अनीश (माँ का प्यार) DINESH KUMAR KEER द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अनीश (माँ का प्यार)

1. अनीश और माँ का प्यार

एक दिन की बात है । अनीश अपने दोस्तों के साथ रविवार की शाम मेला देखने पास के गाँव ये कह कर माँ से गया कि - "माँ ! मैं बस थोड़ी देर में ही आ जाऊँगा । पास के मैदान में क्रिकेट खेलने जा रहा हूँ ।" पर अधिक रात हो गयी । अनीश अपने दोस्तों के साथ मेले में घूमता रहा । अनीश जब समय पर घर नहीं आया, तो माँ परेशान हो उठी । घबराहट में मन ही मन बड़बड़ाने लगी कि - "आखिर अनीश क्यों नहीं आया ? उसको मेरी कोई चिन्ता नहीं कि माँ अकेले परेशान हो रही होगी । पिता जी शहर में है । वो तो अब आने से रहा नहीं, मुझे ही जाकर पता लगाना होगा ।"
इधर - उधर ढूँढने और पूछताछ करने पर पता चला कि - "अनीश दोस्तों के साथ पास के गाँव में मेला देखने गया है । अनीश की माँ बहुत घबरायी । कितनी रात हो गयी, वह अकेला घर कैसे आयेगा ?
अनीश मेले में घूमता रहा । उसे समय की खबर ही नहीं रही । उसे अचानक जब भूख लगी, तब याद आया कि माँ से मैंने कहा था कि जल्दी से आऊँगा । माँ मेरा इन्तजार कर रही होगी । माँ ने भी खाना नहीं खाया होगा । वह मेरा इन्तजार कर रही होगी । उसने दोस्तों से कहा कि - "दोस्तों ! अब घर चलो, काफी रात हो गयी है ।" जैसे ही अनीश अपने दोस्तों के साथ अपने घर की तरफ चला, उसे अँधेरे में बहुत डर लगने लगा ।
अँधेरे में उसने देखा कि कुछ जानवर बहुत तेजी में सामने से दौड़े आ रहे हैं । सभी लोग अपनी - अपनी जान बचाकर भागे । अनीश भी चिल्लाते हुए भागा और एक गड्ढे में गिर गया । उसे चोट लग गयी । वह रोने लगा, तभी अनीश की माँ आ गयी । उसने अनीश को रोता देख गले से लगा लिया । अनीश ने माँ से गलती की माफी माँगी ।
माँ ने अनीश को घर ले आयी । चोट पर दवाई लगायी, फिर प्यार से खाना खिलाया और समझाते हुए बोली - "बेटा ! तुम झूठ कभी मत बोलना । झूठ - फरेब व्यक्ति को कमजोर बनाता है । तुम मेरे बहादुर बेटे हो ! तुम्हें नेक काम करके अच्छा इन्सान बनना है । झूठ की आदत कभी अच्छा इन्सान बनने नहीं देगी ।"
अनीश को माँ का प्यार समझ आया । उसने माँ से वादा किया और खुद इरादा किया कि अब वह कभी झूठ नहीं बोलेगा ।

संस्कार सन्देश :-
झूठ इन्सान को खोखला बनाता है । सच ताकत देता है । लिहाजा हमें हमेशा सच बोलना चाहिए ।

2.
उसने कहा “प्यार पर क्यों नहीं लिखती?”
मैंने कहा “लिखा तो है!”
उसने कहा “ये तो इंतज़ार है”
मैंने कहा “हाँ यही प्यार है”
उसने कहा “इसमें बस दर्द है
ना इज़हार ना इक़रार है”
मैंने कहा “हाँ यही प्यार है”
उसने कहा “क्या मज़ाक़ है!”
मैंने कहा “हाँ यही प्यार है”
प्यार मेरी ज़िंदगी में इंतज़ार बनकर आया और मज़ाक़ बनकर ठहर गया। अब क्यूँकि, इंतज़ार नहीं करती, मैं प्यार पर नहीं लिखती|