श्री चैतन्य महाप्रभु - 7 Charu Mittal द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्री चैतन्य महाप्रभु - 7

महाप्रभु की गया यात्रा
अब निमाइ को विवाह योग्य देखकर श्रीशची माता ने विष्णुप्रिया नाम की कन्या से उनका विवाह कर दिया। श्रीगौरसुन्दर के विवाह से शचीमाता निश्चिन्त हो गयीं। अपने पुत्र एवं पुत्रवधु की अपूर्व जोड़ी देखकर वे फूली नहीं समा रही थीं। विष्णुप्रिया ने भी अपनी सेवा एवं मधुर स्वभाव से परिवार के सभी सदस्यों को अपने वश में कर लिया। उनकी सेवा, सरलता एवं उज्ज्वल चरित्र से श्री गौरसुन्दर भी अति प्रसन्न थे।
उस समय संसार में भक्ति प्रायः लुप्त हो गयी थी। सर्वत्र ही ज्ञान, कर्म, योग अथवा नास्तिकता का साम्राज्य फैला हुआ था। संसार की नास्तिकता देखकर प्रभु की इच्छा हुई कि मैं जिस कार्य के लिए आया हूँ, मुझे वह आरम्भ कर देना चाहिये। ऐसा विचारकर वे पिता के श्राद्ध के छल से अपने कुछ छात्रों के साथ गया के लिए चल पड़े।
मार्ग में एक स्थान पर प्रभु ने ज्वर (बुखार) से पीड़ित होने की लीला प्रकट की। प्रभु को ज्वर से (बुखार) पीड़ित देखकर उनके साथ आये हुए सभी छात्र बहुत चिन्तित हो गये। सभी ने मिलकर ज्वर को दूर करने का बहुत प्रयास किया, परन्तु ज्वर कम होना तो दूर, इसके विपरीत और भी अधिक बढ़ने लगा। वह तो कोई साधारण ज्वर नहीं था बल्कि वह तो प्रभु की इच्छा थी। अतः जगत्‌ में ऐसा कौन है, जो प्रभु की इच्छा के विरुद्ध चल सके। इसलिए जब वे सभी प्रयास करते-करते थक गये, तो प्रभु स्वयं ही बोले— “मेरा ज्वर किसी भी औषधि से ठीक नहीं हो सकता। इसे दूर करने का एक ही उपाय है– “यदि मुझे किसी शुद्ध ब्राह्मण का चरणामृत मिल जाए तो उसे पानकर मैं अवश्य ही स्वस्थ हो जाऊँगा।”
यह सुनकर छात्र पास ही के गाँवमें गये तथा किसी आचरणशील एवं शुद्ध ब्राह्मण का चरणामृत लाकर प्रभु को प्रदान किया। प्रभु ने प्रसन्न होकर उसे पान किया। पान करते ही ज्वर दूर हो गया। इस प्रकार प्रभु ने शुद्ध ब्राह्मणों की महिमा जगत्‌ में प्रकाशित की।

ईश्वरपुरी से दीक्षा ग्रहण
गया पहुँचकर प्रभु ने विष्णु के श्रीचरण कमलोंमें अपने पितरों का तर्पण किया। ब्राह्मणों के मुखसे भगवान् के चरण चिह्नों की महिमा श्रवणकर वे प्रेम में आविष्ट हो गये। उनके नयनों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी तथा सारा शरीर पुलकित हो गया। इस प्रकार जगत्-वासियों का सौभाग्य उदित हुआ, क्योंकि अब प्रभु ने अपनी प्रेमा भक्ति को प्रकाश करना आरम्भ कर दिया। उनके नेत्रों से गङ्गा एवं यमुना की भाँति अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। इस अद्भुत दर्शन कर वहाँ उपस्थित सभी ब्राह्मण अचम्भित रह गये। उसी समय वहाँ पर परम भागवत श्रीईश्वरपुरीपाद उपस्थित हुए। श्री गौरसुन्दर ने उन्हें अपने सम्मुख देखकर आदरपूर्वक उनके चरणों में प्रणाम किया। ईश्वरपुरी ने भी गौरसुन्दर को देखकर प्रसन्नता पूर्वक उन्हें आलिङ्गन किया। दोनों के ही नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी, जो एक दूसरे के श्रीअङ्गों को भिगो रही थी। कुछ समय पश्चात् प्रभु बोले— “आज आपके श्रीचरणों के दर्शन से मेरी गया यात्रा वास्तवमें ही सफल हुई है। तीर्थोंमें पिण्डदान करने से केवल उसी का उद्धार होता है, जिसके नाम से पिण्डदान किया जाता है, परन्तु आप जैसे परम भागवत के दर्शन से तो कोटि-कोटि पितृों का उद्धार हो जाता है। अतः तीर्थों के साथ आपकी तुलना सम्भव ही नहीं है। आप तो तीर्थों को भी पवित्र करनेमें समर्थ हैं।”
गङ्गार परश हइले पश्चाते पावन ।
दर्शने पवित्र कर एइ तोमार गुण ॥
अर्थात् गङ्गामें आचमन अथवा स्नान करने पर व्यक्ति पवित्र होता है। परन्तु वैष्णवों का ऐसा अमित प्रभाव है कि उनके दर्शनमात्र से ही पापी से पापी व्यक्ति भी परम पवित्र हो जाता है।
“अतः हे वैष्णव ठाकुर! आप इस संसार से मेरा भी उद्धार कीजिये। मैंने अपना तन, मन और वचन आपके श्रीचरणों में समर्पित कर दिया है। आप मुझे कृष्ण प्रेमरस पान करायें।”
