Forgotten sour sweet memories - 16 books and stories free download online pdf in Hindi

भूली बिसरी खट्टी मीठी यादे - 16

स्कूल प्रशासन ने पोस्टिंग का फार्मूला निकाला जो परीक्षा में फर्स्ट और सेकंड आये थे।उन्हें बुलाया गया।फर्स्ट नीमच का प्रेम और सेकंड मैं आया था।हम दोनों ने कोटा मण्डल चुन लिया।बाकी को मुम्बई भेज दिया गया।मैं ट्रेनिंग स्कूल से पहले बांदीकुई आया था।मेरी माँ और भाई बहन आबूरोड से बांदीकुई आ चुके थे।
मैं यहाँ से कोटा गया था।कोटा जाने के लिए दो रास्ते थे।जयपुर होकर या भरतपुर होकर।मैं बांदीकुई से जयपुर गया और वहाँ से सवाई माधोपुर उन दिनों दिल्ली अहमदाबाद मीटर गेज थी और सवाईमाधोपुर भी।सवाई माधोपुर से कोटा के लिए बड़ी लाइन की ट्रेन मिलती थी।कोटा जाने का वह मेरा पहला अवसर था।वहां में मण्डल कार्यालय गया और मुझे एक महीने की प्रेक्टिल ट्रेनिंग के लिए कोटा स्टेशन भेज दिया गया।
कोटा मे कोई जान पहचान नही थी।अतः मैं बजरिया में एक होटल में बेड लेकर रहा।उस कमरे में एक महाराष्ट्र का एम आर,एक सरदारजी और एक कलाकार भी रहता था।स्टेशन के पास बजरिया मे ही मद्रास होटल था।अब भी है।उसमें मे खाना खाता था।उस समय थाली में दाल चावल सब्जी और रोटी भर पेट मिलती थी।यहाँ के 2 लड़के और थे।विमलेश और देवेंद्र।यह दोनों कोटा के थे।पर इन्हें मुम्बई मिला था इसलिए गए नही थे।
रोज सुबह मैं दस बजे से पहले कोटा स्टेशन पहुंच जाता।मुझे एक महीने की प्रेक्टिकल ट्रेनिंग लेनी थी।पन्द्रह दिन के लिए बुकिंग आफिस में और पन्द्रह दिन के लिए पार्सल आफिस में।उस समय कोटा बुकिंग के इंचार्ज राजेन्द्र और पार्सल के भगवान दास थे।कुछ और स्टाफ में शंकर लाल,सूरज,सरदार हरबंस,नथिलाल,पी ए सक्सेना मामा आदि थे।शाम को मैं होटल में वापस आ जाता था।महीना होने पर तनखाह नही मिली और मेरे पास पैसे खत्म हो गए।खाने की समस्या हो गयी।तब मैंने विमलेश से कहा और एक दिन उसके खाना खाया और उससे दस रु उधार लिए थे।
विमलेश के पिता कोटा में ही गुड्स क्लर्क रहे थे।उसने पर्सनल विभाग के क्लर्क से बात की तब हमारी पे शीट बनी और हमे तनखाह मिली थी।एक महीने बाद सहायक वाणिज्य प्रबन्धक ने टेस्ट लिया और जब पोस्टिंग की बारी आई तब पता चला।मेरा पुलिसः वेरिफिक्सन नही हुआ है।उस समय कोटा में सीनियर डी सी एम उस समय डी सी एस बोलते थे के पद पर जसवंत सिंह थे जो कोटा राज दरबार से ताल्लुक रखते थे।मेरा पोस्टिंग भरतपुर किया गया था।लेकिन पुलिस वेटिफिकेसन न होने के कारण मुझे बांदीकुई वापस आना पड़ा था।
और यहां मैं प्रतीक्षा करता रहा।अक्टूबर में कागज आये और जब पुलिस ने वापस भेज दिए तब कोटा से पत्र आया
मैने बांदीकुई के स्टेशन मास्टर आफिस से पास लिया और मैं22 अक्टूबर को कोटा गया । 23 को कोटा पहुंचा।जब मैं पर्सनल में बाबू से मिला तो उन्होंने कहा,"जी एम के यहां से आदेश हो गए है।अनुकम्पा वालो को अपने होम मण्डल में ही पोस्ट किया जाए।तुम अगर चाहो तो जयपुर जा सकते हो।"
लेकिन मैं कोटा मण्डल में ही रहा और आगरा फोर्ट का पोस्टिंग मैने स्वीकार कर लिया।उसी रात मै कोटा के लिए पैसेंजर ट्रेन में बैठ गया।
जब पिताजी अछनेरा में थे।यह सन 1959 की बात है तब मैं उनके साथ 2 या 3 बार आगरा गया था

अन्य रसप्रद विकल्प