श्री चैतन्य महाप्रभु - 9 Charu Mittal द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्री चैतन्य महाप्रभु - 9


काजी का उद्धार
गया से लौटने के पश्चात् श्रीगौरसुन्दर ने सङ्कीर्त्तन-धर्म का प्रचार आरम्भ कर दिया था। सर्वप्रथम श्रीवास पण्डित के घर में कीर्त्तन प्रारम्भ हुआ। तत्पश्चात् सभी भक्तलोग अपने-अपने घरों में कीर्त्तन करने लगे। यह समाचार जब नवद्वीप के मुसलमान शासक चाँद काजी के पास पहुँचा तो वह क्रोधित होकर अपने सैनिकों के साथ एक भक्त के घर पहुँच गया, जहाँ पर कीर्त्तन हो रहा था। वहाँ पहुँचकर उसने मृदङ्ग को जमीन पर पटककर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये तथा कीर्त्तन में सम्मिलित वैष्णवों को चेतावनी देते हुए बोला— ‘आज तो मैंने मात्र मृदङ्ग ही फोड़ा है। यदि पुनः यहाँ पर कीर्त्तन हुआ तो सभी को कठोर सजा दूँगा और सबकी जाति नष्ट कर दूँगा।’ ऐसा कहकर वह चला गया।

अब तो काजी के भय से कीर्त्तन बन्द हो गया। जब यह घटना प्रभु के कानों में पहुँची तो वे क्रोधित हो गये। उन्होंने सभी वैष्णवों को एकत्रित किया तथा उनसे बोले— “उस दुष्ट काजी का इतना साहस कि वह मेरा कीर्त्तन बन्द करायेगा। अच्छी बात है। आज तक कीर्त्तन घर के अन्दर होता था, परन्तु कल इस नवद्वीप की गलियों में विशाल नगर-सङ्कीर्त्तन होगा। तब देखूँगा कि वह काजी या उसके सिपाही हमारा क्या बिगाड़ते हैं। अतः तुम सब लोग कल सन्ध्या के समय अपने-अपने घरों को सजाना और हाथों में मशाल जलाकर महानगर-सङ्कीर्त्तन में सम्मिलित होना।”

यह सुनकर भक्तों में हर्ष की लहर दौड़ गयी तथा वे उत्कण्ठा से अगले दिन की प्रतीक्षा करने लगे। दूसरे दिन सन्ध्या के समय हजारों की संख्या में भक्त लोग प्रभु के घर पर उपस्थित हुए तथा वहाँ से एक विशाल सङ्कीर्त्तन-यात्रा आरम्भ हो गयी। उस यात्रा में कितने ही मृदङ्ग, करताल, झाँझर इत्यादि वाद्य बज रहे थे तथा हजारों भक्तवृन्द उच्च-स्वर से महामन्त्र का कीर्त्तन कर रहे थे। सबके हाथोंमें मशालें थी। धीरे-धीरे यात्रा काजी के महल की ओर ही जा रही थी। जब यात्रा काजी के महल के निकट पहुँच गयी तो काजी ने भय के कारण द्वार बन्द कर दिये तथा स्वयं भीतर छिपकर बैठ गया। यात्रा में उपस्थित युवाओं ने जोश में भरकर काजी के बगीचों को ही उजाड़ना आरम्भ कर दिया।

जब श्रीमन्महाप्रभु ने देखा कि काजी ने द्वार बन्द कर दिये हैं, तो उन्होंने कुछ भक्तों को उसे बुलाने के लिए भेज दिया तथा स्वयं महल के बाहर ही बैठ गये। कुछ क्षण पश्चात् सिर झुकाये हुए काजी श्रीमन् महाप्रभु के समक्ष उपस्थित हुआ। भय से उसका सारा शरीर काँप रहा था। उसे अपने निकट देखकर प्रभु कोमल वाणी से कहने लगे— “अरे काजी! मैं आज तुम्हारे घर पर अतिथि बनकर आया हूँ, परन्तु तुम घर के भीतर छिपकर बैठ गये। यह तो उचित नहीं है। द्वार पर आये अतिथि का अवश्य ही सम्मान करना चाहिये।

