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कामसूत्र प्रेम या पोर्न

आचार्य वात्स्यायन रचित कामसूत्र भारतीय ज्ञान संपदा की एक ऐसी अनमोल और अनूठी विरासत है, जिसकी प्रासंगिकता और उपयोगिता इसके सृजन के शताब्दियों बाद भी बनी हुई है। इसकी रचना कब हुई, इस बारे में अनेक विद्वानों ने अलग-अलग राय व्यक्त की है। इसे लेकर जो मत प्रचलित हैं, उनके अनुसार यह ग्रंथ डेढ़ से ढाई हजार साल पहले रचा गया हो सकता है। रोचक बात यह है कि कामसूत्र स्वयं में कोई मूल ग्रंथ नहीं है, बल्कि ब्रह्मा जी द्वारा धर्म, अर्थ और काम के नियमन और व्यवस्था के लिए तैयार किए गए संविधान के काम वाले हिस्से का संक्षिप्त रूप है। इस संविधान में एक लाख अध्याय थे।

संविधान के धर्म विषय पर आधारित हिस्से को लेकर मनु ने मानवधर्मशास्त्र की रचना की और अर्थ विषय को लेकर आचार्य बृहस्पति ने बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र की। इसके बाद बचा काम विषयक अंश। भगवान शिव के सेवक नंदी ने इसका संपादन कर एक हजार अध्यायों में कामशास्त्र की रचना की। नंदी के बाद उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ने इसे और संक्षिप्त कर पांच सौ अध्यायों वाला ग्रंथ बना दिया। इसे और भी संक्षिप्त किया पांचाल देश के विद्वान वाभ्रव्य ने, जिन्होंने इसे डेढ़ सौ अध्यायों में समेट दिया।

वाभ्रव्य का यह ग्रंथ अनेक अधिकरणों और प्रकरणों में बंटा हुआ था,जिन्हें लेकर आचार्य दत्तक, आचार्य चारायण, आचार्य घोटकमुख जैसे विद्वानों ने अलग-अलग ग्रंथ तैयार किए। अब यह दो प्रकार से लोगों के लिए उपलब्ध था। एक तो डेढ़ सौ अध्यायों वाले वाभ्रव्य के विशाल ग्रंथ के रूप में। दूसरा, अलग-अलग विद्वानों द्वारा प्रस्तुत अधिकरण या खंड विशेष पर एकाग्र अलग-अलग ग्रंथों के रूप में। दोनों ही रूपों में आम लोगों के लिए इसका समग्र अध्ययन काफी कठिन और श्रमसाध्य था। वात्स्यायन मुनि ने इसके सर्वांगीण और सुगम अध्ययन की आवश्यकता को अनुभव किया और इसका संक्षिप्तीकरण कर कामसू्त्र नाम के नए ग्रंथ की रचना की।

लगभग दो हजार साल पहले रचित सात अधिकरणों, 36 अध्यायों, 64 प्रकरणों और 1250 सूत्रों (श्लोकों) में विभक्त आचार्य वात्स्यायन का यह ग्रंथ हमें पंचेंद्रियों से प्राप्त होने वाले सेक्स-सुख को ग्रैविटी से उठाकर मन और चेतना के गूढ़ जीरो ग्रैविटी क्षेत्र में पहुंचा देता है। कामशास्त्र का यही उद्देश्य है कि वह स्त्री और पुरुष को परस्पर मिलाकर मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बना सके। लगभग दो सौ वर्ष पूर्व ब्रिटिश भाषाविद सर रिचर्ड एफ. बर्टन ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिसने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। कहा जाता है कि आज दुनिया की लगभग हर भाषा में इसका अनुवाद हो चुका है।

कामसूत्र एक ऐसी रचना है, जिसने साहित्य, कला,संस्कृति आदि में अनेक महान वकालजयी कृतियों के सृजन को प्रेरणा दी है। राजस्थानी कलम में रचित अनेक चित्र, खजुराहो के विश्प्रसिद्ध मूर्तिशिल्प, अनेक रीतिकालीन कवियों की काव्यरचनाओं का प्रेरणास्रोत रहा है आचार्य वात्स्यायन रचित कामसूत्र।

