खूनी किताब-एक रहस्य Akash Saxena "Ansh" द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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खूनी किताब-एक रहस्य

अरे अवंतिका ! अवन्ति(प्यार से) कहाँ हो यार जल्दी करो नहीं तो सेमिनार खत्म हो जायेगा.....वैसे भी बड़ी मुश्किल से पिछली बार एंट्री मिली थी।

आ रही हूं मीत यार ! तुम भी ना कभी चैन से तैयार नहीं होने देते मुझे
......अवंतिका साड़ी ठीक करती हुयी कमरे से बाहर आती है।

अवंतिका को देखकर मीत के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और वो अवंतिका को प्यार से छेड़ते हुए कहता है की-आज तो कोई बड़ा ही खूबसूरत लग रहा है।

इस पर अवंतिका एक बड़ी सी बनावटी मुस्कान मीत को दिखाकर बोलती है-हाँ! हाँ पता है अब मक्खन मत लगाओ...सब मालूम है मुझे,तुम चलो....पहले चिल्लाते हो फ़िर मक्खन लगाते हो....

मीत-वैसे आज ये मोतियों की माला कैसे पहन ली तुमने?

अवंतिका-क्यूँ नहीं पहन सकती....तुम्हारी माया कितनी भी अंगूठी और माला पहने तब कुछ नहीं।

मीत-अच्छा तो ये बात....हाहा हाहाहा

नोक-झोंक करते हुए,अवंतिका और मीत दोनों एक दुसरे की बाँहों मे बाहें डालकर बाहर की तरफ कदम बढ़ाते ही हैँ की तभी उनके मेन डोर की बेल भी बजती है....जिसे सुनकर दोनों एक साथ दरवाज़ा खोलते हैँ।

"सर पार्सल" दरवाजे पर खड़ा डिलीवरी बॉय अपने हाथ से पार्सल को मीत की तरफ बढ़ाते हुए कहता है।

मीत-किसका?कैसा पार्सल भाई मैंने तो कुछ आर्डर नहीं किया?

डिलीवरी बॉय पार्सल को अलट-पलट कर देखता है और दोबारा से मीत की तरफ बढ़ाते हुए कहता है-सर पार्सल तो इसी अड्रेस पर डिलीवर करना है...ये देखिये आपका नाम और अड्रेस दोनों पड़े हैँ।

मीट उस से पार्सल लेता है और उस पर एक नज़र घुमाते-घुमाते बड़बड़ाता जाता है....-ये किसने भेज दी आफत...मैंने तो कुछ भी नहीं मंगाया....है क्या आखिर इसमे??

मीत उस पार्सल को देखते देखते अपनी सोच मे खो जाता है.....जिसे देखकर उसके बाजू मे खड़ी उसकी बीवी अवंतिका का गुस्सा सर चढ़ने लगता है और वो बड़े ही गुस्से से पार्सल मीत के हाथ से छीनकर उस डिलीवरी बॉय से ऊँची आवाज़ मे पूछती है....

अवंतिका-अरे भैया क्या है इसमे? और कहाँ से आया है ये? सुबह सुबह दिमाग़ का दही बनवा रहे हो।

अवंतिका की आवाज़ सुनकर, डिलीवरी बॉय बड़ी ही सहमी सी आवाज़ मे जवाब देता है-मेम इस मे क्या है ये तो मुझे मालूम नहीं....लेकिन ये मिसेस माया देवी के यहाँ से है.....

माया देवी का नाम सुनते ही अवंतिका का गुस्सा फुरर्र हो जाता है और डिलीवरी बॉय की बात काटते हुए ही वो बोलने लगती है-ओ,मुझे माफ़ कीजियेगा मैं तो भूल ही गयी थी इसके बारे मे ....आपका बहुत-बहुत शुक्रिया इसे हम तक पहुँचाने के लिये.....लाईये कहाँ सिग्नेचर करने है।

अवंतिका पार्सल लेकर उसे खोलने ही लगती है की मीत उसे सेमिनार की याद दिलाता है..सेमिनार का नाम सुनते ही वो तुरंत उस पार्सल को वहीं रखती है और दोनों सेमिनार के लिए निकल जाते हैं।

गाड़ी मे मीत अवंतिका से-अच्छा अवन्ति वो उस पार्सल मे क्या था?

