Kash... Pahle Bata Dete books and stories free download online pdf in Hindi

काश…. पहले बता देते !

काव्या का पंखे से लटका हुआ देह मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा था. ये किस्मत का कैसा खेल है? कौन कहां पर गलत है ? पुलिस को मिले सुसाइड नोट में स्पष्ट शब्दों में लिखा था. महीप उसके बच्चे का बाप नहीं है. वह उसे भाई मानती थी. उसे राखी बांधती थी. पर कहीं पर भी उसने बच्चे के असली पिता का जिक्र तक नहीं किया था. अपनी मृत्यु के लिए उसने किसी को भी दोष न देते हुए लिखा था,

‘मैं अपनी मर्जी से जान दे रही हूं. मेरी मौत के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है, मैं स्वयं ही जिम्मेदार हूं. द‍ीपाक्षी, ये खास तुम्हारे लिये लिख रही हूं… मेरे बेटा का पिता महीप नहीं है. लेकिन मैं चाहती हूं की मेरे मरने के बाद तुम और महीप उसे कानूनन गोद ले लो. उसके माता-पिता बन जाओं. उसके पैदा होने में उसका कोई दोष नहीं है. दरअसल, मेरा नसीब ही ऐसा है, पहले भाई को खोया, फिर पति को और इतना दुख मेरे लिए कम नहीं था जो मेरे ससुराल और मयके वालों ने मुझे ही घर से निकाल दिया. ऐसे में अपनी इस दुखियारी बहन का सहारा बनकर महीप ने ही छोटे भाई का फर्ज निभाया है. दीपाक्षी महीप मेरा छोटा भाई है. सगे भाई से भी बढ़कर, उसने हमेशा मेरा साथ दिया. मैं उसे जो राखी बांधती थी. उस राखी की उसने लाज रखी है. मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से अब उस पर कोई मुसीबत आये. उसका कोई नुकसान हो. अत: सारी मुसीबत की जड़ मैं खुद को खत्म कर रही हूं. ताकि मेरा मनहूस साया किसी और को कोई नुकसान ना पहुंचाये. प्लीज मेरे बेटे का ध्यान रखना…’  

                                                                                                                 अभागी

                                                                                                                  काव्या

            पत्र पढ़कर मेरे आंसू नहीं रूक रहे थे. बच्चे के रोने की आवाज मेरे कानों में पड़ रही थी. पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं उसे अपनी गोद में उठाऊ. महीप बच्चे को शांत करने में लगा हुआ था और मैं…. मैं सोच के गहरे सागर डूबती चली गई.

            महीप और मेरी शादी बड़े धूमधाम से हुई. हम दोनों के घर वालो ने अपनी सारी हसरतें पूरी कर ली थी. लेकिन महीप और मेरा चेहरा मुरझाया हुआ था. मैं इस शादी से खुश नहीं थी, शायद महीप भी उसकी मर्जी के बिना ये शादी कर रहे थे. हम दूल्हा-दुल्हन बनकर यंत्रवत सारे रीतिरिवाज निभा रहे थे. महीप की चचेरी, ममेरी बहनों और अन्य लड़कियों ने मुझे सुहाग सेज पर लाकर बिठा दिया था और मुझे छेड़े जा रही थी. लेकिन मुझे इसमें जरा भी रस नहीं आ रहा था. महीप कमरे में आये तो सभी लड़कियां उसे छेड़ते हुये कमरे से बाहर चली गई और दरवाजा बंद कर दिया. मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था. अब ये मेरे साथ क्या करेंगे… मैं कैसे इन्हें अपने पास आने दूं… मेरे मन में तो कोई और है. नहीं…. नहीं… मैं इन्हें खुद को छूने भी नहीं दूंगी. मेरा तन और मन दोनों सरल के लिए है.

            सरल, मेरा सबकुछ, मेरा प्यार, मेरी जिन्दगी है. जब मैं नौंवी में पड़ती थी तभी से उससे प्यार करती हूं. वह उस समय जूनियर कॉलेज में पड़ता था और क्या बाइक चलाता था…. बाइक इतनी झुका लेता कि लगता वह अभी गिर जायेगा, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं और फिर उसकी वह सिगरेट पीने की स्टाईल हवा में धुएं के वे छल्ले. सब मेरी आंखों के आगे नजर आने लगे थे.

सरल मेरी स्कूल के आगे आकर खड़ा हो जाता और मुझे देखते रहता था. मुझे भी उसे देखना अच्छा लगता था. जिस दिन मैं उसे देखकर हलके से मुस्कुराई थी उस दिन तो वह एकदम मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और … “आय लव यु दीपाक्षी” मैं सन्न रह गई, डर गई और नजरें चुराते हुए वहां से तेज कदमों से चलते हुए अपने घर पहुंची. उसकी आवाज अब भी मेरे कानों में गूंज रहीं थी. पूरी रात करवटे बदलते हुए गुजरी. सोच रहीं थी कि कब दिन निकलेगा और मैं उसे देखूंगी उसके ‘आय लव यु’ का जवाब ‘आय लव यु टू’ कहकर दूंगी. रात काफी लंबी लगने लगी थी.

            सरल, दूसरे दिन फिर वहीं खड़ा दिखा. मैं स्कूल के गेट से बाहर आयी और उसे देखते हुए फिर हलके से मुस्कुराई. मेरी आंखों की चमक ने उसे वह सब कह दिया था जो मैं कहना चाहती थी. वह फिर मेरे सामने आकर खड़ा हो गया. “कल तुमने जवाब नहीं दिया” अब मैं उसके सामने रूकी रहीं. क्योंकि आज मैं तैयार थी उससे बात करने के लिए. कल जो भी हुआ था वह अचानक था. “कल तुमने मुझे डरा दिया था”

            “अच्छा तो तुम्हें डर भी लगता है, तुम्हारी मुस्कान तो ऐसी थी की तुम खुद चाहती थी मैं तुमने बात करू इसीलिए मैंने हिम्मत की”

            “तुम मुझे अच्छे लगते हो, मैं भी तुम्हें चाहती हूं” मैंने अपने दिल में जो था वह सीधे सीधे उसे बता दिया. हम छुप छुप कर मिलने लगे. घरवालों से झूठ बोलना सिख गई थी. एक्स्ट्रा क्लास है, सहेली के घर गई थी, आज टीचर ने रोक लिया था. समय पर जो भी बहाना सूझे वह बताने लगी. घरवालों का मुझ पर पूरा विश्वास था. वे सोच भी नहीं सकते थे कि मैं किसी से प्यार करती हूं और उससे गार्डन में और कॅफे में मिलती हूं. चार सालों तक हम अपने घरवालों से अपने प्यार की बात छुपाने में कामयाब रहे. वह मेरा ग्रॅज्युएशन का प्रथम वर्ष था. मैंने घर में बताया की मैं अपने कॉलेज के सहेलियों के साथ पिकनिक पर जा रहीं हूं और सरल के साथ उसकी बाइक पर हम शहर से दूर एक तलाब के किनारे गये. वहां झाड़ियों की ओट में हम घंटों बैठे रहे. लेकिन तभी वहां पर किसी संगठन के कार्यकर्ता आये और उन्होंने हमे एक दूसरे से लिपटे हुए देखकर खूब फटकारा. सरल की तो पिटाई भी कर दी. हमसे हमारे फोन लेकर हमारे घरवालों को हमारी तस्वीरे भेज दी और उन्हें फोन लगाकर बोले,

“अपने बच्चों की ये करतूतें देखों. बच्चे संभाल नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो. ये खुले में अश्लीलता फैला रहे है. जरा भी ध्यान नहीं है हमारी सभ्याता और संस्कृति का. इनकी नकेल कसो. काबू में रखो”

मैं अपने मम्मी-पप्पा के सामने शर्मिंदा होकर गर्दन झुकाए खड़ी थी. पापा ने फरमान सुनाया की आज के बाद से मैं कॉलेज नहीं जा सकती. लेकिन मम्मी ने बात को संभाला और पापा को समझाया की आगे से यह ऐसा कभी नहीं करेंगी. मैं खुद इस पर नजर रखूंगी. पढ़ाई बंद मत कीजिए. पापा मान गये. मां ने मुझे धीरे से पूछा, “तुमने हद तो पार नहीं की ना”

