इस प्यार को क्या नाम दूं ? - 5 Vaidehi Vaishnav द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
शेयर करे

इस प्यार को क्या नाम दूं ? - 5

(5)

अम्मा ! अम्मा ! रोते हुए ख़ुशी औऱ पायल गरिमा को जगाने का प्रयास करती है।

अचानक ख़ुशी उठती है और फ़ोन के पास जाकर एक डायरी उठाती है वह डायरी के पन्नो को जल्दी जल्दी पलटते हुए नम्बर देखती है। जैसे ही उसे नम्बर मिल जाता है वह तुरन्त नम्बर डायल कर देती है।

कॉल रिसीव होते ही खुशी कहती है- हेलो, हम ख़ुशी, सराफा बाजार के महाकाल मिष्ठान से।

उधर से एक शख्स कहता है- हाँ बेटा बोलो क्या हुआ ? सब ठीक तो है न ?

ख़ुशी हड़बड़ाहट में कहती है- अंकल अम्मा बेहोश हो गई है।

ओहो! तुम तुरन्त उन्हें संजीवनी हॉस्पिटल ले आओ। मैं अभी यहीं हूँ।

ठीक है अंकल कहकर ख़ुशी ने फ़ोन का रिसीवर रखा और तेज गति से बढ़ते हुए मधुमती के पास आकर कहती है- बुआजी, अम्मा को तुरन्त हॉस्पिटल ले जाना होगा।

शशि बबुआ भी तो यहाँ नहीं है- सिर पर हाथ रखते हुए चिंतित होकर मधुमती ने कहा।

तुम अम्मा को हॉस्पिटल ले जाने की तैयारी करो ख़ुशी। बाबूजी को हम कॉल करके सारी बात बता देते हैं। वह भी सीधे हॉस्पिटल में ही आ जाएंगे- हकबका कर पायल ने कहा।

ठीक है जीजी- कहकर ख़ुशी हड़बड़ी में घर से बाहर निकल जाती है। घर से कुछ ही दूरी पर ऑटो रिक्शा स्टैण्ड था। ख़ुशी एक ऑटो के पास खड़ी होकर इधर-उधर देखती है।

तभी एक ऑटो चालक ख़ुशी के पास आकर कहता है- क्या हुआ ?

सब ठीक तो है ? तुम चप्पल पहनें बिना ही आ गई।

ख़ुशी ने अपने पैरों को देखा। वह हड़बड़ी में चप्पल पहनना भूल गई थीं।

अचकचाकर ख़ुशी ने कहा- संजीवनी हॉस्पिटल चलना है। जल्दी से ऑटो घर की ओर ले चलो। अम्मा बेहोश हो गई है।

जल्दी से बैठो- कहकर ऑटो चालक अपनी ऑटो में बैठ गया और ऑटो स्टार्ट कर दी। ख़ुशी भी ऑटो में बैठ जाती है। ऑटो चालक तेज़ रफ़्तार से ऑटो चलाता है।

बस-बस यहीं रोक दीजिये। हमें आप की मदद की आवश्यकता होगी- ख़ुशी ने ऑटोचालक से कहा।

ठीक है कहकर ऑटो चालक भी खुशी के साथ घर की ओर चल देता है। दोनो एक साथ घर में प्रवेश करते है। अब तक गरिमा बेसुध ही थी। ऑटोचालक ने गरिमा को उठाया औऱ ऑटो में पिछली सीट पर लेटा दिया। ख़ुशी गरिमा के सिर को अपनी गोद में रख लेती है। पायल भी गरिमा के पैर के पास बैठ जाती है। मधुमती ऑटोचालक के पास बैठ जाती है। तीनों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच जाती है। ऑटोचालक उन्हें सांत्वना देकर कहता है- आप लोग चिंता न करें सब ठीक हो जाएगा।

हवा को चीरता हुआ तेज़ रफ़्तार से ऑटो सुनसान सड़क पर आगे बढ़ता जाता है। तभी एक कार हॉर्न बजाती हुई तेज़ गति से ऑटो के नजदीक से निकलती है। ऑटोचालक का बैलेंस बिगड़ने लगा लेक़िन अपनी सूझबूझ से वह स्थिति सम्भाल लेता है।

आजकल के लड़के शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं, ये भी नहीं देखते हैं कि कोई दीनदुखी है उस पर क्या बीत रही है- मधुमती ने गुस्से से कहा।

कुछ ही देर में ऑटो संजीवनी हॉस्पिटल के सामने रुकता है।

सभी गरिमा को लेकर हॉस्पिटल में प्रवेश करते हैं। ख़ुशी एक वार्डबॉय को रोकते हुए पूछती है- डॉ संदीप कहाँ मिलेंगे ?

