दिसंबर संजोग - आभा श्रीवास्तव राजीव तनेजा द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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दिसंबर संजोग - आभा श्रीवास्तव

वैसे अगर देखा जाए तो हमारे आसपास के माहौल में इतनी कहानियाँ अपने किसी न किसी रूप में मौजूद रह इधर-उधर विचरती रहती है। जिन्हें ज़रूरत होती है पारखी नज़र..सुघड़ हाथों एवं परिपक्व सोच की, जो उन्हें किसी कहानी या उपन्यास का मुकम्मल जामा या फिर कोई छोटा सा हिस्सा ही बना सजा..संवार कर उभार सके।

आँखों के ऑपरेशन की वजह से लगभग 15 दिनों तक किताबों से दूरी के बाद ऐसे ही जिस उम्दा कहानी संकलन को पढ़ने का मौका मिला, उसे 'दिसंबर संजोग' के नाम से लिखा है प्रसिद्ध लेखिका आभा श्रीवास्तव ने। 650 से ज़्यादा रचनाएँ लिख चुकी आभा श्रीवास्तव जी अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं।

धारा प्रवाह शैली में लिखी गयी इस संकलन की कहानियों में कहीं ज़िंदादिल स्वभाव की खूबसूरत प्रिया बनर्जी का अपने सगे मामा के दिलफैंक फौजी बेटे से प्रेम के बाद विवाह तो हो जाता है मगर कुछ ही महीनों के बाद वो एक विधवा के रूप में अपने मायके वापिस लौट आती है। इसके बाद कॉलेज में लैक्चरार लग चुकी प्रिया का अपने से कम उम्र के स्टूडेंट के अफ़ेयर होने के बाद विवाह तो हो जाता है मगर..

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी रत्ना के ब्याह की तैयारियों में जुटे उसके गरीब माँ-बाप उस वक्त चिंता मुक्त नज़र आने लगते हैं जब ब्याह से एन पहले बुखार की वजह से रत्ना की मृत्यु हो जाती है कि अब उसके दहेज के लिए सहेजा गया सामान छोटी बेटी के दहेज में काम आ जाएगा।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ एक तरफ़ जब तीन खूबसूरत एवं गुणी बहनों में से दो बहनें अपने विवाह के पश्चात लड़का पैदा ना कर पाने की वजह से उपेक्षा/ कमज़ोरीवश मर जाती हैं तो सबसे छोटी बहन पूरी ज़िंदगी विवाह न करने के अपने फैसले पर अडिग हो जाती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में आँधी तूफ़ान से भरी अँधेरी रात में शहर के नामी गिरामी डॉक्टर श्रीवास्तव को एक बूढ़ा व्यक्ति बेहद गिड़गिड़ा कर मरणासन्न हालात में पड़ी अपनी बेटी का इलाज करने के लिए अपने साथ चलने के लिए राज़ी कर लेता है मगर वहाँ पहुँचने पर पता चलता है कि असल कहानी तो कुछ और ही है।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ सब कुछ जानते समझते हुए भी अमीर घर के कैसेनोवा प्रवृति के गौतम का विवाह, उसकी माँ खूबसूरत दिव्या से कर देती है मगर किसी एक खूँटे से बँध कर रहना गौतम को मंज़ूर नहीं। अपनी गर्भवती पत्नी का त्याग कर गौतम के हमेशा-हमेशा के लिए घर छोड़ कर चले जाने पर गौतम की माँ पछतावे स्वरूप बुरी तरह से टूट कर डिप्रेशन में आ चुकी दिव्या के लिए संबल बनती है। ठीक होने के बाद गौतम की माँ उसका विवाह डॉ. शशांक से करवा देती है। ऐसे में क्या दिव्या, गौतम के साथ गुज़रे लम्हों और पुरानी बातों को भूल नए सिरे..नयी शुरुआत कर पाएगी? तो वहीं एक अन्य कहानी में बिना अपनी किसी ग़लती के शोभा को अपने ही घर में अपने परिवार से इस हद तक उपेक्षित जीवन जीना पड़ा कि माता-पिता की उदासीनता के चलते अपनी पसन्द के लड़के से विवाह करने पर उसके लिए घर के दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। अब पिता की मृत्यु के बाद असहाय हो चुकी माँ शोभा से उसे अपने साथ..अपने घर बाकी की बची ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए ले जाने की गुहार लगा रही है।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी विवाह के छह महीनों बाद ही विधवा हो चुकी उस कल्याणी की बात करती दिखाई देती है। जिसके पड़ोस में रहने वाली भाभी के घर में उनका भाई, अमोल आ कर ठहरा हुआ है। शुरुआती परिचय के बाद कल्याणी के मन में अमोल के प्रति कुछ कोमल भावनाएँ जन्म लेने को होती हैं कि इतने में अमोल का रिश्ता कहीं और तय हो जाता है। क्या कल्याणी कभी अपनी भावनाएँ अमोल के समक्ष व्यक्त कर पाएगी अथवा मूक रह कर अपने मन की बात को मन में ही दबा रहने देगी?

इसी संकलन की एक अन्य कहानी अधेड़ उम्र के अच्युत और कमसिन अरुंधति की बेमेल जोड़ी के बहाने से इस बात की तस्दीक करती दिखाई देती है कि समय के साथ जीव-निर्जीव में बदलाव तो हो कर ही रहते हैं। इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ एक तरफ़ दबंग जेठानी बन कर कोई औरत अपनी देवरानी के जीवन को नर्क बनाती दिखाई डेट तो वहीं दूसरी ओर कर्कश सास बन कर अपने दब्बू बेटे का जीवन भी तबाह करती नज़र आती है। लेकिन यह भी तो सच का ना कि अपने कर्मों का हिसाब हमें यहीं..इसी जन्म में भुगतना पड़ता है।

कुछ एक जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त कुछ एक स्थानों पर मुझे प्रूफरीडिंग की कमियां भी दिखाएं दी जैसे कि..

पेज नंबर 60 में लिखा दिखाई दिया कि..

'उसी पार्टी में सुनयना को एक और बात पता चली कि सुनयना के साथ गौतम की गहरी दोस्ती थी'

यहाँ 'सुनयना' को नहीं बल्कि 'दिव्या' को पता चलता है कि 'सुनयना के साथ गौतम की गहरी दोस्ती थी' इसलिए सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

' उसी पार्टी में दिव्या को एक और बात पता चली कि सुनयना के साथ गौतम की गहरी दोस्ती थी'

इसी तरह पेज नंबर 61 में एक जगह लिखा है लिखा दिखाई दिया कि..

'मिस फ्रेशर का खिताब जीतने के बाद जब पहले सेमेस्टर में उसके सर्वाधिक अंक आए तो उसने 'ब्यूटी विद ब्रेन' की उक्ति को सार्थक कर दिया था।
लेकिन इसी पैराग्राफ में इसके बाद एक और पंक्ति लिखी हुई दिखाई दी जो पहली पंक्ति को ही काटती नज़र आयी कि..

'स्कूल से कॉलेज तक वह पढ़ाई के अलावा हर गतिविधि कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी'
जो कि सही नहीं है। अतः सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'स्कूल से कॉलेज तक वह पढ़ाई के साथ-साथ हर गतिविधि, कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी'

हालांकि 148 पृष्ठीय यह उम्दा कहानी संकलन मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है सन्मति पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 160 /- जोकि कंटेंट एवं क्वालिटी के हिसाब से जायज़ है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।