बेशक हम में से बहुत सारे लोगों ने कामसूत्र नहीं पढ़ा होगा,लेकिन शायद ही ऐसा कोई हो, जिसे इसके बारे में पता न हो। वैसे ज्यादा संभावना यही है कि हमारी यह जानकारी बहुत सीमित और एकांगी हो। कामसूत्र को अधिकतर लोग एक सेक्स मैन्युअल के रूप में देखते हैं, जिसका उद्देश्य लोगों को उनके यौन संबंधों को बेहतर बनाने की शिक्षा देना है। लेकिन वास्तविकता इसके एक दम विपरीत है।

सच तो यह है कि वात्स्यायन रचित कामसूत्र के सात भागों में से सिर्फ एक ‘सांप्रयोगिकम’ ही ऐसा है जो सहवास या यौन संबंधों पर केंद्रित है। लगभग अस्सी प्रतिशत कामसूत्र प्रेम, भावनाओं, राग-अनुराग, परस्पर व्यवहार, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण और काम की व्याख्या जैसी बातों पर आधारित है। इसके रचयिता वात्स्यायन के अनुसार कामसूत्र स्त्री - पुरुष के धार्मिक-सामाजिक नियमों का शिक्षक है और यदि वे इस शास्त्र के अनुसार वैवाहिक जीवन व्यतीत करेंगे तो काम की दृष्टि से उनके दाम्पत्य जीव में सदैव सुख, शांति और संतुष्टि रहेगी। आइए जानें कि आखिर कामसूत्र में ऐसा क्या है, जो इसे इतना लोकप्रिय और महत्वपूर्ण बनाया हुआ है।

कामसूत्र के पहले अधिकरण में पांच अध्याय हैं, जिनमें धर्म, अर्थ और काम को परिभाषित करते हुए जीवन में इनकी आवश्यकता के बारे में बतलाया गया है। इनसे संबंधित शंकाओं का समाधान किया गया है। वात्स्यायन कहते हैं कि मानव जीवन के इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म विद्या, अर्थ विद्या, काम विद्या और इनसे संबंधित अन्य विद्याओं का अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने संगीत शास्त्र के अध्ययन को काम शास्त्र का ही एक अंग माना है। उन्होंने कामसूत्र की अंगभूतकलाओं के यप में 64 कलाओं का वर्णन किया है, जिनमें गीत, नृत्य, वाद्य, काव्य, नाटक, चित्रकला जैसी विधाएं शामिल हैं। आचार्य ने सुझाव दिया है कि सभी युवतियों को इन विधाओं का प्रशिक्षण अवश्य लेना चाहिए और यह प्रशिक्षण किसी योग्य और विश्वासपात्र स्त्री द्वारा दिया जाना चाहिए।

इस अधिकरण के अगले अध्याय में बताया गया है कि एक नागरक अर्थात रसिक व्यक्ति के रूप में हमें किस प्रकार का जीवन जीना चाहिए। हमारी दिनचर्या, भवन और उसके अंदर का सामान और साज-सज्जा, रहन-सहन, खान-पान आदि किस प्रकार का होना चाहिए। इसके अतिरिक्त इसमें विभिन्न अवसरों पर की जाने वाली क्रीड़ाओं और उत्सवों पर प्रकाश डाला गया है, जो स्त्री-पुरुषों को एक दूसरे के संपर्क में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पहले अधिकरण का पांचवा और अंतिम अध्याय नायक-नायिका के सहायकों और दूत-दूतियों के कर्तव्यों के बारे में बताता है और नायिकाओं का वर्गीकरण करता है। आचार्य के अनुसार, नायिकाएं तीन प्रकार की होती हैं – कन्या, पुनर्भू अर्थात पुनर्विवाहिता और वेश्या। इन तीन प्रकारों में अनेक उप प्रकार हैं। जैसे कि कन्या के दो प्रकार हैं पुत्रदा और सुखदा, यानि पुत्र देने वाली और सुख देने वाली। आचार्य वात्स्यायन का मत है कि संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से सहवास सिर्फ अपनी ही जाति या वर्ण की कन्या के साथ किया जाना चाहिए। जबकि यौन सुख प्राप्त करने के लिए इस प्रकार की कोई बाध्यता नहीं है। वेश्याओं को अधम नायकों के उपयोग में आने वाली अधम नायिका मानने वाले वात्स्यायन ने न तो इनके साथ सहवास का समर्थन किया है और न ही इसका निषेध किया है। उन्होंने इन्हें असाधारण स्त्री मानते हुए समाज में इनकी उपयोगिता और महत्व को स्वीकार किया है। इन पर वैशिक नाम के स्वतंत्र अधिकरण की रचना की है।

