श्री चैतन्य महाप्रभु - 6 Charu Mittal द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्री चैतन्य महाप्रभु - 6

जगन्नाथ मिश्र का स्वप्न तथा परलोक-गमन
एक दिन जगन्नाथ मिश्र ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न देखकर वे शोक सागरमें डूब गये। शय्या से उठते ही भगवान्‌ को प्रणाम करते हुए कहने लगे– “हे कृष्ण ! हे गोविन्द ! प्रभो ! मैं आपसे केवल एक ही वर चाहता हूँ कि मेरा निमाइ गृहस्थ होकर मेरे घरमें ही रहे।” यह सुनकर शची माता ने चिन्तित होकर पूछा– “क्या बात है, आज आप शय्या से उठते ही अचानक ऐसा वर क्यों माँग रहे हैं?” मिश्र कहने लगे– “आज मैंने एक स्वप्न देखा । निमाइ का सिर मुण्डा हुआ था तथा वह एक अद्भुत संन्यासी के वेशमें था। कभी वह 'कृष्ण कृष्ण' कहकर रो रहा था, तो कभी हँस रहा था। चारों ओर से लाखों लोग आनन्दपूर्वक उसकी स्तुति कर रहे थे। फिर कुछ क्षण बाद ही मैंने देखा कि हमारा निमाइ लाखों लोगों के साथ नगर-नगरमें कीर्त्तन करते हुए नाच रहा था। फिर मैंने देखा कि निमाइ समस्त भक्तों को साथ लेकर नीलाचल चला गया। यह स्वप्न देखकर मुझे चिन्ता हो रही है कि हम दोनों के जीवन का एकमात्र सहारा हमारा निमाइ कहीं संसार से विरक्त होकर संन्यासी न हो जाय।” यह सुनकर शची माता भी भयभीत हो गयी, परन्तु उन्होंने अपने भाव को छिपा लिया तथा बोलीं– “स्वप्न भी कहीं सच होते हैं? आप चिन्ता न कीजिये, हमारा निमाइ इतना निर्दय नहीं है कि हम दोनों को असहाय छोड़कर चला जायेगा।” ये सब बातें माता कह तो रही थीं, परन्तु न जाने क्यों उनका मन भी यही कह रहा था कि निमाइ सर्वदा के लिए घरमें रहने वाला नहीं है। अब रात दिन जगन्नाथ मिश्र को यही चिन्ता सताये जा रही थी। इसी चिन्ता के कारण अन्ततः एक दिन वे परलोक सिधार गये अर्थात् नित्यधाममें चले गये। पिता के देह त्याग करने पर प्रभु श्रीगौरसुन्दर उसी प्रकार विलाप करने लगे, जैसे महराज दशरथ के देह त्याग करने पर रामचन्द्र ने विलाप किया था। शची माता का भी रो-रोकर बुरा हाल था। प्रभु उन्हें सान्त्वना देते हुए कहने लगे– “माँ ! तुम लेशमात्र भी चिन्ता मत करो। जब मैं तुम्हारे पास हूँ, तो तुम्हारे पास सब कुछ है। हे माता! ब्रह्मा, शिव आदि के लिए भी जो दुर्लभ वस्तु है, मैं तुम्हें वह लाकर प्रदान करूँगा।” अपने निमाइ का मुख देखकर शची माता अपना सब दुःख भूल गयीं। जिन प्रभु का स्मरण करनेमात्र से ही समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, ऐसे प्रभु जिनके पुत्र हैं, उनके हृदयमें दुःख कैसे रह सकता हैं।

ज्योतिषी पर कृपा
अपना अध्ययन पूरा कर लेने के पश्चात् प्रभु ने अब बच्चोंको व्याकरण पढ़ाना आरम्भ कर दिया। भ्रमण करते हुए एक दिन वे एक ज्योतिषी के घर पहुँच गये। प्रभुके दिव्य स्वरूप का दर्शनकर उसने सम्भ्रमपूर्वक प्रभु को प्रणाम किया।
प्रभु बोले– “मैंने सुना है कि आप अच्छे ज्योतिषी हैं। अतः मेरा हाथ देखकर बतलाइये कि मैं पिछले जन्ममें कौन था ?” प्रभु की बात सुनकर ज्योतिषी गोपाल मन्त्र जपते-जपते मन-ही-मन चिन्ता करने लगा। कुछ क्षण पश्चात् उसने देखा कि कारागार में रात्रि के समय माता-पिता के (देवकी-वसुदेव के) सामने शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म लिए भगवान् खड़े हैं तथा वे दोनों उनकी स्तव स्तुति कर रहे हैं। अगले ही क्षण देखा कि पिता वसुदेव पुत्र को गोकुल पहँचाने जा रहे हैं। फिर उसने प्रभु के द्विभुज धारी शिशु स्वरूप का दर्शन