Nakaab - 16 books and stories free download online pdf in Hindi

नकाब - 16

भाग 16

राघव गुड़िया का हाथ पकड़े बाहर गाड़ी तक आया। उसे पीछे की सीट पर बिठा दिया। ठाकुर गजराज सिंह आगे की सीट पर बैठ गए। गुड़िया कसमसा कर रह गई। वो किसी भी हालत में जाना नही चाहती थी। पर राघव और पिता ने उसे जिस तरह बैठे देखा था, उसे वो लाख बातें बना कर भी झुठला नहीं सकती थी कि उसके और प्रभास के बीच कुछ भी नही है। इसी सब वजह से उसकी जुबान नही खुल पा रही थी। इस तरह अचानक सब कुछ हुआ की गुड़िया ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। सभी के बैठते ही राघव ने गाड़ी गुड़िया के हॉस्टल की ओर मोड़ दी।

गुड़िया के हॉस्टल पहुंच कर राघव ने गाड़ी रोक दी। वो गुड़िया से बोला, "जा गुड़िया..! जल्दी से अपनी किताब कापी ले आ। जिससे समय से घर पहुंच जाए।"

गुड़िया को कुछ भी अच्छा नही लग रहा था। एक अजीब सी घबराहट हो रही थी। हर छोटी बड़ी बात पर पापा और भईया से जिद्द करने वाली, अपनी हर बात मनवाने वाली, आज निःशब्द हो गई थी। आज उसकी हिम्मत नही हो रही थी,पापा और भईया के आदेश को नही मानने की।

गुड़िया जल्दी से अपने कमरे में गई। फिर एक बैग में अपनी सारी किताबें और नोट्स रखने लगी। कुछ और जरूरत का सामान रक्खा और बाहर चलने को हुई। फिर उसे ध्यान आया। उसकी रूम पार्टनर लड़की परेशान होगी उसके वापस नही आने से। उसने एक नोट लिख कर अपने टेबल पर दिया की, मैं घर जा रही हूं। जल्दी ही वापस आ जाऊंगी।

फिर वो बैग ले कर बाहर आ गई। नीचे गाड़ी के पास खड़ा राघव उसी का इंतजार कर रहा था। गुड़िया को देखते ही आगे बढ़ कर उसके हाथ से बैग ले लिया और गाड़ी की डिग्गी में रख दिया। फिर गुड़िया के बैठते ही गाड़ी घर की ओर ले चला।

पूरे रास्ते एक अजीब सी मनहूसियत छाई थी। कोई किसी से बात चीत नहीं कर रहा था। सब अपने अपने ख्यालों में खोए हुए थे।

राघव और ठाकुर गजराज सिंह सोच रहे थे। गुड़िया घर पहुंच कर शादी की तैयारी देख कर कैसा रिएक्शन करेगी…? कही कुछ गड़बड़ ना हो जाए..?

इधर गुड़िया ये सोच कर परेशान थी की वो इस तरह अचानक बनारस से चली आई। प्रभास उसके लिए कितना परेशान होगा…? भला उसे कैसे पता चलेगा की वो अपने घर आ गई है…? फिर एक्जाम भी तो है। कैसे वो घर पे रह कर तैयारी कर पाएगी…? क्या हो गया भाभी को जो उसे इस तरह अचानक लाना पड़ा..?

तीनों के दिमाग में अपने अपने अनुसार खयाल घूम रहे थे।

जल्दी करते करते भी उन्हे घर पहुंचने में शाम हो गई। गाड़ी राघव ने सीधा पोर्च में ला कर खड़ी की। शाम का ढल गई थी। रात का हल्का धुंधला अंधेरा फैल रहा था।

ठाकुर गजराज सिंह ने अपनी बड़ी बहन कांति देवी को शादी में निर्देश के लिए बुला लिया थी। कांति देवी कहने को तो गजराज सिंह की बहन थीं, पर वो उम्र में उनसे काफी बड़ी थी। कांति देवी गजराज को बेटे समान प्रेम देती थी। वो ज्यादा तो नहीं आ पाती थी अपनी घर गृहस्ती को छोड़। पर जब भी गजराज सिंह को जरूरत होती उनकी, वो सब छोड़ छाड़ कर भाई की मदद को हाजिर हो जाती।

