अगर मैं बोलूँगा - रचना त्यागी राजीव तनेजा द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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अगर मैं बोलूँगा - रचना त्यागी

आमतौर पर सभी लेखक अपने आसपास के माहौल एवं चल रहे मौजूदा हालात से प्रेरित होकर अपनी कल्पनाशक्ति एवं कौशल के ज़रिए कुछ ना कुछ नया रचने का प्रयास करते हैं। वर्तमान में चल रही इन्हीं तात्कालिक घटनाओं से प्रेरित होकर "अगर मैं बोलूँगा" के नाम से लेखिका रचना का एक नया कहानी संग्रह आया है।  सत्ता और समाज से टकराते आम आदमी की व्यथा, दुःख एवं हताशा को उकेरते इस कहानी संकलन की एक कहानी में मौजूदा व्यवस्था पर तंज कसा जाता दिखाई देता है। जिसमें नोटबंदी के दिनों में पैसे-पैसे को तरसते आम इनसानों की व्यथा को बखूबी व्यक्त किया गया है कि किस तरह अपना ख़ुद का पैसा होते हुए भी वे महज़ एक सरकारी फ़रमान के चलते दाने-दाने तक को मोहताज हो गए। इसी कहानी में जहाँ एक तरफ़ बेटी के निकाह के लिए पाई-पाई कर पन्द्रह हज़ार रुपए जोड़ चुकी रज़िया को अचानक पता चलता है कि नोटबंदी की वजह से उसकी तमाम बचत अब किसी काम की नहीं रही तो उसके पैरों के नीचे से धरती खिसक जाती है तो वहीं दूसरी तरफ़ अपनी बीमारी में भी घंटो तक बैंक की लाइन में धक्के खाने के बावजूद भी उसका पति ज़हूर निकाह के लिए ज़रूरी रकम निकलवा नहीं पाता और अंततः बैंक की ही देहरी पर दम तोड़ देता है। तो वहीं सीवर इत्यादि की सफ़ाई करने वाले कर्मचारियों की शोचनीय दशा को व्यक्त करती इसी संकलन की एक अन्य कहानी में प्रधानमंत्री को लिखे गए एक पत्र के माध्यम से बताया गया है किस तरह सीवर से भरे गंदे नालों की सफ़ाई करने के लिए इनमें से कइयों को धड़ समेत इनमें घुसना पड़ता है कि कई बार सीवर में मौजूद गैस अथवा दुर्गंध की वजह से उनकी मृत्यु तक भी हो जाती है। इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ गाँव के एक सामान्य युवक बृजेश में शहर में आने के बाद आए सार्थक परिवर्तन की बात करते हुए मौजूदा व्यवस्था की खामियों और खोखले चुनावों की बात करने के साथ-साथ इस बात की भी आस बँधाने का प्रयास करती है कि तमाम तरह की नाकारात्मकता के बावजूद भी कुछ लोगों में इंसानियत और ईमान का जज़्बा अभी पूरी तरह से मरा नहीं है। तो वहीं एक अन्य कहानी किसान आंदोलन के दौरान धरने पर बैठी उस हरनाम कौर के दुःख..हताशा और संताप को व्यक्त करती है जिसके जवान बेटे भगत सिंह को छह: अन्य किसानों समेत किसान आंदोलन को कुचलने की साज़िश के तहत उस वक्त कुचल कर मार दिया जाता है जब वे ट्रैक्टर से अनाज ले कर लौट रहे थे। धरने पर बैठे किसानों की व्यथा, दुःख और हताशा को व्यक्त करती इस कहानी में बेटे की मौत के बाद हरनाम कौर एक महिला आंदोलनकारियों की एक ऐसी नेता के रूप में उभरती है जिसके एक लाठीचार्ज के दौरान मौत हो जाती है।इसी संकलन की एक अन्य कहानी विकास का बहाना बना पहाड़ों की ज़मीन हथियाने के मंसूबे का पर्दाफ़ाश करती दिखाई देती है जिसमें एक पहाड़ी गाँव में कुछ दिनों के लिए सैलानी के रूप में रहने आए निखिल की मुलाक़ात भेड़ें चराने वाली भोली भाली गुंजा से होती है। कुछ एक मुलाक़ातों के बाद गुंजा और वो एक-दूसरे को दिल तो दे बैठते हैं मगर कुछ समय बाद निखिल ग़ायब हो जाता है। हैरान परेशान गुंजा को जब उसके ग़ायब होने के पीछे की कहानी का पता चलता है तो..उम्दा कहानियों से लैस इस कहानी संग्रह में पढ़ते वक्त मुझे एक-दो जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त प्रूफरीडिंग की भी एक-आध कमी दिखाई दी।पेज नंबर 94 में लिखा दिखाई दिया कि..'इनमें चाँद बीबी की समझाने का गहरा असर गहरा था'यहाँ 'चाँद बीबी की समझाने का गहरा असर गहरा था' की जगह 'चाँद बीबी के समझाने का गहरा असर था' आएगा।पेज नंबर 95 में लिखा दिखाई दिया कि..' मंत्री जी इस हादसे की सड़ी निंदा करते हुए दोषियों को सख़्त से सख़्त सज़ा दिलवाने के पक्ष में हैं'मेरे हिसाब से यहाँ 'सड़ी निंदा' की जगह 'कड़ी निंदा' आना चाहिए।इससे अगले पैराग्राफ़ में भी यही ग़लती दो-तीन बार दोहराई जाती दिखाई दी।• तसवीर - तस्वीर• फ़क्र - फ़ख्रउम्दा कागज़ पर छपे इस शानदार कहानी संग्रह के 119 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है श्वेतवर्णा प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 249/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।