गुणों के आधार पर नायिकाभेद के इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए कामसूत्र स्वकीया, परकीया और सामान्या नायिकाओं को उनकी प्रवृत्ति और विशेषता के अनुसार अलग-अलग वर्गों में बांटता जाता है। अंत में हम पाते हैं कि नायिकाओं के कुल तीन सौ चौरासी भेद होते हैं। आचार्य इस अध्याय में विस्तार से बताते हैं कि किन परिस्थतियों में किस प्रकार की नायिका के साथ यौन संबंध बनाना धर्मविरूद्ध नहीं माना जाता। इसी प्रकार आचार्य वात्स्यायन ने नायक के भी उत्तम, मध्यम और अधम, ये तीन भेद बताए हैं। अध्याय के अंत में आचार्य ने अच्छे मित्रों और दूतों की पहचान, विशेषताओं और कार्यों का वर्णन किया है और बताया है कि उन्हें किस प्रकार से विश्वासपात्र, वाकपटु और कूटनीति में निपुण होना चाहिए ताकि वेनायक के उद्देश्य की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सकें।

द्वितीय अधिकरण ‘सांप्रयोगिकम’ कामसूत्र का सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण भाग है, जिसे सर्वाधिक प्रासंगिक भी कहें तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। इसमें दस अध्याय हैं। पहले अध्याय में आचार्य ने जननांगों के आकार के आधार पर स्त्री-पुरुषों की तीन-तीन श्रेणियां बताई हैं। पुरुषों के जननांग की लंबाई के अनुसार आचार्य उन्हें शश, वृष और अश्व श्रेणी में रखते हैं। स्त्रियों के जननांग की गहराई के आधार पर उन्हें मृगी, अश्वा या बड़वा और करिणी या हस्तिनी, इन तीन श्रेणियों में रखा जाता है। आचार्य के मतानुसार छोटे जननांग वाला शश पुरुष का कम गहरे जननांग वाली मृगी स्त्री के साथ सहवास उचित होता है। इसी प्रकार वृष पुरुष का बड़वा स्त्री के साथ और अश्व पुरुष का हस्तिनी स्त्री के साथ सहवास अधिक सुविधाजनक और सुखद होता है।

जोड़ों के आधार पर इनमें कुल नौ प्रकार के सहवास होते हैं। जिन्हें सहवास में शामिल स्त्री-पुरुष की श्रेणी को देखते हुए समरत या विषमरत सहवास कहा जाता है। आकार के अलावा वेग और समयावधि के आधार पर भी श्रेणियां और जोडियां निर्धारित की गई हैं। समान आकार, वेग और समय वाले सहवास और असमान स्त्री-पुरुष के बीच सहवास के कुल सत्ताइस भेद बताए गए हैं, जिनका ज्ञान सहवास को सुखमय और संतुष्टिदायक बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दूसरे अध्याय आलिंगन विचार में आचार्य वात्स्यायन ने आलिंगन, चुंबन, नखक्षत, दंतक्षत, औपरिष्टक अर्थात् मुख मैथुन आदि सहवास के आठ प्रकारों के बारे में बताया है, जिनके आठ-आठ भेद होते हैं। इन 64 भेदों को काम की 64 कलाओं के नाम से जाना जाता है। इनका उपयोग सहवास को सरस, आनंददायक और विविधतापूर्ण बनाने के लिए होता है।

इसके बाद वे आलिंगन के प्रमुख आठ प्रकारों का वर्णन करते हैं। इनमें चार प्रकार के आलिंगन स्पृष्टक, विद्धक, उद्धृष्टक, पीड़ितक उन प्रेमी-प्रेमिकाओं द्वारा किए जाते हैं, जो प्रेम में हैं लेकिन सहवास नहीं किया है। सरल भाषा में कहें तो इन आलिंगनों में बहाने से स्पर्श करना, टकराना और लिपटना, भीड़-भाड़ या अंधेरे में एक-दूसरे से शरीर को रगड़ते हुए चलना, दीवार या खंभे के पास खड़े नायक या नायिका को दोनों हाथों से घेर कर दबाना जैसी क्रियाएं शामिल हैं।

