Is Pyaar ko kya naam dun - 22 PDF free in फिक्शन कहानी in Hindi

इस प्यार को क्या नाम दूं ? - 22

(22)

हॉल में सत्यनारायण भगवान की कथा की तैयारियां हो चुकी थी। पण्डितजी भी आ गए थे। देवयानी ने फोन करके पायल, मनोरमा व मधुमती को भी कथा में बुलवा लिया था।

अर्नव के ऑफिस से जरूरी काम आन पड़ा था। वह अपने कमरे में लेपटॉप के सामने बैठा हुआ ऑनलाइन मीटिंग ले रहा था।

नियत समय पर सत्यनारायण भगवान की कथा प्रारंभ हुई। खुशी का मन कथा में भी नहीं लग रहा था। कथा में आए प्रसंग को सुनकर उसके दिमाग ने मन से ज़िरह छेड़ दी। खुशी आज अपने ही मन और बुद्धि के कारण दुःख के सागर में गोते लगा रही थी।

कथा समाप्त हुई और आरती की तैयारी होने लगीं। अपने मन को कही और लगाने के लिए खुशी ने अपना पसंदीदा काम चुना। आरती की पुस्तक लेते हुए वह बोली आरती हम गाएंगे।

पंडितजी- बिटियां इस तरफ माइक के पास आ जाओ। पंडितजी ने दीपक प्रज्वलित किया और खुशी ने आरती गाना शुरू की....

ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा...

सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा, ॐ जय लक्ष्मी...

रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे.....

आरती सुनकर अर्नव अपना काम छोड़कर कमरे से बाहर निकलकर हॉल की तरफ़ आता है । खुशी को गाते हुए देखकर वह सीढ़ी पर ही ठहर जाता है।

आरती समाप्त होती है। सभी लोग आरती व प्रसाद लेते हैं। खुशी की मन्त्रमुग्ध कर देने वाली आवाज सुनकर हॉल में मौजूद रायजादा परिवार के सभी सदस्य बहुत अधिक प्रभावित होते हैं । सभी खुशी की आवाज़ की तारीफ़ में कसीदे गढ़ते हुए बारी-बारी से कहते हैं...

देवयानी- खुशी की इस कला के विषय में तो हमें पता ही नहीं था।

मनोरमा- हम तो सोचत रहे ई टेपवा कौन ऑन कर दीन्ही..

श्याम- सच में ख़ुशीजी, हमने आजतक इतनी मधुर आवाज लाइव नहीं सुनी।

अंजली- मुझे तो अब भी यक़ीन नहीं हो रहा कि वो जादुई आवाज़ आपकी थी। हमारे बीच इतने समय से इतनी बड़ी गायिका रह रही थी।

आकाश- ख़ुशीजी आपको ऑडिशन देना चाहिए।

पायल- गायक बनना तो खुशी के बचपन का सपना है, बदकिस्मती से वह पूरा नहीं हो सका।

अपने मन का काम करके और सबकी तारीफ़ सुनकर खुशी के चेहरे की रौनक लौट आती है।

खुशी की आवाज़ से प्रभावित होता है। अर्नव सीढ़ी पर खड़ा हुआ सबकी तारीफ सुन रहा होता है। सबकी बात सुनने के बाद अर्नव तय कर लेता है कि वह म्यूजिक डायरेक्टर देवानंद झुनझुनवाला से खुशी के लिए बात करेगा।

अर्नव (मन ही मन ठानता हैं)- खुशी के बचपन का सपना मैं पूरा करूँगा। खुशकिस्मती से सिंगर्स और म्यूजिक डायरेक्टर मेरे कॉन्टैक्ट में रहते ही है, क्योंकि मुझे अक्सर अपने ऐड के लिए उनकी जरूरत पड़ती रहती है।

खुशी का सपना पूरा कर पाना मेरे लिए बाएँ हाथ का खेल हैं। खुशी कुमारी गुप्ता तैयार हो जाओ अपने सपने को साकार करने के लिए।

अर्नव खुशी के सपने को पूरा करने में जुट जाता है। वह अपने फ़ोन पर नम्बर डॉयल करता है- कॉल रिसीव करते ही दूसरी तरफ़ से आवाज़ आती है- हमारे भाग्य खुले जो तुमने याद किया.. कहो किस सब्जेक्ट पर धुन बनानी है..? जैसा प्रोडक्ट वैसी धुन..