अवंतिका-ओह सॉरी यार मै तुम्हे बताना ही भूल गयी थी....तुम्हे ध्यान है जब हम लास्ट टाइम माया देवी जी के सेमिनार मे गए थे।

मीत-हाँ! हाँ! बिलकुल याद है माया देवी जैसी बेहतरीन और रहस्यमयी लेखिका का सेमिनार कौन मिस कर सकता है....मै तो कभी नहीं।

अवन्ति-हाँ तो उस सेमिनार मै मुझे माया जी के साथ कुछ देर बातें करना का मौका मिल गया था....तब मैंने उन्हें बताया की हम लोग उनके कितने बड़े फैन हैँ और उनकी लिखी हर किताब को हमने पढ़ा है। और तुम्हे पता है क्या ? मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ था जबाब उन्होंने ये बात कही थी।

मीत बड़ी ही उत्सुकता से-तुमने माया जी से बात की..... क्या? क्या कहा तो माया जी ने?

अवंतिका-पहले तो उन्होंने मुझे शुक्रिया कहा, उन्हें इतना प्यार देने के लिए और फ़िर वो बोली की उनकी अगली किताब की पहली ओरिजिनल कॉपी वो अपने अगले सेमिनार यानि की आज सबसे पहले हमें भेजेंगी और गैस व्हाट्?

मीत अवंतिका की बातें सुनते-सुनते पहले ही इतना खुश चुका था और अब उस पर भी एक गैस और मीत बिना कुछ सोचे पूरे जोश से बोला -उस पार्सल मे माया देवी की अगली किताब की फर्स्ट कॉपी है......तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है अवंतिका(मीत ख़ुशी के मारे चिल्लाते हुए).......मतलब

अवंतिका भी ख़ुशी के मारे चिल्लाते हुए हाँ हाँ चिल्लाये जा रही थी और अगले ही पल मीत ने गाड़ी रोकी और अवंतिका को कस कर गले लगा लिया....वो दोनों ही उस एक पल मे खो गए....लेकिन माया देवी को वो कैसे भूल जाते....

अवन्ति-अब चलो भी मीत लगता है की उनका सेमिनार शुरू हो चुका है,और दोनों गाड़ी से निकलकर सेमिनार हॉल मे भागते हुए जा घुसते हैँ।

सेमिनार मै दोनों को शाम हो जाती है और दोनों बातें करते हुए घर लौट रहें होते हैँ। दोनों को मूड थोड़ा सा ऑफ होता है और गाड़ी मै भी एक दम शान्ति ।

शान्ति देखकर अवंतिका से रहा नहीं जाता aur वो मीत से बड़ी ही मायूसी से कहती है-आज पहली बार सेमिनार मे जाना बिलकुल ही बेकार रहा।

मीत भी मुरझाया सा-हाँ यार! माया जी की तबियत भी आज ही खराब होनी थी,मुझे उनसे आज मिलने का बहुत मन था।

अवंतिका-ऐसा मत बोलो मीत,भगवान करे की वो बस जल्दी से ठीक हों जाएं।

मीत-मै भी यही प्रार्थना करता हूँ की वो ठीक हों जाएं......इतना कहकर मीत दो सेकंड के लिए रुका और फ़िर अचानक से वो अवंतिका से मुस्कुराता हुआ बोला-अरे अवन्ति हम ये तो भूल ही गए की उनकी अगली किताब हमारी घर पर ही रखी है।

अवंतिका ,मीत की तरफ़ मुँह फाड़ते हुए देखती है और ख़ुशी से झूम उठती है।

कुछ ही देर मे दोनों घर पहुँच जाते हैँ और अवंतिका गाड़ी रुकते-रुकते ही उसमे से कूद कर घर की तरफ दौड़ लगा देती है और उसका पीछे-पीछे मीत भी।अवंतिका फटाफट गेट खोलकर अंदर घुसती है और लाइट ऑन करती है,पर ये क्या...