शेष चार प्रकार के आलिंगन लतावेष्टितक, वृक्षधिरूढ़क, तिलतण्डुलक और क्षीरजलक हैं, जो सहवास के समय किए जाते हैं। पहले दो खड़े रहकर किए जाते हैं जिनमें नायिका नायक से लता की तरह लिपटती है या पेड़ मानकर उस पर चढ़ने की कोशिश करती है। तिलतंडुलक में दोनों लेटकर एक दूसरे को दबाते हैं और क्षीरजलक में बैठकर परस्पर चिपक जाते हैं। इनके अतिरिक्त आचार्य ने सुवर्णनाभ द्वारा बताए गए चार अन्य आलिंगनों को भी कामसूत्र में शामिल किया है। उरूपगूहन, जघनोपगूहन, स्तनालिंगन और ललाटिका नाम के इन आलिंगनों में नायक-नायिका अपनी जंघाओं, पूरे शरीर, वक्षस्थल और माथे को परस्पर दबाते हैं।

तीसरा अध्याय चुंबन विकल्प है, जिसमें विभिन्न प्रकार के चुंबनों की व्याख्या की गई है। इनमें सहवास से पहले काम भावना को उत्तेजित करने वाले चुंबन और सहवास आरंभ होने के बाद आनंद को बढ़ाने के लिए किए जाने वाले चुंबन शामिल हैं। आचार्य वात्स्यायन ने चुंबन के आठ स्थान बताए हैं। ये स्थान हैं - माथा, केश, गाल, आंखे, वक्ष, स्तन और मुंह के अंदर जीभ और तालू। आचार्य ने विभिन्न भूभागों में प्रचलित चुंबन के कुछ अन्य स्थानों जैसे बगल, जांघों का जोड़, नाभिमूल आदि का भी उल्लेख किया है। लेकिन देश प्रथा के अनुसार ही इन स्थानों का चुंबन करने का परामर्श भी दिया है। चुंबनों के आवेग, सघनता, चुंबन स्थल, परिस्थति आदि के आधार पर आचार्य ने निमित्तक, स्फुरितक, घट्टितक, समचुंबन, तिर्यक चुंबन, उद्भ्रांत, अवपीड़ितक आदि चुंबन प्रकारों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए आचार्य ने विभिन्न प्रकार की चुंबन क्रियाओं, चुंबन कलह और क्रीड़ाओं के बारे में बताया है। इन्हें संपुटक, मृदु, पीड़ित, अंचित, प्रातिबोधिक, रागदीपक, चलितक आदि श्रेणी के चुंबनों द्वारा संपादित किया जाता है।

इस अधिकरण के अगले दो अध्याय नखक्षतजाति और दशनंछेद्यविधि नाखूनों और दांतों के इस्तेमाल से कामक्रीड़ा को रोचक और रोमांचक बनाने की प्रक्रिया पर आधारित है। इनमें आचार्य ने विस्तार से बताया है कि नखक्षत और दंतक्षत कितने प्रकार के होते हैं। शरीर में किन-किन जगहों पर और किस-किस तरह से नाखूनों से खरोंचा जा सकता है या दांतों से काटा जा सकता है और इससे यौन और प्रेम संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

अगले अध्याय संवेशनविधि में सहवास में प्रयोग किए जाने वाले आसनों का वर्णन है। जिनकी सहायता से असमान आकार के जननांगों वाले युगल भी अपने सहवास को सुगम, सरस और आनंददायक बना सकते हैं। सरल शब्दों में कहें तो इन आसनों की सहायता से अधिक गहरे जननांग वाली स्त्री, कम लंबे जननांग वाले पुरुष के सहवास का आनंद ले सकती है या कम गहरे जननांग वाली नायिका अधिक लंबे जननांग वाले नायक के साथ बिना पीड़ा का अनुभव किए सहवाससुख प्राप्त कर सकती है।

वहीं अनुकूल आकार के जननांगों वाले युगल भी इन आसनों को अपनाकर सहवास को और अधिक रोमांच और विविधता दे सकते हैं। इन आसनों में सम्पुटक, उत्पीड़ि़तक, धेनुकरत आदि वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित हैं,जिनमें क्रमशः स्त्री के ऊपर लेटकर, उसके दोनों पैरों को मोड़कर और पशुओं की तरह स्थित कर सहवास किया जाता है। इनके अलावा एक नायिका के कई नायकों या एक नायक के अनेक नायिकाओं के साथ सहवास के लिए गोयूनथिक आसन का प्रावधान किया है।

