गर्ल्स --" 

       राजेन्द्र की ज़ोर से हँसी छुट गई, सच ही तो कह रहा था लेकिन क्या लेडीज़ को परमिशन मिल सकती थी ?

" बात तो ज़ोरदार कही है शीनोदा ने ----बासु दी ! कोशिश करने में क्या हर्ज़ है ?"

" नो---नो---हू  विल टेक द परमिशन ---आई कांट गो ---" बासु दी हकलाने लगी थीं | 

 "ओ के, ठीक हय –“जैसे वह किसी सोच में पड़ गया और फिर अचानक चमककर बोला ;

“दोंत वरी ---आई विल गैत यू द परमीशन -----" जापानी लड़के ने कुछ सोचते हुए कहा | अचानक वह बड़ा आश्वस्त सा दिखाई देने लगा था |  

      अरे वाह ! सब आश्चर्य में उसका चेहरा अपलक देखने लगे जैसे कोई अजूबा हो | क्या करने वाला है ये ? 

"पर --कैसे ---?"

"इट'स अप तु मी -----" अब तक वह सबसे काफ़ी खुल गया था | हाँ, कम बोलने का उसका स्वभाव था और कुछ गंभीर भी |  कुछ भाषाई तकलीफ़ भी थी ही | लगता था, हॉस्टल के कुछ गुण-अवगुण भी उसकी दृष्टि में आ गए थे क्योंकि वह कभी-कभी सबके सामने ऐसे प्रश्न रख देता था जिनके उत्तर किसी के भी पास नहीं होते थे | 

 "दिस इज़ रीतिन लैटर ---सी ----यस ! परमीशन फॉर ऑल ऑफ़ यू ---" दो-तीन दिनों में ही उसने सबके सामने एक पत्र रख दिया जिसमें बॉयज़ हॉस्टल इंचार्ज के हस्ताक्षर थे | सब उससे पूछना चाहते थे आख़िर वह असंभव सा कारनामा उसने किया कैसे था लेकिन वह वैसे ही चुप्पी लगा रहा था जैसे और सब उसकी बातों का कोई उत्तर नहीं दे पाते थे | हारकर सब चुप हो गए और उसके कथनानुसार 'उसके घर में' यानि हॉस्टल के कमरे में जाने का दिन निश्चित हो गया | 

    सबकी नब्ज़ पकड़ना सीख रहा था वह धीरे-धीरे | यह सबको उस लिखित पत्र से ज्ञात हो गया जो उसने अचानक ही एक दिन सबके सामने लाकर रख दिया था | वाक़ई, यह उसकी बड़ी जीत थी |एक विदेशी की ऐसे माहौल में जीत !हाँ, पर वह विदेशी था, इसीलिए जीत सका था शायद वर्ना---- मज़ाल किसी की ---!

       अन्य विश्वविद्यालयों की भाँति  विद्यापीठ में भी विदेशों से 'स्टुडेंट्स एक्सचेंज ' के छात्र-छात्राएँ आते थे| यह कोई पहली बार नहीं था कि एक जापानी शिक्षण के लिए गुजरात विद्यापीठ में आया था | अमरीका, इंग्लैण्ड, चीन आदि देशों से छात्र-छात्राओं के ग्रुप्स आते ही रहते | इन लोगों से परिचय भी जल्दी हो जाता था | अपने स्वभाव के अनुसार अनामिका व बासु दीदी कभी-कभी  उन्हें घर भी बुलाती  रहती थीं  | 

अनामिका को एक बार का किस्सा याद हो आया ;

        जिस वर्ष उसने विद्यापीठ में प्रवेश लिया था उसी वर्ष अमरीका से आए हुए एक ग्रुप को उसे हिंदी में बातें समझाने  का भार सौंपा गया था | यहाँ बहुत कम लोग अँग्रेज़ी में बात कर पाते थे इसलिए जो लोग अँग्रेज़ी में वार्तालाप कर पाते थे , उन्हें इस प्रकार के छात्रों के आने पर उनसे बात करने अथवा उनको कुछ ऎसी चीज़ें समझाने  का काम सौंपा जाता जो बिलकुल भी हिंदी अथवा गुजराती समझ नहीं पाते थे | इन छात्रों को गाँधी जी के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता होती थी | 