ईश्वरपुरी— “हे निमाइ पण्डित! मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप कोई साधारण जीव नहीं, अपितु भगवान्‌ के अवतार हैं। इसका कारण है कि जैसा आपका पाण्डित्य है, वैसा साधारण मनुष्योंमें नहीं हो सकता। आपका दर्शन कर जैसा आनन्द होता है, साधारण मनुष्य के दर्शन से वैसा असम्भव है। जब से मैंने नवद्वीप में आपका दर्शन किया है, तब से मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता; सब समय आपका ही स्मरण होता रहता है। मैं सत्य कह रहा हूँ कि मुझे आपका दर्शन करके श्रीकृष्ण दर्शन का ही सुख प्राप्त होता है।”
उनकी बातें सुनकर प्रभु मुसकराते हुए बोले— “आप तो महाभागवत हैं। महाभागवतों को सर्वत्र भगवत् स्फूर्ति ही होती है। अतः यदि आप मुझे योग्य समझें तो मुझे दीक्षामन्त्र प्रदान कीजिये।”
ईश्वरपुरी— “हे पण्डित महाशय ! मन्त्र की तो बात ही क्या, यदि आप मुझसे मेरे प्राण भी माँगें, तो मैं उन्हें भी प्रसन्नता पूर्वक आपको दे सकता हूँ, क्योंकि मैं तो आपका आज्ञाकारी दास मात्र हूँ।”
इस प्रकार जगत्‌ को शिक्षा देने के उद्देश्य से स्वयं साक्षात् भगवान् होकर भी श्रीमन् महाप्रभु ने ईश्वरपुरी से मन्त्र ग्रहण किया। मन्त्र ग्रहणकर प्रभु ने पुरीपाद की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर बोले— “हे गुरुदेव ! आज मैंने अपना सर्वस्व आपको अर्पित कर दिया है। अतः आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं कृष्णप्रेम के सागरमें डूब सकूँ।”

श्रीवास को चतुर्भुजरूप का दर्शन कराना
गया से लौटने के पश्चात् प्रभु का भाव ही बदल गया। अब वे पण्डित निमाइ नहीं, बल्कि भक्त निमाइ हो गये थे। अब उन्होंने व्याकरण पढ़ाना बन्द कर दिया था। वे सब समय ‘कृष्ण कृष्ण’ कहते रहते थे। एक दिन प्रभु भ्रमण करते-करते गङ्गा के सुरम्य तट पर जा पहुँचे और चारों ओर देखने लगे। उस समय उन्हें गङ्गा के तट पर गायों का एक झुण्ड दिखायी दिया। उनमें से कुछ तो घास चर रही थीं, कुछ पूँछ उठाकर इधर-उधर दौड़ रही थीं, कुछ सो रही थीं और कुछ गङ्गा में जलपान कर रही थीं। इस दृश्य को देखकर प्रभु गर्जन करने लगे तथा बार-बार “मैं वही हूँ, मैं वही हूँ” कहने लगे। फिर उसी आवेशमें दौड़ते-दौड़ते श्रीवास पण्डित के घर पहुँच गये। वहाँ जाकर गरजते हुए बोले— "श्रीवास क्या कर रहा है ?” ऐसा कहकर जिस घर के अन्दर श्रीवासजी नृसिंह भगवान् की पूजा कर रहे थे, उसके दरवाजे पर जोर-जोर से ठोकर मारने लगे तथा दहाड़ते हुए कहने लगे— “तू किसकी पूजा करता है और किसका ध्यान करता है? तू जिसका ध्यान और पूजा कर रहा है, देख आज वह स्वयं ही तेरे द्वारपर आये है।” यह सुनकर जैसे ही श्रीवास पण्डित का ध्यान भङ्ग हुआ, उन्होंने सामने ही शङ्ख, चक्र, गदा एवं कमल का फूल धारण किये हुए चतुर्भुजरूपमें प्रभु श्रीगौरसुन्दर को वीरासन में बैठे हुए देखा। उस स्वरूप का दर्शन कर श्रीवास अपने कर्त्तव्य के विषय में विमूढ़ होकर चुपचाप बैठे ही रह गये। उन्हें इसका भी ज्ञान न रहा कि इस समय क्या करना चाहिये। उन्हें इस प्रकार मोहित हुआ देखकर प्रभु बोले— “श्रीवास! इतने दिनों तक मैं तेरे आस-पास घूमता रहा। परन्तु आज तक तू मुझे पहचान नहीं पाया। तू नहीं जानता कि तेरे उच्च सङ्कीर्त्तन एवं नाड़ा (अद्वैताचार्य) के हुङ्कार से ही मैं अपने समस्त परिकरों के साथ वैकुण्ठ छोड़कर इस धराधाम में अवतरित हुआ हूँ। अतः अब चिन्ता की कोई बात नहीं है, क्योंकि अब मैं दुष्टों का संहार कर साधुओं का उद्धार करूँगा। अतः अब तू निश्चिन्त होकर मेरी स्तुति कर।”
यह सुनकर तथा प्रभु को अपने समक्ष साक्षात् रूप में प्रकट हुआ देखकर श्रीवास प्रेम में आविष्ट एवं पुलकित होकर दोनों हाथ जोड़कर प्रभु की स्तुति करने लगे।

श्री अद्वैताचार्य को दिव्य दर्शन
एक दिन प्रभु अद्वैताचार्य को पुकारने लगे। जब भक्त लोग आचार्य के पास गये तथा आचार्य को बताया तो वे अपनी पत्नी के साथ प्रभु के निकट उपस्थित हुए। उन्होंने प्रभु के दिव्य स्वरूप का दर्शन किया— तपे हुए स्वर्ण जैसा प्रभु का सुन्दर वर्ण तथा उनका अद्भुत लावण्य करोड़ों कामदेवों को भी पराभूत कर रहा था। उनकी दोनों भुजाएँ सोने के दो स्तम्भों के समान प्रतीत हो रही थीं, जिन पर रत्नजड़ित अलङ्कार झिलमिला रहे थे। वक्षःस्थल पर श्रीवत्स एवं कौस्तुभमणि सुशोभित हो रही थी। कानोंमें मकराकृत कुण्डल झलमल-झलमल कर रहे थे। गले में वैजयन्ती माला धीरे-धीरे