उसी समय काजी ने प्रभु के चरण पकड़ लिये। यह देखकर वहाँ पर उपस्थित भक्तों के आश्चर्य की सीमा न रही। काजी को इस प्रकार अपने चरणों में पड़ा हुआ देखकर श्रीमन् महाप्रभु ने बड़े प्रेम से उसे उठाया तथा उससे पूछने लगे “काजी महाशय! देखो तो, ये हजारों लोग तुम्हारे आदेश की अवहेलना कर रहे हैं, अतः इन्हें दण्ड प्रदान करो।” यह सुनते ही काजी रोने लगा। उसे रोते देखकर प्रभु ने पूछा— “क्या बात है, काजी महाशय! आप इन्हें दण्ड प्रदान क्यों नहीं कर रहे हैं? काजी ने प्रभु से निवेदन किया कि मैं आपसे एकान्त में कुछ कहना चाहता हूँ। प्रभु बोले— “एकान्त में नहीं, जो कुछ कहना है, यहीं पर सबके सामने कहो। ये सब मेरे अपने ही लोग हैं।”

यह सुनकर काजी बोला— “हे प्रभो! आप सब जानते हैं, फिर भी इन लोगों की जानकारी के लिए आप मुझसे कहलवाना चाहते हैं, तो कृपा पूर्वक सुनिये। कुछ दिन पहले मैंने एक भक्त के घर जाकर मृदङ्ग फोड़ दिया तथा घर के लोगों को अपमानित कर अपने महल में आ गया। उसी दिन आधी रात को जब मैं सो रहा था, तो अचानक एक अद्भुत प्राणी मेरी छाती पर चढ़कर बैठ गया। उसके शरीर का ऊपर का हिस्सा तो शेर जैसा तथा नीचे का मनुष्य जैसा था। वह गुस्से में दहाड़ते हुए बोला— अरे दुष्ट! तूने मेरा मृदङ्ग तोड़ा तथा मेरा कीर्त्तन बन्द कराया, इसके बदले में मैं तेरी छाती को फाड़ देता हूँ। ऐसा कहते ही उसने अपने तीखे नाखूनों को मेरी छाती में घुसा दिया। मैं भयभीत होकर चिल्ला उठा तथा उससे क्षमा प्रार्थना की, जिससे उसका क्रोध कुछ शान्त हुआ तथा वह मुझसे गरजते हुए बोला— “ठीक है, आज तो मैं तुझे क्षमा करता हूँ। परन्तु पुनः यदि तूने या तेरे वंश में किसी ने भी मेरे कीर्त्तन में बाधा पहुँचायी तो तेरे सारे वंश को ही नष्ट कर दूँगा।” ऐसा कहकर वह प्राणी अन्तर्धान हो गया। ऐसा कहकर काजी ने अपनी छाती दिखायी, तो वहाँपर नाखूनों के निशान थे। काजीके मुखसे यह घटना सुनकर सभी भक्त लोग समझ गये कि वह प्राणी और कोई नहीं, अपितु हमारे प्रभु ही थे जिन्होंने भक्तों की रक्षा के लिए नरसिंह रूप धारण किया था। श्रीमन् महाप्रभु काजी से बोले— “काजी! अब तुम भी हमारे सङ्कीर्त्तन में सम्मिलित हो जाओ, जिससे तुम्हारा कल्याण हो जायेगा।” यह सुनकर काजी बोला— “प्रभो! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मेरे वंश में यदि किसी ने कीर्त्तन का विरोध किया, तो मैं उसे तलाक दे दूँगा। उसके ऐसा कहते ही प्रभु ने उसे आलिङ्गन कर लिया। प्रभु का स्पर्श पाते ही वह प्रेम में पागल हो गया और नृत्य करते-करते कीर्त्तन करने लगा। इस प्रकार प्रभु की अहैतु की कृपा से काजी परम-वैष्णव बन गया। वह काजी प्रभु का इतना प्रिय हो गया कि जब उसकी मुत्य हुई, तो प्रभु ने स्वयं अपने हाथों से उसे समाधि प्रदान की तथा उसकी समाधिपर गोलोक-चम्पक फूलका वृक्ष लगाया, जो आज तक वैष्णव- तीर्थके रूपमें प्रसिद्ध है।

