नकाब - 21 Neerja Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नकाब - 21

भाग 21

पिछले भाग में आपने पढ़ा की राघव गुड़िया के पछतावे को देखते हुए उसे ठाकुर साहब से मिलने अस्पताल ले कर जाता है। वहां होश आने पर गुड़िया उनसे वादा करती है की वो उनकी इच्छानुसार ही चलेगी। अब आगे पढ़े।

अब ठाकुर साहब की वास्तविक बीमारी का सही इलाज हो गया था। उन्हे जिस भय से हार्ट अटैक आया था। वो वजह दूर हो गई थी। अब उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आने वाली थी। ठाकुर साहब ने एक नौकर को अपने पास अस्पताल में रहने दिया और राघव को सब कुछ समझा कर वैदेही और गुड़िया के साथ घर भेज दिया। शादी में गिने दिन बचे थे। और ठाकुर साहब नही चाहते थे की उसमे कोई भी कमी रह जाए।

पिता गजराज सिंह के बताए अनुसार राघव दोनो घरों की शादी की व्यवस्था देखने लगा। जोर शोर से शादी की तैयारी होने लगी। चारो ओर खुशी का माहौल छा गया। तीसरे दिन ठाकुर साहब भी घर आ गए। अगर कोई खुश नहीं था वो गुड़िया थी। उसने अपने पापा के जीवन को बचाने के लिए अपने जीवन से सौदा कर लिया था। जब निश्चय कर लिया तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखना था। बस अब किसी भी तरह कोशिश कर के पुरानी यादों को धो पोंछ कर साफ करना था। आसान नहीं था ये सब करना। पर इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था।

बुआ ने रोज नाउन से गुड़िया को उबटन लगवाना शुरू कर दिया। घर में मंगल गीत गए जाने लगे। पर क्या उबटन उस चेहरे में सौंदर्य की चमक ला सकता है…? जिसकी आंखों के सपने मर गए हो…। क्या मंगल गीत उस दिल में खुशियां दे सकता है ..? जो अभी अभी टूटा हो। जो किसी के बिछड़ने से वीरान हुआ हो।

सुहास के घर भी तैयारियां जोरों पर थी। रस्में धीरे धीरे शुरू हो गई थी। घर मेहमानों से खचाखच भर गया था। भरता भी क्यों ना..? आखिर सभी के मन में इतने बड़े घर से आने वाली दुलहन को देखने की उत्सुकता जो थी। साथ ही मिलने वाले उपहारों का लालच भी था। लीला इतराती फिर रही थी की आज उसके बेटे का ब्याह इतने बड़े घर में हो रहा था। इतनी खुशी में भी एक मलाल उसे हो रहा था। वो ये को उसका बेटा प्रभास इस शादी में शामिल नहीं हो पा रहा था। बचपन से ही प्रभास सदैव कहता था, भईया की शादी में मैं खूब नाचूंगा। खूब मजे करूंगा और साथ ही अपनी इकलौती भाभी को खूब छेडूंगा। अब प्रभास एग्जाम की वजह से शादी में शामिल नहीं हो पा रहा था। इसी वजह से लीला दुखी थी। अब ये मौका दुबारा नहीं आएगा।

गुड़िया की हां ने ठाकुर साहब को एक नए उत्साह से भर दिया था। वो तो पहले भी कोई कोर कसर नही रखते इस शादी में। पर अब जब गुड़िया ने उनका मान रक्खा था तो वो अपना सब कुछ उस पर न्योछावर कर देना चाहते थे। उन्होंने शादी से दो दिन पहले राघव को बुला कर बोला कि वो शहर जाएं और एक मंहगी गाड़ी का इंतजाम करे।

राघव ने विरोध करते हुए कहा, "पर पापा गाड़ी देने की तो कोई बात नही हुई थी..?"

ठाकुर साहब बोले, "बेटा..! बात तो नही हुई थी। पर मैं

चाहता हूं की गुड़िया अपनी गाड़ी में विदा हो। फिर मैंने कभी तुम दोनो में कोई फर्क नहीं किया। तुम्हारे पास अपनी अलग गाड़ी है, उसे तुम चलाते हो। गुड़िया को भी ड्राइविंग आती है तो क्यों न उसे भी अपनी गाड़ी दी जाए। क्या तुम नही चाहते..?"