“नहीं मम्मी, मैंने कभी उसे ज्यादा आगे बढ़ने नहीं दिया.” बात सच भी थी इस बार झूठ नहीं बोला था. मम्मी को यह न बता सकी की, चूमने और बाहों में लेने तक मैंने सरल को कभी मनाई भी नहीं की थी. पर कभी उसे अपने कपडों के अंदर झांकने तक नहीं दिया था. मम्मी का फिर सवाल आया, “कब से चल रहा था ये सब”

“चा… चार सालों से”

“बापरे…! और हमें अब पता चल रहा है”

“सुनो.. दीपाक्षी…. दीपाक्षी…..” ऐसा लगा मानो कोई दूर से मुझे पुकार रहा हो. मेरी तंद्रा टूटी. सामने महीप मुझे पुकार रहे थे. “क्या बात है.. तबीयत तो ठीक है ना”

“अं… हां… हां ! मैं ठीक हूं.” मुझे लगा वे अभी मेरे एकदम समीप बैठेंगे. मैंने अपने जिस्म को थोड़ा और समेट लिया. वे बैठे लेकिन मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर. मैं उन्हें कनखियों से देख रही थी. वे मुझसे नजर भी नहीं मिला रहे थे. लग रहा था कुछ सोच रहे है. आखिर मैंने ही चुप्पी तोड़ी, “मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं”

“हं… बोलो”

“दरअसल, मैं ये शादी करना ही नहीं चाहती थी. मम्मी पापा ने मुझे इस शादी के लिए मजबूर किया है. मैं…..”

थोड़ी देर के लिए मैं रूकी, उनकी प्रतिक्रिया देखना चाहती थी. पर वे शांत उसी तरह बैठे रहे, निर्विकार भाव से. मैं सोचने लगी उन्हें सब सच बताऊ या नहीं. लेकिन मुझे मेरी मर्जी से जिना है तो सच बताना ही पड़ेगा. मैंने बोलना सुरू किया, “मैं किसी और से प्यार करती हूं” वे शांत और निश्चल रहे, उनके चेहरे पर कोई भाव प्रकट ही नहीं हुये. किस मिट्टी का बना है ये आदमी पहली ही रात एक पत्नी अपने पति से कहे की वह किसी और से प्यार करती है तो उस पती का गुस्से से तिलमिलाना बनता है. पर इन पर कोई असर ही नहीं हुआ. क्या ये भी किसी और को चाहते है. मैंने अपनी बात आगे जारी रखी,

“उसका नाम सरल है, तीन साल पहले मम्मी पापा को हमारे प्यार के बारे में पता चला मैं फर्स्ट इयर में थी. पापा मेरी पढ़ाई बंद करना चाहते थे. लेकिन किसी तरह मां ने उन्हें मना लिया और मैंने अपनी ग्रॅज्युएशन पूरी की. हमारे पकड़े जाने के बाद कुछ दिनों तक तो मैं सरल से मिली नहीं पर मेरा कही मन नहीं लगता था. दो महिनों बाद चोरी छिपे हम फिर मिलने लगे. मैं अपने फोन से उससे कभी बात नहीं करती और ना ही चॅट करती थी. मैं मेरी सहेली सावरी के फोन से उससे बात करती थी. एक साल तक हमारी ऐसी ही रिलेशनशिप चली. उसके बाद उसका सिलेक्शन अग्निवीर के लिए हो गया और वह फौज में भर्ती होने के लिए लेह चला गया. कभी कभार वह खुद मुझसे फोन पर बात करता है. मैं उसे कॉल नहीं कर सकती. उसने बताया कि अभी उसे और दो साल वहीं पर रहना है. मैं तुम्हारे साथ दो सालों तक पत्नी बनकर रहूंगी लेकिन तुम्हें पत्नी का सुख नहीं दे सकती. मेरा तन और मन दोनों सरल के लिए है.”

“ठीक है” बस इतना कहकर वे उठ खड़े हुये और बेड पर से तकिया और कंबल उठाया. कंबल नीचे फर्श पर बिछा कर उसी पर लेट गये. मैं अवाक् उन्हें देखती ही रही. कैसा आदमी है ये. इन्हें गुस्सा क्यों नहीं आया ? ये मुझ पर चिढ़े क्यों नहीं ? तमतमाते हुऐ कमरे से बाहर नहीं निकले. उनका वह शांत स्वभाव मेरे दिल को छू गया. पर मुझ पर तो सरल का नशा कुछ ज्यादा ही हावी था. उस नशे में मुझे सारे ही लोग बुरे नजर आते थे.

समय बितता गया. बेडरूम में हम साथ जाते पर वे निचे फर्श पर अपना बिस्तर बिछाते और सो जाते. हममें ज्यादा बातें नही होती थी. मैं नौकरी के लिए आवेदन कर रही थी और मुझे एक बैंक में क्लर्क की नौकरी मिल गई. लेकिन मेरी पोस्टिंग एक छोटे कस्बे में हुई. मैं खुश थी कि अब मुझे इस जमघट में रहकर पति-पत्नी वाला नाटक नहीं करना होगा. एक बेडरूम मे सोने से बच जायेगे. लेकिन घरवालों के लिए और समाज के लिए तो हम पति-पत्नी ही थे. हम दोनों के अलग अलग शहर में रहने को लेकर महीप के घरवालों में और मेरे मयके में भी बहस छिड़ गई. आखिर यह तय हुआ कि महीप पति-पत्नी एकत्रीकरण के प्रावधान के तहत जहां मेरी पोस्टिंग हुई है वहीं पर अपना तबादला करवा ले.

दो महिने बाद ही महीप अपनी पोस्टिंग करवा कर उस छोटे-से कस्बे में आ गये जहां पहले से ही मैंने एक अपार्टमेंट में टू बेडरूम किचन वाला फ्लैट किराये से ले रखा था. एक बेडरूम में हमने डबल बेड और दोनों के कपडों की अलमारी रख ली थी ताकि हमारे घर से कोई आए तो उन्हें यह न लगे की हम अलग-अलग बेडरूम में सोते है. मुझे अपने मनमर्जी से जिने की पूरी आजादी थी. वे अपनी जिन्दगी जी रहे थे. घर के कामों मे मेरी मदत भी कर देते. कभी वे खाना बनाते तो कभी मैं. यहां तक की वे बर्तन मांजना और झाडू पोछा तक कर लेते थे. मुझे कभी घर आने में देर हो जाती तो फोन करके बस इतना ही पूछते थे कि, ‘कब तक आओगी’ यह कभी नहीं पूछा की देर क्यों हो रही है, मेरे देर से आने का कारण आज तक उन्होंने नहीं पूछा था.

वे मेरा पूरा-पूरा ख्याल रखते, कभी बिमार हो गई तो डॉक्टर के पास ले जाना, दवाई खिलाना और सुश्रुषा करने में उन्होंने कोई कोताही नहीं बरती. लेकित बात बहुत कम करते. उनके इस स्वभाव ने मेरा मन मोह लिया था. लगता काश यदि मैं सरल से प्यार नहीं करती तो ये मेरे लिए कितने ‘परफेक्ट’ पति थे. अगले जन्म के लिए उन्हें बुक करा लू ऐसा कई बार मेरे दिल में आया. मन यह भी चाहने लगा की ऐसा ही स्वभाव सरल का हो. वो भी इसी तरह मेरी कदर करे, मुझे अपनी पलकों पे बिठाके रखे. लेकिन सपने तो नींद खुलने पर टूटते ही है.

