मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 2: चुप्पी Varun द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 2: चुप्पी

बाथरूम वाली घटना की उसी शाम, बड़ी हवेली होने वाली शादी की सजावट से जगमगा रही थी। यही हवेली सौम्या के बचपन का घर था।

सौम्या के पिता, ठाकुर धुरंधर सिंह, पुराने समय के राजवाड़ी ज़मींदार थे। मौजूदा पहचान भले ही एक सांसद की थी, लेकिन पैसा, रौब और शक्ति अब भी राजवाड़ों जैसी ही थी।

हवेली के चारों ओर फैला बाग़ तरतीब से कटा हुआ था, लेकिन हर पगडंडी पर निगाहें तैनात थीं। चप्पे-चप्पे पर हथियारबंद गुंडों का पहरा था। कुछ सजे-धजे कमांडो—बूट चमकाते, कंधों पर राइफलें। कुछ उन्हीं में घुले-मिले सादे कपड़ों में—कहीं बनियान पहने, कहीं जैकेट डाले, कहीं दाढ़ी खुजाते हुए।

कुछ लोग अलाव के पास बैठे थे। आग की लौ में हथियारों की परछाइयाँ नाचती थीं। कोई हँस नहीं रहा था—सिर्फ़ इंतज़ार था।

किसी-किसी के वॉकी-टॉकी पर गश्त मैनेजर की सूखी, सपाट आवाज़ गूँज जाती—

“ईस्ट गेट क्लियर।”

“गार्डन पाथ—नो मूवमेंट।”

हवेली कोई घर नहीं लग रही थी। वह एक क़िला थी।

अंदर कमरे में अजीब-सी ख़ामोशी थी।

ठाकुर धुरंधर सिंह कुर्सी पर बैठे थे, मूँछों पर ताव देते हुए—जैसे कोई फ़ैसला पहले ही हो चुका हो। 

सामने पलंग के किनारे सौम्या बैठी थी। सिर झुका हुआ। हाथ आपस में उलझे हुए।

एक ओर उसकी माँ—जानकी देवी। दूसरी ओर बड़ी भाभी—रश्मि। दोनों की आँखों में चिंता थी, लेकिन डर उससे ज़्यादा।

जानकी देवी ने धीरे से पूछा,

“बेटा… तूने कोई सपना तो नहीं देख लिया?”

सौम्या चौंकी। उसने सिर उठाया।

“मम्मी… ये आप क्या बात कर रही हैं?”

ठाकुर साहब ने उसकी आँखों में देखा और ज़ोर से हँस पड़े।

“अरे बस इतनी-सी बात?”

सौम्या के होंठ काँप गए।

“पापा?”

उसे लगा, जैसे वह अपने ही घर में नग्न खड़ी हो—बिना किसी के उसे ढकने की ज़रूरत समझे।

ठाकुर साहब उठ खड़े हुए। “बेटी, बाथरूम में घुस गया तो क्या हुआ?” उन्होंने ऐसे कहा जैसे कोई पुरानी, आज़माई हुई सच्चाई दोहरा रहे हों। “इस उम्र के लड़कों में बहुत ग़र्मी होती है। और ख़ासकर शादी से ठीक पहले ये उन्माद चरम पर होता है।”

वह मुस्कराए।

“जब हमारी और तुम्हारी मम्मी की शादी हुई थी, तो एक हफ्ते तक—”

“चुप भी कीजिए आप,” जानकी देवी ने झुँझलाकर कहा।

ठाकुर साहब ठहाका मारकर हँसे।

रश्मि भाभी की नज़रें झुक गईं। वह शरमा गई।

सौम्या का गला भर आया। “पापा… उसने इतनी गंदी हरकत की है और—”

“अरे क्या गंदी हरकत?” ठाकुर साहब ने बीच में काट दिया। “ये तो कुछ भी नहीं। जब हम जवान थे, तो दोस्तों के साथ नदी किनारे जाया करते थे। नदी में नहाती औरतों को देखने—”

वह फिर हँसे। “हा-हा।”

सौम्या की आँखों में आँसू छलक आए। “इसे आजकल molestation और sexual harassment कहा जाता है, पापा।”