किया। उस समय उनके श्रीअङ्ग पर एक भी वस्त्र नहीं था। उनकी कमर में किङ्किणी बँधी हुई थी। उनके एक हाथ में मक्खन था तथा दूसरे हाथ से वे उसे खा रहे थे। वह ब्राह्मण बाल-गोपाल का उपासक था तथा गोपालमन्त्र का जप करता था। इसलिए प्रभु में अपने इष्टदेव गोपाल का दर्शनकर आश्चर्यचकित हो गया। उसी समय दृश्य बदल गया। अब उसने देखा कि भगवान् त्रिभङ्गरूपमें खड़े होकर मुरली बजा रहे हैं तथा गोपियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर नाना प्रकारके वाद्य यन्त्रों के साथ गान कर रही हैं। यह अद्भुत दृश्य देखकर उस ज्योतिषी ने विस्मित होकर अपनी आँखें खोलकर देखा तो पाया कि सामने कोई नहीं एकमात्र प्रभु बैठे हैं। इसलिए वह मन-ही-मन अपने इष्टदेव गोपालदेव से प्रार्थना करने लगा- “हे प्रभो! यह ब्राह्मण कौन हैं? कृपा कर आप मुझे सब बताइये।” जैसे ही उसने आँखें बन्दकर यह प्रार्थना की, उसी क्षण उसने हाथमें धनुष-बाण लिये हुए श्रीरामचन्द्र जी का दर्शन किया। इस प्रकार उसे प्रभु में कभी प्रलयकालीन जलमें अपने दाँत पर पृथ्वी को धारण किये हुए भगवान् वराहदेव के दर्शन, कभी उग्ररूपधारी भक्तवत्सल भगवान् श्रीनृसिंह के दर्शन, कभी बलि महाराज के दरबार में एक छोटे से ब्रह्मचारी के रूपमें भगवान् वामनदेव के दर्शन, कभी प्रलयकालीन जल में मत्स्य अवतार के दर्शन, कभी हल-मूसलधारी बलदेव प्रभु के दर्शन होने लगे। परन्तु भगवान्‌ की माया से मोहित होने के कारण वह ब्राह्मण प्रभु को पहचान नहीं पाया। वह मन-ही-मन विचार करने लगा कि यह ब्राह्मण अवश्य ही कोई मन्त्रविद है अथवा कोई देवता है और मेरी परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मण के रूप में है। इसका कारण है कि इसके शरीर से जैसा तेज निकल रहा है, वैसा तेज किसी साधारण व्यक्ति के शरीर से निकलना असम्भव है।
उसे इस प्रकार विचारमग्न देखकर श्रीगौरसुन्दर ने उससे पूछा “हे ज्योतिषी ! मैं पूर्व जन्ममें कौन था ? तुमने अपने विद्या के द्वारा जो देखा उसे स्पष्ट रूपसे कहो।” ज्योतिषी बोला “हे ब्राह्मण अभी आप जाइये। आज सन्ध्या के समय मैं अच्छी प्रकार से मन्त्र जपकर देखूँगा, तब बताऊँगा।” “बहुत अच्छा” कहकर श्री गौरसुन्दर हँसते हुए वहाँ से चल पड़े।

भक्त श्रीधर से प्रेम-कलह
नवद्वीपमें एक परम भगवद्भक्त रहते थे। उनका नाम श्रीधर था। वे बहुत ही निर्धन थे। बाजारमें उनकी एक छोटी-सी सब्जी की दुकान थी। श्री गौरसुन्दर श्रीधर से बहुत प्रीति करते थे। किसी-न-किसी बहाने बार-बार उनकी दुकान पर चले जाते तथा उनसे नाना प्रकार से हास-परिहास करते। एक दिन जब प्रभु उसकी दुकान पर उपस्थित हुए, तो उन्हें आया हुआ देखकर श्रीधर ने प्रभु को श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर बैठने के लिए उन्हें एक आसन प्रदान किया। श्रीधर बहुत ही सरल एवं शान्त स्वभाव के थे। किसी प्रकार से उस छोटी-सी दुकान से जीवन निर्वाह करते हुए सब समय भगवद्भजनमें प्रमत्त रहते थे। परन्तु भगवान्‌ को तो अपने ऐसे निष्किञ्चन भक्तों के साथ हास-परिहास करने में ही आनन्द आता है। इसलिए प्रभु उनसे बोले– “अरे श्रीधर! मैं देखता हूँ कि तुम सब समय हरिनाम करते रहते हो, परन्तु तुम्हारे दुःख तो दूर ही नहीं होते। यह तो बहुत आश्चर्य की बात है। लक्ष्मीकान्त की सेवा करने पर भी तुम्हारे पास पहनने के लिए वस्त्र पर्याप्त एवं खाने को पर्याप्त अन्न भी नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि इसका क्या कारण है?”