अगले अध्याय ‘प्रहणन-सीत्कार’ में सहवास के दौरान उत्तेजना और आनंद बढ़ाने के लिए शरीर पर प्रहार करने के बारे में मार्गदर्शन किया गया है। इसमें बताया गया है कि शरीर के किन अंगों पर कैसे प्रहार किया जाना चाहिए ताकि कष्ट कम और आनंद ज्यादा हो। पीठ, कंधे, स्तनों का मध्य भाग, जंघाएं आदि स्थानों पर मुट्ठी, उंगली,हथेली, उल्टी हथेली से प्रहार किए जाने पर काम-भावना भड़कती है और सहवास के आनंद में वृद्धि होती है। प्रहार के प्रत्युत्तर में स्त्री किन-किन ध्वनियों के माध्यम से अपनी भावनाएं प्रदर्शित करती है। इस बारे में सीत्कार वाले भाग में बताया गया है। हालांकि वात्स्यायन का मत है कि भले आदमियों को प्रहरण विधियों का अनुसरण नहीं करना चाहिए।

आठवें अध्याय ‘पुरुषायित’ में सहवास को सुखद, सफल और आनंददायक बनाने के बारे में बताया गया है। इस अध्याय का पहला भाग सहवास की उस स्थिति के बारे में बताता है, जिसमें पुरुष नीचे रहता है और स्त्री उसके ऊपर आकर पुरुषों जैसा व्यवहार करती है। दूसरे हिस्से पुरुषोसृप्त में सहवास से पहले स्त्री को शारीरिक और मानसिक रूप से सहवास के लिए तैयार करने और सहवास के समय विभिन्न प्रयोगों के बारे में समझाया गया है।

अगला अध्याय ‘औपरिष्टक’ अर्थात मुख मैथुन है। इसमें जननांग और मुंह के संपर्क व निकटता के आधार पर मुख मैथुन के आठ प्रकारों के बारे में बताया है। यद्यपि इसे अनुचित मानते हुए आचार्य का परामर्श है कि किन्नरों और वेश्याओं के साथ मुख मैथुन कर सकते हैं लेकिन उनके मुख का चुंबन नहीं करना चाहिए। इसमें स्त्री-पुरुष, पुरुष-पुरुष, स्त्री-स्त्री और एक ही समय स्त्री-पुरुष के परस्पर मुख मैथुन के बारे में भी प्रकाश डाला गया है। इस अधिकरण के अंतिम अध्याय रतारंभावसानिक और प्रणय कलह में सहवास से पहले और सहवास के बाद किए जाने वाले व्यवहार को लेकर सुझाव दिए गए हैं। इसके अलावा इसमें प्रेम बढ़ाने के लिए नायक-नायिका के बीच होने वाले झूठ-मूठ के कलह को लेकर भी मार्गदर्शन किया गया है।

तीसरा अधिकरण ‘कन्यासंप्रयुक्तक’ पांच अध्यायों में बंटा हुआ है और विशुद्ध रूप से विवाह पूर्व, विवाह और विवाह के बाद के जीवन से संबंधित मार्गदर्शन और सुझाव देता है। पहले अध्याय में विवाह के आठ प्रकारों के बारे में बताते हुए कन्या के चयन और वर के चयन के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों पर प्रकाश डाला गया है और समझाया गया है कि किस प्रकार के वर या कन्या से विवाह नहीं करना चाहिए और इससे क्या नुकसान हो सकते हैं। अधिकरण के अगले अध्याय में आचार्य वात्स्यायन समझाते हैं कि विवाह कर के घर लाई गई कन्या के साथ पति का व्यवहार कैसा होना चाहिए, उनका आचरण, रहन-सहन, आहार-विहार कैसा हो।

आचार्य का कथन है कि स्त्रियां फूल के समान कोमल होती हैं। उनके साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए, वर्ना उन्हें सहवास से घृणा हो जाएगी। वह परामर्श देते हैं कि पति-पत्नी पहले संयम बरतते हुए एक-दूसरे का विश्वास जीतें और एक-दूसरे को भली-भांति जानने के बाद ही सहवास करें। उनका सुझाव है कि दोनों पहली तीन रातों तक सहवास से बचते हुए सिर्फ प्रेम करें, जिसमें स्पर्श, आलिंगन, मधुर और रुचिपूर्ण बातें आदि व्यवहार शामिल हैं।