झूल रही थी। उनके श्रीचरणों में लक्ष्मी देवी विराजमान थीं तथा अनन्त देव उनके ऊपर छत्र धारण किये हुए थे। उनके श्रीचरणों के नखकमल मणियों की भाँति चमक रहे थे। श्रीचरणों के निकट ही चतुर्मुख ब्रह्मा, पञ्चमुखी शिव तथा षड्मुखी कार्तिकेय इत्यादि प्रणत होकर उनकी स्तुति कर रहे थे। निकट में ही नारद, शुक आदि हाथ जोड़कर आनन्द पूर्वक प्रभु का गुणगान कर रहे थे। उनके चरणों के समीप ही मगरमच्छ पर सवार परम सुन्दरी श्रीगङ्गा जी हाथ जोड़े खड़ी थीं। उनकी दृष्टि प्रभु के श्रीचरणों में पड़े हुए हजारों देवताओं पर पड़ी, जो रोते-रोते प्रभु की स्तुति कर रहे थे। एक ओर हजारों फणधारी नाग अपने फणों को उठाकर प्रभु की स्तुति कर रहे थे। उनके निकट ही उनकी पत्नियाँ भी सजल नयनों से क्रन्दन करते-करते गद्गद् कण्ठ से प्रभुकी वन्दना कर रही थीं। आकाश ऐरावत, गज, हंस, अश्व आदि हजारों प्रकार के विमानों से भरा हुआ था, जिन पर विद्यमान इन्द्रादि देवतागण एवं उनकी स्त्रियाँ आनन्द से प्रभु का गुणगान करते हुए उनके ऊपर पुष्प वर्षा कर रही थीं। इन समस्त दृश्यों को देखकर दोनों पति-पत्नी हतप्रभ हो गये। उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था।
उन्हें इस प्रकार मोहित हुआ देखकर प्रभु श्री गौरसुन्दर श्री अद्वैताचार्य को लक्ष्यकर बोले— “आचार्य! तुम्हारी प्रतिज्ञा के कारण मुझे यहाँ आना पड़ा। मैं तो क्षीरसागर में शयन कर रहा था। परन्तु तुमने जैसी मेरी आराधना की एवं जैसा सङ्कल्प किया, उससे मेरी निद्रा भङ्ग हो गयी और मुझे यहाँ आना पड़ा। इसके अतिरिक्त मेरे चारों ओर जो इन भक्तों को देख रहे हो, ये सभी मेरे गण हैं, ये तुम्हारे लिए ही जगत्‌ में अवतीर्ण हुए हैं। जिन वैष्णवों का (मेरे परिकरों का) दर्शन करने के लिए ब्रह्मा आदि भी लालायित रहते हैं, आज तुम्हारी कृपा से साधारण मनुष्य भी उनका दर्शन पाकर धन्यातिधन्य हो जायेंगे।”
प्रभु के श्रीमुख से इन सब बातों को सुनकर आचार्य प्रेम से विह्वल होकर अवरुद्ध कण्ठ से कहने लगे– “हे प्रभो! चारों वेद आपके विषय में वर्णन तो करते हैं, परन्तु स्वयं उन्होंने भी अभी तक आपका दर्शन नहीं किया। परन्तु आज मेरे सब जन्म-कर्म सफल हो गये, जो कि वेदों के लिए भी दुर्लभ आपके ऐसे दिव्य स्वरूप के दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है।”

श्रीवास पण्डितपर कृपा
एक दिन भगवद्-आवेश की अवस्था में प्रभु सन्तुष्ट होकर श्रीवास जी से बोले— “श्रीवास! क्या तुम्हें वह दिन स्मरण है, जब तुम देवानन्द पण्डित के पास भागवत सुनने गये थे तथा भागवत सुनते-सुनते प्रेममें आविष्ट होकर जोर-जोर से रोते-रोते सभा के बीच में ही मूच्छित होकर गिर पड़े थे। तब देवानन्द के भक्तिशून्य अबोध शिष्यों ने तुम्हारे भावों को न जानकर तथा पागल समझकर तुम्हें द्वार से बाहर कर दिया था। उस समय स्वयं देवानन्द पण्डित भी यह सब देखता रहा, परन्तु उसने अपने शिष्यों को ऐसा करने से रोका नहीं, क्योंकि यद्यपि वह भागवत पाठ करता था, परन्तु उसके हृदय में लेशमात्र भी भक्ति नहीं थी। वह तो पाठ करता था, केवल मान-सम्मान अथवा धन-सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए। इसलिए वह भी तुम्हारे हृदय के भावों को समझ नहीं पाया, क्योंकि वैष्णव ही वैष्णव के हृदय के भावों को समझ सकता है, दूसरा कोई नहीं। इस प्रकार कुछ क्षण पश्चात् जब तुम्हें होश आया, तो तुम बहुत दुःखी होकर एकान्त स्थान पर जाकर रोने लगे। परन्तु फिर से तुम्हारी इच्छा भागवत सुनने की हुई। उस समय मैं तुम्हारा दुःख सह न पाया तथा वैकुण्ठ से तुम्हारे हृदय में आविर्भूत हो गया। इस प्रकार तुम्हारे हृदय में बैठकर मैंने तुम्हें अपनी लीलाओं की अनुभूति करायी थी।” यह सुनकर तथा प्रभु की कृपा को स्मरण कर श्रीवास पण्डित आनन्द से नाचने लगे।

गङ्गादास पर कृपा
[गङ्गादास त्रेतायुगमें वशिष्ठ ऋषि थे। उस समय स्वयं श्रीरामचन्द्र एवं लक्ष्मणजी ने उन्हें गुरुरूप में वरण किया था। द्वापरयुग में ये सान्दीपनी मुनी थे। कृष्ण-बलराम ने उज्जैन जाकर इनसे शिक्षा ग्रहण की लीला की थी। इस कलियुगमें वे ही नवद्वीप में गङ्गादास के रूप में प्रकट हुए। इनका घर प्रभु के घर से थोड़ी दूरी गङ्गानगर में था। इन्होंने अपने घर में विद्यालय खोल रखा था। जब श्री गौरसुन्दर कुछ बड़े हुए तो, जगन्नाथ मिश्र ने विद्याध्ययन के लिए प्रभु को इनके चरणों में समर्पित किया, श्रीगौरसुन्दर ने इनसे व्याकरण आदि की शिक्षा ग्रहण की।]