      ये छात्र अधिकाँशत: पंद्रह दिन अथवा  अधिक से अधिक एक माह के लिए आते थे | यहाँ पर हिंदी विषय के लिए 'हिंदी भवन' अलग से बनाया गया है जिसमें राष्ट्र भाषा का अलग विभाग है |वहाँ पर हिन्दी सिखाई जाने के साथ ही कोर्सेज़ चलते हैं  जिनकी परीक्षाएँ भी लीं  जातीं हैं | धीरे-धीरे उस विभाग में उर्दू, बांगला, पंजाबी आदि  अन्य भारतीय व विदेशी भाषाओं का शिक्षण भी शुरू कर दिया गया जिसके लिए विद्यापीठ के बाहर से शिक्षकों की व्यवस्था की गई | 

       हाँ, तो अनामिका को उसके प्रथम वर्ष में अमरीका से आए हुए पाँच /छह लड़कियों के ग्रुप को ‘गाइड’ करने का आदेश दिया गया | अपने स्वभाव के अनुसार उसकी बहुत जल्दी ही सबसे मित्रता हो गई | विद्यापीठ के सामने , सड़क पार करते ही  एक कमर्शियल सेंटर था जिसमें एक खूब प्रसिद्ध मिठाई की दुकान भी थी जिसमें पूरे दिन गर्मागर्म समोसे छनते रहते और गुजराती फरसाण यानि नमकीन व्यंजन बहुत बढ़िया, ताज़े व स्वादिष्ट मिलते थे | 

      उस विदेशी ग्रुप की सब लड़कियों को तीखी नमकीन व समोसों का इतना चटकारा लग गया था कि वो उसे लेकर हर दिन समोसे खाने पहुँच जातीं | वहीं उसने मिठाईयों के व अन्य सब व्यंजनों के नाम उन्हें सिखाए थे | वे पैन व डायरी साथ रखतीं और उसमें लिखती रहतीं उन्होंने बताया कि भारत भ्रमण में उन्हें यह सब काम आएगा | 

"डू यू नो हाऊ टू मेक दिस ----स ---मौसा ---?"

"यस ----" 

"आई वांट टू लर्न ---?" एंजलीना ने कहा| उसने इतनी बार अनामिका से कहा कि उसे हाँ कहना ही पड़ा| 

          उसने उन्हें अपने घर पर निमंत्रित कर लिया | वैसे तो सामने हलवाई की दुकान पर समोसे बनते रहते पर वहाँ के कारीगर समोसे अंदर किचन में तैयार करके दुकान के बाहर लगी भट्टी पर लाते थे, जहाँ उन्हें  तला जाता था  | अत: बनाने का तरीका देख पाना संभव नहीं था | एंजलीना  को सबसे ज़्यादा शौक था | वही अधिकतर सब चीज़ें जानने की उत्सुकता रखती | 

      वह  घर पर सारी तैयारी करके गई थी | ग्रुप में से तीन लड़कियाँ ही उसके साथ घर पर आईं, एक बासु दीदी | उसे  मिलाकर वो पाँच हो गईं थीं | उनमें एक अफ़्रीकी लड़की भी थी ---पैरी मैथ्यू और एक मैरी स्मिथ!एंजलीना आते ही आना के साथ रसोईघर में आ गई | बाक़ी सब सिटिंग-रूम में बैठकर गप्पें मारने में व्यस्त हो गए |एंजलीना को समोसा, चटनी, पकौड़ा --सब बोलना आ गया था, समझती भी खूब थी | उसमें चीज़ों को जानने की एक उत्सुकता दिखाई देती थी | 

