📖 भाग 1
बारिश उस रात कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी।
रेलवे स्टेशन की पुरानी छत से टपकती बूंदें ज़मीन पर गिरकर छोटे-छोटे गड्ढे बना रही थीं, जैसे कोई बीता हुआ सच ज़मीन पर निशान छोड़ रहा हो। प्लेटफॉर्म नंबर तीन लगभग खाली था। दूर कहीं से ट्रेन के हॉर्न की आवाज़ गूँजी और फिर सन्नाटा लौट आया।
ज़ारा खान अपने गीले दुपट्टे को कसकर पकड़ते हुए स्टेशन के बाहर खड़ी थी। हवा ठंडी थी, लेकिन उसकी हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई थीं। दिल बार-बार सीने से बाहर निकलने को मचल रहा था।
उसकी नज़र मोबाइल की स्क्रीन पर टिकी थी।
Unknown Number:
“अगर तुम्हें अपनी माँ की मौत का सच जानना है, तो आज रात 9 बजे रेलवे स्टेशन आ जाना।”
मैसेज आए हुए पूरे तीन घंटे हो चुके थे, लेकिन ज़ारा अब तक उसी एक लाइन में उलझी हुई थी।
“माँ की मौत का सच…”
उसने खुद से बुदबुदाया।
पाँच साल हो गए थे उस दिन को।
पाँच साल, जब उसकी दुनिया अचानक थम गई थी।
लोगों ने कहा था — “एक्सीडेंट था।”
पुलिस ने फाइल बंद कर दी थी।
पिता ने चुप्पी ओढ़ ली थी।
और ज़ारा…
ज़ारा ने सवाल पूछना छोड़ दिया था।
फिर आज ये मैसेज।
उसने कई बार सोचा कि वापस चली जाए।
लेकिन फिर माँ का चेहरा आँखों के सामने आ जाता —
आख़िरी बार अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा हुआ,
आँखें अधखुली, होंठों पर अधूरी-सी बात।
“अगर उस दिन मैंने ज़्यादा सवाल पूछे होते…”
ज़ारा की आँखें भर आईं।
“नाज़िया, तुम पागल हो रही हो।”
उसने खुद को समझाया।
“कोई मज़ाक भी हो सकता है।”
लेकिन दिल नहीं माना।
घड़ी में ठीक नौ बज रहे थे।
तभी पीछे से किसी के जूतों की आवाज़ आई।
ज़ारा चौंककर मुड़ी।
“ज़ारा खान?”
आवाज़ भारी थी, साफ़ और बेहद गंभीर।
उसके सामने एक आदमी खड़ा था।
करीब तीस-बत्तीस साल का।
काली जैकेट, भीगे बाल, हल्की दाढ़ी।
आँखें…
आँखों में अजीब-सी बेचैनी और गहराई थी।
“आप…?”
ज़ारा का गला सूख गया।
“मेरा नाम आरव मल्होत्रा है।”
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, लेकिन ज़ारा ने हाथ नहीं मिलाया।
“आपने मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”
उसने सीधा सवाल किया।
आरव ने चारों ओर नज़र दौड़ाई, जैसे किसी को ढूँढ रहा हो।
“यहाँ बात करना ठीक नहीं है।”
उसने धीमी आवाज़ में कहा।
“तो फिर आपने यहीं बुलाया क्यों?”
ज़ारा का लहजा तेज़ हो गया।
आरव ने उसकी आँखों में देखा।
पहली बार ज़ारा को लगा कि ये आदमी झूठ नहीं बोल रहा।
“क्योंकि कुछ लोग आपको ढूँढ रहे हैं।”
ज़ारा का दिल ज़ोर से धड़का।
“क…कौन लोग?”
“वही लोग…”
आरव ने गहरी साँस ली।
“जो आपकी माँ की मौत के ज़िम्मेदार हैं।”
वक़्त जैसे रुक गया।
“बकवास!”
ज़ारा लगभग चिल्ला पड़ी।
“मेरी माँ की मौत एक हादसा थी।”
आरव ने जेब से एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला।
पीला पड़ चुका था, किनारे फटे हुए।
“क्या आपकी माँ का नाम सायरा खान था?”
उसने पूछा।
ज़ारा की आँखें फैल गईं।
“आपको ये नाम कैसे पता?”
आरव ने लिफ़ाफ़ा खोलकर एक फोटो निकाली।
एक औरत — हल्की मुस्कान, आँखों में वही अपनापन जो ज़ारा रोज़ आईने में देखती थी।
“ये…”
ज़ारा के हाथ काँपने लगे।
“ये मेरी माँ है।”
“और ये फोटो उनकी मौत से तीन दिन पहले ली गई थी।”
आरव ने कहा।
ज़ारा का दिमाग़ सुन्न हो गया।
“ये… ये आपको कहाँ से मिली?”
“उस घर से…”
आरव की आवाज़ में अजीब-सा दर्द उतर आया।
“जहाँ उन्होंने आख़िरी साँस ली थी।”
बारिश और तेज़ हो गई।
“आप ये सब क्यों कर रहे हैं?”
ज़ारा ने भर्राई आवाज़ में पूछा।
“आप कौन हैं?”
आरव कुछ सेकंड चुप रहा।
“क्योंकि उस रात…”
उसने धीरे से कहा,
“मैं भी वहाँ था।”
ज़ारा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“आप झूठ बोल रहे हैं।”
उसने सिर हिलाया।
“काश मैं झूठ बोल रहा होता।”
आरव की आँखें नम हो गईं।
“तो आज मुझे हर रात डरकर नहीं जागना पड़ता।”
तभी आरव का फोन बज उठा।
उसने स्क्रीन देखी और चेहरे का रंग बदल गया।
“हमें यहाँ से जाना होगा।”
“क्यों?”
ज़ारा घबरा गई।
आरव ने प्लेटफॉर्म की तरफ़ इशारा किया।
वहाँ दूर खड़ी एक काली कार की हेडलाइट्स जल उठीं।
“क्योंकि वो हमें देख चुके हैं।”
“कौन?”
“वो लोग…”
आरव ने ज़ारा का हाथ पकड़ा।
“जो सच को दफ़न रखना चाहते हैं।”
ज़ारा ने instinctively हाथ छुड़ाना चाहा, लेकिन आरव की पकड़ मज़बूत थी।
“अगर ज़िंदा रहना है…”
उसने कहा,
“तो मुझ पर भरोसा करो।”
ज़ारा की आँखों में डर था, उलझन थी, लेकिन कहीं न कहीं उम्मीद भी।
“अगर आप झूठ बोल रहे हुए…”
उसने चेतावनी दी।
“तो मैं सबसे पहले खुद को सज़ा दूँगा।”
आरव ने कहा।
काली कार धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी।
“अब सवाल ये नहीं है कि आप मेरे साथ चलें या नहीं…”
आरव ने कहा।
“सवाल ये है कि आप सच जानना चाहती हैं… या नहीं।”
ज़ारा ने एक पल के लिए पीछे देखा —
वही स्टेशन, वही बारिश, वही अकेलापन।
फिर उसने आगे देखा —
अनजान रास्ता, अनजान आदमी, और सच का डर।
उसने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“चलो।”
आरव बिना कुछ कहे उसे लेकर तेज़ी से अंधेरे में निकल गया।
पीछे स्टेशन पर रह गई —
बारिश…
और वो सवाल, जिनके जवाब अब टल नहीं सकते थे।
जिस सच की तलाश में ज़ारा निकली है,
वही सच उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बनने वाला है…
और आरव —
वो रक्षक है या सबसे बड़ा राज़?
➡️ जारी रहेगा…