Niruttar - Part 4 books and stories free download online pdf in Hindi

निरुत्तर - भाग 4

विशाखा अब आज़ाद थी। उसे तो कामिनी के जाने का ज़्यादा अफ़सोस भी नहीं था।

दो-तीन दिन के बाद ही वह अपने पति प्रकाश के साथ उसके मायके आई। दरवाज़े पर दस्तक की आवाज़ सुनते ही विशाखा की भाभी मधु ने लपक कर दरवाज़ा खोला।

विशाखा और प्रकाश को अपने सामने देखते ही मधु के होश उड़ गए।

उसने कहा, “अरे दीदी अचानक?”

“हाँ भाभी, मम्मा पापा की बहुत याद आ रही थी सोच रही हूँ थोड़े दिनों के लिए उन्हें मेरे साथ ले जाऊँ। उन्हें भी थोड़ा चेंज मिल जाएगा।”

विशाखा के बोले यह शब्द काफ़ी थे, मधु का चेहरा उतरने के लिए।

विशाखा ने अपना पर्स टेबल पर पटका और मम्मा-मम्मा आवाज़ लगाते हुए सीधे अपनी माँ उर्वशी के कमरे में चली गई। लेकिन कमरे में उसके मम्मा या पापा में से कोई भी नहीं था।

विशाखा ने आवाज़ लगाई, “मम्मा-मम्मा, पापा कहाँ हो आप लोग?”

वहाँ से कोई आवाज़ पलट कर नहीं आने पर विशाखा ने मधु से पूछा, “अरे भाभी पापा मम्मा दिखाई नहीं दे रहे हैं? कहाँ गए हैं?”

मधु शांत थी, उसके पास इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि विशाखा की बातों का जवाब दे सके।

तब तक विशाखा को उसका भाई विक्रम दिखाई दिया, अपनी बहन और जीजा जी को देखकर कमरे से बाहर आने की उसमें हिम्मत नहीं थी।

परंतु विशाखा ने उसे देखते ही आवाज़ लगाई, “विक्रम मम्मा और पापा कहाँ हैं?”

तब वह कमरे से बाहर आकर चुपचाप खड़ा रहा। गुस्से में तन फ़न होती विशाखा ने उन दोनों को चुप खड़ा देखा तो उसके मन में शंका उत्पन्न हो गई।

विशाखा ने अपने भाई की शर्ट की कॉलर को पकड़ कर उसे झकझोरते हुए पूछा, “विक्रम तू चुप क्यों है? बता मुझे कहाँ हैं पापा मम्मा?”

विक्रम ने घबराते हुए धीरे से कहा, “जीजी वे तो नाराज होकर वृद्धाश्रम …!”

“क्या …?” विक्रम के गाल पर एक तमाचा लगाते हुए विशाखा ने कहा, “ये क्या कह रहा है तू? ये यह तेरी बीवी … इसे मैं क्या कहूँ यह तो पराई है। इसे हमारे माँ-बाप से क्या मतलब? पर तू …? तू तो हमारा है ना पापा मम्मा का खून … जिससे तू बना है विक्रम। शर्म कर डूब मर चुल्लू भर पानी में। बीवी की गोद में बैठा रह तू।”

गुस्से में तिलमिलाती विशाखा ने अपना पर्स उठाते हुए प्रकाश की तरफ़ देखा और कहा, “चलो प्रकाश वृद्धाश्रम से पापा मम्मा को लेते हुए घर चलेंगे।”

आज अपने माता-पिता के लिए तड़पती हुई विशाखा को देखकर प्रकाश हैरान था फिर भी वह चुप था। आज उसने विशाखा का यह दोगला व्यवहार देखा तो उसे आश्चर्य तो ज़रूर हो रहा था। अजीब भी लग रहा था और बुरा भी लग रहा था फिर भी मुँह खोलकर जीभ को आज़ादी देने की हिम्मत उसमें अब भी नहीं थी। वह चुप था पर ख़ुश नहीं था।

वृद्धाश्रम में जाकर विशाखा ने अपने पापा से कहा, “आपने मुझे क्यों नहीं बताया? मुझे फ़ोन क्यों नहीं किया? यहाँ क्यों आ गए? वह घर पहले आपका है उसके बाद मधु और विक्रम का। चलो पापा मैं आप दोनों को लेने आई हूँ।”

“लेकिन बेटा तुम्हारी सासू माँ?”

“पापा अभी यहाँ से चलो। यह सब बातें बाद में हो जाएंगी।”

इस तरह वह अपने माता-पिता को अपने घर ले आई। घर आने के बाद जब विशाखा के पापा और मम्मा को यह मालूम पड़ा कि कामिनी के साथ क्या हुआ तब भी उन्होंने विशाखा को कुछ भी नहीं बोला और आराम से उसके साथ रहने लगे।

 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः

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