"डू यू हैव चटनी फॉर स--मोसा ---?" थोड़ा तोड़कर बोलती थी वह समोसे को | 

"यस ----" आना ने उसको समोसे में स्टफ़िंग करना सिखाते हुए उत्तर दिया | 

      रामी तो घर पर आ ही जाती थी सो उसने समोसे तलने शुरू कर दिए और अनामिका से कहा कि वह सबके साथ जाकर बैठे, वह गरम-गरम तलकर ले आएगी |

          समोसे लगभग बन गए तो अनामिका  प्लेट में रखकर उन्हें डाइनिग-टेबल पर रखने सिटिंग-रूम में ले जाने लगी | 

"कैन आई टेक ---?" एंजलीना ने आना से पूछा | 

"श्योर ---बी केयर-फुल, वेरी हॉट ----" 

"ओह ! यस ---आई विल---" उसने आना के हाथ से प्लेट ले ली | 

         जैसे ही अनामिका ने चटनी निकालने के लिए रेफ़्रिजेरेटर खोला एंजलीना रुककर  कुछ ऐसी नज़रों से उसमें झाँकने लगी जैसे उसने कुछ अनहोनी चीज़ देख ली हो ---

"ओ माय गॉड ---!" उसकी ऑंखें आश्चर्य से फ़्रिज में रखी हुई चीज़ों पर फिसल रही थीं | जैसे कुछ नापने का प्रयत्न कर रही हो | 

"व्हाट हैपन्ड -----" आना की समझ में कुछ नहीं आ रहा था | आख़िर ऐसा क्या था उसमें ?

"व्हाट हैपन्ड ----? समथिंग रॉन्ग ---?"उसने दुबारा पूछा |

"नो ---नो --नथिंग ---" कहकर एंजलीना अपने हाथ में समोसों से भरी प्लेट लेकर आगे बढ़ गई | उसके पीछे-पीछे अनामिका कैचप और चटनी लेकर आई और डाइनिंग-टेबल पर रखकर सबको बुलाने लगी जो सामने सोफ़ों में धंसे हुए गप्पें मारने में लगभग खो चुके थे | हाँ, रेफ़्रिजेरेटर को देखकर एंजलीना का व्यवहार उसकी समझ में नहीं आ रहा था | 

          केवल समोसे ही नहीं थे, डाइनिंग टेबल पर विभिन्न प्रकार के व्यंजन सजे हुए थे जिनमें मिठाई भी शामिल थी, बंगाली रसगुल्ला बासु दीदी को बहुत पसंद था। साथ ही कई प्रकार के ज्यूसेज़ भी ! अनामिका ने रामी के साथ मिलकर काफ़ी तैयारी पहले से ही कर ली थी | सबके टेबल पर आ जाने के बाद वह खाली प्लेटें व्यंजनों से सजाने लगी| बासुदी भी अतिथियों के लिए व्यंजन परोसने में उसकी सहायता करने लगी थीं | बासुदी से घर के जैसे संबंध हो गए थे अत: वे अब मेहमानों की श्रेणी में नहीं थीं और अधिकारपूर्वक सहायता करने लगती  थीं | 

“ए आना !यू टेक आउट ज्यूस, आई एम पुटिंग द स्नेक्स ---“बासुदी ने जैसे उसे ऑर्डर दिया | 

“ओके बॉस ---“ उसने हँसकर कहा |  

“आना ?हू इज़ आना ?”मेहमानों में  से किसी ने एक-दूसरे की सूरत देखते हुए पूछा |

“दिस अनामिका इज़ आना ---“बासुदी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया |

“ब्यूटीफुल !कैन वी औलसो कॉल यू आना ?शॉर्ट एंड स्वीट  –“ अनामिका मुस्कुरा दी | 

       ऐसा तो मुमकिन नहीं कि चुप्पी साधकर खाना खाया जाए सो बातें चल रही थीं | अमरीका की बातें, भारत की बातें ---परिवारों की बातें | सभी अविवाहित लड़कियाँ थीं, उनके माता-पिता के बारे में बातें होने लगीं | किसके माता-पिता क्या करते हैं ? घर में और कौन -कौन हैं ? ये ही सब नॉर्मल बातें !

