बेमेल - 2 Shwet Kumar Sinha द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बेमेल - 2

....पिता की चल और अचल सम्पत्ति पर अधिकार पाकर त्रिदेवियां- नंदा, सुगंधा, अमृता तथा उनके पतियों के पांव तो जमीन पर ही नहीं टिक रहे थे। इस बात का उन्हे तनिक भी ख्याल न रहा कि पिता ने छोटे भाई मनोहर की ताउम्र देखभाल और सेवा करने की जिम्मेदारी भी सौंपी है।
सम्पत्ति की सुरक्षा से निश्चिंत राजवीर सिंह के दिमाग में अब बस एक ही बात कौंध रही थी वह थी बेटे का ब्याह। पर सौंपता कौन इस विक्षिप्त के हाथों में अपनी बेटी को? आखिर कौन अपनी फूल-सी बेटी की जीवनडोर पगले मनोहर के संग बांधता? पर इस संसार में लोभियों और भोगियों की कमी थोड़े ही है, एक ढुंढो हज़ार मिलेंगे! फिर मनोहर तो ठहरा अथाह सम्पत्ति का अकेला वारिस, हाँ वो अलग बात है कि उसकी सम्पत्ति पर उसके ही परिवारवालों ने अपना हक़ जमा लिया था। पर भीतर की बात किसे पता! जब पास के ही गांव के एक विधुर ब्रजलाल को पता चला कि जमींदार साहब अपने इकलौते बेटे के लिए किसी गरीब घर की कन्या तलाश रहे हैं तो यह जानते हुए भी कि मनोहर मानसिक रूप से विक्षिप्त है वह अपनी इकलौती बेटी श्यामा का रिश्ता लेकर उनके चौखट पर जा पहुंचा।
श्यामा ने बचपन से ही गरीबी में दिन गुजारे थे। माता की असामयिक मृत्यू के बाद घर और पिता को उसने अकेले ही सम्भाला। ऊपर से ब्रजलाल ठहरा पीने वाला। शाम को मजदूरी करके लौटता और रास्ते में किसी ने पीने की दावत दे दी फिर सारी रात ठेके पर ही कटती। श्यामा ने पिता से लाख मिन्नतें की ताकि वह शराब की लत छोड दे। पर बुरी लत एकबार इंसान को पकड़ ले तो इंसान के लाख चाहने के बाद भी वह उसका पीछा नहीं छोडती।
किसी को कानोकान खबर भी नहीं पडी। पर नशेडी ब्रजलाल के पीने की लत का फायदा उठाकर राजवीर सिंह के बड़े दामाद रामाधार सिंह ने ही उसे यह तरकीब सुझाई कि अपनी बेटी को जमींदार साहब के पगले बेटे के मत्थे मढ़कर मृत्यूशैया तक अपनी शराब की बोतल पक्की समझे। इतने से ही मन नहीं भरा तो रामाधार सिंह ने उसके दिमाग में यह बात भी डाल दी कि अपनी बेटी की सहायता से पगले मनोहर को कुछ खिलापिला कर ठिकाने लगा दे। फिर सारी सम्पत्ति पर उनदोनों का एकछत्र अधिकार हो जाएगा।
चोर-चोर मौसेरे भाई। कलयूग के प्रहरियों ने मिलकर ऐसी अनिष्ट योजना तो बना ली। पर भूल गए कि कण-कण में बसी मां प्रकृति के पास हर चीजों का हिसाब संचित रहता है और समय आने पर वह अपना इंसाफ करती है। कब? ये तो वही जाने! खैर....पगले मनोहर का श्यामा के साथ ब्याह करके जमींदार राजवीर सिंह अपनी ज़िम्मेदारियों से विमुक्त हुए और सांसारिक जीवन त्यागकर पत्नीसंग भारतवर्ष के तीरथ पर निकल गये।
