सोई तकदीर की मलिकाएँ - 16 Sneh Goswami द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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सोई तकदीर की मलिकाएँ - 16

 

सोई तकदीर की मलिकाएँ 

 

16

 

पथकन से लौट कर केसर को कोठरी में आते ही अपनी सुबह की बेवकूफी फिर से याद हो आई । उसने अपनेआप को जी भर कर कोसा – ये आज हो क्या गया था उसे । ऐसे कैसे उसने शरम हया बेच खाई थी कि भोले के गले से लिपट गई । गले से चिपकी तो चिपकी , चिपक कर रो भी दी । पता नहीं सरदार ने इस सब का क्या मतलब निकाला होगा । क्या सोचा होगा उसने । यह सब ऊटपटांग बातें उसके दिमाग में आई कहाँ से । दिमाग में आते ही वह मर क्यों न गई । छोटी सरदारनी उसे सगी बहनों से भी ज्यादा प्यार करती है । उसकी हर जरूरत का ध्यान रखती है । उसे पता लगा तो वह क्या सोचेगी । ऊपर से ये छोटा सरदार , पूरा नाराज हो गया लगता है । सुबह से घर से निकला हुआ अब तक नहीं लौटा । भूखा प्यासा न जाने कहाँ भटक रहा होगा । लौटेगा तो वह माफी मांग लेगी । पर माफी मांगेगी कैसे । उसे तो माफी मांगनी ही नहीं आती और उसे यह मौका पता नहीं मिलेगा भी या नहीं । अगर इन लोगों ने नाराज होकर उसे हवेली से निकाल दिया तो वह कहाँ जाएगी । किसके सहारे जिएगी । कहाँ आसरा मिलेगा उसे । वह यह सब सोच ही रही थी कि बसंत कौर ने उसे पुकारा – ए केसर , चल इधर आ , रोटी खा ले ।
सरदारनी की आवाज को अनसुना करना केसर के लिए असंभव था । वह बिना एक पल गंवाए बाहर आई । चौकें में सरदारनी उसकी रोटी और सब्जी की कटोरी लिए खङी थी । उसने चुपचाप रोटी सब्जी पकङी और वहीं चौंके के पास बैठकर सिर झुकाए झुकाए रोटी खाने लगी । रोटी खाकर उसने नलके पर ले जाकर बर्तन मांजे । तब तक बसंत कौर ने कपङे धोने के लिए सोडा उबाल लिया था तो वह नलके पर थपकी से पीट पीट कर कपङे धोने लगी ।
तभी भोला सिंह साइकिल लिए घर में घुसा । उसने साइकिल दीवार के सहारे टिकाई , तभी उसे ध्यान आया कि वह खेत गया था तो गाय भैंसों के लिए चरी और मक्की काट लाता । वहाँ खेत में खाली बैठा रहा । अपनी उलझनों में उलझता सुलझता रहा । मन की परेशानी में उसे सामने उगी चरी दिखाई ही नहीं दी कि दो तीन भरियां काट लेता । शाम को गाय भैंसों के चारे के काम आती । उसने गेजे को पुकारा -
गेजे ओ गेजे
जी भाई
सुन ऐसा कर , खेत जाकर पसुओं के लिए चारा काट ला । आज मुझसे चारा लाया नहीं गया ।
जी भाई । कोई बात नहीं । मैं जाकर ले आता हूँ । – गेजे ने तुरंत दरांत उठाई और साइकिल लेकर चारा लेने खेत चल पङा ।
भोले को आँगन में आता देख कर केसर नलका छोङ कर एक ओर सिर झुकाए खङी हो गयी । भोला सिंह ने रगङ रगङ कर हाथ पैर धोए । मुँह पर पानी के कई छींटे मारे । तब तक परना लिए बंसत कौर चली आई – सरदारा , आज सुबह तङकसार ही सुच्चे मुँह किधर निकल गया था । देख परछावां भी ढल गया । कहाँ रहा सारा दिन । रोटी रूटी की कोई जरूरत है कि नहीं ।
एक बहुत जरूरी काम था । करने गया था । अब तू दो मिनट लगा । रोटी डाल दे । या ऐसा कर , रोटी थाली में डाल कर ऊपर चौबारे में ही ले आ । भूख के मारे बुरा हाल हुआ पङा है । आंते बुरी तरह से कुलबुला रही हैं । चूहों ने पेट में अलग धमाचौंकङी मचा रखी है ।