इस अधिकरण का तीसरा अध्याय उन पुरुषों का मार्ग दर्शन करता है जो किसी अपात्रता या असमर्थता के कारण अपनी इच्छित कन्या से विवाह नहीं कर सकते। इसमें बताया गया है कि वे किस प्रकार पारंपरिक खेलों और उपहारों के द्वारा उनका हृदय जीत सकते हैं। अध्याय में यह भी समझाया गया है कि कन्याओं को इस प्रकार के प्रयासों पर किस तरह का व्यवहार करना चाहिए।

चौथे अध्याय में इसी को और अधिक विस्तार देते हुए नायक और नायिकाओं को सुझाव दिए गए हैं कि वे किस प्रकार अपनी पसंद की कन्या या युवक के सामने अपने प्रेम को अभिव्यक्त करें और उनका सामीप्य सुख किस तरह प्राप्त करें। अंतिम अध्याय भी यही बताता है कि सभी परिस्थतियां प्रतिकूल होने पर भी नायक किस प्रकार नायिका से अपनी भेंट और विवाह सुनिश्चित कर सकता है। इस अध्याय में वात्स्यायन धर्मसम्मत न माने जाने वाले पैशाच, राक्षस, गान्धर्व विवाह को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हुए प्रथम दो के साथ गान्धर्व का भी सुझाव देते हैं क्योंकि प्रथम दो में अपहरण और बलात्कार शामिल होने के कारण उन्हें उचित नहीं माना जाता।

चौथा अधिकरण ‘भार्याधिकारिक’, भार्या अर्थात पत्नियों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कन्या का अपने पति के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए। इसमें पत्नियों की दो श्रेणियां बताई गई हैं। एकचारिणी, यानी पति की एकमात्र पत्नी और सपत्निका, अर्थात सौतों वाली पत्नी। सपत्निका श्रेणी की पत्नी ज्येष्ठा या कनिष्ठा हो सकती है। इसका अर्थ है प्रथम पत्नी या पुरुष के पुनर्विवाह के बाद पत्नी बनी स्त्री। एकचारिणी पत्नी के कर्तव्यों के बारे में वात्स्यायन ने काफी विस्तार से बताया है कि उसे अपने पति की किस प्रकार सेवा करनी चाहिए। उसकी सभी प्रकार की आवश्यकताओं को कैसे पूरा करना चाहिए। पति के मित्रों और परिवारवालों के सामने उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए। पति को वह किस प्रकार प्रसन्न रखती सकती है। जब पति लंबे समय के लिए किसी दूसरे स्थान पर गया हो, तब उसे क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए।

आचार्य ने सौतों वाली पत्नी को भी कई सुझाव दिए हैं, जिनका पालन कर वह अपने पति की सबसे अधिक प्रिय पत्नी बनी रह सकती है। आचार्य का मत है कि बड़ी पत्नी को अपनी सौत को छोटी बहन समझना चाहिए और छोटी पत्नी अपनी ज्येष्ठा सौत को माता के समान आदर दे। आचार्य कहते हैं कि ज्येष्ठा भार्या अपनी सौतों से द्वेष न रखते हुए उनके साथ सखियों की तरह रहे। इसी अधिकरण में आचार्य ने पुरुषों को भी सुझाव दिया है कि वे पत्नी को गृहलक्ष्मी मानकर सम्मान दें। अनेक पत्नी होने की स्थिति में पति घर में सुख-शांति कैसे बनाए रख सकता है, इस बारे में भी आचार्य वात्स्यायन ने काफी अच्छा मार्गदर्शन किया है।

कामसूत्र का पांचवा अधिकरण ‘पारदारिक’ स्त्री के साथ समागम या सहवास के बारे में है। आचार्य पराई स्त्री के साथ समागम को उचित नहीं मानते। लेकिन उनका मत है कि विशेष परिस्थतियों में इस प्रकार के संबंध बनाए जा सकते हैं। उनका परामर्श है कि इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले लक्षित स्त्री के प्राप्त होने की संभावनाओं, उसकी पात्रता, पुरुष में उसकी रुचि और ऐसे संबंधों के क्या परिणाम हो सकते हैं जैसी बातों पर विचार कर लेना चाहिए। इसके बाद आचार्य उन कारणों का उल्लेख करते हैं जो परकृस्त्री के लिए ऐसे संबंध स्थापित करने में बाधक होते हें और वे बताते हैं कि प्रयासरत पुरुष किस प्रकार इन बाधाओं पर विजय पा सकता है।