कुछ दिन सबकुछ ठीकठाक चला। फिर असलियत धीरे-धीरे अपने रंग बिखेरने लगी। नशेड़ी पिता के मुंह से अपनी पति को विष देने की बात सुनकर पतिव्रता श्यामा ने उससे अपने सारे रिश्ते समाप्त कर लिये। पानी जब सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो कोतवाली में शिकायत कर उसे जेल भिजवाने से भी पीछे नहीं हटी। ज्येष्ठ दामाद रामाधार सिंह के दिमाग में डर ने पैठ बना लिया कि कहीं ब्रजलाल पुलिस के सामने सबकुछ बक न दे। इसी भय में उसने ब्रजलाल को रास्ते से हटवा दिया और अफवाह फैला दी कि पश्चाताप की अग्नि में जलता श्यामा का पिता दूर वनगमन कर गया।
वहीं दूसरी तरफ तीनों बहनें अपने पति संग पिता की सम्पत्ति पर कुंडली मारकर बैठ चुकी थी। धीरे-धीरे तीनों दामादों ने अपने ससुर के पूरे कारोबार पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। उनके दबंग रवैये के सामने किसी की मजाल न होती कि कोई चूं भी करे। जहाँ दानवीर राजवीर सिंह के समय में गांववाले ही नहीं, कोई भी दुख का मारा मदद का हाथ फैलाने की हिम्मत रखता था, वहीं अब मदद मांगने वालों के लिए हवेली का दरवाजा सदा के लिए बंद कर दिया गया और मूछों पर ताव दिए दो मुस्टंडे दिनरात हवेली के दरवाजे पर पहरा देने लगे। घर में काम करने वाले नौकरों से भी कोई गलती हो जाती तो निर्दयी बहनें उनकी महीनेभर की पगार काटने से गुरेज न करती।
तीनों बहनें अपनी इकलौती भाभी श्यामा से कोल्हू के बैल की भांति काम लेती। कुछ दिनों तक तो उनके शब्दों में आत्मियता की झलक रही, फिर उनका दानवीय हृदय खुलकर सामने आया। मंदबुद्धि मनोहर से अब अगर कोई भी काम खराब होता तो उसे कमरे में बंद कर दिया जाता और खानापीना देने की भी मनाही कर दी जाती। अपने पति के साथ ऐसी ज्यादती होते देख पत्नी श्यामा कलप उठती। न तो वह अपने बडी ननदों और ननदोइयों से शिकायत कर सकती थी और न ही अपने पति को भूखा छोड सकती थी।
एकबार की बात है।
छत पर खेलते हुए कोई खिलौना मनोहर के हाथो से छूटकर नीचे बैठी मंझली दीदी सुगंधा के सिर पर जा गिरा।
“हाय रे...मार डाला! यह कलमुंहा एक दिन मेरे प्राण हरके रहेगा!भगवान इस मनोहर के बच्चे को अपने पास क्यूं नहीं बुला लेता! हमें क्या इसके मार खाने के लिए यहाँ रख छोड़ा है! वो तो पिताजी का मोह था नहीं तो मैं इस पगले का मुंह ज़िंदगी भर नहीं देखती। ठहर तू...ठहर आज तेरी खबर लेती हूँ! तुझे सबक सीखाना ही पडेगा!!” – बड़बड़ाती हुई सुगंधा ने पास पड़ी एक लाठी उठायी और तमतमाए चेहरे से छत की तरफ बढने लगी। श्यामा वहीं पास ही बैठी बर्तन मांज रही थी और कलेजे पर पत्थर रख ननद की सारी बातें सुन रही थी। पर पति को पीटने की बात पर उससे रहा न गया और उसे बचाने के लिए फुर्ती से लपकी। हालांकि वह अभी गर्भ से थी और आंठवा महीना चल रहा था, पर पति के आगे उसने अपनी तनिक भी परवाह न की।
“दीदी….उनसे भूल हो गई! मैं देखती हूँ उन्हे! समझाती हूँ। डांट लगाती हूँ कि क्यूं हर वक़्त ऐसे खिलवाड़ करते रहते हैं। आप अपने कमरे में जाकर आराम करें। उन्हे कमरे में बंद करके मैं तेल लेकर आती हूँ फिर आपके सिर पर लगा दुंगी। उससे बड़ा आराम मिलेगा! आप तो समझदार हैं न और वो तो ठहरे पागल! दीदी...जाने दिजिए न! आप ही ऐसे गुस्सा करेंगी तो कैसे चलेगा!”– मंझली ननद सुगंधा को रोकती और अपने पति के लिए माफी की गुहार लगाती गर्भवती श्यामा ने कहा।