अर्नव- धुन तो मुझ पर सवार हो गई है। किसी को सिंगर बनाना है। मैं उसको रिकमेंड नहीं कर रहा हूँ। उसकी आवाज़ म्यूजिक इंडस्ट्री में तहलका मचा देगी।

म्यूजिक डायरेक्टर- मुझे तो नई प्रतिभाओं की तलाश रहती ही है।

तुम इतनी तारीफ कर रहें हो तो सीधे स्टूडियो ही ले आओ। ब्रेक दे देते हैं। हम तो है ही स्टारमेकर.. हम तो यहाँ बैठे ही इसीलिए है कि कलाकार को सितारा बना सकें।

अर्नव मैं आपसे कल ही मिलता हूँ। कल मेरे घर आकाश की इंगेजमेंट के लिए पार्टी है, आप जरूर आइयेगा। मैं उस लड़की से आपको पार्टी में ही मिलवा दूँगा।

म्यूजिक डायरेक्टर- आकाश को अग्रिम शुभकामनाएं ! मैं कल जरूर आऊंगा।

अर्नव (आसमान को देखते हुए)- माना कि अभी ये तारें धुंधले है, पर जब इनका वक़्त आएगा तब ये भी चमकेंगे। एक बार इन्हीं तारों को देखते हुए मैंने खुद से वादा किया था कि मैं तुम्हारे हर सपने को पूरा करूँगा। तुम्हें हर खुशी दूँगा।

कल एक नई सुबह होगी खुशी, लोग तुम्हारी कला के बारे में जानेंगे। बचपन से जिस सपने को बुनते हुए तुम यहाँ तक आई हो अब उसको साकार होते देखोगी। बस कुछ ही दूरी पर तुम्हारी मंजिल है। कल की शाम तुम्हारे नाम होगी खुशी। क़ामयाबी तुम्हारे कदम चूमेगी और फिर हम दोनों के बीच अमीरी-ग़रीबी का फासला भी मिट जाएगा। तुम भी एक सफ़ल गायिका बनोगी।

अगले दृश्य में....

खुशी अपने कमरे में गुमसुम सी बैठी हुई खिड़की के बाहर देख रही थी। सड़क से गुज़रते हुए विभिन्न वाहनों व उन पर सवार लोगों के चेहरों को खुशी बहुत ही गौर से देखती है। वह नोटिस करती है कि कार में बैठे हुए इंसान की हँसी भी बिल्कुल वैसी ही है जैसी सायकल सवार की है। खुशी सोचती हैं- रुपये से किसी के सुख के पैमाने तय होते तो हँसी और आंसू भी अलग-अलग होते न... अमीरों के आंसू हीरे मोती होते... अमीरों की हँसी भी अलग ही होती लेक़िन ऐसा तो कुछ भी नहीं है। हमें आज क्यों अपने ग़रीब होने पर इतना गुस्सा आ रहा?

हमनें तो सुना था जब प्यार होता है तो मौसम सुहाना लगने लगता है, पंछी सुर में गाने लगते हैं, भौरे गुनगुनाते है, तारे भी नाचने लगते है, रात ग़ुलाबी हो जाती है, चाँद ज्यादा चमकीला लगता है.. पर हमारे साथ तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्यार के बीच जब रुपये आ जाए, रुतबा आ जाये तो शायद यहीं हाल होता है जो हमारा हो गया। एक सुहाना भ्रम टूट गया और हमने इस प्यार को जान लिया है। अब बस हमारा दिल ये बात भी जान ले कि अर्नवजी और हमारे बीच मीलों के फासले है जो कभी कम नहीं होंगे।

खुशी अपने ख्यालों में डूबी हुई थी तभी उसे बाहरी दुनिया में लाते हुए पायल कहती है- खुशी कल के लिए यह साड़ी सही रहेगी न?

खुशी- कल क्या है जीजी?