इसके बाद प्रभु श्रीगौरसुन्दर गङ्गादास से बोले– “गङ्गादास! क्या तुम्हें उस रात्रि का स्मरण है जब तुम मुसलमान राजा के भय से अपने सारे परिवार के साथ गाँव छोड़कर भाग रहे थे, परन्तु गङ्गा के तटपर पहुँचते-पहुँचते रात हो जाने के कारण वहाँ पर तुम्हें एक भी नाव नहीं मिली। तब तुमने अपने मन में विचार किया कि अभी कुछ ही देर में राजा के सिपाही आकर हमें पकड़ लेंगे तथा मेरी आँखों के सामने ही मेरे परिवार की स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार करेंगे। अतः इससे पहले ही मैं गङ्गा में कूदकर आत्महत्या कर लूँगा। ऐसा सोचकर जैसे ही तुमने गङ्गा में कूदना चाहा, उसी समय मैं स्वयं एक नाविक के रूप में एक नौका को चलाते हुए तुम्हारे सामने पहुँचा। अपने सामने ही एक नौका देखकर तुम्हारी प्रसन्नता की सीमा न रही तथा तुम बहुत करुण स्वर में मुझसे कहने लगे— “हे भाई! आज मेरी जाति, प्राण, धन, सब कुछ तुम्हारे हाथों में है। अतः कृपाकर तुम मुझे सपरिवार गङ्गा पार करा दो। मैं तुम्हारा उपकार जीवन भर नहीं भूलूँगा और तुम्हें मुँहमाँगा पुरस्कार दूँगा।” तुम्हारी ऐसी करुण प्रार्थना सुनकर मैं तुम्हें तथा तुम्हारे सारे परिवार को गङ्गा पार कराकर अपने धाम वैकुण्ठ ले आया।” यह सुनकर गङ्गादास को उस घटना का स्मरण हो आया तथा वह प्रभु की कृपा को अनुभव कर आनन्द से मूच्छित हो गये।

श्रीधरपर कृपा
तब प्रभु ने अपने भक्तों को शीघ्र ही भक्त श्रीधर को बुलाकर लाने का आदेश दिया। वे सदा सर्वदा रोते-रोते प्रभु का भजन करते रहते थे और उनका दर्शन करने के लिए उत्कण्ठित रहते थे। अतः प्रभु की इच्छा हुई की वे आज यहाँ आकर उनका दर्शन करके अपनी अभिलाषा पूर्ण करें। यह सुनकर भक्तवृन्द श्रीधर को बुलाने के लिए चल पड़े। अभी वे आधे रास्ते में ही पहुँचे थे कि उन्हें श्रीधर की आवाज सुनायी दी। वे जोर-जोर से नाम सङ्कीर्त्तन कर रहे थे। यह सुनकर वैष्णव लोग जहाँ से ध्वनि आ रही थीं, उस दिशा में चल पड़े।
कुछ ही दूरी पर देखा कि वे निर्जन में बैठकर जोर-जोर से रोते-रोते हरि नाम कीर्त्तन कर रहे हैं। यह देखकर भक्त वृन्द उनके पास गये और उनसे बोले— “श्रीधरजी! चलिये, आपको प्रभु ने बुलवाया है।” प्रभु का नाम सुनते ही श्रीधर आनन्द से मूर्च्छित हो गये। भक्तों ने शीघ्र ही उन्हें उठा लिया और प्रभु के पास लाकर उनके श्रीचरणों में रख दिया। अपने चरणों के निकट श्रीधर को देखकर प्रभु प्रसन्न हो गये तथा प्रेम से कहने लगे— “श्रीधर ! तुमने बहुत जन्मों तक मेरी आराधना की है। कितनी ही बार मेरा प्रेम प्राप्त करने के लिए भजन करते-करते देह को त्याग दिया। इस जन्ममें भी तुमने मेरी बहुत सेवा की।
सब समय तुम्हारे दिये हुए केले, थोड़, मोचा (केले का फूल) आदि ही खाता हूँ। क्या तुम भूल गये कि जब मैं व्याकरण का छात्र था, उस समय मैं तुम्हारी दुकान में आया करता था। तुमसे झगड़कर भी तुमसे केले, थोड़ आदि ले लिया करता था तथा उनका मूल्य भी नहीं चुकाता था। परन्तु तुम मुझे पहचान नहीं पाते थे। तुम्हें स्मरण होगा कि मैंने तुमसे कहा था कि मैं एक दिन जगत्‌ को दिखाऊँगा कि तुम कितने धनी हो। अतः अब तुम मेरे स्वरूप का दर्शन कर लो। मैं तुम्हें अष्ट सिद्धियाँ प्रदान करूँगा।” यह सुनकर जैसे ही श्रीधर ने सिर उठाकर प्रभु की ओर देखा तो उन्होंने प्रभु के दिव्य-स्वरूप के दर्शन किये। उस समय उन्होंने श्रीगौरसुन्दर को श्यामवर्ण में देखा, उनके हाथों में वंशी थी, उनके दाहिनी ओर बलदेव प्रभु विद्यमान थे। लक्ष्मीजी प्रभु के हाथ में ताम्बुल (पान) अर्पण कर रही थीं तथा चतुर्मुख ब्रह्मा, शिव आदि सभी देवता हाथ जोड़कर उनकी स्तुति कर रहे थे। यह देखते ही श्रीधर आनन्द से मूच्छित हो गये। प्रभु बोले– “उठो श्रीधर, उठो।” प्रभु के मधुर वचन सुनते ही जब श्रीधर की मूर्च्छा दूर हो गयी, तो प्रभु बोले— “श्रीधर ! तुम मेरी स्तुति करो।”
श्रीधर— “प्रभो ! मैं तो एक मूर्ख व्यक्ति हूँ। आपकी स्तुति करने का सामर्थ्य मुझमें कहाँ है ?”