दिन, सप्ताह, महिने गुरजते रहे, एक साल कैसे बित गया पता ही नहीं चला. इतवार का दिन था हम दोनों ही घर पर थे. आज वे खाना बना रहे थे. अचानक डोर बेल बजी, मैंने ही उठकर दरवाजा खोला, सामने सरल दरवाजे पर खडा था. उसे देखकर मेरी आंखों की चमक बढ़ गई. शरीर उत्साह से थरथराने लगा और बिना सोचे समझे मैं उससे लिपट गई. उसने भी कसकर मुझे अपनी बाहों में भिंच लिया. हम दोनों के चेहरे एकदम पास-पास थे. एकदूसरे की आंखों  में आंखें डालकर हम खो गये. होठ होठों के करीब आने लगे. आगे कुछ और होता तभी महीप की आवाज कानों से टकराई, “कौन है…. दीपाक्षी !” हम दोनों को होश आया. एक दूसरे से अलग हुए. थोड़ा झेंपते हुए ही, “ … ये… ये….” मेरी बात पूरी होने से पूर्व ही महीप बोले, “ओह ! तो लगता है ये ही तुम्हारे सरल है”

दोनों ने हाथ मिलाया. पहले तो सरल ने बताया उसकी अग्निवीर वाली नोकरी का बॉन्ड खत्म हो गया है और अभी फिलहाल बेरोजगार है. नौकरी की तलाश में ही इस शहर आया है. यहां किसी होटल में रूकने की जगह वह सीधे यहां चला आया. उसने कोई गलती तो नहीं की. उसकी बात सुनकर हम दोनों एक दूसरे के चेहरे देखने लगे. हमारे बिच खामोशी छा गई.

लेकिन जैसे ही महिप ने कहा वह एक रात क्या सप्ताह पंद्रह दिन रूक सकता है.. उसे कोई एतराज नहीं. महीप की इस बात से  मैं आश्वस्त हुई. मुझे इसी बात का डर लग रहा था कि, महीप सरल के रूकने पर नाराज ना हो जाये. मेरी तो इच्छा थी की सरल यही रूके. मेहमानों के लिए यहा कोई अलग कमरा नहीं था. अत: महीप सरल के साथ अपना कमरा शेअर करने के लिए तैयार हुए. तत्पश्चात इधर उधर की बातें करते रहे. रात का खाना खाकर तय नुसार हम अपने बेडरूम में चले गये.

रात तकरीबन दो बजे होंगे मेरे मोबाईल की रिंग बज उठी इतनी रात कौन कॉल कर रहा है, मन ही मन उसे गालियां देते हुए मोबाईल देखा तो वह कॉल सरल का था. यह जानने के लिए बगल के ही कमरे में रहते हुए सरल फोन कैसे कर रहा है, मैं फोन हाथ में लेकर दरवाजे के पास पहुंची और दरवाजा खोला तो देखा सरल सामने ही खडा था. वह जल्दी से अंदर आ गया और दरवाजा बंद कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और “अब जुदाई बर्दाश्त नहीं होती” कहते हुए मुझे चूमने की कोशिश करने लगा. मैं कसमसाई. रात खाना खाते वक्त उसने अपनी जेब से देसी ठर्रे की बोतल निकाली थी और महीप के साथ शेयर करके पिना चाहता था पर महीप ने मना किया तो उसने अकेले ही वह बोतल खाली कर दी थी. उसके मुंह से निकला हुआ शराब की बदबू मेरे नथूनों में समा गई मुझे मतली सी आने लगी.

उससे खुद को छुड़ाने के लिए मैंने कहा, “महीप जाग गये और उन्होंने देख लिया तो क्या सोचेगे” वह बोला “अरे वह तो जबरदस्त खर्राटे मार रहा है. दोपहर में देखा नहीं उसने हमें बाहों में देखकर भी अनदेखा वह हमारे रिश्ते के बारें में सब जानता है. उसे क्या फर्क पड़ेगा ?” मैं उसकी मजबुत पकड में छटपटा रहीं थी. उसके शराब की बदबू मुझे सही नही जा रही थी. अपनी पूरी ताकत से उससे अपने आप को छुडाते हुये बोली,

“उसे नहीं… फर्क मुझे पड़ेगा, उसकी पत्नी होते हुए भी आज तक उसने मुझे छुआ नहीं है और तुम अपनी हद पार कर रहे हो, मैं अभी तुम्हारी पत्नी नहीं हूं जब बन जाऊंगी तब ये सब…”

“अरे मेरी जान इतने दिनों से तडप रहा हूं. तुम मुझे और तड़पाना चाहती हो.”

“हां ऐसा ही समझ लो… पहले मैं अपने डिवोर्स के पेपर रेडी करती हूं. महीप से तलाक लेती हूं फिर हम शादी कर लेंगे उसके बाद जितनी मर्जी चलानी है चला लेना. मैं रोकूंगी नहीं. पर अभी नहीं… छोडों.. छोड दो” कहते हुए मैंने उससे अपने आप को छुडाया और उसे धक्का देते हुए कमरे से बाहर किया. तभी हम दोनों की नजर बगल के बेडरूम के दरवाजे पर खड़े महीप पर पड़ी. मैं अपने आप को शर्मसार महसूस करने लगी. मानों मैंने कोई बहुत बड़ी चोरी की हो. सरल बेशर्मों की तरह चलता हुआ महीप के समिप पहुंचा और दोनों अंदर चले गये. सरल की हरकत ने मुझे सोचने पर मजबुर किया कि क्या वाईक उसे यहां रूकने देना चाहिए. नहीं… नहीं… हम महीप के अच्छे और शांत स्वभाव का फायदा नहीं उठा सकते.

दूसरे दिन महीप काम पर चले जाने के बाद मैंने सरल से अपने घर से चले जाने को कहा तो वह मुझसे उल्‍टी-सीधी बातें करने लगा. तब मैं बोली, “मुझे लगता है हम महीप के सीधे-साधे स्वभाव का गलत फायदा उठा रहे है. वह मुझे तलाक देने के लिए राजी है लेकिन जब तक तलाक नहीं दे देते तब तक मैं उनकी पत्नी हूं और मुझे वैसे ही रहना चाहिए जैसे एक पत्नी रहती है” मेरी इस बात से नाराज होते हुए सरल बोला,

“जान… तुम तो सती सावित्री की तरह बात कर रही हो. कही तुम्हें उससे प्यार तो नहीं हो गया. या फिर अब तुम मुझसे पहले उसे चखना चाहती हो.” सरल की बात सुनकर मैं दंग रह गई. कितने घटिया और नीच विचार थे उसके.

“सरल… लगता है रात की उतरी नहीं… कैसी बातें कर रहे हो. उन्होंने आज तक मुझे छुआ तक नहीं”

“अरे हां… साले ने ये तीन साल कुछ नहीं किया तो अभी क्या करेंगा. रात को हमें एक कमरे से निकलता देखकर भी कुछ बोला नहीं. मुझे तो लगता है साला नामर्द है, उसकी पत्नी किसी के भी साथ सोये उसे कोई फर्क नहीं पडता”

सरल की इस बात ने मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था. अपने आप ही मेरा हाथ उठा जो तड़ाक की आवाज के साथ सरल के गाल से टकराया. सरल अपने गाल को सहलाते हुय मेरी तरफ गुस्से से देख रहा था. मैं चीख पड़ी, “निकल .. अभी निकल इस घर से” वह बिना कुछ कहे गुस्से से तमतमाते हुये मेरे घर से निकल गया.

यह कैसे हुआ ? मुझे महीप को नामर्द कहने पर इतना गुस्सा क्यों आया ? क्या सचमुच मैं महीप से प्यार करने लगी थी ? जिससे मैं सात-आठ सालों से प्यार कर रही थी, जिसका इतने सालों तक इंतजार किया उस पर मैंने हाथ उठा दिया था. और… और क्या ये वही सरल था. जो मुझे अच्छा लगता था. या फिर सच में वह मेरी नादानी थी. उसकी हिम्मत और दिलेरी ने मुझे आकर्षित किया था. लेकिन यह हिम्मत और दिलेरी किस काम की. वह तो किसी की इज्जत नहीं करता, कद्र नहीं करता दूसरों की भावनाओं से उसे कोई सरोकार नहीं. बस उसे अपने मजे की पड़ी है. रात अगर उसे रोका नहीं होता तो वह सारी हदे पार कर जाता.