पायल- अर्नवजी की पार्टी.. तुम्हें तो पहले से पता होगा फिर भी हमसें पूछ रही हो।

खुशी- अच्छा हाँ, याद आया..

ये साड़ी तुम पर ख़ूब जचेगी जीजी।

पायल- तुम क्या पहनोगी खुशी ? तुम्हें तो अर्नवजी की पसन्द-नापसंद भी नहीं पता है।

खुशी (चिढ़ते हुए)- जीजी, आजकल तुम भी न बहुत बकवास करने लगी हो।

पायल- हमारी छोड़ो.. तुम क्या कर रहीं हो खुशी ? ख़ुद से ही छल कर रही हो। तभी आजकल हर बात पर बिफ़र जाती हो, उदास-देवदास सी रहती हो। तुम अपने आप से झूठ नहीं कह पाओगी की तुम्हें अर्नवजी से प्यार नहीं है। हम सब समझते है कि तुम्हारी गुत्थी दिनरात इसी बात में उलझी रहती है।

खुशी- जीजी, हमें कुछ समझ नहीं आ रहा है। हम जब उनके सामने होते है तो मन करता है उनसे कह दे कि वही हमारे सपनों के राजकुमार है जिसके ख्यालों में कब दिन से रात हो जाती है पता नहीं चलता। पर सारे सपने तब चकनाचूर हो जाते जब हम उनके और हमारे बीच पैसों की दीवार को पाते हैं।

पायल- खुशी, तुम बस बहती नदी सी चलती रहो, देखना एक दिन सागर से जरूर मिलोगी। जैसे नदी पर्वतों को काटकर अपनी राह बना लेती है, वैसे ही तुम भी इस पैसों की दीवार को ढहा दोगी।

तुम्हारे लिए हम साड़ी पसन्द करते हैं। देखना, जब अर्नवजी तुम्हें देखेंगे तो देखते ही रह जाएंगे।

खुशी- जीजी वो नवाबजादे आपके जेठ क्या बन गए सारा दिन उनका ही गुणगान गाती रहती हो। अभी से ससुराल वालो कि साइड लेने लगी हो। वहाँ जाने के बाद तो हमको भूल ही जाओगी..

कहकर खुशी भागने लगती है, तो पायल उसकी चोटी पकड़कर खींच देती है। रुको ज़रा! अभी मज़ा चखाते हैं।

खुशी- जीजी, छोड़ों हमें.. दर्द हो रहा है। अम्मा....

पायल खुशी को छोड़ देती हैं। खुशी भागकर दरवाज़े की ओट से कहती है- अर्नवजी कि चमची...

पायल भी खुशी के पीछे भागती है। खुशी किचन में काम कर रही अपनी अम्मा के पीछे छुप जाती है। पायल भी वहाँ आती है।

पायल (हाँफते हुए)- अम्मा, देखो न ये खुशी हमें चिढ़ा रही है।

गरिमा- क्या कह रही है, ज़रा हम भी तो सुनें...

खुशी अपने पुराने अंदाज़ में लौट आती है। वह भौहें उचकाकर इशारे से पूछती है- बताओ न जीजी..

पायल शरमा जाती है और वहां से चली जाती है।

खुशी अम्मा आप जाओ आज खाना हम बनाएंगे। खुशी गरिमा के हाथ से करछी छीन लेती है और किचन से जाने के लिए ज़िद करती है।

गरिमा- तुम्हारी सनक दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। कभी तो एक दम शांत बैठी रहती हो कभी धमाल मचा देती हो। आफ़त की पुड़िया ही हो सच में। सोच रहे हैं मधुमतीजी तुम्हारे लिए जो लड़का बता रहीं है, उसे देख आए और तुम्हें उसके साथ सात फेरों के बंधन से बांधकर विदा करके चैन की बंसी बजाए।

किसी और लड़के के साथ खुद को सोचकर ही खुशी सिहर जाती है।

अपनी शादी की बात सुनकर खुशी गरिमा से कहती है- हम तो हमेशा आपके साथ ही रहेंगे और आपकी छाती पर मूंग दलेंगे।

मधुमती नींद से जागकर, उनींदी सी आती है औऱ कहती है- जब मूँग दल जाए तो हलवा बना देना।