इसके बाद आचार्य वात्स्यायन नायिका की निकटता के अवसर उत्पन्न करने, वस्तुओं के आदान-प्रदान, प्रशंसा, नायिका के बाहरी कामों में उसकी सहायता आदि से परिचय को प्रगाढ़ता प्रदान करने का परामर्श देते हैं। वे कहते हैं कि इसके बाद एकांत में नायिका के स्पर्श, चुंबन और आलिंगन के माध्यम से नायक उस स्त्री को प्राप्त कर सकता है। लेकिन आचार्य सावधान करते हैं कि पुरुष को कब और किस प्रकार की स्त्री से नहीं मिलना चाहिए। ऐसी स्त्रियों में शंकालु, डरपोक, पहरे में रहने वाली, सास-ससुर के साथ रहने वाली स्त्रियां प्रमुख हैं।

तीसरे अध्याय में ऐसी स्त्रियों का वर्णन किया गया है,जो पुरुष से सहवास तो चाहती हैं, लेकिन किन्हीं कारणों से न तो इसमें कोई रुचि दिखाती हैं और न ही पुरुषों के प्रयासों को प्रोत्साहित करती हैं। आचार्य का सुझाव है कि पुरुष ऐसी धीर स्त्रियों की चेष्टाओं और मनोभावों का अध्ययन करे। इसमें सक्षम या स्पष्ट न होने पर वह किसी योग्य और विश्वसनीय दूती की सहायता ले सकता है।

अगला अध्याय नायक की सहायता करने वाली दूतियों के कार्यों, प्रकारों और लक्षणों के बारे में बताता है। आचार्य वात्स्यायन के अनुसार दूती को नायिका के सामने उसके पति की कमियों और नायक की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर बखान करना चाहिए। उसे प्रसिद्ध प्रेमकथाएं सुनाकर उसके मन में नायक से मिलन की इच्छा जगानी चाहिए। नायक द्वारा दिए गए संदेशों, उपहार आदि को उस तक पहुंचाना चाहिए। इस अधिकरण के अंतिम दो अध्याय राजाओं और उनके अंतपुरों में रहने वाली रानियों पर केंद्रित हैं, जिनमें बताया गया है कि किन उपायों और सावधानियों से वे अपने जीवन, सम्मान और निजता की रक्षा करते हुए परकृस्त्री या पर-पुरुषों से सहवास कर अपनी यौनक्षुधा शांत कर सकते हैं।

कामसूत्र का छठा अधिकरण ‘वैशिकम्’, वेश्याओं पर केंद्रित है। इसमें छह अध्याय हैं। इनमें आचार्य ने विस्तार से बताया है कि वेश्याओं के सामान्य गुण क्या होते हैं। कर्तव्य क्या होते हैं। उन्हें किन स्थितियों में, किस प्रकार के पुरुषों के साथ सहवास करना चाहिए या नहीं करना चाहिए। अपने प्रेमी के साथ उनका व्यवहार कैसा हो, आदि।

दूसरे अध्याय में वात्स्यायन ने ऐसी वेश्याओं का मार्गदर्शन किया है, जो नायक से प्रेम करने लगती हैं। वह उन्हें एकचारिणी नायिका की तरह आचरण करने के लिए कहते हैं। चूंकि यौन संबंधों से धनार्जन उसकी जीविका का जरिया है, इसलिए उन्होंने ऐसे उपाय बताए हैं जिससे उसका आर्थिक नुकसान न हो। अगले अध्याय में इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए आचार्य बताते हैं कि वेश्या किस प्रकार आवश्यकता बताकर, आर्थिक नुकसान का बहाना कर, उपहार की मांग करने आदि उपायों से नायक से अधिक धन प्राप्त कर सकती हैं। लेकिन आचार्य का यह भी मत है कि यदि नायक द्वारा स्वाभाविक रूप से दिया गया धन उसके लिए पर्याप्त है तो उसे उपायों से धन नहीं लेना चाहिए। साथ ही आचार्य ने यह भी कहा है कि यदि नायक किसी संकट में पड़ता है तो उसे भी उसकी यथासंभव सहायता करनी चाहिए।

