भूली बिसरी खट्टी मीठी यादे - 15 Kishanlal Sharma द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

भूली बिसरी खट्टी मीठी यादे - 15

आगे बढ़ने से पहले एक व्यक्ति का जिक्र जरूरी है।
नरोति लाल चतुर्वेदी
नरोति लाल आगरा फोर्ट स्टेशन पर मारकर के पद पर थे।यह पद रेलवे में चतुर्थ श्रेणी में आता था। यह पद पार्सल और माल गोदाम में होता है।मारकर का काम मारका डालना होता है।
वह मेरे से उम्र में बड़े थे और न जाने क्यों उन से मेरी आत्मीयता हो गयी थी।हम सभी को केंटीन से चाय नाश्ता खाना मिलता था।पर वह सात्विक थे और किसी के हाथ का कुछ नही खाते थे।इसलिए अपने साथ स्टॉप और बर्तन आदि लाये थे।उन्होंने कमरे में खाना पकाने की इजाजत ले ली थी।वह अपने लिए चाय खाना खुद ही बनाते थे।
उनकी समझ मे पढ़ाई नही आती थी और कुछ दिन बाद वह अपना सामान लेकर चले गए।तब मैंने उन्हें चिट्ठी लिखी थी और मेरा पत्र मिलने के बाद फिर आ गए थे।लेकिन वह परीक्षा पास नही कर सके।
उदयपुर वैसे तो रेलवे के ट्रेनिग स्कूल की वजह से जाना जाता है।मोहन लाल सुखाड़िया जो कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे थे।उन्होंने इस शहर की नींव रखी थी।सुखाड़िया सर्कल पर ही रेलवे का ट्रेनिंग स्कूल और हॉलिडे होम है।
उदयपुर ऐतिहासिक शहर भी है।यहां पर देखने के लिए सहलियो की बाड़ी, पैलेस और अनेक सांस्कृतिक जगह है।उदयपुर के पास एकनाथजी मंदिर,नाथद्वारा और हल्दीघाटी आदि ऐतिहासिक स्थान है।
रविवार की छुट्टी रहती थी।हम कुछ लोग ग्रुप बनाकर घूमने के लिए गए थे।एकनाथजी का मंदिर बड़ा विशाल है।इसे पूरा देखने के लिए पूरा दिन भी कम पड़ जाए।
नाथद्वारा का मंदिर की बड़ी मान्यता है।देश विदेश से प्रति दिन हज़ारो की संख्या में लोग यहाँ आते हैं।गुजरात के श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में आते है।जन्मस्थली भले ही भगवान श्रीकृष्ण की मथुरा रही हो लेकिन कर्मस्थली तो द्वारका ही रही है।
आंगन का प्रांगण काफी छोटा था।इसलिए जब पट खुलते है तब धक्का मुक्की सी रहती है।पर दर्शन हो जाते है।आप दान पेटी में डाल सकते है और काउंटर से प्रशाद भी खरीद सकते है।जहाँ प्रशाद तैयार होता है वहा काफी गहरे कुए बने हुए है।जिनमे असली घी भरा रहता है।
वापस आते समय एक बस हल्दी घाटी होती हुई आती थी।हमने वह बस पकड़ी थी।वह बस हल्दी घाटी में रुकती थी।हल्दी घाटीमहाराणा प्रताप की कर्मस्थली रही है।पहाड़ियों से घिरी है।यहाँ के जंगलों में रहकर उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी।हल्दी घाटी नाम यू ही नही पड़ा है।वहाँ की मिट्टी हल्दी की तरह पीली है।भारत का इतिहास विरगाथाहो से भरा पड़ा है।लेकिन वामपंथी,लिबरल और गुलामी की मानसिकता से ग्रसित इतिहासकारों ने हमारे वीर पुरषो के त्याग और बलिदान को महत्त्व न देकर विदेशी आक्रांताओं जा महिमा मंडन करने में कोई कसर नही रखी।राम को काल्पनिक बताने वाले और कर भी क्या सकते है।
हल्दी घाटी को देखकर मैं सोचने लगा।सेकड़ो साल पहले कितने कष्ट और परेशानियों का सामना करके विदेशी आक्रांता अकबर से वह लड़ते रहे लेकिन झुके नही।
और आखिर में हमारा रिजल्ट आ गया।नरोति लाल को छोड़कर बाकी सब पास हो गए थे।ट्रेनिंग पूरी होने के साथ ही मण्डल का एलॉटमेंट होना था।जो लोग प्रमोशन पर आए थे।उन्हें अपने मण्डल में ही जाना था।बाकी 2 वेकेंसीय कोटा मण्डल में और 7 बंबई में थी।हम 9 लोग अनुकम्पा पर आए थे।