Still Waiting For You - Rashmi Ravija books and stories free download online pdf in Hindi

स्टिल वेटिंग फ़ॉर यू- रश्मि रविजा

70- 80 के दशक के तक आते आते बॉलीवुडीय फिल्मों में कुछ तयशुदा फ़ॉर्मूले इस हद तक गहरे में अपनी पैठ बना चुके थे कि उनके बिना किसी भी फ़िल्म की कल्पना करना कई बार बेमानी सा लगने लगता था। उन फॉर्मूलों के तहत बनने वाली फिल्मों में कहीं खोया- पाया या फ़िर पुनर्जन्म वाला फंडा हावी होता दिखाई देता था तो कोई अन्य फ़िल्म प्रेम त्रिकोण को आधार बना फ़लीभूत होती दिखाई देती थी।

कहीं किसी फिल्म में नायक तो किसी अन्य फ़िल्म में नायिका किसी ना किसी वजह से अपने प्रेम का बलिदान कर सारी लाइम लाइट अपनी तरफ़ करती दिखाई देती थी। कहीं किसी फिल्म में फिल्म में भावनाएँ अपने चरम पर मौजूद दिखाई देतीं थी तो कहीं कोई अन्य फ़िल्म अपनी हल्की फुल्की कॉमेडी या फ़िर रौंगटे खड़े कर देने वाले मार धाड़ के दृश्यों के बल पर एक दूसरे से होड़ करती दिखाई देती थी।

उस समय जहाँ बतौर लेखक एक तरफ़ गुलशन नंदा सरीखे रुमानियत से भरे लेखकों का डंका चारों तरफ़ बज रहा था तो वहीं दूसरी तरफ़ सलीम-जावेद की जोड़ी को भी उनकी मुँह माँगी कीमतों पर एक्शन प्रधान फिल्मों की कहानी लिखने के लिए अनुबंधित किया जा रहा था। ऐसे ही दौर से मिलती जुलती एक भावनात्मक कहानी को प्रसिद्ध लेखिका, रश्मि रविजा हमारे समक्ष अपने उपन्यास 'स्टिल वेटिंग फ़ॉर यू' के माध्यम से ले कर आयी हैं।

मूलतः इस उपन्यास में कहानी है
कॉलेज में एक साथ पढ़ रहे शची और अभिषेक की। इस कहानी में जहाँ एक तरफ़ बातें हैं कॉलेज की हर छोटी बड़ी एक्टिविटी में बड़े उत्साह से भाग लेने वाले मस्तमौला तबियत के अभिषेक की तो वहीं दूसरी तरफ़ इसमें बातें हैं साधारण नयन- नक्श की सांवली मगर आकर्षक व्यक्तित्व की प्रतिभाशाली युवती शची की। मिलन और बिछोह से जुड़े इस उपन्यास में शुरुआती नोक-झोंक के बाद शनैः
शनैः उनमें आपस में प्रेम पनपता तो है लेकिन कुछ दिनों बाद शची, अभिषेक को अचानक नकारते हुए उसके प्रेम को ठुकरा देती है और बिना किसी को बताए अचानक कॉलेज छोड़ किसी अनजान जगह पर चली जाती है।

किस्मत से बरसों बाद उनकी फ़िर से मुलाकात तो होती है मगर क्या इस बार उनकी किस्मत में एक होना लिखा है या फ़िर पिछली बार की ही तरह वे दोनों अलग अलग रास्तों पर चल पड़ेंगे?

धाराप्रवाह शैली में लिखे गए इस भावनात्मक उपन्यास में प्रूफरीडिंग के स्तर पर कुछ कमियाँ भी दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 13 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'वैसे यह भी ज्ञात हुआ कि एक्स्ट्रा करिकुलर 'सुबह सवेरा' काफ़ी हैं उसकी।'

इस वाक्य में लेखिका बताना चाह रही हैं कि 'शची की रुचि एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ में काफ़ी रुचि है लेकिन वाक्य में ग़लती से 'एक्टिविटीज़' या इसी के समान अर्थ वाला शब्द छपने से रह गया। इसके साथ ही त्रुटिवश 'सुबह सवेरा' नाम के एक अख़बार का नाम छप गया है जिसकी इस वाक्य में ज़रूरत नहीं थी।

सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

वैसे यह भी ज्ञात हुआ कि एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ काफ़ी हैं उसकी।'

इसी तरह पेज नंबर 36 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'सारा गुस्सा, मनीष पर उतार दिया। मनीष चुपचाप उसकी स्वगतोक्ति सुनता रहा। जानता था, यह अभिषेक नहीं उसका चोट खाया स्वाभिमान बोल रहा है। उसने ज़रा सा रुकते ही पूछा, "कॉफी पियोगे?"