शाम को जब महीप घर आये तो उन्होंने पूछा कि सरल कहा है. मैं बोली, “वह चला गया है उसका इस शहर में काम खत्म हो गया. अब नहीं आयेगा.”

“ठीक है, मैंने तलाक के पेपर बनवा लिये है. साईन भी कर दिये है, तुम भी साईन कर दो, कल मैं वकिल को देकर कोर्ट में जमा करवा दूंगा, तीन या चार महिनों में हमारा तलाक हो जायेगा.”

महीप की यह बात सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा. लगा जैसे मुझसे ज्यादा जल्दी महीप को है तलाक की. उन्होंने रात जो देखा उससे वे आहत हो गये है. बोल नहीं रहे पर अंदर ही अंदर शायद टूट गये है. अपनी आंखों के सामने ऐसे नजारे और ना देखना पडे इसलिये ये जल्दी…..

जो मैं कर रहीं हूं वह सही है या गलत मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था. मुझे लगा सुबह नाश्ते की टेबल पर जो हुआ वह महीप को बता देती हूं शायद उसी से कुछ रास्ता निकल आये, मेरी दुविधा दूर हो सकती है. यही सोचकर मैंने रात का खाना खाते खाते महीप को सब बता दिया.

महीप बोले, “यह तुमने ठीक नहीं किया, उसे नाराज नहीं करना चाहिए था. मैं तो पहले से ही जानता हूं कि तुम मेरे पास एक अमानत की तरह हो. तुम मुझसे नहीं, सरल से प्यार करती हो और एक दिन तुम्हें सरल के पास ही जाना है. इस सच्चाई से मैं कभी भागा नही. देखो अब जब तुम मंजील के इतने करीब आ गई हो तो अपने कदम पीछे मत लो, आगे बढो. उसे फोन करो, माफी मांगो और बता तो की बस अब तीन चार महिनों की बात है. कोर्ट से ऑर्डर मिलते ही तलाक हो जायेगा.”

महीप…. महीप तुम किस मिट्टी के बने हो, ऐसा कैसे सोच सकते हो. मैं तुम्हारी पत्नी हूं, मुझ पर गुस्सा करो. चिल्लाओं, डाटो, मेरे चरित्र पर लांछन लगाओ. ऐसी कई बातें उस क्षण मेरे मन में आई. मुझे खुद पर ही गुस्सा आ रहा था. पर महीप शांत थे. रात भर मैं सोचती रहीं. निंद ने आंखों से तलाक ले लिया था. जिसके इंतजार में मैंने महीप को अपने करीब नहीं आने दिया आज जब वह दिन आया है तो मैं डगमगा क्यों रहीं हूं महीप सच कहते है, मैंने अपने कदम पीछे नहीं लेने चाहिए. आगे बढ़ना ही जिन्दगी है. जो होगा देखा जायेगा.

सुबह सबसे पहले मैंने सरल को कॉल किया लेकिन वह मेरा फोन उठा ही नहीं रहा था. जिस तरह उसे घर से निकाला था उससे वह कुछ ज्यादा ही नाराज हो गया था. मैं कॉल लगाती रही वह कट करता रहा. आखिर मैंने उस तक बात पहुंचाने के लिए अपनी सहेली सावरी को फोन किया. सावरी से फोन पर बात करने के बाद तो मै ऐसे सकते में आई मानों मुझ पर एक नहीं कई बिजलियां गिरी हो. सरल, सिर्फ नाम से ही सरल था अन्यथा वह तो…. सावरी ने बताया, “उसने शादी कर ली है और एक बच्चे का बाप भी है.” यह सुनते ही मेरे मुंह से निकला, “क्या ….! यह कैसे हो सकता है वह तो फौज में था”

“फौज की नौकरी तो दो-ढाई साल ही की उसने, उसका तो कोर्ट मार्शल हुआ है” एक एक नई बात मुझे पता चल रही थी. मैंने सावरी से कहा, “ये क्या बता रही है, मुझे शुरू से पूरी बात बता” तब उसने जो बताया वह ये था कि, सरल की फौज की ट्रेनिंग लेह में हो रही थी. ज्यादा थंड होने के कारण सभी जवान खुद को गर्म रखने के लिए रम या किसी अन्य शराब का सहारा लेते थे. उनके ट्रेनिंग सेंटर के पास ही एक छोटा सा गांव था जहां के लोग अलाव के लिए लकडियां चुनने उनके सेंटर तक आते थे. एक शाम दो लडकियां लकड़ी चुनते हुये इनके सेंटर तक पहुंची थी. सरल और उसके साथ तीन लोग और शराब पी रहे थे. उन्होंने उन लडकियों को दबोच लिया और चारों ने उनके साथ जबरदस्ती की. जिसकी कम्पलेंट बाद में गांव वालों ने उनके यूनिट से की तो उन चारों का कोर्ट मार्शल कर उन्हें फौज से निकाल दिया गया और गिरफ्तार कर जेल में डाला गया.

लेकिन, सरल जमानत पर लेकर वहीं पर रुका रहा. वह उस गांव पहुंचा और लडकी के परिवार वालों से मिला उनके हाथ पाव जोडे, माफी मांगी और कहां की वे लोग अपनी शिकायत वापस ले ले या कम से कम उसका नाम शिकायत में से हटा दे. तब एक लडकी के परिवार वाले मान गये, उन्होंने शर्त रखी की उनकी लडकी से उसे शादी करनी होगी. सरल ने उस लडकी से शादी कर ली और वही रहकर दूसरी लडकी के परिजनों को शिकायत वापस लेने के लिए मनाता रहा.

दूसरी लडकी नाबालिग थी और उसके साथ ज्यादा ही दुर्व्यवहार हुआ था. अत: वे लोग माने नहीं. केस बंद कराने के चक्कर में उसका साल वही पर बित गया. उस लडकी ने एक बच्चे को जन्म दिया. तब दूसरी लडकी ने भी अपनी शिकायत में से सरल का नाम कटवा दिया. जिससे सरल जेल जाने से तो बच गया लेकिन घटना के वक्त वह वहां मौजूद था इसलिए उसे फौज से निष्कासित कर दिया गया. उसका रेकार्ड अच्छा ना होने की वजह से अब उसे कही नौकरी भी नहीं मिल रही है. वह खूब शराब पीता है और अपनी पत्नी को रोज मारता है और अपनी बर्बादी के लिए उसे ही दोष देता है.

सरल की हकीकत जानकर मुझे अपने आप से घृणा होने लगी कि मैं कैसे ऐसे घृणित इंसान से प्यार कर बैठी. शायद वह मेरी नादानी और कम उम्र की सोच थी. लेकिन अब मैं विचारों से परिपक्व हो गई हूं. अपना भला-बुरा समझ सकती हूं भविष्य के बारे में सोच सकती हूं. मुझे सरल के साथ अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा था जबकि महीप सच्चे हमदम, हमसफर की तरह नजर आ रहे थे. मैंने फैसला कर लिया कि मैं तलाक के पेपर पर हस्ताक्षर नहीं करूंगी. अब मैं कभी भी महीप का साथ नहीं छोडूंगी.

महीप को जैसे ही यह बात बताई. महीप का चेहरा लटक गया. पहली बार उनके चेहरे पर परेशानी के भाव देख रही थी. उनकी बैचेनी देख रही थी. वे मुझे तलाकनामे पर हस्ताक्षर करने के लिए मनाने लगे. खुद से दूर रहने के लिए मुझे कन्वींस करने लगे. अपने तबादले की बात की, मुझे आजाद जिन्दगी का पाठ पढ़ाने लगे. महीप का यह व्यवहार मेरी समझ से परे था.