हाथ मुँह पौंछकर उसने परना बसंत कौर के हाथ पर रख दिया । बसंत कौर ने उसका मुँह देखा । आँखें चुगली कर रही थी कि भोला सिंह झूठ बोल रहा है । ऐसा कौन सा इतना जरूरी काम आन पङा था कि बिना नहाए , बिना खाए चला गया । पर बसंत कौर ने आगे कुछ नहीं पूछा । इन लङकियों को माँ , दादी , नानी ने घुट्टी में ही पिला दिया होता है कि पति परमेश्वर होता है । वह कुछ भी करे , कर सकता है । औरत को चुपचाप सहन करना होता है । ज्यादा सवाल जवाब करने से पति नाराज हो गया तो घर गृहस्थी तहसनहस हो जाती है । औरत को सब्र और सहनशीलता से काम लेना चाहिए इसलिए बसंत कौर ने भी अगला सवाल नहीं किया । वह चुपचाप चौंके में गई और थाली में चार रोटियाँ , कद्दू की सब्जी में मक्खन का पेङा डालकर हरी मिरच का अचार रखा । साथ में चिब्बङ की चटनी और लोटा भर लस्सी । यह सब लेकर वह चौबारे पहुँची जहाँ भोला सिंह उसका बेसब्री से इंतजार कर रहा था । थाली सजी देख कर उसकी भूख और तेज हो गयी ।
अल्लाह अल्लाह राम राम करते शाम ढल गयी । रात तारों की झिलमिलाती चूनर ओढे धीरे धीरे आसमान से नीचे उतर आई । उसने पेङ पौधों समेत सारी धरती को अपने आगोश में ले लिया । चाँद अभी जगत की सैर करने के लिए निकला न था । रात रानी के फूल अपनी महक बिखेर रहे थे । आवारा कुत्तों के भोंकने से सन्नाटा थोङी देर के लिए टूटता पर फिर सब शांत हो जाता । लोग चारपाइयों पर टेढे हो गये थे । भोला सिंह गली में घूमता हुआ जब तक लौटा , बसंत कौर चौका समेट कर ऊपर चौबारे में जा चुकी थी ।
भोला सिंह ने सीधे कोठरी का रूख किया । केसर ने पैरों की आहट सुनी तो उसका दिल धङकने लगा । रोम रोम सिहर उठा । यह क्या , आज सरदार सीधा उसी की कोठरी की ओर चला आ रहा था । वह घबराकर पसीना पसीना हो गई । उसका मन किया धरती में कहीं समा जाय । पर वह सीता नहीं थी । वह थी कलयुग की एक पापिन लङकी जिसने जान बख्शवाने का अपराध किया था । सारे परिवार के मारे जाने पर भी उसे अपनी जिंदगी सलामत चाहिए थी । पर उसके जीने का फायदा क्या हुआ । यहाँ आकर नेक दिल बेबे जी के संताप और मौत का कारण बनी । सगे से भी ज्यादा चाहनेवाली बसंत कौर सरदारनी के दुख का कारण रही और आज जो उससे हो गया ...।
तब तक भोला सिंह उसकी चारपाई तक आ पहुँचा था । उसने केसर को चारपाई पर बैठे देखा । केसर दोनों हथेलियों में मुँह छिपाए चारपाई पर पैर लटकाए थी । भोला सिंह ने उसके दोनों हाथ पकङ लिए – केसर ।
केसर के भीतर से कुछ उमङ घुमङ रहा था कि भोला ने उसे बाहों में भर लिया – अब बता , सुबह क्या कह रही थी ?
केसर लाज से गङ गई । उससे कुछ कहा न गया । वह भोले की छाती में मुँह गङाए रही । भोले ने उसका मुँह ऊपर उठाया । आँसू पलकों के ओर छोर मोतियों की तरह लटके हुए थे । भोले ने उन पलकों को चूम लिया । फिर क्या था वह केसर का मुँह , गाल , होंठ बेतहाशा चूमता रहा । केसर की नाजुक सी बाँहें भोले को कसती चली गयी ।
तू जानती तो है केसर , पिछले दिनों इस घर पर क्या गुजरी । मैं .. मेरा मन ही नहीं किया किसी चीज को । मैं आया ही नहीं तेरे पास ..।
केसर उसमें समाती जा रही थी । वह केसर में समाता जा रहा था । करीब घंटे भर बाद वह अपने चौबारे की सीढियाँ चढ रहा था ।


बाकी फिर ...