विश्वास - कहानी दो दोस्तों की - 10 सीमा बी. द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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विश्वास - कहानी दो दोस्तों की - 10

विश्वास (भाग --10)

टीना को रात की खामोशी कई बार इतना बेचैन करती है कि दवा खाने के बाद भी नींद आँखों से कोसों दूर भाग जाती है। हम सबके साथ कभी न कभी ऐसा ही तो होता है , जब दिनभर बहुत बिजी रहने के बाद भी रात को कुछ बातें या यादें हमें घेर कर नींद को पास ही नहीं फटकने देती। मेरे साथ तो अक्सर होता रहता है।

टीना को स्कूल कॉलेज की यादें और दोस्त बहुत याद आते हैंं। एक्सिडेंट से पहले वाली टीना उसको जागने पर मजबूर कर देती है उसके ऊपर ये निराशा कि वो शायद ही कभी ठीक होगी। वो जानती है कि उसका परिवार उसको कितना प्यार करता है ,फिर भी न जाने क्यों उसको अपने आप को खत्म करने के ख्याल आते हैं।

टीना तो ऐसी कभी नहीं थी। उसको तो रंग बिरंगी दुनिया, खुश लोग और जिंदादिली पसंद थी तो वो क्यों मरने की सोचने की बजाय" ठीक होना ही है", सोच पाती।। खैर आज थोडी़ अनमनी सी और सिरदर्द के साथ दिन की शुरूआत हुई । दादी अपना पाठ कर रही थी। साहियका की मदद से सुबह के रूटीन काम से फ्री हुई तो नर्स भी दवा ले कर हाजिर थी।

नर्स के पीछे पीछे सरला जी भी अंदर आयीं। उनके हाथ में मिल्टन का थरमस था। "दीदी भुवन चाय लाया है,हम सबके लिए अपने रसोइये से बनवा कर"। सरला ने थरमस टेबल पर रखते हुए कहा। " अरे सरला भुवन ने क्यों तकलीफ की मीनल तो रोज आती है, भुवन को कॉलेज भी जाना होता होगा"। उमा जी ने कहा। "दीदी मैंने तो उसको मना ही किया था पर वो कहने लगी कि इधर से ही निकलता है कॉलेज के लिए तो चाय नाश्ता पकडाते हुए जाएगा, फिर मैं ज्यादा मना नही कर पायी।

सरला जी की बात पर उमा जी मुस्करा दी।
"अच्छा तो आओ बैठो चाय पी कर जाओ"।
"नहीं दीदी मास्टर जी जाग रहे हैं , वहीं पी लूँगी"। ठीक है , अपने लिए एक कप में चाय ले कर थरमस सरला को देते हुए उमा जी ने कहा। "आप ने एक ही कप ली है, टीना के लिए चाय "? "टीना चाय नही पीती", उमा जी ने कहा।

"ये तो बहुत अच्छी बात है, हम लोगो को तो आदत हो गयी है चाय पीने की", कह कर सरला जी हँस दी। सरला जी के जाने के बाद टीना ने दादी को अपने पास बेड पर बैठने के लिए इशारा किया। उमा जी पोती के सिरहाने जा बैठी, "क्या हुआ बेटा क्यों परेशान है सुबह से"? उसने उमा जी का हाथ अपने माथे पर रख दिया।

"दर्द हो रहा है"? दादी के प्यार भरे स्पर्श से उसकी आँखो में आँसू आ गयेे। दादी ने उसका माथा सहलाया और दबाने लगी। उसकी आँखो से बहते आँसू देख दादी की आँखे भी भर आयी। "मुझे पता है बेटा तू तकलीफ में है, पर क्या करें हम सब तेरी तकलीफ नहीं बाँट पा रहे। मेरा वश चले तो तेरी सारी तकलीफ और दुख मुझे मिल जाएँ और तू बिल्कुल ठीक हो जाए"।

दादी का ऐसा कहना टीना को और दुखी कर गया। उसकी दादी पर पकड़ मजबूत हो गयी। "तुझे पता है न तू हम सबकी जान है,
फिर क्यों तू हमारे लिए जीने की सोचती !!! नेगेटिव सोचना छोड़ दे मेरी बच्ची और जल्दी से अच्छी हो जा"। ये सब दादी पहली बार नही कह रही थी, टीना समझती तो सब है, पर जब अमल करने का टाइम आता है और वो कोशिश भी करती है पर शारीरिक दर्द के आगे हार मान लेती है।

कुछ देर रो कर दोनों का मन हल्का हो गया तो एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्करा दी, यही वो टाइम था, जब टीना के मम्मी पापा ने कमरे में कदम रखा।
क्रमश: