इस प्यार को क्या नाम दूं ? - 2 Vaidehi Vaishnav द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
शेयर करे

इस प्यार को क्या नाम दूं ? - 2

(2)

नौजवान लड़के ने ख़ुशी की बातों को अनसुना कर दिया। वह बिना ख़ुशी की ओर देखें मन्दिर की सीढ़ियों की तरफ़ जाने लगा। ख़ुशी को उसका ऐसा बर्ताव बुरा लगा। वह दौड़कर उस लड़के के सामने चली गई औऱ अपने दोनों हाथ फैलाकर उसका रास्ता रोकते हुए बोली- "बहरे हो या गूंगे या फिर दोनो ही हो ? पहले एक शरीफ़ लड़की का दुप्पटा खींच लेते हो फिर मन्दिर में जूते सहित प्रवेश करते हो। इन सबके बाद अकड़ भी दिखाते हो।

रौबदार आवाज़ में नौजवान ने कहा- तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा रास्ता रोकने की औऱ मुझसे इस तरह से बात करने की ?

ख़ुशी नौजवान की बात सुनकर सहम गई। उसने अपने दोनों हाथ नीचे कर लिए, उसे देखकर लग रहा था कि वह किसी अधिकारी के सामने सावधान की मुद्रा में खड़ी हो। लड़का बिना समय गंवाए तेज़ी से सीढ़ी उतरता हुआ अपनी गाड़ी की ओर जाने लगा। कार के लॉक खुलने की आवाज़ आई, लड़के ने कार के डोर के हैंडल पर अपना हाथ रखा और डोर को अपनी तरफ खींचा। वह सीट पर बैठने ही वाला था कि उसने अपनी कार के साइड मिरर को देखा। कार के दरवाज़े को तेजी से बंद करके वह साइड मिरर की ओर बढ़ने लगा। मिरर के पास पहुंच कर उसने साइड मिरर को खींचकर निकाल दिया और फेंक दिया। वह ख़ुशी की ओर देखकर बोला- मेरी कार भी महँगे कपड़ों से साफ़ होती है,  तुम्हारे दुप्पटे से मिरर गंदा हो गया था।

ख़ुशी उस नौजवान लड़के को जवाब देने के लिए सीढ़ी से उतरी ही थीं। तभी लड़के ने कार स्टार्ट कर दी। तेज़ स्पीड से कार ख़ुशी के सामने से निकल कर चली गई।

मौसी की बातों से ख़ुशी पहले से ही आग बबूला थी। बाकी की कसर अब उस अनजान लड़के ने आग में घी डालकर पूरी कर दी। ख़ुशी मुँह फुलाए हुए ही फिर से मन्दिर की सीढ़ियां चढ़ने लगीं। वह शिव जी के सामने जाकर खड़ी हो गई। कुछ देर शिव जी को निहारने के बाद वह उनसे कहने लगीं- आपके सामने ही कोई हमारी इतनी बेइज्जती करके चला गया और आपने कुछ नहीं किया। आप चाहते तो उसे सीढ़ियों से गिरा देते। गिरने के साथ ही उसका घमण्ड, जो कि सातवें आसमान पर रहता है वह भी धड़ाम से धरती पर आकर चकनाचूर हो जाता। पर आप ये सब हमारे लिए क्यों करेंगे ? जैसे मौसी के लिए हम आज तक पराए ही है वैसे ही आपने भी हमें कभी अपना नहीं माना। मौसी की तरह ही हम आपकी आँखों में भी खटकते है। इससे अच्छा तो यह कर दो कि हमारी जीवन लीला ही समाप्त कर दो।

कुछ देर चुप रहने के बाद ख़ुशी फ़िर से बोलना शुरू कर देती है। वह शिव जी से कहती है- क्या कभी हमारी जिंदगी भी फूलों सी महकेगी? जिस पर तितलियों से रंग-बिरंगे खुशियों के लम्हें मंडराएगे ? क्या कभी मेरी जीवन बगिया में बहार आएंगी ? मानसून की झड़ियों सी सुखद घड़िया मेरे जीवन में आएंगी ? भोलेबाबा आप तो विषपान करके महादेव बन गए। हम साधारण मानव भी जीवन में न जाने कितनी ही बार कटु अनुभवों का सामना करते है और असहनीय पीड़ा को भोगते है, फिर भी हम रहते साधारण ही है।