प्रभु— “श्रीधर ! तुम्हारे जैसे भक्त का बोलना ही स्तुति है।” उसी समय प्रभु की आज्ञा से सरस्वती देवी श्रीधर की जिह्वा पर विराजमान हो गयीं। अब तो श्रीधर अत्यन्त सुन्दर रूप से प्रभु की स्तुति करने लगे— “हे प्रभो! आप तो वेदों के लिए भी गोपनीय हैं अर्थात् वेद भी आपको जानने में पूर्ण रूप से समर्थ नहीं हैं। आप प्रति युग में धर्म की रक्षा करने के लिए भिन्न-भिन्न रूपों में आते हैं। आप ही राम हैं, आप ही नृसिंह, आप ही कूर्म आदि हैं। हे प्रभो ! मुझे स्मरण है कि एक बार आपने मुझसे कहा था कि तुम्हारी आराध्या गङ्गा मेरे चरणों से निकली है। उस समय मेरा चित्त पापों से कलुषित होने के कारण मुझे आपके वचनो पर विश्वास नहीं हो रहा था। परन्तु आपकी ही कृपा से आज मैं समझ गया हूँ कि जिन्होंने अपनी मनोहारी लीलाओं के द्वारा गोकुल नगरी को धन्य किया था, वे नन्दनन्दन आप ही हैं तथा इस समय इस नवद्वीप को धन्य करने के लिए गौरसुन्दर के रूप में अवतरित हुए हैं। आप भक्ति के अधीन हैं। भीष्म पितामह ने अपनी भक्ति के बल से ही रणभूमि में आपको पराजित कर दिया था। भक्ति के बलसे ही माता यशोदा ने आपको बाँध दिया था। भक्ति के वशीभूत होकर ही इच्छामात्र से अनन्त ब्रह्माण्डों का लय-प्रलय करने में समर्थ होने पर भी आपने श्रीदाम नामक अपने गोप-सखा को कन्धे पर बैठाकर ढोया।”
इस प्रकार श्रीधर निरन्तर प्रभु की स्तुति करते जा रहे थे। यह देखकर वहाँ पर उपस्थित सभी वैष्णवों को बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि वे सभी सोचते थे कि श्रीधर सब्जी बेचने वाला एक अनपढ़ है। श्रीधर प्रभु की ऐसी स्तुति करेगा किसी ने ऐसी कल्पना भी नहीं की थी। परन्तु आज उसके ऊपर प्रभु की ऐसी कृपा देखकर सभी को आश्चर्य हुआ। प्रभु मुसकराते हुए कहने लगे— “श्रीधर ! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँगो। आज मैं तुम्हें सभी के सामने अष्ट सिद्धियाँ प्रदान करूँगा।”
श्रीधर— “प्रभो! आप मुझे फिर से ठगने की चेष्टा कर रहे हैं। परन्तु अब मुझे ठगना आपके लिए सम्भव नहीं है।”
प्रभु (मुसकराते हुए)– “परन्तु श्रीधर मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता। इसलिए तुम्हारे मन में जो हो, माँग लो।”
इस प्रकार जब प्रभु बार-बार वर माँगने को कहने लगे तो श्रीधर बोले— “प्रभु ! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यही वर दीजिये कि जो ब्राह्मण मुझसे केले, थोड़ आदि छीन लिया करता था, वहीं ब्राह्मण जन्म-जन्मान्तरों में मेरा प्राणनाथ हो जाय।” ऐसा कहते-कहते श्रीधर भावविह्वल होकर प्रभु के चरणोंसे लिपटकर जोर-जोर से रोने लगे। प्रभु ने उन्हें उठाकर अपने गले से लगा लिया। श्रीधर की भक्ति तथा उस पर प्रभु की ऐसी अपूर्व कृपा देखकर सभी वैष्णव लोग क्रन्दन करने लगे। तब प्रभु बोले—“श्रीधर ! मैं तुम्हें चक्रवर्ती सम्राट बना देता हूँ।”
श्रीधर— “प्रभो ! मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। मैं यही चाहता हूँ कि मैं सब समय आपके नामों का कीर्त्तन करता रहूँ ।”
प्रभु– “श्रीधर ! तुम तो मेरे नित्य दास हो। इसका लक्षण यही है कि मेरे भक्त को भक्ति के अतिरिक्त कोई भी वस्तु अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकती। इसलिए मैं वेदों के लिए भी दुर्लभ भक्तियोग तुम्हें दे रहा हूँ।” यह सुनकर सभी वैष्णव लोग प्रभु एवं श्रीधर दोनों की जय-जयकार करने लगे।

मुरारिगुप्त पर कृपा
श्रीधर पर कृपा करने के बाद प्रभु मुरारि गुप्त जो हनुमान के अवतार हैं, उनसे कहने लगे— “मुरारि ! तुम भी मेरे स्वरूप का दर्शन करो।”