इमरजेंसी वार्ड में- वार्डबॉय ने कहा।

ख़ुशी इमरजेंसी वार्ड में अपने कदम बढ़ा देती है। वह वहाँ पहुंचकर वह डॉ सन्दीप से मिलती है और उन्हें जल्दी चलने के लिए अनुग्रह करती है।

डॉ संदीप तुरन्त ख़ुशी के साथ चल देते हैं।

गरिमा का चेकअप करने के बाद कहता है- इन्हें जल्दी से आई.सी.यू. में ले चलो। ख़ुशी जी आप तुरन्त रिसेप्शन पर जाकर फ़ाइल बनवा लीजिए।

ख़ुशी यह सुनकर चौंक जाती है- वह सन्दीप से पूछती है- क्या हुआ है अम्मा को ?

माइनर हार्टअटेक है- डॉ संदीप ने गंभीरता से कहा। और वह वार्डबॉय से बात करते हुए आगे चले गए।

ख़ुशी को लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वक़्त रुक गया। उसका जहां सुना हो गया।

पायल ने ख़ुशी को झकझोरते हुए कहा- ख़ुशी कहाँ खो गई ?

ख़ुशी की चंचल झील सी आँखे अचानक ठहरा समुंदर हो गई जिसमें अश्रु बूंदे झिलमिला रही थी। दर्द की एक लहर दिल में उठी औऱ आँखों के किनारों से टकराकर आँसू बनकर बहने लगीं।

पायल भी रोने लगीं। मधुमतीं भी अपने आँसू पोछते हुए दोनों लड़कियों के सिर पर हाथ फिराते हुए बोली- " घबराओ नहीं बच्चियों.. मधुसूदन सब ठीक करेंगे। ऐ खुशी जाओ जल्दी से फ़ाइल बना लाओ। हम गरिमा को लेकर जाते हैं।

अनमनी सी बिना कुछ कहे ख़ुशी रिसेप्शन की ओर चल दी। वह गुमसुम सी खोई हुई कदमों को बढ़ाती है। उसे महसूस होता है जैसे उसके पैर जम से गए हैं जिनमें लाख कोशिश के बाद भी गति नहीं हो रहीं। उसका दिल मानो पत्थर बन गया है जहाँ हर सकारात्मक भाव टकराकर चकनाचूर हो रहें हैं। नकारात्मक भाव दिल की दीवारों पर सीमेंट की तरह बनकर उस परत चढ़ा रहे हो और दिल को और अधिक कठोर बना रहे हो।

रिसेप्शन से आ रही आवाज़ ने ख़ुशी को ख्यालो के कारवाँ से धकेलकर बाहर वास्तविक दुनिया में खड़ा कर दिया।

एक महिला रेसेप्सनिस्ट से बहस कर रही थी। वह चिल्लाकर कह रही थी- हम कह रहे हैं कि हमारी सासु माँ इन्ही हॉस्पिटल में आई रहीं। हमरे पास हमार बिटवा का कॉल आई रहा। उँ हमका बताएं कि इन्ही हॉस्पिटल में उँ की दादी एडमिट हुई रही।

रिसेप्शनिस्ट कहती है- मैंम आपकी मिक्स भाषा मेरी समझ के परे है।

आप क्या कह रही समझ नहीं आ रहा ?

