1
वो शहर, जहाँ गलियाँ यादें छुपाती नहीं
उस शहर की हवा में कुछ अटका हुआ था।
शायद कोई अधूरी चीख़…
या कोई ऐसा सच, जिसे कभी दफ़नाया नहीं गया।
आयरा को बचपन से खिड़कियों से लगाव था।
उसे लगता था, खिड़कियाँ झूठ नहीं बोलतीं।
दीवारें इंसान को धोखा दे सकती हैं,
लेकिन बाहर की दुनिया…
हमेशा सच दिखा देती है।
हर रात वो उसी खिड़की के पास बैठती।
नीचे वही सड़क।
वही मोड़।
और वही स्ट्रीटलाइट—
जिसकी पीली रोशनी में
तीन साल पहले
एक ज़िंदगी खत्म हुई थी।
लोग कहते थे वो हादसा था।
पुलिस ने भी यही कहा।
लेकिन आयरा जानती थी—
कुछ हादसे, दरअसल गुनाह होते हैं,
बस उनमें हथियार नहीं होते।
उस रात भी बारिश हो रही थी।
बूँदें शीशे से टकरा रही थीं,
जैसे कोई बाहर से दस्तक दे रहा हो।
आयरा ने आँखें बंद कीं।
उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी—
गिरते हुए जिस्म की।
और उसके बाद…
सन्नाटा।
2
पहली मुलाक़ात, जो इत्तफ़ाक़ नहीं थी
कॉलेज की लाइब्रेरी
हमेशा आयरा की शरणस्थली रही थी।
शोर से दूर,
लोगों से दूर,
और सवालों से थोड़ी देर की छुट्टी।
वहीँ उसने उसे देखा।
ज़ैद।
सबसे आख़िरी मेज़ पर।
अकेला।
किताब खुली हुई,
लेकिन आँखें शब्दों से दूर।
आयरा ने अनजाने में पूछ लिया—
“ये किताब अच्छी है?”
ज़ैद ने सिर उठाया।
उनकी नज़रें टकराईं।
उस पल आयरा को लगा
जैसे किसी ने उसके सीने में
धीरे से उँगली रख दी हो।
“अच्छी किताबें नहीं होतीं,”
ज़ैद बोला,
“बस कुछ किताबें
हमारे जैसे लोगों को पहचान लेती हैं।”
“हमारे जैसे?”
आयरा ने पूछा।
ज़ैद की आँखों में
एक अजीब सी मुस्कान उभरी।
“जो बाहर से ज़िंदा
और अंदर से थके होते हैं।”
आयरा पहली बार
बिना वजह समझी गई थी।
3
ख़ामोशी की दोस्ती
उनकी दोस्ती
किसी प्रस्ताव से शुरू नहीं हुई।
बस…
साथ बैठना।
एक ही किताब पढ़ना।
और कभी-कभी
बिल्कुल चुप रहना।
ज़ैद बहुत कम बोलता था।
लेकिन जब बोलता,
तो आयरा के ज़हन में
बहुत देर तक गूँजता रहता।
“तुम कभी अपने बारे में क्यों नहीं बताते?”
आयरा ने एक दिन पूछा।
ज़ैद ने खिड़की की तरफ देखा।
“क्योंकि मैं वो इंसान हूँ
जिसका अतीत
उसके वर्तमान से ज़्यादा भारी है।”
“तो छोड़ क्यों नहीं देते?”
ज़ैद हँसा नहीं।
“कुछ बोझ
छोड़ने से नहीं उतरते।”
आयरा ने पहली बार
अपने दिल में डर महसूस किया।
लेकिन उसी डर के साथ
एक अजीब सी खिंचाव भी।
4
वो रास्ता, जिससे मना किया गया था
उस दिन बारिश अचानक आई।
कॉलेज के बाहर
छाते कम थे,
लोग ज़्यादा।
ज़ैद ने अपना छाता खोला।
“घर छोड़ दूँ?”
आयरा ने हाँ कर दी।
दोनों उसी सड़क की ओर बढ़े।
वही सड़क।
ज़ैद अचानक रुक गया।
“इस रास्ते से मत जाया करो,”
उसकी आवाज़ सख़्त थी।
“क्यों?”
आयरा रुकी।
“क्योंकि कुछ जगहें
इंसान को याद रखती हैं,”
ज़ैद बोला,
“और कुछ इंसान
उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाते।”
आयरा ने हँसकर बात टाल दी।
लेकिन उस रात
उसकी नींद में
वही सड़क आई।
और वही आवाज़।
5
हाथ, जो पकड़ लिया गया
पहली बार ज़ैद ने
उसका हाथ पकड़ा
तो आयरा चौंकी।
उसके हाथ
बहुत ठंडे थे।
“अगर मैं ग़लत निकला तो?”
ज़ैद ने पूछा।
“तो भी,”
आयरा ने बिना सोचे कहा,
“तुम अकेले नहीं रहोगे।”
ज़ैद की पकड़
और मज़बूत हो गई।
उस रात आयरा ने
डायरी में लिखा—
“कुछ लोग
हमें इसलिए नहीं मिलते
कि हमें खुश करें,
बल्कि इसलिए
कि हमें बदल दें।”
उसे नहीं पता था
ये बदलाव
उसे तोड़ देगा।
6
अचानक ग़ायब
अगले दिन
ज़ैद कॉलेज नहीं आया।
ना फोन।
ना मैसेज।
तीसरे दिन
आयरा उसी सड़क पर पहुँची।
जहाँ पोस्टर लगा था—
“तीन साल पुराना केस –
फिर से जाँच”
उसके हाथ काँप गए।
7
नाम, जो ज़िंदा नहीं था
पुलिस स्टेशन।
इंस्पेक्टर की आवाज़।
“जिस लड़के की तस्वीर आप पहचान रही हैं,”
उसने कहा,
“उसका नाम अयान मिर्ज़ा है।
और वो तीन साल पहले मर चुका है।”
आयरा की दुनिया
एक पल में ढह गई।
“लेकिन वो मेरे साथ…”
“मरे हुए लोग
किसी के साथ नहीं चलते,”
इंस्पेक्टर बोला।
8
गुनाह की असली शक्ल
तीन साल पहले—
आयरा ने सच लिखा था।
एक आर्टिकल।
अयान ने उसी सड़क पर
उससे बहस की।
धक्का।
फिसलन।
टक्कर।
मौत।
हादसा कहलाया।
लेकिन आयरा के अंदर
हर रोज़ क़त्ल होता रहा।
9
वापसी
रात को दस्तक हुई।
दरवाज़ा खोला।
ज़ैद सामने था।
“तुम ज़िंदा हो?”
“तुम्हारे ज़मीर में,”
उसने कहा।
10
सच्चाई, जो इंसान नहीं होती
“मैं बदला लेने नहीं आया,”
ज़ैद बोला,
“मैं इसलिए आया
क्योंकि तुमने खुद को
कभी माफ़ नहीं किया।”
आयरा रो पड़ी।
“तो मैं क्या करूँ?”
ज़ैद ने धीमे से कहा—
“सच स्वीकार करो…
तभी मैं जा पाऊँगा।”