“हुह.....चोट्टी कहाँ की!! अपने पागल पति की तरफदारी करती है! पेट में गर्भ पल रहा है। इसलिए तुझ पर तरस खा रही हूँ नहीं तो देख लेती मैं तूझे भी! और मुझे क्या करना है क्या नहीं....समझाने वाला आज तक इस सृष्टि में पैदा नहीं हुआ! हट मेरे रास्ते से...!!” – दांत पीसते हुए सुगंधा ने कहा और सीढ़ी पर चढ़ते हुए अपने हाथ को श्यामा से छूड़ाने का प्रयास करने लगी। पर क्रोध में ध्यान ही न रहा कि श्यामा गर्भ से है। धक्का खाकर श्यामा तीन सीढ़ियों से नीचे जा फिसली और दर्द से विलाप करने लगी। उसकी चीख-पुकार सुन घर में काम कर रहे नौकर-चाकर भागे आये। फिर सुगंधा को एहसास हुआ कि कहीं श्यामा की मौत का कलंक उसके मत्थे न आन पड़े। रोती-कलपती सबकी मदद से उसे लेकर गांव के अस्पताल पहुंची,जहाँ श्यामा की जान तो बच गई पर उसने समय से पहले ही अठमासू बच्ची को जन्म दिया।
पर शायद यह बच्ची अपना बुरा किस्मत साथ ही लेकर पैदा हुई थी। इधर हस्पताल में बच्ची की किलकारी गूंजी, उधर खबर मिली कि तीरथ कर रहे जमींदार राजवीर सिंह अपनी पत्नी संग ईष्ट की अराधना करते हुए स्वर्ग सिधार गये। तीनों बहनों के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उन्होने ये खबर उड़ा दी कि मनोहर की पत्नी ने मनहूस को जन्म दिया है, जिसके पैर पड़ते ही घर से उन सबका छत छीन गया। आगे पता नहीं किसकी बारी है!
उधर समय से पहले बच्चा जनने की वजह से श्यामा काफी कमजोर हो चुकी थी। डॉक्टर ने उसे आराम की सख्त हिदायत दी। साथ ही उसकी ननदों को सलाह दिया कि उसे जरा भी काम न करने दिया जाये और जितना बन पड़े फल-फूल देते रहें। डॉक्टर की बातें सुनकर ननदों का भौवें कस गई। भला श्यामा ठाठ से पड़ी रहे, ये उन्हे कैसे गंवारा होता। अस्पताल में तो डॉक्टरों की बातों पर बढ़-चढ़कर हाँ में हाँ मिलाते रहें। पर घर में श्यामा को चुल्हा-चौंका छोड़ बिस्तर पर ठाठ से आराम फरमाते जब चार-पाँच दिन से ज्यादा गुजर गए तो उनके कलेजे पर जैसे सांप लोटने लगा।
“अब मुझसे रहा नहीं जाएगा! आज फैसला होकर ही रहेगा! चल री, देखती हूँ आखिर महारानी की ये नौटंकी कबतक जारी रहेगी।” - नंदा ने भौवें कसते हुए कहा।
“हाँ दीदी, सही कहती हैं आप! हमें क्या नौकर समझ रखा है कि खुद महारानी बैठकर आराम करती रहेगी और हम उनकी गुलामी के लिए खड़े करेंगे! अपने बाप को क्यूं नहीं बुला लेती! खुद तो पता नहीं कहाँ भाग गया और हमारे मत्थे मढ़ दिया इस फुलकुमारी को! हमनें भी तो बच्चा जना है! पर अगले ही दिन से अपने काम पर लग गई थीं! मजाल था कि कोई एक गिलास पानी भी लाकर दे देता!”–संझली बहन अमृता ने भी मन की सारी भड़ास निकाली।
“चल री! देखती हूँ आज उस महारानी को...!” –आग उगलते हुए नंदा बोली और तीनो सगी बहने मनोहर के कमरे की तरफ बढ़ने लगी। श्यामा कमरे में अपनी अठमासू बेटी को सुलाने का प्रयत्न कर रही थी जब धड़ाम की आवाज के साथ दरवाजा खुला। वह चिहुंक उठी और कातर भाव से आँखें तरेरती ननदों की तरफ देखने लगी।

क्रमशः....