ख़ुशी बीच में बोल पड़ती है- इनकी सासुजी यहाँ एडमिट है। आप इन्हें उनका रूम नंबर बता दीजिए।

ओह, आई एम वैरी सॉरी मैम- माफ़ी मांगते हुए रिसेप्शनिस्ट ने उस महिला से कहा।

ठंकु बैरी मच, हमका जाइका पड़ी- महिला ने ख़ुशी से कहा और वहाँ से जल्दबाजी में चली गई।

ख़ुशी रिसेप्शनिस्ट से फ़ाइल बनाने का कहती है। खुशी से मरीज से सम्बंधित सारी जानकारी लेकर रिसेप्शनिस्ट ने फ़ाइल तैयार कर दी। फ़ाइल को खुशी की ओर बढ़ाते हुए उसने कहा- पाँच हजार रुपए जमा कर दीजिए मैम।

पाँच हजार..?? हम तो जल्दबाज़ी में रुपए रखना ही भूल गए...

ख़ुशी के लिए तुरन्त पाँच हजार रक़म जमा करना सम्भव नहीं था। वह हड़बड़ी में शशिकांत को कॉल करतीं है और सारी बात बताती है।

शशिकांत कहते हैं- तुम चिंता न करो मैं जल्दी ही आता हूँ। तब तक यदि हो सकें तो ईलाज शुरू करने के लिए निवेदन कर लो।

ठीक है मौसा जी- कहकर ख़ुशी कॉल डिस्कनेक्ट कर देती है।

फ़ाइल उठाकर ख़ुशी रिसेप्शनिस्ट से कहती है- हमारे मौसाजी रुपये लेकर आते ही होंगे। आप कृपा करके ईलाज शुरु करवा दीजिए।

सॉरी मैम मैं ऐसा नहीं कर सकती। मैं भी यहाँ जॉब करती हूं औऱ यहाँ के नियमों के अनुसार ही मुझे काम करना  होता है- असमर्थता जताते हुए रिसेप्शनिस्ट ने कहा।

हम आपकी बात समझते है। पर आप भी हमारी भावनाओं को समझिए। मौसाजी जब तक नहीं आते तब तक आप ये सोने की चेन रख लीजिए। पर मेहरबानी करके हमारी अम्मा का ईलाज शुरू करवा दीजिए- खुशी ने अनुनय करते हुए कहा ।

ख़ुशी की बात सुनकर वह लड़की असहज हो जाती है। चेन को ख़ुशी से लेते हुए वह कहती है- ठीक है मैम। आप जल्दी रुपए जमा करवा दीजियेगा। मैं आपसे यह चेन नहीं लेती पर आप मेरी मजबूरी समझ सकती है। चेन को ड्रावर में रखकर वह लड़की पाँच हज़ार की रसीद बनाकर खुशी को दे देती है।

जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद- कहकर ख़ुशी फ़ाइल औऱ रसीद लेकर वहाँ से चली जाती है।

गरिमा का ईलाज शुरू हो जाता है।

ख़ुशी मन ही मन महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवजी से अपनी अम्मा के उत्तम स्वास्थ्य के लिए कामना करती है।

मधुमती भी आज अपने मधुसूदन से गरिमा के लिए बार-बार प्रार्थना करती है। पायल भी मातारानी से अपनी माँ के लिए लंबी आयु मांगती है। सभी अपने-अपने इष्ट देवी देवताओं से गरिमा के लिए प्रार्थना करते है।

शशिकांत भी हॉस्पिटल पहुँचकर आई.सी.यू. वार्ड की तरफ़ तेज़ गति से बढ़ते हैं।

शशिकांत को आया हुआ देखकर मधुमतीं भावुक हो जाती है वह रोते हुए कहती है- बबुआ ये सब क्या हो गया? मैं तो यहाँ आई थी पायलिया का रिश्ता लेकर। कितने खुश थे हम सब। पहले ख़ुशी गुमशुदा हो गई और अब गरिमा हॉस्पिटल में... इतना कहते हुए मधुमती का गला रुँध गया।

वह आगे कुछ भी न कह सकी और फफककर रोने लगी। ख़ुशी औऱ पायल भी रोने लगती हैं।

शशिकांत खुद को संभाले रखते हैं और सबको धीरज बंधाते हुए कहते है- जीजी आप मन को यूँ दुःखी न करें। ईश्वर हमारी परीक्षा ले रहे हैं। जो भी वो करते है उसमें भलाई ही छुपी होती हैं। ये बुरा वक़्त भी जल्दी ही टल जाएगा।