अब आप ही बताओ ? आज मुझे जीजी के साथ होना था, वह वहां मेरा रास्ता देख रहीं होंगी और मैं यहाँ हूँ। यहाँ भी क्या कर रही हूँ ? आपसे शिकायत।

क्या मेरा जीवन यूँ ही शिकायत करते हुए बीत जाएगा या मैं भी आम लड़कियों की तरह एक सामान्य जिंदगी गुजर बसर कर पाऊंगी ?

हे भोलेबाबा ! मेरी भी अर्जी सुन लेना। बचपन से ही मैंने आपको अपना बाबा माना है। अब आप ही मेरी नैय्या पार लगाना। ख़ुशी के इतना कहते ही शिवजी के सिर से गुलाब का एक फूल नीचे गिरता है। ख़ुशी ने उसे शिवजी का आशीर्वाद समझा औऱ झट से उठकर फूल को ले लिया। ख़ुशी फूल को पाकर ऐसे ख़ुश हो गई मानो उसे खजाना मिल गया। उसे पूरा यक़ीन था कि अब शिवजी उसकी नैया पार लगा देंगे।

"मैं तो अपनी बातों में इतना रम जाती हुँ कि बाकी काम भूल ही जाती हूं"- पूजा की थाली उठाते हुए ख़ुशी ने कहा।

बड़े ही भक्तिभाव से ख़ुशी शिवजी का जलाभिषेक करने लगीं। पूजा करते समय उसे अपनत्व व आत्मिक शांति का अनुभव हुआ। कुछ पल के लिए वह अपना दुःख दर्द भूल गई। कुछ देर पहले एक अजनबी से हुई नोक-झोंक भी उसे याद नहीं रहीं। तल्लीनता से वह शिवजी की भक्ति में लीन हो गई ।

पूजा अर्चना करने के बाद ख़ुशी मंदिर की सीढ़ियों पर आकर बैठ गई। उसका मन अब अपने घर कि ओर चला गया। वह सोचने लगी- जीजी ने कौन सी ड्रेस पहनी होगी ? लड़का जीजी के जितना ही समझदार होगा ? क्या उसके घर वाले भी मौसी औऱ मौसाजी की तरह होंगे जो जीजी को अपनी बहू नहीं बेटी की तरह ही दुलार करेंगे ?

मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठी हुई ख़ुशी घर में चल रही गतिविधियों की कल्पना करती है।

ख़ुशी के घर का दृश्य उसकी कल्पना के लगभग सटीक ही था। मेहमान घर आ चुके थे। गरिमा और शशि ने दरवाज़े से ही मेहमानों की आवभगत करना शुरू कर दी थी। मेहमानों के साथ शशिकांत की बहन मधुमती भी आई थी। पायल के लिए यह रिश्ता मधुमती ही लायी थी। मधुमती दिल्ली में अकेली रहती है। उनके पति सेना में थे जो 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध में शहीद हो गए थे। तबसे लेकर आज तक मधुमती ने अपना जीवन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में ही व्यतीत किया। खुशी की माँ महिमा मधुमती की बहुत अच्छी सहेली थी। गरिमा से अपने भाई शशिकांत का विवाह भी मधुमती ने ही करवाया था। अपने भाई शशिकांत व दोनों लड़कियों से मधुमती का विशेष लगाव है।

हे मधुसूदन ! आजकल तो सफ़र करना भी आसान नहीं रहा- सोफ़े पर बैठते हुए मधुमती ने कहा।

सही कह रहे जीजी- गरिमा ने मधुमती के आगे पानी के गिलासों से सजी ट्रे को आगे करते हुए कहा।

पानी का गिलास उठाते हुए मधुमती ने कहा- सुपर एक्सप्रेस ख़ुशी कही दिखाई नहीं दे रही।

