A Perfect Murder - 1 books and stories free download online pdf in Hindi

ए पर्फेक्ट मर्डर - भाग 1

भाग 1

खिड़की गांँव के उस छोटे से पुलिस स्टेशन में एक खामोशी सी छा गई जब अमोल ने इंस्पेक्टर यादव पर चीखते हुए कहा,"मैं बारह घंटों से इस पुलिस स्टेशन के चक्कर काट रहा हूँ पर आप हैं कि आपके कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। मेरी पत्नी पिछले बारह घंटों से घर नहीं आई है इंस्पेक्टर। प्लीज़, तलाश कीजिए उसकी।"

अमोल गुप्ता, एक फूड कम्पनी में सुपरवाइज़र के पद पर नियुक्त था। कद-काठी, शक्ल-सूरत बहुत आम थी। रंग सांवले से थोड़ा कम था। पूरी तरह श्याम वर्ण भी नहीं कहेंगे। अपने छोटे से परिवार में बहुत खुश था। दिल्ली में खिड़की एक्सटेंशन में अपनी पत्नी नीलम और दो बच्चे, रोहित जो चार साल का था और चित्रा जो छह साल की थी, के साथ रहता था।

सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। नीलम जैसी सुंदर सर्वगुण संपन्न पत्नी पा अमोल अपने आपको बहुत खुशकिस्मत समझता था। प्रायः लोग उन दोनों की जोड़ी देख आश्चर्यचकित रह जाते थे। नीलम बहुत खूबसूरत, सुडौल शरीर और हंसमुख स्वभाव की महिला थीं। कोई भी उसकी तरफ आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता था। और अमोल एक आम सा दिखने वाला, चुपचाप और शांत स्वभाव का व्यक्ति था। लोग चाहे जो भी कहें, वह दोनों आपस में बहुत खुश थे।

आज भी शादी का दिन याद आता है उसे, जब नीलम को देखकर उसके सभी दोस्त हक्के-बक्के रह गए थे।

“यार! तेरी तो लॉटरी लग गई! क्या खूबसूरत लड़की मिली है तुझे!” अमोल के दोस्त संजय ने ताना मारते हुए कहा।

“हाँ यार! लंगूर को हूर मिल गई!” पुनीत हँसते हुए बोला।

अमोल का मन तो कर रहा था कि सबका मुँह तोड़ दे। अंदर एक तुफान चल रहा था। पर वो अपने मन को संभाल कर बैठा था। कोई तमाशा नहीं चाहता था। पर जब उसके दोस्त साहिल ने टिप्पणी कसी, “यार! क्या चीज़ है! मज़े हैं तेरे भाई! आज रात…” ये सुनते ही अमोल का खून खौल उठा। वो साहिल का कॉलर पकड़ने ही वाला था कि नीलम ने उसके उसके हाथ को खींचते हुए उसे वापस बैठने का इशारा किया।
“अमोल जी, जिसे जो कहना है कहने दीजिए। लोग तो कहते ही रहेंगे। आप शांत रहिए।”
नीलम के विनम्र निवेदन पर अमोल शांति से बैठ गया।

शादी की पहली रात जब वो कमरे में आया, तब भी उसके मन में अपने दोस्तों द्वारा बोले गए शब्द गूंज रहे थे। वो चुपचाप जाकर खिड़की के पास खड़ा हो गया। उसका ऐसा बर्ताव देख नीलम थोड़ी घबरा गई। वह पलंग से उठ उसके पास जाकर बोली, “क्या बात है? आप ठीक तो हैं? क्या मुझसे कुछ गलती हुई है?”

अमोल ने घूमकर नीलम की आँखों में देखते हुए कहा, “नीलम, आपसे एक बात पूछनी है। आप बुरा तो नहीं मानेंगी?”

“नहीं, पूछिए।” नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा।

“आपने…मतलब…आप इतनी खूबसूरत हैं, आपको तो कोई भी हैंडसम लड़का मिल सकता था। फिर…आपने मुझसे शादी क्यों की?”