मीत-लाइट क्यूँ नहीं जल रही बाहर तो सबकी लाईट आ रही है।

अवंतिका फटाफट से फ़ोन की टोर्च ऑन करती है और उस पार्सल की तरफ टोर्च मारती है,लेकिन उसे वो पार्सल वहां नहीं दिखता....वो कुछ बोल पाती की उस से पहले ही मीत उस से मेन स्विच चेक करने की बात कहकर वहां से निकल जाता है। अवंतिका को थोड़ी हैरानी तो होती है लेकिन थकान के मारे वो दिमाग़ पर ज़्यादा ज़ोर ना डालते हुए पार्सल को वहीं आस-पास खोजने लगती है......पार्सल की तलाश करते-करते उसकी नज़र उसके बैडरूम पर पड़ती है,जिसका दरवाजा हल्का सा खुला होता है और उसमे से हल्की हल्की चमकदार लाल रोशिनी बाहर आ रही होती है....अवंतिका रोशनी के देखकर घबरा जाती और मीत को आवाज़ देने लगती है-मीत! मीत ! यहाँ आओ जल्दी से .....अवंतिक, मीत को कई आवाज़ें देती है लेकिन शायद उसकी आवाज़ मीत तक पहुँच ही नहीं रही होती।

वो एक ही समय पर थोड़ा डर भी रही होती है और साथ ही साथ धीरे धीरे उस कमरे की तरफ कदम भी बढ़ा रही होती है....उस रोशनी की चमक ही ऐसी थी की वो हर किसी को अपने पास खींच ले। घबराती हुयी अवंतिका कमरे तक पहुँच ही जाती है और दरवाज़े को धीरे से धक्का मार देती है।

दरवाज़ा खुलते ही,चमक से वो अपनी आँखें बंद कर लेती है और उसे एक आवाज़ सुनाई देती है...जैसे कोई अपनी साँसों से उसे बुला रहा हो..."आओ अवंतिका,मेरे पास आओ,मुझे बरसो से बस तुम्हारा ही इंतजार था।"

आवाज़ सुनकर वो अपनी आँखों से झट से हाथ हटाती है,और अगले ही पल लाईट आ जाती है। तब अवंतिका देखती है की एक,काले हीरो से जड़ी,ऊपर उभरा एक अजीब सा चिन्ह,सोने की तरह चमकते हुए पन्ने और ढेरों चित्रकारी के बीचों-बीच एक बड़ा सा लाल रत्न लिए एक किताब उसके बेड पर पड़ी है और एक रेपर उसके बेड किनारे।
वो समझ जाती है की उस लाल रत्न मे से ही वो रोशनी निकल रही थी जो अब भी हल्का हल्का चमक रहा था। किताब को देखकर उसके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान तो होती है,लेकिन माथे पर शिकन भी।
लेकिन माया देवी की किताब जानकर और उस किताब की खूबसूरती देख कर उस से रहा नहीं जाता और वो कूद कर बेड पर चढ़ जाती है और उस किताब को छूने के लिए जैसे ही अपना हाथ आगे बढाती है तभी अचानक एक ज़ोरदार आवाज़ आती है-"रुको"
वो पलट कर देखती है तो मीत भी हैरानी के साथ मुस्कान लिए आ जाता है और अवंतिका से कहता है-वाह अवन्ति! तुमने तो अकेले ही खोल लिया पार्सल।

लेकिन अवंतिका मीत से कुछ भी नहीं कहती।

मीत दोबारा से-अब इस किताब को खोलने का हक़ मेरा बनता है।

मीत की बातें खत्म होते ही अवंतिका उसकी तरफ गुस्से से घूरने लगती है और एक दम से उठकर वो मीत को धक्का दे देती है।