वरना दरवाज़े से ही उसकी बकरबकर शुरू हो जाती है। आज तो बहुत सन्नाटा छाया हुआ है।

ख़ुशी का नाम सुनकर गरिमा असहज हो गई। लड़के की माँ को मिठाई की तश्तरी पकड़ाते हुए उसने कहा- जीजी, ख़ुशी शिव मंदिर गई हुई है।

भला ये भी कोई समय था मन्दिर जाने का। मेहमान घर आये औऱ देवीजी मन्दिर चली गई।

मधुसूदन ही कृपा करें इस लड़की पर तो।

उधर पायल कमरे में आईने के सामने अकेली बैठी हुई थीं। वह ख़ुशी का इंतजार कर रहीं थी। उसकी नजरें बार -बार दरवाज़े पर जा टिकती फिर ख़ुशी को वहाँ न पाकर निराश हो वह फिर से आईने में अपने ही अक्स को निहारने लगती।

ये ख़ुशी भी न, उसे अच्छे से पता है कि मुझे आज उसकी कितनी ज़्यादा जरूरत है। मन्दिर दर्शन करने के लिए गई है या फिर मन्दिर निर्माण के लिए ? अब तक नहीं आई।

पायल विचारों की उधेड़बुन में ही खोई हुई थी तभी गरिमा उसके कमरे में आई। वह मुस्कुराते हुए पायल से बोली- मेरी लाड़ो को किसी की नज़र न लगें। बहुत सुंदर लग रही हो। चलो लड़के वाले आ गए हैं, उन्हें चाय तुम ही देने जाना।

अम्मा, ख़ुशी आई क्या? वो साथ रहेगी तो मुझे डर नहीं रहेगा- पायल ने नर्वस होकर कहा।

ख़ुशी का नाम सुनकर गरिमा की त्योरियां चढ़ गई। वह कहने लगीं- कब तक ख़ुशी के पल्लू से बंधी रहोगी और अब तुम छोटी बच्ची नहीं रही। ब्याह होने वाला है शादी को भी गुड़िया-गुड्डा का खेल समझ रखा है क्या, जिसमें ख़ुशी का होना जरूरी हो गया।

बिना ख़ुशी के तो किसी की शादी नहीं होती अम्मा। हर कोई राजी ख़ुशी ही ब्याह के मंडप में बैठता है- उदास स्वर में पायल ने कहा औऱ वह ड्रेसिंग टेबल के सामने से हटकर कमरे से बाहर जाने लगीं। गरिमा पायल की बात सुनकर उसे बाहर जाते हुए देखती रह गई।

उधर ख़ुशी मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठी घर के विषय में कयास लगाए जा रही थी। जीजी ने जरूर वो हल्के रंग का सूट पहना होगा। उस पर बूंदे वाले इयररिंग्स पहने होंगे तो सुंदरता में चार चांद लग गए होंगे। सूट के साथ वो जयपुरी नग वाले चूड़े तो कमाल लग रहें होंगे.. पता नहीं जीजी मेरे बिना कैसे तैयार हुई होंगी ? अब तक मेरी राह निहार रहीं होगी। शायद नाराज़ भी होंगी।

पर मैं मना लूँगी। कुछ पल के लिए ख़ुशी उदास हो जाती है। उसका मन भी विचारशून्य हो जाता है जैसे लड़की की विदाई के बाद घर सुना हो गया हो।

कुछ देर यूँ ही एकटक जमीन में नजरें गड़ाने के बाद ख़ुशी लड़के वालों के विषय में सोचने लगती है। जीजी के होने वाले सास-ससुर भले मानुष तो होंगे न ? मेरे जैसी एक ननद भी हो तब तो मज़ा ही आ जाएगा। औऱ देवर भी होगा क्या ? देवर के ख्यालभर से ही ख़ुशी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। खुशी लड़के के विषय में सोचने लगती है। जीजी को जो लड़का देखने आया है, वह सही आचरण का तो होगा न; कही शराबी न हो..? जीजी तो कोई प्रश्न भी नहीं पूछने वाली। अरे ! कही जीजी को देखने वही लड़का तो नहीं आया जो मन्दिर में कुछ देर पहले आया था ..? इस विचार के मन में आने से ही ख़ुशी एकदम खड़ी हो गई मानो युद्ध के लिए बिगुल बजा हो औऱ वह अस्त्र-शस्त्र के साथ शत्रु पर आक्रमण के लिए तैयार हो।