वात्यासन ने इस पर भी विस्तार से प्रकाश डाला है कि वह नायक के उससे विरक्त हो जाने पर भी किस प्रकार धन प्राप्त कर सकती है या नायक से स्वयं विरक्त होने पर उससे कैसे पीछा छुड़ा सकती है। चैथे अध्याय में वात्स्यायन ने उन उपायों पर चर्चा की है जिनकी सहायता से वेश्या अपने पुराने, अलग हो चुके नायक से फिर संबंध स्थापित कर सकती है। वह सावधान भी करते हैं कि निर्धन, कंजूस या अस्थिर मन वाले नायकों से फिर से संबंध स्थापित करना उचित नहीं है।

पांचवे अध्याय में आचार्य ने वेश्याओं की तीन श्रेणियां निर्धारित की हैं। एक समय में एक ही व्यक्ति से प्रेम करने वाली एकपरिग्रहा, कई व्यक्तियों से प्रेम करने वाली अनेकपरिग्रहा और बिना किसी से प्रेम किए सिर्फ देह व्यापार करने वाली अपरिग्रहा। इसमें उन्होंने तीनों ही प्रकार की वेश्याओं का यथोचित मार्गदर्शन किया है, जिनसे वे अधिकाधिक धन, आदर और प्रेम प्राप्त कर सकती हैं।

अधिकरण का अंतिम अध्याय वेश्याओं के जीवन की समस्याओं, विशेषकर आर्थिक चुनौतियों पर विचार करता है। यह बताता है कि वे किन-किन कारणों से इस प्रकार की कठिनाईयों में घिर सकती हैं या इन पर विजय पा सकती हैं। इसी अध्याय में वेश्याओं के परिचारिका, नटी, रूपाजीवा, गणिका आदि नौ भेद बताए गए हैं।

कामसूत्र का अंतिम अधिकरण ‘औपनिषदिक’ ऐसे टोटकों और नुस्खों के बारे में बताता है जिनसे रूप, यौवन, शक्ति, सौंदर्य, क्षमता आदि में वृद्धि की जा सकती है और अपने इच्छित पुरुष या स्त्री को वश में किया जा सकता है।

आचार्य वात्स्यायन की इस अमर रचना के बारे में इतना विस्तार से जानने के बाद मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि लगभग दो सहस्राब्दियों पहले रचित यह ग्रंथ आज के समय में कितना प्रासंगिक है। इस बारे में यही कहा जा सकता है कि जिस प्रकार हमारे जीवन में काम हमेशा से विद्यमान है, उसी प्रकार कामसूत्र भी निरंतर किसी न किसी रूप में प्रासंगिक रहा है और रहेगा।

यह सच है कि इसमें ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिन्हें उस दौर में स्वाभाविक और उचित माना जाता था, लेकिन आज वे नैतिक, सामाजिक और वैधानिक दृष्टि से अस्वीकार्य घोषित की जा चुकी हैं। मगर इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जाने अनजाने हमारे यौन व्यवहार और काम संबंधी गतिविधियों में इस ग्रंथ की अधिकतर बातें नजर आ ही जाती हैं। ऐसा सामाजिक, शैक्षिक, पारिवारिक और शायद आनुवांशिक कारणों से भी हो सकता है, लेकिन हमारे अवचेतन में कामसूत्र एक शाश्वत सत्य के रूप में विद्यमान है।

इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात है, जिसका जिक्र अप्रासंगिक नहीं होगा वह ये कि आज बहुत सारी चीजें, जिन्हें हम आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति की देन मानते हैं, हमारे इस सैकड़ों साल पुराने ग्रंथ में मौजूद हैं। बस नाम बदल गए हैं। जैसे ओरल सेक्स यहां औपरिष्टक है। सिक्सटी नाइन काकिल है। जिसे हम फ्रेंच किस कहते हैं, कामसूत्र उसे मुखयुद्ध या जिह्वायुद्ध कहता है। ग्रुप सेक्स यहां गोयूथिक के नाम से मिल जाता है। तो बीडीएसएम प्रहरण के नाम से। ऐसे उदाहरणों की एक लंबी सूची बनाई जा सकती है। कुल मिलाकर यह एक ऐसी महानकृति है, जिसकी उपयोगिता कभी खत्म नहीं होगी

Writen By Amanat Malik

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