मधुमती की बात सुनकर गरिमा और खुशी खिलखिलाकर हंसती हैं।

मधुमती- हँस काहे रहीं हो ? कुछ गलत कहा है क्या? गरिमा ज़रा चाय चढ़ा दो। आज तो दर्द से सिर फटा जा रहा।

खुशी- चाय हम बनाते है बुआजी, ऐसी चाय पिलायेंगे कि आपका यह रोज़ का सिरदर्द हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

मधुमती (कवियों के अंदाज में)- सनकेश्वरी की स्पेशल चाय.. पियों तो सिरदर्द भाग जाय।

गरिमा (पंक्ति को आगे बढ़ाते हुए)- खुशी की स्पेशल चाय, आलस्य को भगाए..

पायल- जो भी पिये यह चाय, वह तरोताजगी है पाय, खुशी की चाय..।

शशिकांत (हॉल में प्रवेश करते हुए)- पी लो रे पी लो भाई, सबके मन को ललचाए, खुशी बिटिया की चाय।

वाह! वाह! क्या तुकबन्दी है।

आज तो सभी ग़ालिब बन गए है- खुशी ने दाद देते हुए कहा।

शशिकांत- अब कल पार्टी में जाना है तो महफ़िल तो सजेगी ही न..

चाय की ट्रे लाते हुए खुशी कहती है- सही कहा बाबूजी.. तन्हाई, रुसवाई इन सबकी अब हमारे जीवन में कोई जगह नहीं है.. मतलब हमारे घर में कोई जगह नहीं है।

चाय पर सभी लोग रायजादा हॉउस में होने वाली पार्टी के बारे में बात करते हैं।

अगले दृश्य में...

रायजादा हॉउस में कल होने वाली पार्टी को लेकर जोरो-शोरो से तैयारियां शुरू हो जाती है। अर्नव ने गार्डन एरिया और पूरे घर को लाइट और फूलों से सजवाया था। गार्डन से सटे हुए पुल एरिया जहां पर कुमुदिनी और कमल के फूलों का छोटा सा तालाब बना हुआ था, उस तऱफ एक बड़े आकार का लालरंग के गुलाब के फूलों से बना दिल का फ़्रेम लगा हुआ था जिसमें आकाश और पायल का नाम लिखा हुआ था। मेहमानों के बैठने से लेकर उनकी जरूरत की हर सुविधाओं का बढ़िया इंतज़ाम किया गया था। पूरा घर दुल्हन सा सजा हुआ लग रहा था।

अर्नव पार्टी को लेकर बहुत उत्साहित था। अनगिनत विचार उसके मन में नया उत्साह और जोश पैदा कर रहे थे। रात गहरा गई थी अर्नव असंख्य विचारों के साथ सो गया।

अगले दिन....

सुबह का दृश्य मन में सकारात्मकता भर देता है। खुशी की नींद आज जल्दी ही खुल गई थी। बिस्तर में लेटे हुए ही वह खिड़की से बाहर धुंधलके को देखती है। सर्द हवाओं से उसका शरीर कपकपा रहा था। रजाई में घोटमोट हुई खुशी सोचती है- सुबह भी एक सबक देती है। यह हमें यह यक़ीन दिलाती है कि रात कितनी भी काली हो, लंबी हो लेकिन सुबह जरूर आती है। सूर्य अपनी किरणों के ब्रश से रात के स्याह कालेपन को दूर करके आसमान को लाल व नारंगी रंगों से भर देता है। हम लोगों की ज़िंदगी से भी स्याह दुःखभरी रात के कालेपन को मिटाने के लिए शिवजी किसी सूर्य को जरूर भेजते हैं। हमें यकीन है हमारे जीवन में भी ऐसा ही एक सूरज आएगा जो हमारे जीवन को रोशन कर देगा। वह सूरज अर्नवजी ही है। हम आज ही उनसे अपने मन की बात कह देंगे। खुशी दृढ़ निश्चय करके शिवजी की शपथ लेकर कहती है- आज चाहे जो भी हो हम उनसे डरे बिना अपनी फीलिंग्स उनके साथ शेयर कर देंगे। हमारे प्यार का अंजाम जो भी हो, पर हम हिम्मत करके अपनी बात कहकर ही रहेंगे।

खुशी बिस्तर छोड़ देती है। वह पायल को भी जगाने लगती है। उठो जीजी..