कुछ देर खड़े रहने के बाद ख़ुशी के चेहरे से क्रोध के भाव समाप्त हो जाते हैं और वह फिर से सहज होकर सीढ़ी पर बैठ जाती है। वह सोचने लगती हैं वह लड़का तो बिल्कुल अजीब ही था मानो दूसरी दुनिया से आया हो। मैंने अपने अब तक के जीवन में ऐसा इंसान नहीं देखा। वो तो जैसे खुद ही अपना भगवान हो। उसके घरवालों की कहाँ सुनता होगा वो। घरवालों की सुनकर हमारे घर जीजी को देखने आएगा ऐसा तो असम्भव ही है। उस खड़ूस लड़के से तो यूँ भी सारी लडकियां दूर ही भागती होंगी। कहीं वो हमारे होने वाले जीजाजी का ड्राइवर तो नहीं था? नहीं ..नहीं ड्राइवर होता तो ऐसी अकड़ कभी नहीं दिखाता। कभी किसी जगह दोबारा मिल गया न.. तो ऐसा सबक सिखाएंगे की नानी-दादी याद आ जाएंगी।

अरे, हम भी किस बेतुकी सी सोच में पड़ गए। न जाने किसके बारे में इतना सोच लिया और अपना समय बर्बाद भी किया। अचानक ख़ुशी को उस लड़के द्वारा गाड़ी से शीशा निकालकर फेंक दिए जाने वाली घटना याद आई। वह सीढ़ी उतरकर उस जगह गई जहाँ शीशा पड़ा हुआ था। उसने शीशे को उठाया औऱ अपने पास रखते हुए बोली- उसकी गाड़ी की पहचान के लिए यह शीशा बहुत काम आएगा।

ख़ुशी शीशे को एकटक देखती है औऱ उसके जहन में फिर से उसी गुस्सेल अजनबी लड़के का ख्याल किसी रील की तरह चलने लगता है। शीशे में ख़ुशी को उसी का चेहरा दिखाई देता है।

अगले दृश्य में....

एक ऊँची सी ईमारत के लॉस्ट फ़्लोर के कैबिन में आईने के सामने एक नौजवान लड़का खड़ा दिखाई देता है। उसके दोनों हाथ पेंट की जेब में थे। उसकी लाल आँखे उसके अंदर उठ रहे उबाल को दर्शा रही थीं।

दरवाजे पर ऑफिस के कर्मचारी ने डरते-सहमते हुए दरवाजा खटखटाया और काँपते हुए लफ्ज़ में कहा- "मे आई कम इन सर ?"

"स्टेप इनसाइड"-  रौबदार आवाज़ में उस लड़के ने कहा।

ऑफिस बॉय ने टेबल पर कॉफी का कप रखा औऱ चुपचाप कैबिन से बाहर निकल गया।

यह लड़का कोई औऱ नहीं बल्कि वही था जो ख़ुशी को शिव मंदिर में मिला था। रायजादा परिवार का इकलौता बेटा अर्नव सिंह रायजादा। अर्नव सिंह बिज़नेस की दुनिया का एक जाना पहचाना नाम है। ए.आर.ग्रुप टेक्सटाइल इंडस्ट्री में टॉप पॉज़िशन पर है, जिसे टॉप पर पहुँचाने का पूरा श्रेय अर्नव सिंह रायजादा को जाता है।

अर्नव के सामने कभी कोई अपना मुँह नहीं खोलता है। अगर कोई मुँह खोलने की गलती से जुर्रत कर भी दे तो अर्नव रुपयों से लोगो का मुँह बन्द कर देता है। पहली बार किसी ने अर्नव से इस तरह के लहज़े में बात की थी। खुशी का चेहरा अब भी अर्नव की आँखों मे घूम रहा था।