प्रभु के ऐसा कहते ही श्रीगौरसुन्दर मुरारि को श्रीरामचन्द्र के रूप में दीखने लगे। उस समय उनका वर्ण दुर्वादल की भाँति श्याम वर्ण का था। वे वीर आसन में बैठे हुए थे। उनके हाथों में धनुष सुशोभित हो रहा था। उनके बायीं ओर सीताजी एवं दायीं ओर लक्ष्मणजी विराजमान थे। चारों ओर से बानर एवं भालू इत्यादि उनकी स्तुति कर रहे थे। यह देखते ही मुरारि हनुमान के भाव में आविष्ट होकर मूच्छित होकर गिर पड़े। यह देखकर प्रभु विश्वम्भर कहने लगे— “अरे बानरश्रेष्ठ ! क्या तुम सब भूल गये हो। श्रीसीतादेवी का हरण करने वाले रावण ने तुम्हारी पूँछ में आग लगायी थी तथा तुमने उसकी सारी सोनेकी लङ्काको जलाकर भस्म कर दिया था? मुरारि! उठो, उठो। मैं तुम्हारा प्रभु हूँ। तुम तो मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। मैं वही राघवेन्द्र श्रीराम तथा तुम हनुमान हो। इन सुमित्रानन्दन लक्ष्मण को देखो, जिसे जीवित करने के लिए तुम गन्धमादन पर्वत को ले आये थे। ये श्रीजानकी जी हैं, इन्हें प्रणाम करो, जिन्हें अशोक वाटिका में दुःखी देखकर तुम बहुत रोये थे।”
प्रभु के वचनों को सुनकर मुरारिगुप्त की मूर्च्छा दूर हो गयी तथा वे उस दृश्य का दर्शनकर इस प्रकार प्रेम से अधीर होकर रोने लगे कि उनका करुण क्रन्दन सुनकर मानो सूखी हुई लकड़ी भी द्रवित हो जाये। उन्हें रोता हुआ देखकर प्रभु का हृदय भी द्रवित हो गया। वे बड़े प्रेम से कहने लगे– “मुरारि ! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कुछ भी वर माँगो ।”
मुरारि– “प्रभो ! मुझे और कुछ नहीं चाहिये । बस आप मुझे यही वरदान दीजिये कि मैं सदा सर्वदा आपका गुणगान करता रहूँ। जहाँ कहीं पर भी मेरा जन्म हो, वहाँ पर मुझे आपका स्मरण सब समय बना रहे तथा सर्वदा आपके दासों का सङ्ग मिलता रहे। इसके अतिरिक्त जहाँ-जहाँ पर भी आप अपने समस्त पार्षदों के साथ अवतरित होवें, वहीं पर मैं भी आपका दास होकर आपकी सेवा करूँ।”
यह सुनकर प्रभु बोले– “मुरारि ! मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम सब समय मेरे प्रिय ही बने रहोगे।” यह सुनकर वैष्णववृन्द आनन्दसे जय-जयकार करने लगे। तब प्रभु सभी से कहने लगे– “सभी लोग ध्यानपूर्वक सुनें। यदि कोई व्यक्ति एक बार भी मुरारि की निन्दा करेगा, तो करोड़ों बार गङ्गा स्नान करनेपर अथवा हरिनाम करनेपर भी उसका कल्याण नहीं होगा। बल्कि गङ्गा एवं हरिनाम ही उसका संहार कर डालेंगे। इसके हृदयमें मुरारि (कृष्ण) गुप्त रूप से निवास करते हैं, इसीलिए इसका नाम मुरारिगुप्त है।”

हरिदास पर कृपा
मुरारिगुप्त पर कृपा करने के पश्चात् महाप्रभु हरिदास ठाकुर (जिन्हें ब्रह्माजी एवं प्रह्लादजी का मिलित स्वरूप कहा जाता है) से बोले– “हरिदास! तुम भी मेरा दर्शन करो। तुम तो मुझे मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो। पापी मुसलमानों ने तुम्हें जो कष्ट दिये, उन्हें स्मरणकर तो मेरा हृदय विदीर्ण हो जाता है। हरिदास ! जब दुष्ट मुसलमान तुम्हें बाइस बाजारों में मारते-मारते घुमा रहे थे, उस समय मैं तुम्हारा कष्ट सह नहीं पाया तथा क्रोधित होकर हाथ में चक्र लेकर उनका विनाश करने के लिए वैकुण्ठ से वहाँ पर आ गया था। अभी मैं उनके विनाश के लिए अपना चक्र छोड़ने ही वाला था कि सभी का हित चाहने वाले परम दयालु तुमने मुझसे प्रार्थना की “हे प्रभो! आप कृपापूर्वक इन लोगों को क्षमा करें, क्योंकि ये अबोध हैं।” तुम्हारी ऐसी प्रार्थना ने मेरे चक्र को रोक दिया। परन्तु वे दुष्ट निर्दयतापूर्वक तुम्हें कोड़ों से पीटते ही जा रहे थे। मैं तुम्हें इस प्रकार पिटता हुआ नहीं देख सका। अतः तुम्हारे पीठ पर होने वाले प्रहारों को मैंने अपनी पीठ पर सहन किया। यदि विश्वास न हो, तो ये देखो कोड़ों के निशान।” ऐसा कहकर प्रभु ने अपनी पीठ दिखायी तो मक्खन से भी अधिक कोमल उनकी पीठ पर गहरे-गहरे कोड़ों के निशानों को देखकर सभी को बहुत दुःख हुआ। हरिदास की दशा तो विचित्र ही हो गयी। अपने प्रति प्रभु की कृपा देखकर उनकी आँखों से गङ्गा-यमुना की भाँति अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी तथा वे रोते-रोते प्रभु के श्रीचरणों से लिपट गये। उन्हें इस प्रकार विकलतापूर्वक रोता देखकर प्रभु की आँखें भी छलछला आयीं। वे हरिदास को सान्त्वना देते हुए कहने लगे– “हरिदास ! मैं इस धरा धाम पर कुछ विलम्ब से आने वाला था, परन्तु तुम्हारे दुःख को सहन न कर पाने के कारण अतिशीघ्र ही आ गया।” इस प्रकार भगवान् सदा सर्वदा अपने प्रेमी भक्तों की रक्षा के लिए तथा जगत्में उनका सम्मान बढ़ाने के लिए क्या कुछ नहीं कहते और क्या कुछ नहीं करते?