पायल- सोने दो न खुशी.. नींद पूरी नहीं हुई तो डार्क सर्कल हो जाएंगे फिर हमारी तो पार्टी ही बिगड़ जाएगी।

खुशी- जब भी हम अपनी ज़िंदगी को सुधारने की कोई योजना बनाते हैं तब तुम कभी हमारा साथ नहीं देतीं।

पायल (खुशी को टालने के लिए)- जाओ बालिके तुम्हारा आज का दिन मंगलमय हो! तुम जो चाहो वह सब तुम्हें मिल जाए...

हमें थोड़ी देर और सोने दो..

खुशी- शिवजी करे तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर..

खुशी तैयार होने चली जाती है। वह नहाधोकर आती है, तो गरिमा उसे देखकर कहती है- पार्टी शाम को हैं खुशी तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गई ?

खुशी- अम्मा, आज न जाने क्यों लग रहा है कि जैसे हमारी परीक्षा है। सही समय पर नहीं जागते तो फेल हो जाएंगे।

गरिमा- पगली! न जाने क्या सोचती रहती हो। तुम और तुम्हारी बातों को शिवजी ही समझ सकते हैं।

खुशी- हाँ अम्मा, तभी तो जल्दी नहा लिए हम। अम्मा, हम दर्शन करके आते हैं। चाय हम आकर ही पिएंगे।

गरिमा- ठीक है, जल्दी लौट आना। तुम घर आने में देरी कर देती हो तो चिंता होने लगती है।

खुशी- हाँ, अम्मा हम जल्दी लौट आएंगे।

खुशी पूजा की थाली लेकर घर से निकल जाती है। वह मन्दिर पैदल ही जाती है। उसे सुबह ही अपनी दोस्त गंगा गाय मिल जाती है।

खुशी (गाय से बतियाते हुए)- पता है गंगा, हम आज अर्नवजी को बता देंगे कि हमें हर जगह उन्हीं का चेहरा दिखाई देता है, हर पल उनका ही ख्याल रहता है। आज हम उनसे बिल्कुल नहीं डरेंगे।

गंगा गाय अपनी गर्दन ऐसे हिलाती हैं मानो खुशी की बात पर स्वीकृति जताकर कह रही हो कि जाओ खुशी, तुम्हारी हर इच्छा पूरी हो।

खुशी- अच्छा गंगा, अब हम चलते हैं। अगर हम निडर होकर अपनी बात कह पाए तो कल तुम्हें गुड़ के साथ रोटी खिलाऊंगी।

खुशी शिव मन्दिर की ओर चल देती है। थोड़ी ही देर में खुशी शिव मंदिर पहुंच जाती है। वह मन्दिर के प्रांगण में खड़े हुए पीपल के पेड़ के पास से गुजरते हुए कहती है- हरि, आज हमें शिवजी से बहुत जरूरी बात कहना है। हम जल्दी में है तुमसे बाद में बात करेंगे।

खुशी जल्दबाज़ी में आगे कदम बढ़ा देती है। वह मन्दिर की सीढ़ियों पर भी इतनी जल्दी चढ़ती है, कि यदि वह जल्दी नहीं पहुँची तो शिवजी वहाँ से कही ओर चले जाएंगे।

हांफते हुए खुशी मन्दिर की चौखट पर थोड़ा ठहरती है, फिर जोश से घण्टी बजाती है।

पण्डित जी- खुशी बिटियां इतनी तेज़ घण्टा ध्वनि.. शिवजी के साथ पूरे कैलाश को जगाना हैं क्या ?

खुशी- जाग तो हम गए हैं, पण्डितजी। अतिउत्साहित होकर हमने घण्टी बजा दी।

पण्डितजी- बिटियां, हमेशा ऐसे ही उत्साहित रहो, खुश रहो।

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Balkrishna patel

Balkrishna patel 5 महीना पहले

Daksha Gala

Daksha Gala 6 महीना पहले

jitendra jatav

jitendra jatav 6 महीना पहले

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