मीत ज़ोर से गिर जाता है और दरवाजे से उसके हाथ पर हल्का सा कट लग जाता है जिसे देखकर अवंतिका शायद वापस होश मे आ जाती है और मीत से कहती है-मीत आई ऍम सॉरी,मैंने ये जान कर नहीं किया,मुझे नहीं पाता मुझे एक पल के लिए क्या हुआ....दिखाओ तो ज़रा तुम्हे ज़्यादा चोट तो नहीं आयी।

अवन्ति,मीत का हाथ देख ही रही होती है की तभी उनके घर का लैंडलाइन फ़ोन बज उठता है।जिसे सुनकर मीत,अवन्ति को जाकर फ़ोन उठाने के लिए कहता है और साथ ही फर्स्ट ऐड बॉक्स भी...अवंतिका तुरंत भागती हुयी कमरे से चली जाती है।

इधर मीत अपने हाथ का खून पोंछ रहा होता है की तभी उसे कमरे मे किसी और के भी होने की आहट महसूस होती है।वो झट से पलट कर पूरे कमरे मे एक नज़र घुमाता है और फ़िर दोबारा से अपना ज़ख्म देखने लगता है।

"अवंतिका किसका फ़ोन है,कितनी देर लगेगी तुम्हे" मीत ज़ोर से आवाज़ लगाता है और उसकी आवाज़ खत्म होने के साथ ही लाइट फ़िर चली जाती है।

"अवंतिका! अवन्ति!" वो फ़िर आवाज़ लगाता है और अगले ही पल अवन्ति अचानक उसके सामने आ जाती है जिसे देख कर वो डर जाता है।

"अरे तुम क्या कमरे के बाहर ही थी।,किसका फ़ोन था।"

'पता नहीं कोई साफ़ आवाज़ नहीं आ रही थी...ऐसा लग रहा था कोई कुछ ज़रूरी बात कहना चाहता था लेकिन तब तक फ़ोन कट गया'

"तो तुमने वापस फ़ोन नहीं लगाया"

'लगाया था,पर लगा ही नहीं'

"अच्छा चलो अब दवा लगा दो मै इस लाईट को देख कर आऊं,स्विच ही निकला होगा फ़िर से लूज़ था थोड़ा"

अवंतिका जल्दी से मीत के दवा लगाने लगती है की उसी बीच फ़िर फ़ोन बजता है।

"अब जाओ देखो जाकर कौन है,और आराम से जाना अंधेरा है"मीत के कहने पर जैसे ही अवंतिका कमरे से निकलती है,कमरे का दरवाजा अपने आप बाहर से लॉक हो जाता है,जिसकी आवाज़ अवन्ति को सुनाई नहीं देती ।मीत ये सोचता है की अवंतिका उसके साथ कोई मज़ाक़ कर रही है और वो दरवाजे को खोलने की कोशिश करने लगता है। लेकिन वो नहीं खुलता बल्कि वो कमरा उस लाल रोशिनी से फ़िर चमक उठता है।मीत पीछे मुड़ता है और उसके कदम भी अवंतिका की तरह उस किताब की तरफ बढ़ने लगते हैं और साथ ही साथ वही रहस्यमयी आवाज़ फ़िर आने लगती है-आओ...मेरे पास आओ...

दूसरी तरफ अवंतिका फ़ोन उठाती है________

"हेलो कौन?....हेलो"

'''''""हेलो अवं...अवंतिका....मै बोल रही हूँ माया""""

"कौन माया?"