श्रीधर– “हे पण्डित! यह ठीक है कि मेरे पास पर्याप्त अन्न, वस्त्र इत्यादि नहीं हैं, परन्तु मैं भूखा भी तो नहीं रहता हूँ। खाने के लिए कुछ-न-कुछ व्यवस्था तो हो ही जाती है तथा शरीर को ढकने के लिए छोटे-मोटे कपड़े के टुकड़े भी मिल ही जाते हैं।”
प्रभु– “श्रीधर यह बात ठीक है कि ये वस्तुएँ तुम्हें मिल जाती हैं। परन्तु देखो तो, तुम्हारे कपड़ों में दस जगह टाँके लगे हुए हैं तथा अपने घर की हालत तो देखो! घास की छत है और वह भी टूटी हुई है। वर्षा का सारा पानी घर के अन्दर आता है। इसके विपरीत जो लोग हरिनाम नहीं करते, चण्डी एवं विषहरि आदि देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, उनके पास न खाने का अभाव है न पहननेके वस्त्रों का अभाव। वे तो विशाल एवं सुन्दर भवनों में आनन्द से रहते हैं।
श्रीधर– “हे ब्राह्मण देवता! आप ठीक ही कह रहे हैं, परन्तु
सबका समय तो एक समान ही व्यतीत होता है। राजा के घरमें अपार धन-सम्पत्ति होती है तथा वह उत्तम भोजन एवं उत्तम वस्त्र धारणपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करता है। इसके विपरीत पक्षी वृक्षों पर रहकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। परन्तु काल तो दोनों का एक समान ही होगा अर्थात् काल उपस्थित होनेपर दोनों को ही इस शरीर को छोड़ना पड़ेगा। इसलिए सभी जीव भगवान्‌ की इच्छा से ही अपने-अपने कर्मानुसार विषयों को भोगते हैं।”
प्रभु — “श्रीधर! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पास अपार सम्पत्ति है, जिसे तुम छिपकर भोग करते हो।” मैं कुछ दिनों बाद ही जगत् में सभी लोगों को तुम्हारी सम्पत्ति दिखाऊँगा तथा सबको बताऊँगा कि जगत्‌में श्रीधर से अधिक धनी अन्य कोई नहीं हो सकता। तब देखूँगा कि तुम मुझे कैसे ठगते हो ?”
श्रीधर (हाथ जोड़कर)– “हे पण्डित! आप कृपापूर्वक चुपचाप अपने घर को जाइये। आप एक ब्राह्मण हैं तथा मेरी दुकान पर आये हैं। इसलिए आपसे झगड़ा करना मेरे लिए सर्वथा अनुचित है।”
प्रभु–“श्रीधर! इतना सहज नहीं है कि मैं तुम्हें बिना कुछ
लिए ही छोड़ दूँगा। पहले यह बताओ कि तुम मुझे क्या दोगे? तब मैं तुम्हें छोडूंगा।”
श्रीधर –“पण्डित! मैं कोई बहुत बड़ा व्यवसायी नहीं हूँ कि
आपको कुछ दान कर पाऊँ। मैं कुछ थोड़ (केले के पेड़ के अन्दर का भाग) और मोचा ( केले का फूल) इत्यादि बेचता हूँ। इससे जो थोड़ी-बहुत आय होती है, उसीसे गङ्गाजी की सेवा और अपना जीवन निर्वाह करता हूँ।”
प्रभु– “श्रीधर! मुझे ठगने की आवश्यकता नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम कैसे निर्धन हो? तुमने जो अमूल्य सम्पत्ति (भक्ति) छिपाकर रखी है, उसे तो मैं कुछ दिन बाद लूंगा, अभी तो तुम मुझे मोचा और थोड़ इत्यादि दे दो। यदि नहीं दोगे तो मैं यहीं बैठकर तुमसे झगड़ा करता रहूँगा, जिससे तुम्हारी दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आयेगा और तुम्हारी बिक्री नहीं होगी।”
यह सुनकर श्रीधर मन-ही-मन विचार करने लगा कि ये ब्राह्मण बहुत चञ्चल हैं। यदि मैंने इन्हें बिना मूल्य के कुछ नहीं दिया तो ये मुझे तङ्ग करते रहेंगे। ये ब्राह्मण हैं, इसलिए मैं इनके साथ झगड़ा भी नहीं कर सकता और यदि बिना मूल्य के ही देता हूँ तो मेरा निर्वाह कैसे होगा? क्योंकि यह एक दिन की बात नहीं, रोज की बात है। किन्तु इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि ये जो प्रतिदिन ही छल-बल से मेरे पास से बिना मूल्य दिये सब्जियाँ ले जाते हैं, यह भी मेरा सौभाग्य ही है कि मेरी वस्तु ब्राह्मण की
सेवा में लग रही है। शास्त्रों में ब्राह्मण को दान करने की बात कही गयी है। ऐसा विचार कर श्रीधर बोला– “हे पण्डित! आपको मूल्य देने की आवश्यकता नहीं है। आपकी जो इच्छा हो ले लें। परन्तु कृपाकर मेरे साथ झगड़ा करके मेरी दुकानदारी खराब न करें।”
प्रभु– “अच्छी बात है। मैं अब तुमसे झगड़ा नहीं करूँगा। परन्तु फल, सब्जी अच्छी होनी चाहिये।”
यह कहकर वे थोड़, केले इत्यादि लेकर श्रीधर से बोले– “श्रीधर! तुम मुझे क्या मानते हो? मुझे बताओ, तो मैं चुपचाप अपने घर चला जाऊँगा।”
श्रीधर– “आप ब्राह्मण हैं।”
प्रभु– "तुम मुझे पहचान नहीं पाये, मैं ब्राह्मण नहीं, बल्कि
एक गोप हूँ। तुम मुझे एक ब्राह्मण बालक समझते हो, परन्तु मैं अपने को एक गोप बालक मानता हूँ।”
यह सुनकर श्रीधर हँसने लगा। वह भगवान्‌ की मायाके कारण अपने प्रभु को पहचान नहीं पाया। उसे हँसते हुए देखकर प्रभु बोले– “श्रीधर! तुम जिस गङ्गाजी की पूजा करते हो, वह मेरे चरणों की दासी है। मेरे कारण ही उसकी महिमा है।”
श्रीधर– “हे पण्डित ! आप कैसी अपराधजनक बातें कह रहे हैं? क्या आपको गङ्गाजी का तनिक भी भय नहीं है? मैंने सुना था कि आयु बढ़ने के साथ-साथ बच्चे की चञ्चलता दूर होती है, परन्तु आपकी चञ्चलता तो दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।”
इस प्रकार नित्यप्रति अपने भक्त श्रीधर से छल-बल से प्रभु जो सब्जी ले जाते, उसे ही खाते थे। भगवान्‌ का स्वभाव है–
भक्तेर द्रव्य प्रभु काड़ि-काड़ि खाय।
अभक्तेर द्रव्य प्रभु उलटिया ना चाय ॥
अर्थात् “भक्त की वस्तु को प्रभु बलपूर्वक छीनकर खाते हैं, परन्तु अभक्त के द्वारा छप्पन भोग दिये जाने पर भी वे उस ओर ताकते तक नहीं।”

दिग्विजयी पण्डित का उद्धार