कमरे की हवा बदल गई। ठाकुर साहब का चेहरा सख़्त हो गया।

“देखो, बेटी,” उनकी आवाज़ अब भारी थी, “ये सब भूल जाओ और शादी की तैयारी करो।”

फिर उन्होंने रश्मि की तरफ़ देखा।

“रश्मि बेटा, तुम ज़रा इसे समझाओ।”

रश्मि कुछ कहने ही वाली थी कि—

“मैं ये शादी नहीं करूँगी, पापा!” सौम्या चीख पड़ी।

वह उठ खड़ी हुई। “मैं पूरी ज़िंदगी उस इंसान के साथ—”

“चुप कर, बदतमीज़!” ठाकुर साहब दहाड़े।

उनका हाथ उठ गया—हवा में ही रुक गया। वह ग़ुस्से से काँप रहे थे।

“अब हम पशुपति बाबू को फोन करके क्या कहें?” उन्होंने तंज़ से कहा। “कि आपका भतीजा, जो अमेरिका रिटर्न है, हमारी बेटी के साथ बाथरूम में था?”

कमरा जैसे जम गया।

“बात फैलेगी, बदनामी होगी।” उनकी आवाज़ ठंडी हो गई। “उस लड़के का कुछ नहीं होगा। लेकिन तेरी शादी—कभी नहीं होगी।”

ख़ामोशी छा गई।

सौम्या सिसक रही थी। अपना रुदन दबाए हुए। डरी हुई।

रश्मि पास आई और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

ठाकुर साहब की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हुईं।

“अपना फोन दे।”

सौम्या नहीं हिली।

“फोन दे अपना,” वे गरजे।

काँपते हाथों से सौम्या ने पैंट की जेब से फोन निकाला और आगे बढ़ा दिया।

ठाकुर साहब ने झपटकर लिया और अपनी जेब में रख लिया।

“तेरी शादी तक ये मेरे पास रहेगा,” उन्होंने कहा। “और ख़बरदार—अपनी किसी सहेली, चमची, किसी से भी इस बारे में कुछ कहा।”

उन्होंने जानकी देवी और रश्मि की तरफ़ देखा।

“शादी तक ये कहीं बाहर न जाए, तो अच्छा है। पार्लर, मंदिर—कहीं भी जाना हो, तो तुम दोनों में से एक इसके साथ जाएगी। चाहे कितनी भी व्यस्त हो।” उन्होंने पूछा नहीं। आदेश दिया। “बलदेव, हीरा और चार गनमैन हमेशा साथ रहेंगे। शादी तक कोई ड्रामा नहीं चाहिए। समझीं?”

दोनों ने सिर हिला दिया।

सौम्या वही बैठी रही।

चुप। टूटी हुई। घिरी हुई।

उसे साफ़ समझ आ गया था—कल बाथरूम में जो हुआ था, वह कोई घटना नहीं थी।

वह शुरुआत थी।

तभी हीरा अंदर आया—लंबा कद, चौड़ा बदन, खुले बाल, घनी दाढ़ी और मूँछें।

“ठाकुर साब।”

“क्या है?” धुरंधर सिंह की नज़र अब भी सौम्या पर ही थी।

“जी… मंत्री जी की गाड़ी गेट पर पहुँच चुकी है,” हीरा ने अदब से कहा।

“हाँ, चलो। मैं पहुँचता हूँ।”

हीरा चला गया।

ठाकुर साहब तेज़ी से बाहर निकले, लेकिन जानकी देवी के शब्दों ने उन्हें रोक लिया।

दोनों कमरे से बाहर आ चुके थे।

“सुनिए जी… वो लड़का करण अंदर कैसे घुस आया, इतने पहरे के बीच?”

ठाकुर साहब मुड़े नहीं।

“हमने किसी काम से बुलाया था,” उन्होंने सपाट स्वर में कहा। “हमारी बातचीत ख़त्म हुई, उसके बाद उसने कहा—सौम्या से मिलकर आता हूँ। हमें क्या पता था ऐसी ओछी हरकत करेगा।”

एक पल रुके।

“इस बात को भूल जाओ, मंत्री साहब के लिए बढ़िया खाने का इंतज़ाम करो।”

“जी।”

जानकी देवी ने चुपचाप पल्लू ठीक किया।