""""""""अवंतिका मै माया देवी जिसने तुम्हे आज किताब भेजी है""""""

"अरे माया जी! आपने फ़ोन करने का कष्ट क्यूँ किया वो भी इस समय"

"""""""देखो बेटी मै ज़्यादा कुछ नहीं कह सकती....बस तुम ध्यान से सुनो....तुम उस किताब को खोलना मत चाहें कुछ भी हो जाए"""""""

''किताब....मत.....हेलो....हेलो" फ़ोन मे आवाज़ ख़राब हो जाती है "हेलो माया जी आप सुन रही हो....हेलो"

तभी फ़ोन के स्पीकर मे से माया देवी की ज़ोर से आवाज़ आती है """"""""किताब मत खोलना चाहे जो हो जाए"""""

अवंतिका को ये सब अब थोड़ा अजीब लगने लगता है और तभी उसकी नज़र उस कमरे पर पड़ती है जिसमे से वो रोशनी आ रही होती है। वो दौड़ कर जाती है लेकिन दरवाजा लॉक होता है ....वो धक्का मारकर कोशिश करती है,मीत को ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ देती है.....उसे मना करती है की वो किताब ना खोले.......लेकिन उसकी आवाज़ बाहर ही रह जाती हक़ और गेट भी नहीं खुलता, फ़िर वो भागती हुयी जाकर चाबी ढूंढ़ने लगती है।

लेकिन अंदर मीत किताब के पास बैठा हुआ होता है और उस किताब की खूबसूरती उस से देखते नहीं बनती.....और वो आवाज़,वो आवाज़ जैसेअब उसके दिमाग़ मे घर कर गयी हो। अब उस से और सब्र नहीं होता और वो आख़िरकार किताब को खोल ही देता है।

किताब खुलते ही वो लाल रोशनी कम हो जाती है क्यूंकि वो लाल रत्न किताब पर नहीं लगा था बल्कि वो एक अंगूठी थी।बहुत ही सुंदर अंगूठी....बाहर अवंतिका चाबी लेकर दरवाज़ा खोल रही होती है और अंदर मीत उस अंगूठी को किताब मे से निकाल लेता है.....जैसे जैसे दरवाज़ा खुलता है वैसे वैसे अंगूठी मीत की ऊँगली मे होती है और उसकी चोट से निकलते हुए खून से वो भीग जाती है।

अवंतिका के अंदर आते ही लाइट फ़िर से आ जाती है और वो देखती है की मीत उस किताब का पहला पन्ना पढ़ रहा होता है लेकिन एक अजीब सी आवाज़ मे कोई लड़की की आवाज़ हो जैसे।

किताब के पहले पन्ने पर कुछ यूँ लिखा होता है ""बोलूंगा मै वो मै करता जाऊंगा हर चीख पर मै और सताऊँगा एक बार खोली किताब तो पूरी पढ़नी पड़ेगी और तुम्हारी मौत से मै फ़िर ज़िंदा हों जाऊंगा"" ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने is किताब को शापित किया हो।

मीत बस इन शब्दों को बोले जा रहा था....अवंतिका से ये देखा नहीं गया तो उसने आगे बढ़कर किताब को बंद करना चाहा लेकिन वो उस किताब को छू पाती उस से पहले ही मीत(जो की अब किसी के वश मे था)ने उसे हवा मे उछालकर पटक दिया और वो बेहोश हो गयी।

मीत ने उस किताब को पढना शुरू किया...वो किताब किसी की भी सोच से परे थी....वो जैसे जैसे पन्ने पलटता गया उसने देखा की उस किताब के सभी पने खून से सने थे जैसे की वो अभी भी ताज़ा हो....हर पन्ने पर मन विचलित कर देने वाला एक इंसानी शरीर का दृश्य जिसे तरह तरह की यातनायें देने के बाद भी ज़िंदा रखा गया था...वो किसी स्त्री का शरीर था कहीं-कहीं खाल के टुकड़े......बहुत ही ज़्यादा बेचैन कर देने वाली किताब थी वो।

मीत इस से आगे पढता की उसे अवंतिका की आवाज़ सुनाई दी....अवंतिका धीरे-धीरे होश मे आयी और उसे सब उल्टा दिखने लगा....कुछ देर बाद उसे मालूम हुआ की वो एक खूंटी से उलटी तंगी हुयी है वी मीत को देख कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और उस से कहने लगी-मीत ये तुम क्या कर रहें हो....मीत ते मै हूँ अवंतिका....तुम्हारी अवंतिका मीत....