"आई डोंट हैव फ़ादर ----"अचानक अपने परिवार के बारे में बताते हुए अफ़्रीकी लड़की बोली |उसका परिवार तीन पीढ़ी पहले केन्या से अमरीका आया था | उसकी माँ गोरी अमरीकन व पिता अफ़्रीकन थे | खुद उसका रंग भी श्याम ही कहा जा सकता था |   

"मीन्स----"  

"आई मीन ----आय एम लिविंग विद माय मदर, शी इज़ ए नर्स---वैरी नोबल प्रोफ़ेशन ---" 

           अनामिका को अब भी समझ में नहीं आया वह क्या कहना चाहती थी? उसके चेहरे से नासमझी झलक रही थी | 

"डोंट गेट कनफ्यूज्ड -----" माई पेरेंट्स लेफ़्ट ईच अदर  ---मॉम इज़ सिंगल पेरेंट-----" 

        भारतीयों के लिए उस समय तक यह बहुत संवेदनशील विषय था, वैसे यहाँ पर भी इस प्रकार के किस्से सुनाई देने लगे थे, लिव-इन रिलेशनशिप भी गुजरात में फुसफुसाने लगी थी |   

     इस पर चर्चा करने का कोई अर्थ नहीं था | अनामिका के दिमाग़ में अभी भी एंजलीना का फ़्रिज को देखकर चौंकना समझ में नहीं आ रहा था |वह चुपचाप अतिथियों को खिलाने में व्यस्त रही| 

         बासु दी ने कई बार उसकी चुप्पी का कारण जानने की कोशिश की पर उसे ही समझ नहीं आ रहा था, उन्हें क्या बताती ? 

"यू वांट टु नो अबाउट माय बिहेवियर आना ---?"एंजलीना ने अचानक पूछा तब भी वह  चुप बनी रही | 
"एक्च्वली ----" उसने धीरे से कहा ---

"आई हैव हर्ड फ्रॉम माय फ्रैंड्स ---पीपल इन इण्डिया आर स्टार्विंग ---बट ---आई हैव सीन युअर फ़्रिज इज़ फुल ऑफ़ फ्रूट्स, ज्यूसेज़ एन्ड विद अदर ईटिंग स्टफ़ ----सो, आई वाज़ ए लिटिल शॉक्ड  ---दिस इज़ नॉट गुड़ ---पीपल इन इण्डिया आर सो जैनेरस, गुड़ ---एंड दे आर एज़ प्रॉस्परस लाइक----अदर कंट्रीज़ ---"कुछ साँस लेकर वह फिर बोली ;

" पीपल आर फ़ुलिश टू टॉक लाइक दिस फॉर अदर्स ---आय एम सॉरी फॉर माइ एक्शन --" 

     बासु दी के मन में  विद्रोह भर गया था जो उनके चेहरे पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा था लेकिन वे चुप ही रहीं |

    उस दिन आना के घर मेहमान थे, भारत की संस्कृति 'अतिथि देवो भव' पर चलने वाला परिवार ! उसने कुछ नहीं कहा | उसके अनुसार न एंजलीना की गलती थी, न ही बासु दी की ---गलती थी उन लोगों की जो बिना बात ही किसी मनुष्य, जाति, देश ---या किसी के भी बारे में बिना पूरी तरह जाने बेकार की बातें फैलाते हैं | पता नहीं क्यों आना  कभी-कभी यूँ ही पीछे के दरीचों में घूमने पहुँच जाती है ?  

"क्या हुआ ? कहाँ खो गईं ?" अचानक अनामिका को गुमसुम हुए देखकर अशोक ने कहा तो सबकी ऑंखें उसकी ओर घूम गई और उनमें प्रश्नचिन्ह तैर गए |

“क्यों तुमको उस दिन का बात याद आ गया न, जब तुमारे घर में  समोसा पार्टी था   ---“ 

आना  और बासुदी एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा दीं |