मुकुन्द पर कृपा
महाप्रभु अपने भगवदावेशमें थे। जब सभी लोग प्रभु से वरदान माँग रहे थे, उस समय प्रभु के प्रधान कीर्त्तनीया मुकुन्द द्वार के बाहर बैठे हुए थे। उनका साहस नहीं हो रहा था कि वे प्रभु के समक्ष जा सकें। मुकुन्द तो सभी के प्रियपात्र थे। कोई भी समझ नहीं पा रहा था कि प्रभु सभी को बुला-बुलाकर उन पर कृपा कर रहे हैं, परन्तु प्रभु का प्रधान कीर्त्तनीया मुकुन्द जो कि यहीं पर बैठा है, उसे नहीं बुला रहे हैं, आखिर इससे क्या अपराध हो गया? यह देखकर सभी को बहुत कष्ट हो रहा था। कुछ क्षण पश्चात् श्रीवास पण्डित ने साहस करके प्रभु से पूछ ही लिया– “हे प्रभो! हे जगत् के नाथ! मुकुन्द ने ऐसा क्या अपराध किया है कि जो आपने सबपर तो कृपा की, परन्तु मुकुन्द पर कृपा नहीं की। मुकुन्द तो आपका प्रिय है तथा हम सभी को भी प्राणों के समान प्यारा है। जब वह कीर्त्तन करता है, तो पाषाण-हृदय वाले व्यक्ति का हृदय भी पिघल जाता है। यदि इससे कुछ अपराध भी हो गया हो, तो आप कृपा कर इसे दण्ड दीजिये, परन्तु इस प्रकार अपने सेवक को अपने से दूर मत कीजिये। अतः आप इसे क्षमाकर अपने पास बुलाइये। यदि आप नहीं बुलायेंगे, तो यह आपके सम्मुख नहीं आ पायेगा।”
यह सुनकर प्रभु कुछ रोषपूर्वक कहने लगे– “श्रीवास! आप लोग फिर से ऐसी बात मत कहना तथा इसके लिए मेरे पास प्रार्थना भी मत करना। यह खड़जाठिया है अर्थात् यह जहाँ जाता है, वहाँ वैसा ही बन जाता है। जब यहाँ पर रहता है अर्थात् वैष्णव-मण्डली में रहता है, तो दाँतों में तृण धारण करता है अर्थात् अपनी दीनता प्रकाशित करता है, अपने को मेरा अकिञ्चन दीन-हीन सेवक मानता है। परन्तु जब मायावादियों की मण्डली में जाता है, तो वहाँ जाकर मेरे स्वरूप को नहीं मानता। मुझे निराकार, निर्विशेष इत्यादि कहकर तथा भक्ति को अनित्य मानकर मेरे शरीर पर जाठी (लाठी) से प्रहार करता है। इस प्रकार इसका भक्तिदेवी के श्रीचरणों में अपराध हुआ है। इसीलिए इस पर मेरी कृपा सम्भव नहीं है।”
मुकुन्द बाहर से ही यह सब सुन रहे थे। वे विचार करने लगे
कि बहुत समय पहले कुसङ्ग के प्रभाव के कारण मैंने भक्ति की श्रेष्ठता स्वीकार नहीं की थी। अन्तर्यामी प्रभु इसे जानते हैं। इसलिए अब जब कि मुझ पर उनकी कृपा नहीं होगी, तो इस पापी शरीर को ढोने से क्या लाभ जो प्रभु की सेवा में ही नहीं लग सका। इसलिए मैं आज ही इस अपराधी शरीर को छोड़ दूँगा। ऐसा विचारकर वे श्रीवास पण्डित से बोले– “हे श्रीवास जी! आप मेरी ओर से कृपा करके प्रभु से पूछिये कि क्या कभी वे मुझे दर्शन देंगे।” ऐसा कहकर मुकुन्द फूट-फूटकर रोने लगे। उन्हें रोता देखकर वैष्णवों का हृदय भी टुकड़े-टुकड़े हो गया तथा वे भी क्रन्दन करने लगे।
श्रीवास पण्डित प्रभु से बोले– “प्रभो ! मुकुन्द पूछ रहा है कि क्या आप उस पर कभी कृपा करेंगे?”
