इश्क़ का पैगाम ziya द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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इश्क़ का पैगाम

इश्क़ कभी अचानक नहीं होता।
वो धीरे-धीरे किसी के लहजे में उतरता है, किसी की आँखों में ठहरता है और फिर इंसान की पूरी ज़िंदगी पर अपना नाम लिख देता है।
आलिया को भी नहीं पता था कि उसे इश्क़ कब हुआ।
शायद उस दिन, जब उसने पहली बार अयान को खामोशी से मुस्कुराते देखा था…
या शायद तब, जब उसकी बातों में सवाल कम और अपनापन ज़्यादा महसूस हुआ था।
आलिया शहर के पुराने हिस्से में रहती थी। तंग गलियाँ, झुके हुए मकान, और हर खिड़की के पीछे छुपी कोई न कोई कहानी। उसका घर भी वैसा ही था—पुराना, मगर यादों से भरा हुआ। उसकी माँ अक्सर कहा करती थीं,
“कुछ घर ईंटों से नहीं, सब्र से बने होते हैं।”
आलिया ने बहुत कम उम्र में सब्र सीख लिया था।
पिता की सख़्ती, माँ की खामोशी, और समाज के सवाल—इन सबके बीच उसने खुद को किताबों में ढूँढना शुरू कर दिया। किताबें उसके लिए भागने की जगह थीं, जहाँ कोई रोक-टोक नहीं थी, कोई डर नहीं था।
उसी लाइब्रेरी में अयान से उसकी मुलाक़ात हुई।
अयान…
एक साधारण सा नाम, मगर उसकी मौजूदगी साधारण नहीं थी।
वो उन लोगों में से था जो ज़्यादा बोलते नहीं, मगर जब बोलते हैं तो सामने वाला सुनता रह जाता है। उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी, जैसे उसने ज़िंदगी को बहुत पास से देखा हो।
पहली मुलाक़ात में कोई बात नहीं हुई।
बस नज़रें टकराईं।
और कभी-कभी नज़रें ही काफ़ी होती हैं।
दूसरी बार अयान ने पूछा था,
“आप भी फ़िक्शन पढ़ती हैं?”
आलिया ने सिर हिलाया।
वो मुस्कुराया।
और उस मुस्कान में कोई दावा नहीं था, बस अपनापन था।
धीरे-धीरे दोनों की मुलाक़ातें बढ़ने लगीं।
कभी किताबों पर बातें, कभी खामोशी साझा करना।
कभी चाय की दुकान पर घंटों बैठे रहना, बिना ये सोचे कि वक़्त कहाँ चला गया।
आलिया को एहसास हुआ कि इश्क़ शोर नहीं करता।
वो तो बस किसी के पास बैठकर भी सुकून दे देता है।
मगर हर इश्क़ के सामने एक दीवार होती है।
और उनकी दीवारें बहुत ऊँची थीं।
अयान एक साधारण परिवार से था।
ज़िम्मेदारियाँ उसके कंधों पर उम्र से पहले आ गई थीं।
काम, घर, माँ-बाप—उसकी ज़िंदगी में “मैं” के लिए बहुत कम जगह थी।
आलिया के घरवाले सपनों से डरते थे।
उनके लिए प्यार एक गुनाह था, और लड़की की खामोशी उसकी सबसे बड़ी खूबी।
जब पहली बार किसी ने आलिया से अयान के बारे में पूछा,
तो उसने झूठ बोल दिया।
और उसी दिन उसे समझ आया—
इश्क़ सिर्फ़ मिलने का नाम नहीं, छुपाने का भी नाम है।
अयान हर दिन उसे छोटे-छोटे ख़त लिखता।
व्हाट्सऐप के दौर में भी वो काग़ज़ पर भरोसा करता था।
“अगर मैं कहूँ कि तुम्हारे बिना मेरी ज़िंदगी अधूरी है,
तो क्या तुम इसे इश्क़ कहोगी?”
आलिया ने कभी सीधे जवाब नहीं दिया।
वो डरती थी।
क्योंकि वो जानती थी—
अगर ये इश्क़ टूटेगा, तो आवाज़ नहीं करेगा, बस अंदर ही अंदर सब कुछ ख़त्म कर देगा।
फिर वो दिन आया, जब अयान ने कहा,
“मुझे शहर छोड़ना पड़ेगा।”
आलिया हँसी।
उसे लगा वो मज़ाक कर रहा है।
लेकिन अयान की आँखें मज़ाक नहीं कर रहीं थीं।
“कुछ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं आलिया,
जो इंसान को अपनी खुशियों से भी बड़ा बना देती हैं।”
उस दिन आलिया ने पहली बार महसूस किया कि इश्क़ हमेशा लड़ता नहीं।
कभी-कभी वो चुपचाप हार भी मान लेता है।
अयान चला गया।
बिना किसी वादे के, बिना किसी तारीख़ के।
आलिया ने इंतज़ार करना शुरू किया।
दिन, महीने, साल…
हर त्योहार, हर बारिश, हर अधूरी शाम उसके इंतज़ार में डूबी रही।
लोगों ने कहा—
“भूल जाओ।”
“वक़्त सब ठीक कर देता है।”
लेकिन कुछ जख़्म ऐसे होते हैं,
जो ठीक नहीं होते, बस इंसान उनके साथ जीना सीख लेता है।
आलिया की शादी की बातें होने लगीं।
वो खामोश रही।
क्योंकि उसने समझ लिया था—
कभी-कभी चुप रहना ही सबसे बड़ा विरोध होता है।
एक रात, छत पर बैठी आलिया ने आसमान से पूछा,
“क्या इश्क़ का कोई अंजाम होता है?”
जवाब में बस ख़ामोशी थी।
सालों बाद, एक चिट्ठी आई।
साधारण लिफ़ाफ़ा, मगर हाथ काँप गए।
अयान की लिखावट थी।
उसने लिखा था—
“मैं तुम्हें पा नहीं सका,
लेकिन तुम्हें खोया भी नहीं।
इश्क़ का पैग़ाम यही है आलिया—
कि मोहब्बत मुकम्मल हो या न हो,
अगर सच्ची हो, तो ज़िंदगी भर साथ चलती है।”
आलिया रोई नहीं।
वो मुस्कुराई।
क्योंकि अब उसे जवाब मिल चुका था।
इश्क़ का पैग़ाम यही है—
कि प्यार किसी को बाँधता नहीं,
बल्कि आज़ाद करना सिखाता है।
उस रात, आलिया ने अपनी डायरी में आख़िरी लाइन लिखी—
“मैंने इश्क़ खोया नहीं,
मैंने इश्क़ समझ लिया।”
और शायद…
यही सबसे बड़ी जीत थी। 🌙💌