आज फिर गजराज सिंह को बेटी की शादी में बहन की मदद की जरूरत थी, तो वो आ गई सब संभालने, सबसे पहले। वो काफी अनुभवी थी। राघव के विवाह में इन्ही दीदी की देख रेख में ही विवाह संपन्न हुआ था। और ठाकुर साहब को पूरा विश्वास था की दीदी के रहने से सब कुछ अच्छे से, बिना किसी बाधा के निपट जायेगा। वो सब कुछ अच्छे से संभाल लेंगी। ठाकुर साहब अभी और दो एक दिन बाद ही गुड़िया को लेने जाते। पर दीदी ने आते ही रट लगा दी की जाओ गुड़िया को ले कर आओ। वो दुलहन बनेगी तो कम से कम एक हफ्ते तो उसे उबटन लग जाए। वरना उसका चेहरा खिलेगा कैसे..? दीदी की बात मान ठाकुर साहब गुड़िया को लेने चले गए थे।

दीदी बाहर ही लॉन में बैठी थी। देर हो रही थी तो बाहर ही बैठ कर गजराज सिंह, राघव और गुड़िया की प्रतीक्षा कर रही थीं।

जैसे ही गाड़ी रुकी गुड़िया की निगाह कुर्सी पर बैठी बुआ पर पड़ी। वो धुंधले में भी पहचान गई की बुआ ही है। उसके मन में प्रश्न उठा, बुआ आखिर क्यों आई है..? फिर उसने ही खुद को जवाब दिया, भईया ने बताया था भाभी की तबियत ठीक नहीं। बुआ उन्हीं की देख भाल के लिए आई होंगी।

गुड़िया अंदर ना जाकर बुआ के पास उनसे मिलने चली गई। बुआ को देख कर उसे खुशी हुई और वो उनके गले लग गई।

बुआ ने प्यार से गुड़िया की पीठ सहलाई और उसे खुद से अलग करके उसके चेहरे को अपने हाथो से थाम कर बोली, "दिन भर कॉलेज में घूम घूम कर कैसा रंग कर लिया है…? मैं जानती थी ये। तभी गज्जू (कांति देवी भाई गजराज सिंह को इसी नाम से पुकारती थीं) से कह कर तुझे बुलवा लिया। दस दिन में तो मैं तेरा रंग निखार हीं दूंगी। चल अंदर चले वैदेही भी तुम सब का इंतजार कर रही है।" कांति देवी कुर्सी से उठीं और गुड़िया का हाथ पकड़ कोठी के अंदर बैठक में चली आई। जहा ठाकुर साहब और राघव बैठे थे। संजू पानी वगैरह ला कर रख रही थी। बैठक में गुड़िया के आते ही वैदेही ने भी आगे बढ़ कर उसे गले लगा लिया। और पूछा, "कैसी है गुड़िया बेबी..?"

अब गुड़िया चौक गई। भाभी तो बिलकुल ठीक ठाक दिख रही। फिर भईया ने क्यों कहा की भाभी बीमार है। और बुआ भी आई है। फिर उसने सोचा ही सकता है कोई खुश खबरी हो जो भईया उसे बताने में शर्माता हो।

"गुड़िया बोली,"मैं तो ठीक हूं भाभी। पर आपको क्या हुआ..?"

"मुझे क्या होगा..? मैं तो भली चंगी हूं।" वैदेही बोली।

अब गुड़िया से नही रहा गया। वो बोल उठी, "जब आप बिल्कुल ठीक ठाक हो और आपकी देख भाल को बुआ आई हीं है तो फिर मुझे बुलाने का क्या मतलब..? मेरा एग्जाम है पन्द्रह से आप सब को नहीं पता..?" गुड़िया की आवाज में नाराजगी साफ झलक रही थी।

तभी बुआ बोल उठी। "अरे…! गुड़िया तुझे ना बुलाते तो तेरे ब्याह में दुलहन की जगह किसे बिठाते…? बुआ हंसते हुए गुड़िया से बोली।

क्या हुआ बुआ से ये जान कर की उसका ब्याह हो रहा है..? क्या बुआ मजाक कर रही हैं..? अगर बुआ मजाक कर रही तो ये कैसा मजाक है…? क्या गुड़िया को बुआ की बात पर यकीन हुआ..? जानने के लिए पढ़े सच का अगला भाग।

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