प्रभु— “एक करोड़ जन्मों के बाद मैं उस पर कृपा करूँगा अर्थात् वह मेरा दर्शन पायेगा।”
बाहर बैठे मुकुन्द ने जब सुना कि एक करोड़ जन्मों के बाद प्रभु मुझे दर्शन देंगे तो उन्हें अपार आनन्द हुआ और वे प्रसन्नता पूर्वक भुजाएँ उठाकर उद्दण्ड नृत्य करते हुए कहने लगे– “मुझ पर प्रभु की कृपा अवश्य होगी, अवश्य होगी।” उन्हें इस प्रकार आनन्द से नाचते हुए देख प्रभु विश्वम्भर हँसने लगे हँसते हुए उन्होंने आदेश दिया– “मुकुन्द को मेरे पास ले आओ।” यह सुनकर सभी वैष्णववृन्द मुकुन्द से कहने लगे– “मुकुन्द ! चलो, तुम्हें प्रभु बुला रहे हैं।” परन्तु मुकुन्द को तो होश ही नहीं रहा, वे तो आनन्द से नाचे ही जा रहे थे। तब प्रभु स्वयं ही बोले– “मुकुन्द! तुम्हारे अपराध नष्ट हो गये हैं। अब तुम मेरे निकट आकर मेरा दर्शन करो।” तब सभी लोग मुकुन्द को पकड़कर भीतर ले आये। प्रभु के समीप जाते ही मुकुन्द प्रभु के श्रीचरणों में गिर पड़े।
प्रभु बोले– “मुकुन्द ! उठो। तुम मेरा दर्शन करो। अब तुम्हारा अपराध नहीं रहा। सङ्ग-दोष के कारण ही तुम्हारा अपराध हुआ था। परन्तु अब तुम्हारा वह असत्सङ्ग दोष नष्ट हो गया है। मेरे यह कहने पर कि करोड़ जन्मों के बाद तुम्हारे ऊपर मेरी कृपा होगी, तुम्हारी जो स्थिति हुई उसके द्वारा तुमने करोड़ जन्म एक क्षण में ही बीता दिये। मेरे वचनों पर इतना दृढ़ विश्वास करके तुमने मुझे अपने हृदय में बाँध लिया। मैं तुमसे पराजित हो गया। यथार्थ बात तो यह है कि तुम मुझे बहुत प्रिय हो। अतः प्रिय होने के कारण ही मैंने तुमसे हास-परिहास किया, जब कि वास्तविक बात तो यह है कि यदि तुम कोटि-कोटि अपराध भी करो, तो भी तुम मेरे प्रिय ही बने रहोगे।”
प्रभु की इन सान्त्वना और स्नेहपूर्ण बातों को सुनकर मुकुन्द
रोते-रोते अपने को धिक्कारते हुए कहने लगे– “हे प्रभो! मैंने अपने इसी पापी मुख से भक्ति की नित्यता को अस्वीकार किया। अतः मेरे जैसा भक्ति रहित व्यक्ति आपके मनोहर रूप का दर्शन करके भी क्या सुख प्राप्त कर सकता है? कदापि नहीं। जैसे– दुर्योधन ने आपके विश्वरूप का दर्शन किया, जिसे दर्शन करने के लिए बड़े-बड़े ऋषि-मुनि एवं स्वयं वेद भी इच्छा करते हैं, परन्तु भक्तिरहित होने के कारण ऐसे दुर्लभ विश्वरूप का दर्शन करने पर भी उसे आनन्द नहीं हुआ, बल्कि आपसे द्वेष करने के कारण वह सवंश नष्ट हो गया। जब पृथ्वी देवी का उद्धार करने के लिए आप वराह (शूकर) रूपमें प्रकट हुए और आपने पृथ्वीदेवी को अपने दाँतों पर धारण किया था, उस समय आपकी जो शोभा हुई, उस मनोहर रूप का दर्शन करने के लिए वेद भी लालायित रहते हैं। परन्तु उसी अद्भुत स्वरूप का दर्शन करके भी हिरण्याक्ष को आनन्द नहीं हुआ, बल्कि उसके भीतर क्रोध की ज्वाला धधकने लगी, क्योंकि उसके हृदय में लेशमात्र भी भक्ति नहीं थी। इसी प्रकार एक ओर जहाँ कुब्जा, यज्ञ पत्नियाँ, अक्रूर आदि सभी लोग आपका दर्शन पाकर धन्य हो गये, वहीं दूसरी ओर कंस, जरासन्ध आदि राजा आपका दर्शन करने पर भी द्वेष भाव के कारण सर्वनाश को प्राप्त हुए। उसी प्रकार मैं भी भक्तिरहित होने के कारण आपके स्वरूप का कैसे दर्शन कर सकता हूँ?” ऐसा कहकर मुकुन्द दोनों भुजाएँ उठाकर “हा गौर! हा गौर सुन्दर!” कहकर आर्तनाद करने लगे।
उन्हें इस प्रकार व्याकुलतापूर्वक खेद करते हुए देखकर प्रभु कहने लगे– “मुकुन्द! तुम मुझे बहुत प्रिय हो। तुम जहाँ पर भी कीर्त्तन करोगे, मैं वहीं पर अवतरित हो जाऊँगा। तुमने जितनी बातें कहीं, वे सब सत्य हैं। भक्ति के बिना मुझे कोई भी नहीं देख सकता। जिसका तन, मन, वचन सब कुछ मुझमें अर्पित है, केवल वे ही मेरा दर्शन कर सकते हैं और तुम मेरे ऐसे ही भक्त हो। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम जिस प्रकार मुझे प्रिय हो, उसी प्रकार सभी वैष्णवों के भी प्रिय बने रहोगे। इसके अतिरिक्त जहाँ-जहाँपर भी मेरा अवतार होगा, वहींपर तुम मेरे कीर्त्तनमें रहोगे।" मुकुन्द के प्रति प्रभुका वरदान सुनकर सभी वैष्णववृन्द हर्षपूर्वक जय-जयकार करने लगे।

हरे कृष्ण 🙏🏻