एक दिन केशव काश्मीरी नामक कोई दिग्विजयी पण्डित देश के विभिन्न स्थानों के पण्डितों को पराजित करता हुआ अभिमान के शिखर पर बैठकर नवद्वीप में उपस्थित हुआ। वह जानता था कि इस समय विद्या का प्रधान केन्द्र नवद्वीप है, अतः उसने सोचा कि जब तक मैं नवद्वीप के पण्डितों को पराजित न कर दूँ, तब तक मेरी विजय-यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती। ऐसा विचारकर वह नवद्वीप में उपस्थित हुआ।
नवद्वीप के घर-घरमें एवं पण्डितों की सभाओं में यह समाचार जङ्गल की आग की तरह फैल गया कि देश के समस्त पण्डितों को पराजित करता हुआ सरस्वती देवी का पुत्र एक दिग्विजयी पण्डित नवद्वीप में आया है। इस कारणसे पण्डित समाज चिन्तामें डूब गया। पण्डित लोग विचार करने लगे कि जिसकी जिह्वापर स्वयं सरस्वती देवी विराजमान हो, उसे कोई मनुष्य पराजित नहीं कर सकता। इस समय नवद्वीप के पण्डित समस्त भारतवर्षमें श्रेष्ठ माने जाते हैं। परन्तु आज यदि हमलोग इस पण्डित से पराजित हो गये तो यह हमारे लिए अत्यन्त लज्जा का विषय होगा। इस प्रकार हजारों अध्यापक अपना-अपना कार्य छोड़कर इसी विषयपर चिन्ता करने लगे।
यह समाचार प्रभु के छात्रों ने भी प्रभु को सुनाया कि एक दिग्विजयी पण्डित श्रीसरस्वती देवी को वशमें करके समस्त पण्डितों को पराजित कर उनसे जय पत्र लिखवाते हुए नवद्वीपमें उपस्थित होकर अपना प्रतिद्वन्द्वी चाहता है। उसका कहना है कि यदि नवद्वीप के पण्डितों का सामर्थ्य है, तो वे उसके साथ शास्त्रार्थ करें, अन्यथा जय-पत्र लिखकर दे दें कि हम लोग हार गये । यह सुनकर श्री गौरसुन्दर अपने छात्रों से बोले– “तुम लोग सावधानी पूर्वक सुनो। भगवान् किसी का भी अहङ्कार सहन नहीं करते। जिस-जिस गुण के कारण कोई अहङ्कार करता है, भगवान् उसके उस गुण को नष्ट कर देते हैं। विद्या का फल अहङ्कार नहीं बल्कि नम्रता है। जिस प्रकार वृक्षमें फल लगनेपर वृक्ष की टहनियाँ स्वयं झुक जाती हैं, उसी प्रकार गुणों के आने पर व्यक्ति दीन-हीन बन जाता है। यही पण्डित का लक्षण है। परन्तु यदि व्यक्ति ऐसा न होकर अहङ्कार में डूब जाय तो अवश्य ही भगवान् उसके अहङ्कार को नष्ट कर देते हैं। जैसे– रावण, नहुष, वेण, बाणासुर, नरकासुर ये सभी अत्यन्त ही शक्तिशाली थे, परन्तु जैसे ही इन्हें घमण्ड हुआ, भगवान्ने इन सबके घमण्ड को चूर्ण-विचूर्ण कर दिया। इसी प्रकार भगवान् इस दिग्गवजयी पण्डित के घमण्ड को भी अवश्य ही यहीं पर तुम्हारे सामने ही नष्ट करेंगे।” ऐसा कहकर प्रभु हँसते-हँसते शिष्यों के साथ गङ्गा के तटपर उपस्थित होकर गङ्गाजी को प्रणामकर एवं आचमनकर बैठ गये। उन्होंने शास्त्रचर्चा आरम्भ कर दी। अभी तक उन्होंने किसी को नहीं बताया कि वे किस प्रकार दिग्विजयी पण्डित के अभिमान को चूर्ण करेंगे। परन्तु प्रभु मन-ही-मन विचार करने लगे कि इस पण्डित को बहुत अभिमान हो गया है कि उसके समान पण्डित जगत्‌में नहीं है। अतः यदि मैं इसे सभा के मध्यमें ही पराजित करूँ, तो यह उसके लिए मृत्युतुल्य होगा। सभी लोग उसका अपमान करेंगे, जिससे जीते जी ही उसका मरण होगा। अतः मैं इस प्रकारसे इसके गर्व को चूर्ण करूँगा कि साँप भी मर जाय तथा लाठी भी न टूटे अर्थात् इसका घमण्ड भी चूर्ण हो जायेगा और इसे दुःख भी नहीं होगा। प्रभु ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उसी समय दिग्विजयी पण्डित स्वयं ही वहाँ पर उपस्थित हो गया। प्रभुके अपूर्व सौन्दर्य एवं उनके अलौकिक तेज को देखकर वह बहुत आकर्षित हुआ। उसने कुछ छात्रों से पूछा– “इनका क्या नाम है ?”
शिष्यों ने उत्तर दिया कि इनका नाम निमाइ पण्डित है।
यह सुनकर वह गङ्गाजी को प्रणामकर प्रभुकी सभा के बीच
उपस्थित हुआ। उन्हें देखकर प्रभु मन्द-मन्द मुसकराते हुए एक आसन प्रदान कर बोले– “महाशयजी ! कृपाकर विराजिये।”
वह गर्वपूर्वक आसनपर बैठ गया। बैठते ही उसने कुछ उपेक्षापूर्वक प्रभु से पूछा– “क्या तुम्हारा ही नाम निमाइ पण्डित है? तथा तुम व्याकरण शास्त्र पढ़ाते हो?”
प्रभु– “मैं भला व्याकरण क्या पढ़ाऊँगा, थोड़ी-सी चेष्टा करता हूँ। परन्तु जो मैं पढ़ाता हूँ, उसे न तो शिष्य लोग समझ पाते हैं, न मैं ही उन्हें समझा पाता हूँ। कहाँ आप समस्त शास्त्रों में प्रवीण और कहाँ मैं एक नया-नया व्याकरण का छात्र। मैंने सुना है कि आपके पाण्डित्य के आगे बड़े-बड़े पण्डित नतमस्तक हो जाते हैं। यह सुनकर मेरी इच्छा भी हो रही है कि आपके मुख से कुछ सुनूँ। अतः यदि आप कृपापूर्वक गङ्गाजी की महिमा सुना दें, तो मैं स्वयं को धन्य मानूँगा।”
यह सुनकर उस पण्डित ने गर्व से वहींपर एक सौ श्लोकों की रचना कर उनके माध्यमसे गङ्गाजी की महिमा का गान किया, जिसे सुनकर प्रभु उसके पाण्डित्य की प्रशंसा करते हुए बोले “आपके समान पण्डित इस जगत्‌में दूसरा नहीं है। आपकी कविता का अर्थ आप ही समझ सकते हैं अथवा स्वयं सरस्वती देवी समझ सकती हैं। अतः यदि आप अपने द्वारा कहे गये श्लोकोंमें से मात्र एक श्लोक की व्याख्या सुना दें, तो मैं अपने को धन्य समझँगा।”
दिग्विजयी ने पूछा– “तुम बताओ कौन-से श्लोक की व्याख्या सुनाऊँ ?”
प्रभु ने उसके द्वारा कहे हुए सौ श्लोकोंमेंसे बीच का एक श्लोक सुनाकर उसकी व्याख्या करने को कहा।
वह श्लोक सुनकर पण्डित के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह बोला “मैंने आँधी-तुफान की भाँति एक सौ श्लोक कहे। उनमें से तुम्हें यह एक श्लोक कैसे याद हो गया ?”
प्रभु– “हे पण्डितप्रवर! इसमें आश्चर्य क्या है? यदि आप
सरस्वती देवी के वर से दिग्विजयी हो सकते हैं, तो कोई उन्हीं की कृपा से श्रुतिधर भी तो हो ही सकता है।”
इस उत्तरसे सन्तुष्ट होकर केशव काश्मीरी ने श्लोक का अर्थ सुना दिया। अर्थ सुनकर प्रभु बोले– “कृपापूर्वक इस श्लोक के गुण एवं दोषों को भी बता दीजिये।”
पण्डित– “इस श्लोकमें दोष तो हो ही नहीं सकता। इसमें गुण ही गुण हैं।”
प्रभु– “यद्यपि यह श्लोक सराहनीय है, परन्तु यदि आप रुष्ट न हों, तो मैं बता सकता हूँ कि अच्छी प्रकारसे विचार करने पर स्पष्ट होता है कि इसमें कुछ गुण एवं दोष दोनों ही हैं।”
पण्डित– “यह सम्भव नहीं है कि मेरे श्लोकमें कोई दोष हो।
मैंने जो कहा वह वेदों का भी सार है। तुम तो एक साधारण से व्याकरण के अध्यापक हो। तुमने अलङ्कार-शास्त्र तो पढ़ा ही नहीं। फिर तुम क्या जानते हो अलङ्कार इत्यादि के विषयमें?”