राघव बोला, "नही पापा…मेरा वो मतलब नहीं था। कही वो लोग अन्यथा ना ले।"

ठाकुर गजराज सिंह व्यंग से मुस्कुराते हुए बोले, " बुरा और उन्हें लगेगा..? सुहास का तो मैं नही कह सकता। पर जगदेव जी को तो शायद हमारा ये घर देना भी अच्छा ही लगेगा। उनकी निगाहें मैने अच्छे से पढ़ ली है। उन्हे शायद दुनिया में सब से प्यारा पैसा ही है।"

राघव आज्ञाकारी बेटे की तरह शहर कार खरीदने चला गया।

आज सुबह से ही पूरे घर में गहमा गहमी तेज थी। आज ही शादी थी। वैदेही साए की तरह हर पल गुड़िया के साथ थी। उसे बार बार समझाने की कोशिश करती की एक लड़की को जीवन में कई बार समझौते करने पड़ते है। कभी पिता की खातिर, कभी घर परिवार की खुशियों की खातिर, कभी बच्चो की खातिर। हमेशा एक स्त्री अपनी खुशी के बारे में न सोच कर परिवार के बारे में सोचती है। गुड़िया बेबी अब आपका भी यही दायित्व है।

गुड़िया खामोशी से सब कुछ वैदेही का बताया सुनती और समझती।

इधर सुहास के घर बारात बिदा हो रही थी। सजी धजी लीला देवी सारे रस्म पूरी कर रही थी। पर मिठाई का मुंह लटका हुआ था। इतना सारा खर्चा होने के बाद भी उसे नए कपड़े नही मिले थे। जगदेव सिंह ने प्रभास का ही एक नया कपड़ा उसे दे दिया था। जो प्रभास को थोड़ा तंग था। मिठाई लंबाई में प्रभास से छोटा था। उसे प्रभास के कपड़े बिलकुल फिट नहीं आ रहे थे। पर जगदेव जी ने किसी भी तरह उसे दूसरे कपड़े नही खरीदे। मिठाई सभी के अच्छे कपड़े देख कर चिढ़ जा रहा था।

खैर जगदेव जी गाजे बाजे के साथ अपने पुत्र की बारात ले कर ठाकुर गजराज सिंह के घर के लिए निकल पड़े।

यहां ठाकुर साहब की पत्नी नही थी। इस कारण राघव और वैदेही ही सब रस्मे निभा रहे थे। घूंघट में ही गुड़िया सभी रस्मे निभाती रही। जब भी वैदेही लंबे घूंघट को पीछे खींच कर कुछ कम करने की कोशिश करती। गुड़िया फिर से उसे और खींच लेती। जैसे वो अपना चेहरा किसी को दिखाना ही नही चाहती हो। सुहास ने भी मां से सुना था की वो बहुत सुंदर है। थोड़ी देखने की इच्छा भी थी। पर घूंघट देख कर उसने भी इस और से अपना ध्यान हटा लिया।

रात भर में विवाह पूर्ण हो गया। सुबह अब विदाई की बारी थी। ठाकुर साहब ने जितनी जल्दी को निपटाया था। अब ये घड़ी उन पर बहुत भारी होने वाली थी। जिस गुड़िया को अपने हाथो से पाला पोसा। पलकों पर बिठाया, अब उसे किसी दूसरे के हवाले कर देना था। हॉस्टल में रही गुड़िया कैसे घर बार सम्हालेगी…? अब उन्हे महसूस हो रहा था की एक बेटी को बिदा करना, अपने एक अंग को काट कर अलग करने समान कष्ट दाई होता है। आज के बाद उनका अपनी लाडली बेटी पर हक खत्म हो जाएगा। आज वो पराई हो जायेगी। ठाकुर साहब की आंखे दिखावे के लिए भले ही नही रो रही थी। पर उनका दिल जार जार रो रहा था।

क्या गुड़िया की विदाई सकुशल संपन्न हो गई..? क्या वो नए घर में, नए लोगो के साथ सामान्य हो पाई..? क्या सुहास को उसने अपना पति स्वीकार कर लिया…? ये सब जानने के लिए पढ़े "सच उस रात का.." का अगला भाग।

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