अवंतिका इसके आगे कुछ कह पाती,उस से पहले ही मीत ने एक चाक़ू उठाया और अवंतिका की जीब काट दी....अवंतिका ज़ोर से चीखने लगी....मीत ने उसकी कटी हुई जीब ली और किताब पर रखकर फ़ेंक दी...फ़िर उसने अगला पन्ना पलटा और एक ब्लेड लेकर अवंतिका के पास बढ़ने लगा...अवंतिका दर्द से छठपटाने लगी .....लेकिन मीत पर उसका कोई असर ना हुआ उसने वो ब्लेड अवंतिका के सीधे हाथ पर रखा और एक हाथ मे वो किताब पकड़ी और उस किताब मे से देखकर उसके हाथ पर एक चित्र बनाने लगा।

मीत ने ऐसे ही किताब मे से देख देख कर उसे कई यातनाय दी लेकिन अवंतिका अभी भी ज़िंदा और होश मै थी और फ़िर वो कहीं से एक कुल्हाड़ी लेकर आया....जिसे देखते ही अवंतिका बेहोश हों गयी उसके शरीर से टपक रहे खून से पूरा फर्श और वो शापित किताब सन चुकी थी जो उसके ठीक नीचे रखी थी।
मीत ने जैसे ही कुल्हाड़ी उठाई एक मंत्र की आवाज़ वहां गूंजने लगी जिससे वो बेचैन होने लगा और कुल्हाड़ी उसके हाथ से छूट गयी और वो कुछ बड़बड़ाने लगा.....मंत्र तेज़ होते गए और उसकी आवाज़ भी.....उसकी आवाज़ मे एक नाम साफ़ सुनाई दे रहा था..."""माया""....""""माया""""

और कुछ ही पलों मे माया देवी उसके सामने आकर ख़डी हो गयी...माया के गले मे बड़ी बड़ी माला पड़ी हुयी थी...हाथों मे ढेरो अंगूठी उसका रूप जैसे स्वं काली....माया को देखकर मीत ज़मीन पर गिर गया और लड़की की आवाज़ मे चीखते हुए बोला-माया नहीं माया इस बार फ़िर नहीं.....इस बार तो मे अपना बदला ले कर रहूंगी .........माया मुझे मत रोक माया

मीत के कुछ और बोलने से पहले ही माया ने एक पोटली मे से कुछ मिट्टी निकाली और मीत पर डाल दी जिस से वो तिल मिला उठा और अगले ही पल मौका देख कर उसी कुल्हाड़ी से उसने मीत का वो हाथ भी काट दिया जिसमे उसने वो अंगूठी पहन रखी थी।

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तीन महीने बाद मीत की आँखे अस्पताल मे खुली और होश मे आते ही उसने अवंतिका को पूछा....मीत के होश मे आने के करीब सात महीने बाद अवन्तिका होश मे आयी...उसकी जीब को समय रहते जकड़ दिया गया था लेकिन उसके शरीर पर काफी घाव थे जिन्हे भरने मे काफी वक़्त लगा और जिनके निशान शायद कभी मिटे ही ना....मीत के हाथ को नहीं बचाया जा सका।
अवंतिका के डिस्चार्ज होते वक़्त उसे अस्पताल की तरफ से एक लेटर मिला जो माया देवी की तरफ से था जिसमे उसका अड्रेस लिखा हुआ था।
शरीर से भले ही मीत और अवंतिका ठीक हों गए हों लेकिन उनकी दिमागी हालत को ठीक होने मे दो साल लगे...और दो साल बाद हिम्मत करकर वो दोनों माया देवी से उसके घर मिलने गए। जाते भी क्यूँ नहीं उनके मन मे सवाल ही ढेरों थे।