पायल और ख़ुशी शशिकांत से लिपट जाती है। दोनों के सिर पर हाथ ऱखते हुए शशिकांत कहते है- रोते नहीं बिटियां, सब ठीक हो जाएगा।

अच्छा ख़ुशी हम रुपये जमा करके आते हैं। और जीजी आप बच्चीयों को लेकर घर चले जाओ। यहाँ आपकी सेहत ख़राब हो जाएगी। मैं यहाँ सब सम्भाल लूंगा- शशिकांत ने कहा।

नही, शशि हम यहाँ रहेंगे तो मन को तसल्ली रहेगी। घर पर कुविचारों के काले बादल मंडराते रहेंगे और सिर उन विचारों के भंवर जाल में उलझकर चक्कर खाता रहेगा- मधुमती ने कहा ।

हाँ, हम सब यहीं रहेंगे- ख़ुशी औऱ पायल ने एकसाथ एक ही लय में किसी छोटे बच्चे की तरह ज़िद करते हुए कहा।

अच्छा ठीक है, मैं रुपए जमा करके आता हूँ- कहते हुए शशिकांत जाने लगे।

रुकिये मौसाजी ! रुपए हम जमा करवा देते हैं। आप यही रहिए- ख़ुशी ने पीछे से आवाज देकर कहा।

शशिकांत रुके औऱ मुड़कर ख़ुशी को देखते है। वह ख़ुशी से कहते- मैं रुपए भी जमा कर दूँगा औऱ डॉक्टर से भी मिल लूँगा।

मौसाजी वो बात दरअसल यह है कि रुपये की बात हमने की थी तो वह हमें ही जानती है। लाइये हमें रुपये दे दीजिए- हाथ आगे बढ़ाते हुए ख़ुशी ने कहा।

ठीक है, तुम रुपए जमा कर दो । मैं डॉक्टर से मिलकर आता हूँ- रुपये ख़ुशी को देते हुए शशिकांत ने कहा।

ख़ुशी रुपए लेकर रसीद काउंटर की ओर चली जाती है। शशिकांत भी डॉक्टर के केबिन की ओर अपने कदम बढ़ा देते हैं।

डॉक्टर सन्दीप अपने कैबिन में अकेले ही थे। वह किसी मरीज की फ़ाइल में आँखे गड़ाए हुए थे।

शशिकांत ने केबिन का दरवाजा खटखटाया औऱ डॉक्टर सन्दीप से अंदर आने की इजाज़त माँगते हुए कहा- क्या मैं अंदर आ सकता हूं ?

अपनी गर्दन ऊपर उठाकर डॉ सन्दीप ने शशिकांत को देखा। फ़िर मुस्कुराते हुए बोले- क्यों शर्मिंदा करते हो शशि।

आओ बैठो। अच्छा हुआ तुम आ गए। मुझे भाभी के विषय में बात करना है।

मैं भी उसी विषय में बात करने के लिए आया हूं- शशिकांत ने कहा।

शशिकांत के शब्दों से उनकी घबराहट और बेचैनी ज़ाहिर हो रही थी। जिसे डॉ सन्दीप ने भाप लिया था। शशिकांत की हथेलियों पर हाथ रखते हुए सन्दीप ने कहा- घबराओ नहीं दोस्त। सब ठीक है। हाई ब्लड प्रेशर के कारण हार्ट पर अनावश्यक तनाव होने लगता है। सही समय पर उपचार मिल गया और अब भाभीजी ठीक है। मैंने कुछ टेस्ट लिखें थे। कल उन टेस्ट की रिपोर्ट आ जाएं फिर आगे का देखते हैं। अब भाभी को तनावमुक्त ही रखना। ऐसी कोई भी बात उनसे मत करना जिससे उन्हें सदमा लगे या मन को ठेस पहुँचे।

जी बिल्कुल, मैं ध्यान रखूंगा - शशिकांत ने सन्दीप व ख़ुद को आश्वस्त करते हुए कहा।

अगले दृश्य में ...