"पी लूँगा".. वैसी ही मुखमुद्रा बनाए कहा उसने और फिर शुरू हो गया।'

इसके पश्चात एक छोटे पैराग्राफ़ के बाद मनीष, अभिषेक से कहता दिखाई दिया कि..

'ऐसा तो कभी कहा नहीं शची ने..चल जाने दे..चाय ठंडी हो रही है..शुरू कर।'

अब यहाँ ये सवाल उठता है कि जब कॉफ़ी के लिए पूछा गया और हामी भी कॉफ़ी पीने के लिए ही दी गयी तो अचानक से कॉफी , चाय में कैसे बदल गयी?

इसके आगे पेज नंबर 44 में कॉलेज के प्रोफ़ेसर अपने पीरियड के दौरान अभिषेक से कोर्स से संबंधित कोई प्रश्न पूछते हैं और उसके प्रति उसकी अज्ञानता को जान कर भड़क उठते हैं। इस दौरान वे छात्रों में बढ़ती अनुशासनहीनता, फैशन परस्ती, पढ़ाई के प्रति उदासीनता, फिल्मों के दुष्प्रभाव इत्यादि को अपने भाषण में समेट लेते हैं जो बेल लगने के बाद तक चलता रहता है।

यहाँ लेखिका ने पीरियड समाप्त होने की घंटी के लिए 'बेल बजने' में 'Bell' जैसे अँग्रेज़ी शब्द का इस्तेमाल किया जबकि 'Bell' हिंदी उच्चारण के लिए 'बेल' शब्द का प्रयोग किया जो कि संयोग से 'Bail' याने के अदालत से ज़मानत लेने के लिए प्रयुक्त होता है।

अब अगर 'Bell' के उच्चारण के हिसाब से अगर लेखिका यहाँ हिंदी में 'बैल' लिखती तो अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती कि एक घँटी जैसी निर्जीव चीज़ को सजीव जानवर, बैल में बदल दिया जाता।

अतः अच्छा तो यही रहता है कि ऐसे कंफ्यूज़न पैदा करने वाले शब्द की जगह देसी शब्द जैसे 'घँटी बजने' का ही प्रयोग किया जाता।

अब चलते चलते एक महत्त्वपूर्ण बात कि जब भी हम कोई बड़ी कहानी या उपन्यास लिखने बैठते हैं तो हमें उसकी कंटीन्यूटी का ध्यान रखना होता है कि हम पहले क्या लिख चुके हैं और अब हमें उससे जुड़ा हुआ आगे क्या लिखना चाहिए। लेकिन जब पहले के लिखे और बाद के लिखे के बीच में थोड़े वक्त का अंतराल आ जाता है तो हमें ये तो याद रहता है कि मूल कहानी हमें क्या लिखनी है मगर ये हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि हम पहले क्या लिख चुके हैं।

पहले के लिखे और बाद के लिखे में एक दूसरे की बात को काटने वाली कोई बात नहीं होनी चाहिए। इसी तरह की एक छोटी सी कमी इस उपन्यास में भी मुझे दिखाई दी। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 125 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'जब वह 'कणिका' को याद नहीं कर पा रहा था तो बड़ी गहरी मुस्कुराहट के साथ बोली थी, 'कभी तो तुम्हारी बड़ी ग़हरी छनती थी उससे' इसका अर्थ है वह भूली नहीं है कुछ।'

यहाँ शची, अभिषेक को कणिका के बारे में बताती हुई उसे याद दिलाती है कि कणिका से कभी उसकी यानी कि अभिषेक की बड़ी ग़हरी छना करती थी।

अब यहाँ ग़ौरतलब बात ये है कि इससे पहले कणिका का जिक्र पेज नम्बर 121 की अंतिम पंक्तियों में आया और जो पेज नम्बर 122 तक गया लेकिन इस बीच कहीं भी उपरोक्त बात का जिक्र नहीं आया जो पेज नंबर 125 पर दी गयी है।

इस उपन्यास में कुछ जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना थोड़ा खला। मनमोहक शैली में लिखे गए 136 पृष्ठीय इस बेहद रोचक एवं पठनीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है प्रलेक प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 200/- जो कि कंटेंट एवं क्वालिटी के हिसाब से जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

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