बहुत करीब मंजिल - भाग 1 Sunita Bishnolia द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • डर

    अध्यात्म का बहुत सीधा और सरल अर्थ है—ख़ुद को जानना। (‘अधि +...

  • Muhabbat Ek Sabaq - 16

    "अम्मी आप फ्री हैं" ?? आज रूटीन के मुताबिक़ शहरयार वॉक करने...

  • Raaz - Part 9

    सुबह के पाँच बजे थे।चंदनगढ़ की सुबह बाकी जगहों जैसी नहीं थी।...

  • आख़िरी चिट्ठी का रहस्य

    आख़िरी चिट्ठी का रहस्यबारिश की हल्की बूंदें गाँव की कच्ची गल...

  • क्या दीक्षा आवश्यक है ?

    जयगुरु क्या दीक्षा आवश्यक है? — शास्त्र, संत और मानवता की दृ...

श्रेणी
शेयर करे

बहुत करीब मंजिल - भाग 1

‘‘ बहुत करीब मंजिल ’’

‘‘वाह! बहनजी, बहुत ही खूबसूरत कढ़ाई की है इन चुन्नियों पर। अब ये सारी चुन्नियाँ सीधी फिल्मों के सेट पर जाएँगी। इन चुन्नियों को फिल्मों की हिरोइनें अपनी फिल्मों में ओढ़ेंगी।’’ सूट बूट पहने व्यक्ति ने एक-एक कर सभी चुन्नियों को देखते हुए कहा।

घर में आए उस अनजान व्यक्ति के मुँह से चुन्नियों की तारीफ़ सुनकर तारा की माँ बहुत खुश हुई। उस आदमी की बात सुनकर बाबा भी कमरे से बाहर आ गए थे। वो बोलें -‘'ये हमारी लाड़ली तारा के हाथों का कमाल है।’'

‘हाँ भाई साहब मोहल्ले की औरतों को देख-देख कर हमारी बेटी को बचपन से ही ये शौक चढ़ गया। इसने सिलाई-कढाई किसी सीखी नहीं बल्कि सब कुछ देख-देखकर अपने-आप अपनी मेहनत और दिमाग से सीखा और बनाया है। ये है हमारी बेटी तारा।’’ सीढ़ियों में खड़ी तारा की तरफ हाथ से इशारा करते हुए माँ ने कहा।

सूट बूट वाले ने तारा की तरफ देखा तो वो देखता ही रह गया और मन ही मन बुदबुदाया -‘‘इतनी छोटी उम्र और इन हाथों में इतना हुनर। हाथ चूमने का मन कर रहा है इसके।’’

पर उसने अपने आप को संभालते हुए कहा- ‘‘ हाँ बहनजी इस तरह का काम कोई बहुत ही हुनरमंद व्यक्ति ही कर सकता है। आप बहुत भाग्यवान हैं कि आपकी बेटी इतनी अच्छी सिलाई-कढ़ाई करती है। हाँ तो बहनजी इन सबके मिलाकर कितने पैसे हुए ।’’

उसके पूछने पर माँ ने बताया - ‘‘दो हजार रुपए। ’’

"अच्छा जी लीजिए" कहते हुए उसने झटपट अपनी जेब से दो हजार रुपए निकालकर तारा की माँ को दे दिए।

माँ ने फटाफट चुन्नियों की तह की और एक थैले में डालकर थैला उस व्यक्ति को पकड़ा दिया ।

उसने चुन्नियों का पैकेट तो ले लिया पर वो अभी भी वहीं खड़ा था। ये देखकर पिताजी ने कहा- 'ठीक है साब। ’

पिताजी के ऐसा कहने पर वो बोला- "जी ठीक है पर..

उस व्यक्ति के कुछ कहते कहते रुक जाने पर पिताजी बोले -" जी कहिए..

पिताजी की बात का जवाब देते हुए उस व्यक्ति ने कहा - "जी मुझे ये चुन्नियाँ इतनी पसंद आई कि मैं चाहता था आप दस चुन्नी और तैयार करवा दें। "

" दस चुन्नियाँ..!" माँ ने आश्चर्य से कहा।

" जी हाँ दस चुन्नियाँ! क्या महीने भर में दस चुन्नियाँ और मिल सकती हैं, मैं तो तीन दिन बाद बंबई के लिए निकल जाऊँगा। महीने भर बाद मेरा दोस्त बंबई आएगा अगर आप उसके साथ चुन्नियाँ भिजवा सकें तो… ।"

इस पर माँ ने कहा- ‘‘नहीं... नहीं इतनी जल्दी नहीं होगा और इतना जरूरी है भी नहीं। ये बेटी का शौक है मजबूरी नहीं। ’’

"बहनजी आजकल लोग अपने शौक को ही रोजगार बनाकर अच्छा खासा पैसा कमा रहे हैं।"

" हाँ जी कमाते होंगे पर हमें अभी जरूरत नहीं।" उस व्यक्ति की बात का उत्तर देते हुए पिताजी ने कहा।

आपकी बेटी के हाथों में जादू है। इन्होंने दो हजार रुपये में दस चुन्नियों की कढ़ाई कर के दी।अगर ऎसी कढ़ाई बंबई में करवाने जाएंँ तो एक चुन्नी के दो हजार रूपये लग जाते हैं। हाथ की कढ़ाई वाली यही चुन्नियाँ जब फिल्मों में हीरोइनों को पहनाई जाती हैं तो ये डबल रेट में बिकती हैं।’’

क्रमशः..

सुनीता बिश्नोलिया