उनके इस रवैये पर मैंने सवाल करने शुरू कर दिये. तो वे बगले झांकने लगे. मैं‍ किसी भी किंमत पर उनसे अलग नहीं रहना चाहती थी. अत: मैं भी अपनी जिद्द पे अडी रही. आखिर मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उनसे पूछा,  “क्यों… ? तुम्हारी लाईफ में कोई और है ?” मेरे इस प्रश्न पर महीप कुछ देर तक तो खामोश रहे. फिर उन्होंने बताया कि वे एक लडकी से प्यार करते है. अत: वे मुझे पति का सुख नहीं दे सकते. इस पर मैंने अगला सवाल किया, “तो क्या वह लडकी तुम्हारा इंतजार कर रही है”

महीप ने कहा “नहीं.. वह मेरा इंतजार नहीं कर रही. उसकी शादी हो चुकी है और वह अपने पति के साथ खुश है” तब मैं बोली, “ऐसी बात है तो सारा मामला ही सुलझ गया है”

मेरी इस बात पर पहले तो उन्हें कुछ सुझा नहीं  लेकिन बाद मुझे अपने किसी ‘कसम’ ‘वसम’ की बात बातने लगे. कहने लगे, मेरी कसम टूट जायेगी, वह भले ही मुझसे प्यार ना करती हो पर मैं तो करता हूं. हमारा प्यार जिस्मानी नहीं रूहानी है.. वगैरा.. वगैरा और भी न जाने क्या क्या बकवास करके मुझे समझाने में लगे रहे.  मैं भी पीछे हटने वालों में से नहीं थी मैं बोली, “ये कैसी कसम हो गई. सभी अपनी अपनी लाईफ जी रहे है. आप क्यों इसकी सजा भुगतोगे. आप को भी तो हक है हर तरह का सुख पाने का.”

मैं अब ये कैसी बात कर रही थी. जब तक मुझे आस थी मैं सरल के साथ जाऊंगी तब तक तो मैंने महीप के ‘हर तरह’ के सुख की बात कभी नहीं की और आज मैं खुद स्वार्थी बनकर उनसे ऐसी बातें कर रही थी. दरअसल, अब मुझे पूरी औरत बनना था, एक पत्नी और उससे भी बढ़कर एक मां …! हां.. मैं भी चाहती थी कि मेरी कोख में मेरा अंश पले-बढ़े, मैं उसे जन्म दूं और फिर… न जाने कहां कहां तक मेरी सोच भागने लगी.

आज कल मेरे बैंक में मेरे सहकर्मी मुझसे पूछते, शादी को तीन साल होने को आये खुशखबरी कब दे रही हो. अभी तो गोद में बच्चा आ जाना चाहिये. वरना लोग बांझ होने का लांछन लगाते है. ये अच्छा है की तुम परिवार के साथ नहीं रहती हो वरना रोज ताने सुनने पडते. ऐसी बातें सुनाकर मुझे मां बनने के लिए प्रेरित करते रहते. मेरे साथ पढ़ने वाली मेरी अन्य सहेलियां जिनकी शादी हो चुकी थी वे भी एक दो बच्चों की मां बन चुकी थी और मैंने एक झूठी आस में अपने जीवन के चार साल विवाहित होकर भी बिना वैवाहिक सुख के बिता दिये थे.

मेरे कानों से आवाज टकराई “कौन से सुख की बात कर रही हो,” अचानक मेरी सोच को ब्रेक लगा. महीप ने अपनी बात जारी रखी, “मैं तो बहुत सुखी हूं, स्वतंत्र जीवन से बढ़कर और कौन-सा सुख होता है.”

महीप सच ही बोल रहे थे कि स्वतंत्रता से बढ़कर कोई सुख नहीं. पर फिर भी हम एक-दूसरे से बंध जाते है. अलग अलग भौतिक सुखों की कामना करते है. एक-दूसरे से अपेक्षाएं रखते है. उन अपेक्षाओं के पूरा होने में अपना सुख मानते है.

उनको मेरी अपेक्षाओं से अनजान बनते देख मैं सीधे बोल पड़ी, “मैं मां बनाना चाहती हूं .. मां… तुम्हारे बच्चे की, मुझे ये सुख तुम ही दे सकते हो” महीप ने गर्दन झुका ली. कुछ बोले नहीं. मैंने फिर पुछा, “तुमने जवाब नहीं दिया, क्या तुम मुझे ये सुख नहीं दोंगे” वे फिर सोच मे पड गये और होठो ही होठो में बुदबुदाते हुये बोले, “काश…. दे पाता” वे क्या क्या बुदबुदाये यह मैंने सुन लिया था फिर भी पूछा क्या कहा आपने. तब वे फिर मुझे अपने कसम की दुहाई देने लगे तो मैं बोली, “तोड़ दो….. आप कोई पितामह भीष्म नहीं हो और ना ही ये वह युग है, तुम्हारे कसम तोड़ने से किसी को कोई नुकसान नहीं है.” इसी बात को लेकर हममे बहस चलती रही आखिर उन्हें मेरे सवालों का जवाब देना भारी पड़ रहा था तो वे झल्लाते हुये उठकर सीधे बाहर निकल गये.

उसके बाद कई बार मैंने उनसे बात करनी चाही लेकिन हर बार मेरी बात काट कर वे बाहर चले जाते. अब वे घर में कम ही रहते. सिर्फ खाना खाने आते या फिर जब मैं घर में ना रहूं तब घर के काम निपटाते. उन्होंने अपने काम की आदत नहीं छोड़ी. उनका व्यवहार देखकर लगने लगा, तो क्या ये घर का सारा काम इसीलिए करते है ताकी मेरे चले जाने के बाद इन्हे काम करने में कोई परेशानी ना हो. वे किसी और पर डिपेन्ड न हो. उन्होंने कहा स्वतंत्रता में ही सुख है तो क्या वे अकेले जीवन व्यतित करने को स्वतंत्रता कहते है और उसमें सुख अनुभव करते है. शायद ऐसा ही हो.

मैंने भी आस नहीं छोड़ी और ना ही उन्हें अकेला छोडा. तलाक के पेपर पर मैंने हस्ताक्षर भी नहीं किये. उन्होंने आठ दस बार पूछा मुझसे, “हस्ताक्षर कब करोगी” लेकिन मेरा जवाब ना मिलने पर वे मुझसे बहस नहीं करते थे. अब यही रूटीन हो गया था हमारा. दो अजनबी एक घर में एक छत के नीचे अलग अलग बेडरूम में सोते. अपने अपने हिस्से के काम निपटाते और चले जाते.

दो महिने बाद इसमें थोड़ी तबदीली आयी. हमारे जीवन में एक नये सदस्य का आगमन हुआ और मुझे महीप का दूसरा रूप भी देखने को मिला. उनका वह रूप कितना सच्चा और कितना झूठा था ये मैं समझ ही नहीं पा रही थी. उस नये सदस्य का नाम था काव्या.

महीप जब उसे लेकर आये तो यही बताया कि वह उनकी बहन है… ना… ना सगी नहीं. बल्कि राखी बहन है. उनके दोस्त कपील की सगी बहन और दूसरे दोस्त अकील की पत्नी. यानी एक अकेली महिला से तीन पुरूष जुड़े हुए थे. और… अब तक उनमें से दो की मौत हो चुकी थी. तिसरे मेरे पति यानी महीप जिंदा थे और अब उस महिला का आगमन महीप के घर में हो गया था.

हम तीनों को एक साथ रहते हुऐ महिना दो महिना बीत गया. महीप तो कुछ बताते नहीं थे. लेकिन मैं कुरेद कुरेद कर काव्या से पूछताछ करती रहती. उसके बताये अनुसार उन दो महिनों में काव्या की जो कहानी सामने आयी वह यह कि, महीप, कपील और अकील तीनों बहुत अच्छे दोस्त थे. प्रायमरी स्कूल से ही उनकी दोस्ती थी. एक ही बस्ती में रहते थे, एक ही स्कूल में जाते थे. तीनों का एक-दूसरे के घर आना जाना था. काव्या उनसे दो साल बड़ी थी. लेकिन फिर भी वह उनके साथ खेलती और अपने भाई के साथ साथ महीप को राखी बांधने लगी थी.

काव्या ने अकील को कभी राखी नहीं बांधी क्योंकि वह बचपन से ही उसके प्रति कुछ अलग-सा महसूस करती थी. उम्र बढ़ने के साथ साथ उन्हें यह अहसास हुआ कि वह अलग-सा क्या है. अकील और काव्या दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे और शादी करने का फैसला कर लिया था. यह बात कपील और महीप दोनों जानते थे उन्हें कोई एतराज नहीं था पर कपील के घरवाले और काव्या के घरवाले यह बात नहीं जानते थे. उन्होंने तय किया कि सही समय पर यह बात दोनों अपने अपने घरवालों को बतायेगे.

तीनों दोस्तों ने अपना ग्रॅज्युएशन पूरा कर लिया और तीनों अच्छे अंको से पास हो गये थे. अत: तीनों एक ही मोटर साइकिल पर बैठ कर शहर से बाहर मौज मस्ती करने निकल पड़े. दिन भर तीनों ने खूब मजा किया शाम को खाना खाने एक ढाबे पर रूके तो अकील ने कहा, “यार बिना कुछ पीये खुशी का मजा नहीं आता चलो एक-एक पेग ले लेते है.” हां-ना करते वे दोनों भी मान गये और उन्होंने शराब पी, खाना खाया और फिर तीनों एक ही मोटर साईकिल पर बैठकर घर वापसी के लिए निकले. बाईक अकील चला रहा था उसके पिछे महीप और उसके पिछे कपील बैठा था.

रात का समय और तीनों नशे में, तेजी से दौड़ती बाईक का अलग पहिला एक गड्ढे में धंस गया. महीप और कपील दोनों उछल कर सडक के किनारे बने एक टीन के झोपडे पर गिरे. जबकि अकील सडक पर घिसटता चला गया. टीन का वह झोपडा पहले से ही जर्जर और जंग लगा हुआ था. जगह से जगह से टीन टूटा हुआ था. दोनों के शरीर पर उस जंग लगे टीन ने इतने घाव दिये कि कपील की घटनास्थल पर ही मौत हो गई. महीप की दोनों टांगे चिर गई थी. पेट और हाथों पर भी लंबे-लंबे घाव लगे थे. अकील के सडक पर गिरने और घसीटे जाने की वजह से कपडे फट गये और कई जगह से हाथ पाव छिल से गये थे.

महीप को पंद्रह दिनों तक अस्पताल में रहना पडा. खून की बोतले चढी. जहां जहां महीप के शरीर पर कटे के घाव थे वहां टांके लगाने पडे. इस घटना ने तीनों के परिवार में नफरत के बीज बो दिये थे. इस दुर्घटना के लिए महीप और कपील के परिवार वाले अकील को दोषी मानने लगे. उसी ने शराब पिने की बात की थी और बाईक भी वही चला रहा था.

कपील और अकील के परिवार वालों में इस बात को लेकर काफी झगडा हुआ. गाली गलौच से लेकर हाथापाई तक. काव्या समझ चुकी थी कि अब वह अकील से प्यार की बात बताती है तो उसके घर वाले शादी की रजामंदी कभी नहीं देंगे. अत: वह छुप छुप कर अकील से मिलती रही. इस घटना के दो महिने बाद ही काव्या के घरवालों को अकील और काव्य के प्रेमसंबंध के बारे में बता चला. अपेक्षानुसार, काव्या के घर वालों ने पहले तो काव्या को खुब लताड़ा. उसके पिता और चचरे भाईयों ने अकील की पिटाई तक कर दी. पुलिस में अकील के खिलाफ झुठी शिकायत कर उसे जेल भेज दिया. लेकिन पुलिस को अकील के घर वालों ने पैसे देकर मामला रफा दफा कर दिया.

अब, अकील के घर वाले भी काव्या के परिवार वालों से हद से ज्यादा नफरत करने लगे थे और वे भी नहीं चाहते थे कि काव्या उनके घर की बहु बने. काव्या के घर वाले उसकी शादी उसकी मर्जी के खिलाफ कही और करने वाले थे. हालात ऐसे हो गये कि दोनों ने किसी को भनक तक न लगने दी और कोर्ट में शादी कर ली. जिसमें काव्या का भाई बनकर महीप ने उसकी ओर से गवाह के तौर पर हस्ताक्षर किये थे.

काव्या दुल्हन बनकर अकील के घर तो आ गई लेकिन उसे रोज अकील के घर वालों के ताने सुनने को मिलते. घर का माहौल पूरी तरह खराब रहता. अकील भी बेबस था उसके पास कोई नौकरी नहीं थी. वह भी अपने घर वालों के रहमो करम पर था. घर में रोज की किचकिच से वह तंग आ चुका था. इसलिए दिन भर बाहर रहता रात को शराब पीकर घर आता. एक्सीडेन्ट में उसके सर पर अंदरुनी चोट लगी थी. जिसका असर अब होने लगा था. ज्यादा तनाव में रहने के कारण उसका ब्रेन हॅमरेज हुआ और उसकी मौत हो गई. इस बात के लिए अकील के घरवालों ने काव्या पर इल्जाम लगाया और उसे घर से बाहर निकाल दिया. वह अपने मयके पहुंची तो उसके पिता ने भी उसे घर में आसरा देने से इन्कार कर दिया. तब काव्या ने महीप से मदद मांगी.

महीप उसे सीधे इस फ्लैट पर ले आया. पहले तो उन्होने उसे अपने बेडरूम में सोने को कहा और खुद बाहर हॉल में सोफे पर सोने की बात की, लेकिन वह नहीं मानी और खुद हॉल में सोने लगी. इन दो महिनों में कई बार मैंने देखा वह रोते रहती और महीप उसे सांत्वना देते रहते थे. पीछले तीन वर्षो में जितनी बातें मुझसे की उससे कई ज्यादा बातें दो महिनों में काव्य से कर चुके थे. मुझे शक होने लगा की महीप का प्यार यही तो नहीं है. सब के सामने राखी बांधकर भाई-बहन बने रहना और एकांत में कुछ और ही रिश्ता कायम करना.

उनकी हरकतों पर जब मैंने सवाल करने शुरू किये तो वे मुझ पर चिढ़ने लगे. ऐसा पहली बार हो रहा था, उन्हें गुस्से से उबलता देख उंची आवाज में मुझसे बात करते हुए देखना. हर दूसरे दिन मेरे घर का माहौल ऐसे ही बनने लगा. तब उन्होंने मुझे सीधे धमकी दे दी कि यदि काव्या का यहां रहना उसे पसंद नहीं तो वह काव्या को लेकर कोई और फ्लैट देखकर उसमें शिफ्ट हो जायेगे. मैं महीप को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी. अत: मन मसोसकर रह गई. उसके बाद मैंने उन्हें कुछ भी नहीं कहा लेकिन काव्या को गाहे बगाहे ताने देने लगी. उलाहना देने लगी कि “पहले भाई के साथ थी तो उसे खा गई, फिर अपने ससुराल का माहौल खराब किया और अपने पती को खा गई अब मेरे घर का माहौल खराब कर, मेरे पति को खाये बिना चैन नहीं आयेगा.”

मेरे जली कटी सुनाने से वह और दुखी रहने लगी उसका दुख देकर मेरे पति उसके और करीब होते गये. जब तक उन्हें नींद नहीं आती वे काव्या के साथ ही हॉल में बैठे रहते. काव्या ने मेरे घर का किचन संभाल लिया था. घर के सारे काम वह करने लगी थी. एक तरह से वह मेरे घर की मेड बन गई थी. अपने घर के तनाव को कम करने के उद्देश्य से मैंने गर्मी की छुट्टीयों में अपने बड़े भाई के बच्चों और मेरे छोटे भाई को बुला लिया था. वे लोग दस दिनों तक रहे. तब महीप मेरे कमरे में मेरे साथ मेरे बिस्तर पर सोते थे. लेकिन मुझे छूना तो दूर मेरी ओर मुंह तक नहीं करते थे. उनकी यह हरकत मानों मेरी जलती, तड़पती कामना को हवा देने का ही काम कर रही थी. उन दस दिनों तक घर का माहौल काफी खुशनुमा रहा. काव्या मेड सर्वन्ट की तरह दिन भर खटती रही और महीप एक अच्छे पति का सबके सामने नाटक करते रहे.