ख़ुशी रसीद काउंटर पर जाती है औऱ रुपए देते हुए कहती है- ये लीजिये पाँच हजार रुपए औऱ हमारी चेन हमें दे दीजिए।

रिसेप्शनिस्ट कहती है- मैम आप क्यों मज़ाक कर रही है। आपके रुपए जमा हो गए थे औऱ चेन भी दे दी गई है।

चौंककर ख़ुशी ने परेशान होते हुए कहा- मजाक हम नहीं, आप हमारे साथ कर रहीं हैं।

हम तो आपके पास अभी ही आए हैं। और वह चेन हमारी माँ की है जो उनकी आख़िरी निशानी है हमारे पास- इन शब्दों को कहते हुए ख़ुशी का गला भर आया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके प्राण ही चुरा लिए।

ख़ुशी का उदास चेहरा देखकर वह लड़की घबरा जाती हैं। वह ख़ुशी से कहती है- कुछ देर पहले ही एक चालीस-पेंतालिस उम्र की महिला पाँच हजार रुपए लेकर आई थी जो खुद को ख़ुशी का रिश्तेदार बता रही थीं।

मैंने बिना कोई सवाल किए उन्हें चेन देकर रुपये ले लिए- खेद प्रकट करते हुए वह लड़की खुशी के कंधे पर हाथ ऱखते हुए बोली।

उस लड़की की बातों को सुनकर आँसू की धार ख़ुशी की आँखों के कोर से बहती हुई उसके गालों तक आकर ठहर गईं औऱ ऐसे सूख गई, जैसे तपती मरूभूमि पर पड़ती वर्षा की बूंदों को रेत सोख लेती है।

उदास ख़ुशी वही रसीद काउंटर के पास खड़ी रहती है। ख़ुशी का दिल गुब्बारा बन गया था जिसमें भावनाओं, यादों व दर्द का गुबार बढ़ता ही जा रहा था जिसके यूँ बढ़ते रहने से मानो उसका दिल फट जाएगा। आज ख़ुशी अपनी चेन के बदले कुछ भी करने को तैयार थी बस उसे अपनी माँ की चेन मिल जाये और उसके दिल को भी चैन आ जाए।

ख़ुशी की झील सी आँखों में मोटे-मोटे आँसू मोतियों की टूटी हुई लड़ी से टपटप झड रहे थें। मानो हर एक आँसू चेन के मिलने की दुआ कर रहा हो।

कुछ पल चुप रहने के बाद अपने आँसुओ को पोछते हुए ख़ुशी रिसेप्शनिस्ट से कहती है- क्या आप हमें उनका हुलिया बता सकती है, जिन्होंने रुपये जमा करके चेन ली है ?

काउंटर पर खड़ी लड़की उस महिला को याद करने लगती। तभी ख़ुशी के पीछे से एक चिरपरिचित आवाज आती है।

हुलिया बताए कि कोनहूं जरूरत नाही। व्हाई फियर व्हेन आई एम हियर...

खुशी ने मुड़कर देखा तो पाया की वहीं महिला खड़ी हुई थी जो रिसेपनिस्ट को अपनी बात समझा पाने में असमर्थ थीं औऱ ख़ुशी ने उनकी बात समझकर रिसेपनिस्ट को बताई थीं।

आ..आप..? ख़ुशी ने हैरानी से अचकचाकर पूछा।

हाँ, हम। तुम जब ई रिसेप्शनिस्टीया से बतिया रही उ बखत हम सब सुन लेब। और हमने पाँच हजार रुपए देके तुम्हारी चेन लेके अपने पास रख ली।

जी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया- ख़ुशी ने मुस्कुराते हुए कहा। ख़ुशी को उस महिला की बात सुनकर ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके मरते हुए शरीर को अमृत की बूंदे मिल गई।

शुक्रिया- वुक्रिया से काम नाहीं चलने वाला। हमरी इक शरत है ..महिला गम्भीर होकर बोली।

शर्त की बात सुनकर ख़ुशी का दिल बैठ गया। उसके चेहरे की मुस्कुराहट ऐसे छूमंतर हो गई जैसे बिल्ली को देखकर चूहा हो जाता है।

कैसी शर्त...? ख़ुशी ने सवालिया निगाहों से उस महिला को देखकर पूछा।