वो माया के घर पहुंचे तो उन्होंने देखा की माया का घर काफी अजीब था बड़ी ही नेगेटिव एनर्जी....हर चीज़ जैसे चीख रही हो....वो घर देख ही रहें थे की माया उनके सामने आयी और उन्हें बैठने के लिया बोला।

उन दोनों ने बैठते ही सवालों की झड़ी लगा दी और माया ने एक एक कर जवाब देना शुरू किया।

= उस किताब का राज़ क्या था?अवंतिका ने पूछा।

पहले तो माया ने इस सवाल का जवाब देने के लिए मना कर दिया लेकिन फ़िर ज़ोर देने पर उसने बताया की वो किताब एक प्रेमी जोड़े द्वारा शापित किताब है....एक लड़का था अमीर घर का जिससे एक लड़की को प्यार हो गया लेकिन वो लड़की उस से प्यार नहीं करती थी तो इसने उस से जबरदस्ती शादी कर ली। उसने उसे अपने घर मे कैद कर के रख लिया लेकिन शादी करते वक़्त उस लड़के ने उस लड़की को वचन दिया था की वो उसकी मर्ज़ी के बिना उसके साथ कभी कुछ नहीं करेगा क्योंकि वो उस से सच्चा प्यार करता था ....तो सालों बीत गए और बीते वक़्त के साथ उसका प्यार गुस्से मे बदल गया और एक दिन नशे मे धुत होकर उसने उस लड़की की जान लेने की सोची लेकिन आसानी से नहीं वैसे ही तड़पा कर जैसे उस लड़की ने उसे तड़पाया था इतने सालों तकतब उसने इस किताब को लिया और इस किताब पर हर वो भयानक यातना लिखता गया जो उस दिन उसने उस लड़की को दी वो भी उसी के खून से और अपने आंसुओं से....दोनों ने इसी बीच इस किताब को अपने अपने तरीके से शापित कर दिया ....

लडके ने कहा की जब कभी उसकी प्रेमिका ज़िंदा होगी तो वो उसे हर हॉल मे ज़िंदा कगी...लेकिन उसकी प्रेमिका ने इस किताब के साथ कई चीज़ों को शापित कर दिया .....उसने कहा की जो कोई भी सच्चा प्यार करने वाला इस किताब को खोलेगा वो पहले मुझे ज़िंदा करेगा
और साथ ही उसने अपनी उस लाल रत्न वाली अंगूठी को भी शापित कर दिया की...मुझे ज़िंदा करने वाला इस अंगूठी को पहनकर उस लड़के को भी ज़िंदा करेगा और फ़िर उसे उसी तरह यातनाये देकर मारेगा....तब उस लड़की का बदला पूरा होगा।

=उस किताब का आपने क्या किया और आपने मेरे अंदर उस लड़की को कैसे रोका?मीत ने पूछा

तुम उस किताब की फ़िक्र मत करो वो किताब अब एक बहुत मेहफ़ूज़ जगह पर है जो मै तुम्हे नहीं बता सकती ....लेकिन हाँ उस दिन मैंने तुम्हारे अंदर उस लड़की को उसी के पागल प्रेमी की कब्र की मिट्टी से काबू किया था।

इसके आगे वो दोनों माया देवी से कुछ और पूछते की माया की घड़ी आवाज़ करने लगी और माया ने उन्हें वहां से जाने के लिए कह दिया। वो दोनों उठ कर जाने लगे लेकिन अवंतिका एक बात पूछने के लिए फ़िर वापस पलटी... उसने देखा की माया और कुछ देर पहले वहां मौजूद सब सामान गायब हो गया जिसके बाद वो दोनों बस चुप चाप वहां से निकल लिए ।

वो किताब आज भी कहीं घूम रही है और माया आज भी ज़िंदा है।

समाप्त

धन्यवाद।