प्रदेश के किनारे का एक छोटा-सा गाँव।
कमरा भारी था। दीये जल रहे थे, पर उजाला नहीं था। मिट्टी की दीवारों से धुआँ चिपका हुआ था—जैसे जंगल की लड़ाई यहाँ तक चली आई हो।
जख्खड़ सिर झुकाए चौकी पर बैठा था। कंधे की चोट अब भी सुलग रही थी, पर दर्द से ज़्यादा बोझ किसी और चीज़ का था।
बाहर, गाँव की औरतें विलाप कर रही थीं। किसी माँ की चीख अचानक तेज़ हो जाती, फिर टूटकर सिसकी में बदल जाती। किसी के हाथ में बेटे की कमीज़ थी। किसी के आँचल में खून सूख चुका था।
जीवन पास बैठा था—पुराना डाकू और जख्खड़ का मार्गदर्शक। सफ़ेद दाढ़ी, झुकी पीठ, आँखों में पुरानी आग। उसने धीरे से कहा, “कल तक इन गाँवों के लड़कों के पास नौकरी नहीं थी, जख्खड़। आज इन गाँवों के पास लड़के ही नहीं बचे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“सिर्फ़ इसी इलाके के बीस नौजवान,” जीवन बोला, “उनकी लाशें अभी भी जंगल में पड़ी हैं। माँ-बाप इंतज़ार कर रहे हैं—कि कोई तो बताए, कौन-सा टुकड़ा किसका है।”
जख्खड़ ने कुछ नहीं कहा। सिर और झुक गया।
उसी वक़्त एक आदमी भीतर आया। चेहरा घबराया हुआ था।
“भैया जी,” उसने धीमे से कहा, “वेबसाइट पर एक मैसेज आया है।”
जीवन भड़क उठा। “बंद करो ये वेबसाइट! पुराने ज़माने में हम डाकू लोग छिपकर गुरिल्ला लड़ाई लड़ते थे। ये टीवी, इंटरनेट—इन्होंने हमें सबके सामने नंगा कर दिया है।”
वह आदमी मुड़ने ही वाला था कि—
“रुक।” जख्खड़ की आवाज़ उठी। पहली बार।
उसने धीरे से सिर उठाया।
“किसका मैसेज है?”
आदमी हिचका।
“एक नाम है, भैया… सौम्या धुरंधर सिंह। एक वॉइस मैसेज छोड़ा है।”
कमरे की हवा जैसे जम गई।
कोई खाँसा। कोई साँस रोक बैठा।
जीवन तुरंत बोला,
“ज़रूर ठाकुर की चाल होगी। ये देखने के लिए कि तू ज़िंदा है या मर गया।”
जख्खड़ खड़ा हो गया। दर्द से चेहरा तन गया, पर आवाज़ स्थिर थी।
“हो सकता है,” उसने कहा।
“मैसेज चला।”
आदमी ने फोन पर बटन दबाया और उसे मेज़ पर रख दिया।
—
एक घंटा पहले, ठाकुर धुरंधर सिंह की हवेली।
सौम्या ने अपने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद किया।
कमरा शांत था—इतना कि उसकी साँसें सुनाई दे रही थीं। फोन हाथ में था। उँगलियाँ काँप नहीं रही थीं। यह नया था।
उसने रिकॉर्ड दबाया।
“जख्खड़ भैया,” उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “मैं सौम्या। सौम्या धुरंधर सिंह। मुझे आपसे मिलना है। पर मैं जंगल नहीं आऊँगी। आप भी यहाँ नहीं आएँगे। मुझे पता है—हम दोनों शायद एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर सकते, पर मुझे लगता है हम एक-दूसरे के काम आ सकते हैं।”
एक पल रुकी। फिर बोली—
“मैं अक्सर सुनंदा मौसी के पार्लर जाती हूँ। शहर के बीचोंबीच है। वहाँ मिल सकते हैं। सुनंदा मौसी आपकी ही बिरादरी की हैं। मुझे उन पर भरोसा है… और उम्मीद है कि वहाँ आप भी शांति रखेंगे। मेरे साथ अमूमन चार गनमैन चलते हैं, पर वे पार्लर के बाहर ही रुकेंगे।”
उसकी साँस थोड़ी गहरी हुई।
“अगर बात करनी है—तो वहीं। कल सुबह दस बजे। आप नहीं आए, तो मैं फिर कभी मैसेज नहीं करूँगी।”
रिकॉर्ड बंद।
फोन मेज़ पर रख दिया।
पहली बार उसे लगा—वह किसी से कुछ माँग नहीं रही। शर्त रख रही थी।
—
दूसरी ओर, जख्खड़ देर तक मेज़ पर पड़े फोन को देखता रहा।
संदेश पूरा सुन चुका था।
जीवन पास खड़ा था। “बेटा, ये औरत खतरनाक है। ये जंगल से बाहर खींच रही है।”
जख्खड़ ने नज़र उठाई। “ये लड़की हमसे मदद चाहती है,” उसने कहा। “और हमने कभी मदद से इंकार नहीं किया। आगे देखेंगे—ये हमारे किस काम आ सकती है।”
—
अगली दोपहर।
सुनंदा ब्यूटी पार्लर में अगरबत्ती की हल्की खुशबू थी। शीशों पर गुलाबी परदे। बाहर सड़क का शोर—अंदर धीमी भजन की आवाज़।
हीरा चार गनमैन के साथ गाड़ी से उतरा। चारों ओर नज़र दौड़ाई।
फिर सौम्या गाड़ी से उतरी। सादा सूट। बाल खुले नहीं—बँधे हुए। चेहरे पर न मेकअप, न डर।
रश्मि हमेशा की तरह साड़ी में थी।
“भाभी, ज़रा जल्दी कीजिएगा आप लोग,” हीरा ने पार्लर में घुसते हुए टोका।
रश्मि हँसी।
“दुल्हन का मेकअप है, हीरा भैया। टाइम तो लगेगा।”
वे अंदर चली गईं।
सुनंदा मौसी काउंटर पर बैठी थीं। उन्होंने सिर हिलाया।
“जा, बिटिया। अंदर वाला कमरा खाली है।”
सौम्या अंदर चली गई।
रश्मि ने इधर-उधर देखा और अपने ब्लाउज़ के अंदर से दो-दो हज़ार के नोटों का छोटा बंडल निकाला।
सुनंदा मौसी ने हाथ के इशारे से मना कर दिया।
“नहीं बेटी। इस काम के लिए नहीं।”
अंदर कमरे में सौम्या बैठी रही। दाँत भींचे हुए, पैर टकटकाते हुए।
क्या यहाँ आना गलती थी? अभी भी चली जाऊँ?
पीछे का दरवाज़ा खुला।
जख्खड़ अंदर आया।
न हथियार।
न नक़ाब।
बस थकी आँखें और कंधे पर बँधी पट्टी।
दोनों आमने-सामने बैठे।
पहली बार।
कमरे में कोई सन्नाटा नहीं था।
बस एक सवाल था—
कौन किसे इस्तेमाल करेगा?