उनके जाने के बाद फिर घर में उदासी छा गई. महीप अपने कमरे में चले गये. वही रूटीन शुरू हुआ. तीन महीने बीते थे कि एक रात अचानक मैंने देखा काव्या बाथरूम में उल्‍टी कर रही थी और महीप बाथरूम के बाहर खडे थे. वह जैसे ही उठ कर खड़ी हुई उन्होंने उसे सहारा दिया और उसके दोनों कंधो को पकड़कर, उसका सिर अपने कंधे पर टीकाकर उसके शरीर को अपने शरीर का सहारे देते हुए उसके बिस्तर तक ले आये. मुझसे रहा नही गया और मैं तकरीबन चीख पड़ी, “ये क्या हो रहा है ? एैसी बेहयाई, मुझे तो छूते तक नहीं और इसे…. लगता है इसे मां बनाने की पूरी तयारी कर ली है” मेरा वाक्य पूरा होते ही महीप एकदम से उठे और मेरे गालों पर एक झन्नाटेदार थप्पड रसीद दिया और चीखते हुऐ बोले,

“अपनी जबान को लगाम दे. यह मेरी बड़ी बहन है. ऐसा घिनौना इल्जाम लगाते शर्म नहीं आती. तुम मुझसे तलाक लेने वाली थी फिर क्या हुआ ? क्यों नहीं किया तुमने तलाकनामे पर सिग्नेचर ? चाहे तो अब कर सकती हो.”

पहले तो मुझे महीप पर बहुत गुस्सा आया. उसने मुझे तमाचा जड़ दिया था. पर उसकी बात सुनकर लगा कही ये मुझसे तलाक लेने के लिए ऐसा नाटक जानबूझकर तो नहीं कर रहे है. मैं अपने कमरे में जाकर रोती रही और सोचती रही. ये नाटक है तो मैं तलाकनामे पर हस्ताक्षर नहीं करूंगी. दूसरे दिन वे काव्या को लेकर अस्पताल गये. शाम को मैंने पूछा कि डॉक्टर ने क्या कहा तो दोनों में से किसी ने मुझे कुछ नहीं बताया. पर कहते है ना, ‘इश्क, मुश्क और औरत का पेट छुपाए नहीं छुपते’ काव्या का पेट बढ़ने लगा था. अब तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. काव्या कभी घर से बाहर जाती नहीं थी और घर में सिर्फ एक ही मर्द था महीप. काव्या कोई कुंती नहीं थी कि उसे किसी ऋषि ने कोई मंत्र दिया हो और कोई देव आकर उसकी कोख में बच्चा डालकर चला गया हो. यह निश्चित ही महीप की करतूत थी. मुझे किसी झूठी आस पर नहीं रहना था. पहले जिससे प्यार किया वह भी बेवफा और आवारा निकला. जब पति को पति के रूप में अपनाना चाहा तो उसने भी दगा दिया.

दूसरे ही दिन मैंने तलाकनामे पर हस्ताक्षर कर महीप को पेपर सौंप दिये. कोर्ट ने सुनवाई के लिए दो महीने बाद की तारीख दी. हम उस तारीख पर कोर्ट पहुंचे. जज के सामने कबुल किया की हम आपसी सहमती से यह तलाक ले रहे है फिर भी जज ने हमे अच्छे से सोचने समझने के लिए छ: महीने बाद की तारीख देकर बोले, “यदि इन छे महीनों में तुम्हारे विचार नहीं बदलते है तो ही इस तलाकनामे को कबुल किया जायेगा और डिर्वोस सर्टीफिकेट इश्यु होगा.”

मुझे और छे महीने उनकी बेहयाई सहना था. मेरे लिए एक एक दिन काटना मुश्किल हो रहा था. हमारे आपसी टकराव और बदफैली की बातें आस पड़ोस से लेकर सभी पहचान वालों में फैल गई थी. हर कोई मुझसे हमदर्दी जताता और महीप को भला बुरा कहता. पर इससे उन दोनों पर कोई फर्क नहीं पड रहा था. वे उस कुलटा की तिमारदारी में लग गये. घर का सारा काम खुद करने लगे. उसकी दवा, सेवा सब करने लगे. उसने एक बहुत ही खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया. मेरे ही सामने महीप उस बच्चे को गोद में लेकर उसका लाड दुलार करते तो मेरे सिने पर कई कई सांप लोटने लग जाते.

उस मनहूस औरत के चेहर पर भी बच्चे को देखकर मुस्कान आ जाती. खुश नजर आने लगी थी. ये मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था तो मैंने उसे खूब खरी खोटी सुना दी. उससे कहा कि, “तु बहुत मनहूस है, तु जहां जाती है वहां सिवाय बर्बादी के कुछ नहीं होता. मेरे हंसते खेलते जीवन को तुने नर्क बना दिया है, भाई, पति को खाने के बाद अब तुने महीप की जिन्दगी भी जहन्नुम बना दी है. बाहर लोग उसे कैसी कैसी नजरों से देखते है. उसे कहते है, घर में एक खुबसुरत बिबी के होते हुए दूसरी रखैल लेकर आया है और उससे बच्चा भी पैदा कर दिया. पीठ पीछे मुझे भी ताने मारते है, बांझ कहने लगे है. झूठी हमदर्दी दिखाते है. ये…. ये सब तेरी वजह है हुआ है, तु मर क्यों नहीं जाती” मेरे मुंह से इतना निकलना था कि दूसरे ही दिन काव्या ने खुद को फांसी लगा ली थी.

काव्या के सुसाईड नोट से पुलिस ने आत्महत्या का केस बनाकर फाईल बंद कर दी. तलाक के लिए एक महिना और बचा था. तलाक की एक वजह पंखे से लटककर खत्म हो चुकी थी, महीप का बच्चे से लगाव बढ़ने लगा था. कभी कभी मैं भी बच्चे को देखती तो सोचती इस सारे फेर में इस बच्चे का क्या कसूर है. कितना मासूम और खूबसूरत है. मेरा भी मन उसे गोद में लेकर प्यार करने का होता. लेकिन उसका कसूर ये था कि उसने मेरी कोख से जन्म नहीं लिया था. जब भी उसे उठाकर दुलारने की कोशिश करती मेरी आंखों के आगे उस मनहूस का चेहरा नजर आता. मेरे पति को मुझसे छिनने वाली डायन नजर आती.

वक्त सारे घाव भर देता है. यहां तक की जख्मों के निशान तक मिट जाते है. कुछ ऐसा ही इन पंद्रह दिनों में हुआ. महीप मुझे फिर अच्छे लगने लगे. उनका मेरा साथ किया हुआ दुर्व्यवहार मैं भूल गई थी. क्योंकि एक थप्पड के अलावा उन्होंने मुझ पर कभी हाथ नहीं उठाया था उन कुछ दिनों को छोड़ दे तो उंची आवाज में बात तक नहीं की थी. भला उन क्षणों को मै क्यों याद रखू. उनके शालीन स्वभाव का मेरे दिलो दिमाग पर ज्यादा असर था.

बच्चे के बहाने वे मुझसे बात करेंगे मेरे करीब आयेगे ये सोचकर मैं बच्चे के साथ खेलने लगी और महीप भी मुझसे बाते करने लगे. कोर्ट की तारीख को सात दिन बचे थे उसके पहले मुझे महीप का मन पलटना था. मैंने तय कर लिया था कि मैं अपनी सहमती खारीज कर दूंगी. लेकिन उसके बाद हमें कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ सकते थे और मामला खिचते चला जाता. लेकिन यदि महीप भी मान जाये तो हम अपिलेक्शन ही विड्रा करवा ले. पर इतने कम समय में उसे मनाया कैसे जाये. ऐसे समय में दिमाग में न जाने कैसे कैसे ख्याल आते है जो शायद बचकाने भी लगे लेकिन काम कर गये तो फायदा ही होता है. मेरे मन में आया यदि किसी तरह मेरे और महीप के बिच इन सात दिनों में शारीरिक रिश्ता बन जाये तो मैं उन्हें मना लुंगी. पर वे तो मुझे छूते तक नहीं थे फिर यह मुमकिन कैसे होता.