ख़ुशी के कहे हर एक शब्द उसे शूल की तरह चुभ रहे थे। वह चुपचाप किसी सुप्त ज्वालामुखी की तरह खड़ा हुआ था। कब उसके मन में क्रोधाग्नि बढ़कर ज्वालामुखी की तरह फट जाए कोई नहीं जानता।

छोटे तुम यहाँ हो और हम वहाँ मन्दिर में तुम्हारा इंतज़ार कर रहे थे- अर्नव की बड़ी बहन अंजली ने कैबिन में प्रवेश करते हुए कहा।

अर्नव बिना कुछ कहे वैसे ही खड़ा रहा। अंजली अर्नव के नजदीक जाते हुए बोली- हमसे नाराज़ हो समझ आता है पर इस बेचारी कॉफी ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? देखो तो ज़रा एक गर्म दिमाग इंसान के सामने कैसी बर्फ सी ठंडी हो गई।

दीदी मैं इस वक़्त मजाक के मूड में नहीं हूँ- उखड़े शब्दों मे अर्नव ने कहा।

छोटे हुआ क्या है ? तुम मन्दिर गए पर वहाँ रुके नहीं और न ही हमारा फ़ोन रिसीव कर रहे हो ?

दीदी कुछ देर मुझे अकेला छोड़ दो। मैं आपसे घर आकर बात करूंगा। अभी मेरी क्लाइंट के साथ एक इम्पोर्टेड मीटिंग है- अर्नव ने कहा।

ठीक है बाबा ! हम तुम्हें औऱ डिस्टर्ब नहीं करेंगे। घर जल्दी आ जाना। हम आज तुम्हारी पसन्द के आलू के पराठे बनाएँगे।

उधर ख़ुशी घर की रसोई को याद करते हुए चटकारे लेकर कहती है - मेहमानों के लिए गर्मा गर्म कचौरियाँ तली जा रहीं होंगी। उस पर हरी चटनी डाल दो तो स्वाद और बढ़ जाए। अब हमसे तो और इंतज़ार नहीं हो सकता।

कचौरियाँ औऱ अदरक वाली चाय हमें बुला रही है। अब तो हमें जाना ही होगा। शिव जी आप मौसी को संभाल लेना। हम तो चले घर। पूजा की थाली औऱ शीशा लेकर खुशी घर की ओर चल देती है।

दूसरी औऱ एक मीटिंग हॉल में अर्नव अपनी कम्पनी के मार्केटिंग डिपार्टमेंट के टीम लीडर व मेम्बर्स को सख़्ती से हिदायत देते हुए कहता है-" मुझें इस बार एडवरटाइजमेंट से रिलेटेड कोई भी गड़बड़ नहीं चाहिए"

सभी शूट के समय अलर्ट रहेंगे औऱ काम प्रॉपर तरीके से हो जाने के बाद ही ऑफिस छोड़ेंगे।

सभी लड़कों ने एकसाथ सहमति में जी सर कहा।

"ग्रेट" - कहकर अर्नव ऑफिस से चला जाता है।

एडवरटाइजिंग हेड सभी लड़कों से कहता है- जिसको जो काम सौंपा गया है वह उसे बख़ूबी निभाए। वरना उसकी जॉब के साथ मेरी जॉब जाना भी तय है। उसने अपने सामने खड़े एक लड़के से कहा- "तुम अब तक यहीं पर हो। तुम्हें तो मन्दिर से अनुलता मैम को रिसीव करना है ना ? गो फ़ास्ट।

"ओके सर" - कहकर लड़का तेज़ी से ऑफिस के बाहर जाता है, बाकी लोग भी अपने-अपने काम पर लग जाते हैं।

उधर ख़ुशी घर की ओर जाती हैं। पर उसे मन्दिर से कुछ ही दूरी पर लोगों की भीड़ दिखाई देती हैं। उत्सुकतावश वह भीड़ कि तरफ़ अपने कदम बढ़ा देती है। वह तेज़ी गति से जा रहे एक लड़के को रोकती है और उससे भीड़ का कारण पूछती है। जल्दबाज़ी में जा रहा लड़का कहता है - "मशहूर गायिका अनुलता आई है। मैं भी वहीं जा रहा हूँ।"