संन्यास ग्रहण
श्रीकृष्ण के प्रति व्रज गोपियों का तथा उनमें भी विशेष रूप से श्रीमती राधिका जी का अप्राकृत प्रेम ही दिव्य-प्रेम की चरम सीमा है। श्रीकृष्ण राधिका जी के ऐसे भावों का आस्वादन करने के लिए तथा जगत् में उसकी शोभा अर्थात् मञ्जरी भाव का वितरण करने के लिए ही श्रीमन् महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए थे। एक दिन वे अपने को वृन्दावन-वासिनी गोप कन्या जानकर श्रीमती राधिका जी के उद्देश्य से 'गोपी गोपी' कह रहे थे। उसी समय महाप्रभु के कुछ विद्यार्थी वहाँ उपस्थित हुए और प्रभु को गोपी नाम का उच्चारण करते देखकर मूर्खतावशतः उनसे कहने लगे पण्डित जी! कलिकाल में कृष्ण नाम ही संसार से उद्धार होने का तारक मन्त्र है, परन्तु आप उसका परित्याग कर 'गोपी-नाम' उच्चारण पूर्वक क्यों विपथगामी हो रहे हैं ? यह सुनकर भावाविष्ट महाप्रभु ने उन्हें कृष्णपक्षीय जानकर उनसे कहा— “जिसने बिना दोष के ही वानरराज बालि का वध कर दिया, जिसने बलि महाराज का सर्वस्व हरणकर उन्हें पाताल में भेज दिया तथा स्त्रीजित होकर भी एक स्त्री जो उनसे प्रेम की भिक्षा माँग रही थी, उसकी नाक काट दी, ऐसे कृष्ण का भजन करनेसे मेरा क्या कल्याण होगा। ऐसा कहकर महाप्रभु एक छड़ी हाथ में लेकर उन छात्रों को मारने के लिए दौड़े। यह देखकर वे छात्र भयभीत होकर वहाँ से भाग गये तथा अपने साथियों के साथ मिलकर योजना बनाने लगे कि अब यदि पुनः निमाइ ने हम पर आक्रमण की चेष्टा की, तो हम सब भी मिलकर उस पर आक्रमण करेंगे। विद्यार्थियों की ऐसी योजना को जानने पर महाप्रभु ने विचार किया कि मैं इस जगत् में प्रेम भक्ति प्रदानकर लोगों का उद्धार करने के लिए आया हूँ, परन्तु ये तो मेरे ही विरोधी होते जा रहे हैं। ऐसे आचरण से तो ये और भी घोर नरक में चले जायेंगे। अतः मैं अब संन्यासवेश धारण करूँगा, जिससे मेरे प्रति एक संन्यासी की बुद्धि रखकर ये मुझे सम्मान देंगे तथा मुझे प्रणाम करेंगे। इस प्रकार इनका कल्याण हो जायेगा। ऐसा विचार कर प्रभु ने संन्यास ग्रहण करने का निश्चय किया तथा एक दिन रात्रि के समय चुपचाप घर से निकलकर अपने कुछ भक्तों के साथ कटवा पहुँच गये। वहाँ जाकर केशवभारती नामक एक संन्यासी से संन्यास वेश धारण किया। संन्यासके उपरान्त प्रभुका नाम श्रीकृष्णचैतन्य हुआ।