दूसरे ही दिन मैंने अपनी मां को बुला लिया. मेरी मां ने महीप के कमरे पर अपना कब्जा जमा लिया. सास के होते हुए महीप अपनी पत्नी के कमरे के बाहर सोफे पर तो नहीं सो सकते थे. अत: मजबूरन उन्हें मेरे कमरे में सोना पड़ा. रात उनके दुध में मैंने उत्तेजना बढ़ाने वाली दवा मिला कर उन्हें पीने को दिया. इसका उन पर कोई असर नहीं हुआ. तो दूसरी रात मैंने दवा की मात्रा बढ़ा दी. यह रात भी मेरी सूनी ही रही. तिसरी रात दवा की मात्रा एकदम से डबल कर दी. जो की मेरी सबसे बड़ी गलती थी. दवा का जो असर उन पर होना था वह न होते हुए उनके हाथ पाव ऐंठने लगे. वे दर्द से तड़पने लगे. उनकी ऐसी हालत देखकर मैं घबरा गई. दूसरे कमरे से मैंने मां को बुलाया और हॉस्पिटल में फोन लगाकर एम्बुलेन्स बुलवाई.

रात ग्यारह बजे उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा. मैंने डॉक्टर को बताया कि इनके दूध में मैंने उत्तेजना बढाने वाली दवा मिलाई थी तो डॉक्टर बोली, “ऐसी मुर्खता कैसे कर सकती हो. कोई भी दवा मात्रा से अधिक लेने पर जहर का ही काम करती है. सही समय पर तुम इन्हें हॉस्पिटल नहीं लाती तो इन्हें बचाना मुश्किल होता. फिर भी नुकसान तो हुआ है. इनके नसों पर ऐसा असर हुआ है कि ये  पैरालिटिक हो गये है. दिमाग पर असर हुआ है. ये कभी कभार अपना संतुलन खोकर गिर सकते है. इन्हें चलने फिरने और बात करने में परेशानी होगी. इन्हें सारी बाते याद रहेगी ये भी नहीं कह सकते.”

डॉक्टर की बातों ने मेरी चिंता बड़ा दी थी. ये मैंने क्या कर दिया था. तभी डॉक्टर बोली, “लेकिन तुम्हें इतनी मात्रा में दवा देने की क्या जरूरत पड़ी ?” तब मैंने बताया कि, हमारी शादी को चार साल से ज्यादा हो गये है लेकिन अब तक मेरा कुंवारापन कायम है. ये सुनकर डॉक्टर बोली, “ये सुनकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ बल्कि आश्चर्य इस बात से हो रहा है कि, तुम्हारे पति ने तुम्हें चार साल में एकबार भी नहीं बताया कि वो कभी किसी भी स्त्री से संबंध नहीं बना सकता” ये सुनकर मैं चौक पड़ी और बड़ा-सा मुंह खोलकर अवाक् डॉक्टर की ओर देखने लगी. डॉक्टर आगे बोली, “तुम्हारे पती के परौं, जांघो और पेट पर कटने के कई निशान है साथ ही उनके पौरूष का मुख्य अंग भी टांके लगाकर जोड़ा गया है. उसमें कभी भी उत्तेजना जाग ही नहीं सकती”

मैं थरथर कांपने लगी. तो ये राज है इनके शांत स्वभाव और अकेलेपन का. इसीलिए मुझसे अलग रहना चाहते थे ताकि इनका राज राज बना रहे. क्या इनके घर वाले भी इस बात से अंजान थे. जरूर होंगे, वरना मुझसे बच्चे की आस क्यों लगाते. काव्या के मां बनने पर इनके परिवार वालों ने भी उसे खरी खोटी सुनाई थी. उन्हें भी लगता था काव्या की कोख में महीप का ही पाप पल रहा है. लेकिन…. लेकिन यह सब झूठ है. महीप…. महीप नहीं… तो फिर काव्या के बच्चे का बाप कौन है ? कौन आया था मेरे घर में ? इन प्रश्नों ने मुझे फिर बैचेन कर दिया.

मैंने बच्चे के पैदा होने से पहले नौ महिनों का हिसाब लगाया और अपने अपार्टमेंट के चौकीदार के पास पहुंची. उससे नौ-दस माह पुराने रजिस्टर मांगे और देखने लगी की कौन हमारे पीठ पीछे घर आया था. तब एक रजिस्टर में एक नाम देखकर मैं चौंक गई. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था. मैं रजिस्टर के उन पन्नो की फोटो कॉपी लेकर महीप के पास पहुंची और उसे नाम दिखाते हुये पूछा, “यही है ना बच्चे का बाप” मैंने महीप का हाथ बच्चे के सिर पर रखा और बोली, “तुम कसम को बहुत मानते हो इस बच्चे के सिर पर हाथ रखा है इसकी कसम खाओं और बोलो यही है ना इस बच्चे का बाप” उनकी आंखों से आंसू बहने लगे. हां में गर्दन हिलाते हुए उन्होने हामी भरी.

दूसरे दिन मैं बच्चे के साथ सीधे अपने मयके पहुंची. अपने भाई दिलेश का कॉलर पकडते हुए सबके सामने ले आयी और उसके गालों पर एक के बाद एक कई चांटे मारने के बाद जब मुझे घर के अन्य सदस्यों के पकड़ लिया तब रूकी और चिल्लाने लगी, “बता कमीने क्या किया है तुने, बता… बता सबको बता कि इस बच्चे का बाप कौन है”

वह गर्दन झुकाएं खड़ा रहा. वह समझ चुका था कि मैं सारी असलीयत जान गई हूं. वह हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठ गया और माफी मांगने लगा. “मुझे माफ कर दो दीदी मुझसे बड़ी भूल हो गई. गंदे वीडियो देखकर मेरा दिमाग खराब हो गया था. मैं जानता था दोपहर में आप दोनों काम पर चले जाते हो और काव्या घर पर अकेली रहती है. मैं दोपहर में वहां पहुंचा और उसे किचन में रखे चाकु का डर दिखाया. उसे डराया कि मैं उसका और जिजाजी का नाम बदनाम कर दूंगा. सबसे कहूंगा की जिजाजी को मैंने अपनी आंखों से काव्या से प्यार करते देखा है. वह डर गई और मेरे साथ वह सब किया जो मैं चाहता था. मैं लगातार चार दिनों तक आता रहा. चौथे दिन जिजाजी ने मुझे देख लिया और मुझे खुब लताडा. मैं उसके बाद तुम्हारे घर कभी नहीं आया.”

क्या करती अपने ही दातों से अपने ही होठो को चबाने जैसी बात थी. चुप रहने के अलावा मेरे पास कोई अन्य विकल्प न था. काव्या मर चुकी थी और मरने से पहले उसने इस बात का कही भी जिक्र नहीं किया था कि उसका बलात्कार हुआ है. अत: कोई पुलिस केस बनता ही नहीं था. मेरे पति ने ही शायद मेरे मयके वालों की इज्जत बचाने के लिए अपना और काव्या का मुहं सिल लिया था.

मै महीप के पास पहुंची और उन्हें झंझोडते हुए पूछा, “तुमने अपनी सच्चाई क्यों नहीं बताई महीप. मेरी वजह से काव्या ने अपनी जान दी, तुम अस्पताल में पड़े हो. तब वे बोले, “ये हमारी बदकिस्मती है”

क्या सच में ये हमारी बदकिस्मती है, या हम आसानी से अपनी गलतियों को बदक‍िस्मती का नाम दे रहे है. जबकि हर घटना के पीछे कारण थे. यदि सही समय पर उन कारणो का पता चल जाता तो हालात कुछ और होते. मै महीप की ओर देखकर बस इतना ही बोल पायी, “काश…. पहले बता देते !”

अब आगे क्या करना है मैंने सोच लिया था, मैं महीप को उनमें जो भी कमी है उस कमी के साथ अपनाऊंगी और मरते दम तक रिश्ता निभाऊंगी और… और बच्चा हमारे ही नाम से जाना जायेगा. उसे देखकर अब मुझे घृणा नहीं हुई. उसके कई चुंबन ले लिये और बोली, “बेटा अब से मैं ही तुम्हारी मां हूं …. मां”

***समाप्त***

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