“क्यों, आप हैंडसम नहीं हैं क्या?” नीलम ने अमोल के करीब आते हुए कहा।

“ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है नीलम।”

“खूबसूरत की परिभाषा हर किसी के लिए अलग होती है अमोल जी। कुछ लोग खूबसूरत शक्ल और खूबसूरत बदन वाले इंसान को ही खूबसूरत मानते हैं। पर मेरे हिसाब से खूबसूरत शक्ल या जिस्म नहीं होता, खूबसूरत इंसान का मन होता है। जो आपका है। पिछले साल दुर्गा मौसी की बेटी की शादी में आपको थोड़ा जानने का मौका मिला था। आपने जिस प्रकार उनके परिवार की मदद की, वो काबिले तारीफ थी। फिर जब कुछ समय पहले मौसी ने आपके रिश्ते की बात की, तो मैं ना नहीं कर पाई। क्योंकि, आप जैसे समझदार, सुलझे विचार वाला इंसान यदि मुझे पति के रूप में मिल जाए तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है।” नीलम ने कहा।

अमोल ने उसकी आंँखों में देखते हुए पूछा, “आप पर कोई प्रैशर तो नहीं था ना?”

नीलम ने आशिकाना अंदाज़ में जवाब दिया, “बहुत प्रैशर था! ये जानने का कि जिसका मन इतना खूबसूरत है, उसके प्यार करने का अंदाज़ कितना खूबसूरत होगा।”

अमोल ने मुस्कुराते हुए नीलम को गले से लगा लिया और फिर दोनों उस चांदनी रात में एक दूसरे में खो गए।

नीलम ने जैसे अमोल की ज़िन्दगी ही पलट दी। उसके प्यार ने उसके जीवन को एक नई दिशा प्रदान की। वो अमोल, जो अपने रंग-रूप के कारण लोगों के बीच जाने से कतराता था, अब बेझिझक सबके साथ उठता बैठता था। हालांकि, अभी भी लोग ताने मारने से बाज़ नहीं आते थे।
नीलम और उसकी जोड़ी किसी को भी पर्फेक्ट नहीं नज़र आती थी। पर अब अमोल को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

“अमोल, पर्फेक्ट रिश्ता वैसे भी कोई नहीं होता। कोई अपने आपमें ही पर्फेक्ट नहीं है तो रिश्ता कैसे पर्फेक्ट हो सकता है। क्यों चिंता करते हो। हम-तुम साथ में खुश हैं, यही बहुत है।” नीलम हमेशा उसे प्यार से समझाती थी।


अमोल की बेटी चित्रा के होने पर भी सबने बहुत ताने मारे। खुद अमोल के पिता बोले, “रंग-रूप अपनी माँ का ना ले सके थी क्या छोरी तेरी। चलो अब सारी ज़िन्दगी जैसे हमने तेरे रंग-रूप के बारे में ताने सुने अब तू भी सुनना।”

नीलम अमोल के परिवार की इस सोच से बेहद आहत थी। उसने निर्णय लिया कि वह मेरठ छोड़कर दिल्ली में बस जाएंँ। इस तरह अमोल, नीलम और अपनी बेटी चित्रा के साथ दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन में एक फ्लैट किराए पर लेकर रहने लगा।

कुछ समय बाद अमोल की एक बढ़िया फ़ूड कम्पनी में सुपरवाइजर के तौर नौकरी लग गई। दिल्ली के लोगों की सोच वैसे तो खुले विचारों वाली थी, पर दबे स्वर में सब नीलम और अमोल के रिश्ते का मज़ाक उड़ाते थे। अमोल को इस बात का आभास था, पर नीलम की समझदारी के कारण उसने इन सब बातों को नज़रंदाज़ करना शुरू कर दिया। और दोनों एक खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगे।

पर इस खुशी को नज़र लग गई। 16 जुलाई सुबह नीलम तैयार हो घर से निकली और आज 17 जुलाई हो गई, घर वापस नहीं आई। अमोल के ये सोच कर हाथ-पांव फूल रहे थे कि कहीं नीलम किसी मुसीबत में तो नहीं पड़ गई? क्या वो किसी दुर्घटना का शिकार तो नहीं हो गई?

क्रमशः
©® आस्था सिंघल

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