प्रभु– “आप रुष्ट मत होइये। मैं एक साधारण सा व्याकरण का अध्यापक हूँ। इसीलिए तो आपसे कह रहा हूँ कि आप ठीक प्रकार से मुझे समझा दीजिये। यद्यपि मैंने अलङ्कार शास्त्र नहीं पढ़ा, परन्तु सुना अवश्य है। इसीलिए आपके श्लोकमें गुण एवं दोष दोनों ही देख रहा हूँ।”
पण्डित–“ठीक है! तुम ही बताओ कि मेरे श्लोकमें क्या-क्या दोष एवं गुण हैं।”
यह सुनकर प्रभु ने उस श्लोकमें पाँच दोष एवं पाँच गुण दिखा दिये, जिसे सुनकर दिग्विजयी पण्डित अवाक् रह गया। उसकी प्रतिभा धरी की धरी रह गयी। वह कुछ बोलना चाहता था, परन्तु उसके मुख से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था। वह दुःखी होकर मन-ही-मन विचार करने लगा कि एक साधारण से छात्रा में मुझे बुरी तरह से पराजित कर दिया। ऐसा लगता है कि आज सरस्वती देवी मुझपर असन्तुष्ट हैं। उन्हीं के प्रभाव से आज मेरी यह दुर्दशा हुई है इसका कारण है कि जिस प्रकार इस निमाइ पण्डित ने मेरे श्लोकमें गुण एवं दोष दिखाये है, उससे लगता है कि आज इसकी जिह्वा पर सरस्वती देवी स्वयं विराजमान होकर बोल रही हैं। इस प्रकार बहुत विचार करने के बाद पण्डित श्रीगौरसुन्दर से बोला– “हे निमाइ पण्डित! तुमने जिस प्रकारसे मेरे श्लोकमें दोष एवं गुणों को दिखाया है, उससे मैं बहुत आश्चर्यचकित हूँ। अतः तुम मुझे बताओ कि जब तुमने अलङ्कार शास्त्र पढ़ा ही नहीं, तब किस प्रकार तुमने श्लोकमें विद्यमान गुण एवं दोषोंको जान लिया।”
प्रभु उसके मनकी बातोंको जानकर हँसते हुए बोले – “मैं शास्त्रों का अच्छा-बुरा विचार नहीं जानता। मेरे मुखसे सरस्वती जैसा बुलवाती है, मेरी जिह्वा वैसा ही बोलती है।”
यह सुनकर दिग्विजयी पण्डित ने निश्चय कर लिया कि आज
अवश्य ही देवी ने इस साधारण बालक के माध्यमसे मुझे पराजित करवा दिया। वह घर जाकर देवी की पूजाकर एवं मन्त्र जपकर सो गया। रात्रिमें देवी ने उस भाग्यवान पण्डित को दर्शन दिया और बोलीं– “पण्डित! आज तुम्हारी जिससे पराजय हुई है, वे साधारण मनुष्य नहीं, अपितु अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के नाथ हैं। मैं उनके श्रीचरणकमलों की दासी हूँ तथा उनके सम्मुख खड़े होनेमें भी मुझे लज्जा आती है।”
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया।
विमोहिताः विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः॥
–(श्रीमद्भागवतम् ५/५/१३)
अर्थात् महामाया जीवों को मोहित करती है। उसका यह कार्य भगवान्‌ को अरुचिकर होने के कारण वह स्वयं को दोषी मानकर लज्जा के कारण भगवान्‌ के सामने नहीं आ पाती। जिनकी माया से विमोहित होने के कारण अविद्याग्रस्त जीव 'मैं' और 'मेरा' का अभिमान करते हैं, उन भगवान् वासुदेव को नमस्कार है।
“अतः हे विप्र! जब भी तुम शास्त्रार्थ करते हो, उस समय मैं
तुम्हारी जिह्वा पर विराजमान होकर बोलती हूँ। परन्तु अपने प्रभु के सामने मेरा वश नहीं चलता। मेरी तो बात ही क्या है, स्वयं भगवान् अनन्तदेव अपने अनन्त मुखों से प्रभु का गुणगान करते हैं । वेद जिनका (अनन्तदेव का) गुणगान करते हैं और ब्रह्मा, शिव आदि जिनकी उपासना करते हैं, ऐसे अनन्त देव भी उनके सामने मोहित हो जाते हैं। जिनकी इच्छा से ही सृष्टि और प्रलय होती है, वे प्रभु ही इस कलियुगमें ब्राह्मण के रूप में लीलाएँ कर रहे हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह आदि असंख्य अवतार हैं, उन सबके मूल ये ही हैं। द्वापरयुगमें जिन्हें नन्दनन्दन नाम से जाना जाता है, वे ही अभी शचीनन्दन के रूपमें प्रकटित हैं। अतः हे विप्र! तुमने जो मेरी सेवा पूजा की है मान, पूजा, प्रतिष्ठा आदि को प्राप्त करना उसका मुख्य फल नहीं है। उसका मुख्य फल तो यही है कि तुम्हें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के नाथ का दर्शन हो गया। अतः तुम शीघ्र जाकर उनके श्रीचरणों का आश्रय ग्रहण करो। तुम इसे मात्र स्वप्न मत समझना। मैं तुमपर सन्तुष्ट हूँ, इसीलिए मैंने ये गोपनीय बातें तुमसे कहीं हैं। परन्तु सावधान! ये बातें किसीके सामने प्रकट मत करना । अन्यथा तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी ।” ऐसा कहकर देवी अन्तर्द्धान हो गयीं। प्रातःकाल उठते ही वह भाग्यशाली पण्डित प्रभु के निकट गया और प्रभु का दर्शन करते ही उन्हें साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया। प्रभु भी उसे प्रेम से उठाकर आलिङ्गन करते हुए बोले “हे पण्डितप्रवर! यह आप क्या कर रहे हैं?”
विप्र– “मैं आपकी कृपादृष्टि चाहता हूँ।”
प्रभु– “आप एक दिग्विजयी पण्डित होकर भी ऐसी बातें कर मुझे लज्जित क्यों कर रहे हैं?”
विप्र– “हे प्रभो! आपकी कृपा से ही समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। इस कलियुगमें ब्राह्मण रूपमें आप साक्षात् श्रीकृष्ण हैं। परन्तु आपकी कृपाके बिना आपको कौन पहचान सकता है? कल आपके सामने जब मेरी जिह्वा स्तब्ध हो गयी थी, तभी मुझे सन्देह हो गया था कि आप साधारण मनुष्य नहीं हैं। तीन बार मैं आपसे पराजित हुआ, परन्तु फिर भी आपने अपनी मीठी-मीठी बातों से मेरा सम्मान ही किया, जो एक साधारण व्यक्ति के लिए असम्भव है। अतः मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि आप साक्षात् श्रीकृष्ण हैं। मेरे कोटि-कोटि जन्मों के पुण्यों का ही फल है कि मैं नवद्वीप में आया तथा मैंने आपका दर्शन प्राप्त किया। मैं अज्ञान से अन्धा होकर अभिमान में चूर होकर सर्वत्र सबको पराजित कर उनसे प्रतिष्ठा प्राप्त करने में ही लगा हुआ था तथा इसी को अपने जीवन का उद्देश्य मान बैठा था। परन्तु आज आपकी कृपासे मेरी आँखें खुल गयीं। लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा, धन-सम्पत्ति ये सभी वस्तुएँ इसी जगत्में रह जाती हैं। इनसे आत्मा का लेशमात्र भी कल्याण सम्भव नहीं है। अतः हे प्रभो! आप मुझे उपदेश प्रदान करें जिससे कि मेरे हृदय की समस्त प्रकार की दुर्वासनाएँ नष्ट हो जाएँ तथा निष्कपट हृदय से मैं आपकी सेवा कर सकूँ।”
पण्डितकी दीनता देखकर प्रभु प्रसन्न होकर हँसते-हँसते
बोले– “विप्र! आप धन्य हैं कि सरस्वती आपकी जिह्वापर विराजमान रहती हैं। परन्तु दिग्विजय करना विद्या का कार्य नहीं है, बल्कि ईश्वर का भजन करना ही विद्या का कार्य है। आप जरा विचार तो कीजिये कि पूर्व पूर्व महाजनों ने मान-सम्मान, धन सम्पत्ति, पुत्र परिवार सब कुछ परित्याग कर एकान्त भाव से भगवान् का भजन किया है। इसलिए आप भी इस अनित्य संसार को त्यागकर जब तक शरीरमें प्राण हैं, भगवान्‌ की सेवा करें।” ऐसा कहकर प्रभु ने आनन्दपूर्वक उसे गले से लगा लिया। अब वह दाम्भिक दिग्विजयी पण्डित नहीं, अपितु तृण से सुनीच एक दीन-हीन वैष्णव हो गया।