उजाले की ओर –संस्मरण Pranava Bharti द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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उजाले की ओर –संस्मरण

इस संसार का हर इंसान इस ‘क्यू’ में खड़ा साँसें ले रहा है | वह जग रहा है, वह सो रहा है |वह भाग रहा है, वह रूक रहा है, वह थम रहा है-जम रहा है---- लेकिन जिजीविषा की ‘क्यू’ सबके भीतर है | इसीलिए वह ज़िंदाहै | साँसें कुछ सवाल पूछती हैं, वह कभी उत्तर दे पाता है, कभी नहीं लेकिन उसका हृदय ज़रूर धड़कता है | वह कुछ बातें आत्मसात करता है, उन्हें अपने सलीके से कहने की कोशिश करता है | हाँ, वह ज़िंदा रहता है, यह विभिन्न प्रकार की जिजीविषा ही उसे ज़िंदा रखती है |

आकाशवाणी का वह दिन आँखों के सामने जैसे चलचित्र सा आकर ढीठ बनकर खड़ा हो जाता है कभी भी!

बरसों पुराना दिन ! वैसे तो वो दिन रूठने-मनाने के हुआ करते थे लेकिन यदि कोई मानता है तो मनाता ही जाए और रूठने वाला माने ही न तो भला किया भी क्या जा सकता है ?

आमने –सामने बैठे थे मैं और काबरा जी! बातें हो रहीं थीं विद्यापीठ की जहाँ मैंने विवाहोपरांत वर्षों पश्चात फिर से एक बार शिक्षा के लिए जाना शुरू किया था | पहले अँग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया था | न जाने कुछ ऐसा भ्रम था पीएच.डी में प्रवेश मिल जाएगा | वहाँ अँग्रेज़ी विभाग था ही नहीं और हिन्दी में पीएच. डी के लिए हिन्दी में एम.ए करना ज़रूरी था जबकि बी.ए में मेरे पास अँग्रेज़ी के साथ हिन्दी साहित्य भी था | लेकिन नियम तो नियम थे और मुझे पीएच.डी से पहले हिन्दी में एम.ए करना अनिवार्य था | मैं हिन्दी व अँग्रेज़ी दोनों में थोड़ा बहुत लिख रही थी | विवशता थी, बच्चे छोटे थे और उन्हें छोड़कर मेरा दूर विश्वविद्यालय जाना संभव न था | इसीलिए विद्यापीठ में हिन्दी विभाग में प्रवेश ले लिया गया था |

प्रवेश लेते ही अपनी आदत के अनुसार पंखों के खुलने की सरसराहट शुरू हो गई | आकाशवाणी विद्यापीठ के समीप ही था| हिन्दी विभाग के लोग आकाशवाणी आते-जाते रहते |लेखन में रुचि है, पता चलने पर मुझे भी आकाशवाणी कविता, कहानी पाठ के लिए जब-तब आमंत्रित किया जाने लगा |

खुश थी इस परिवर्तन से फिर भी न जाने क्या था जो भीतर ही भीतर उदास करता रहता | विद्यापीठ में डॉ.काबरा से मुलाक़ात हो चुकी थी |खूब बातें भी होतीं, कविता पाठ होते | यानि पंखों को एक खुला आसमान मिल तो रहा था लेकिन मन की उदासी पतिदेव को परेशान कर देती | बात-बात पर आँखों में आँसू भर आना कैसे कोई समझ सकता है ? वह तो भई पूछ ही सकता है |

उस दिन मेरी और डॉ.काबरा की दोनों की रेकार्डिंग थी, अचानक मिले थे हम वहाँ और हम स्टूडियो के ख़ाली होने की प्रतीक्षा कर रहे थे | वह पहला दिन था जब उनसे इतनी खुलकर बातें हुईं थीं| कुछ ही वर्ष हुए थे अपने मित्र, शहर, माँ को छोड़े | यहाँ का वातावरण बिलकुल भिन्न ! कोई ऐसा न दिखाई देता जिससे अपने किसी प्रिय विषय पर बात की जा सके |

हम बातों मेन मशगूल थे आकाशवाणी में, अचानक पतिदेव पहुँच गए और पहली बार उनकी मुलाक़ात डॉ.किशोर काबरा से हुई|कई बार उनके बारे में सुन चुके थे इसलिए पहचानने में कोई देरी न लगी |अपना नंबर आने पर मैं रेकार्डिंग के लिए स्टूडियो में चली गई | ये दोनों लॉन्ज में बैठे बातें करते रहे |

“एक बात बताइए काबरा जी ---“ मेरे पति ने उनसे कहा |

“पूछिए साहब !” अपने जाने-पहचाने अंदाज़ में उन्होंने कहा |

“समझ में नहीं आता प्रणव को क्या परेशानी है, कभी भी रोने बैठ जाती है | ज़रा-ज़रा सी बात में मुँह फुला लेती है, गुस्सा होने लगती है |”

मेरी रेकार्डिंग चल रही थी और काबरा जी की किसी के साथ चर्चा थी, वे उन महानुभाव की प्रतीक्षा में बैठे थे | इससे अच्छा अवसर और कहाँ मिल सकता था पतिदेव को मेरी बात करने का |

जब मैं वापिस आई तो काबरा जी मुस्कुरा रहे थे | पतिदेव मेरी ओर ऐसे देख रहे थे मानो पहली बार देख रहे हों |

“क्या हुआ ?” स्वाभाविक अंदाज़ में मैंने पूछा |

मेरे पति के साथ मेरे बारे में चर्चा करते हुए डॉ.काबरा मुस्कुराए और बोले ;

“मैंने श्रीवाल साहब को आपके बारे में सब समझा दिया है |”

अरे भई, ऐसा तो क्या समझाया है ? कुछ वर्ष पूर्व विवाह हुआ था | उत्तर प्रदेश से गुजरात का सफ़र यूँ तो शानदार था लेकिन उसमें कहीं अपने मनोनुकूल जिजीविषा की तड़प थी जो पति बेचारे कैसे समझ पाते? मैं नहीं जानती थी उन दोनों में मेरे बारे में क्या बातें होती रहीं थीं लेकिन मन में कहीं ठसक सी तो हो ही गई थी|काफ़ी देर प्रतीक्षा कर चुके थे काबरा जी अपने साथ चर्चा में शामिल होने वाले महानुभाव की ।थोड़ी देर मेन ही आकाशवाणी में सूचना आ गई कि कुछ कठिनाई होने के कारण वे महानुभाव उपस्थित होने में असमर्थ थे | काबरा जी अब फ़्री थे, कार्यक्रम किसी दूसरे दिन के लिए टल गया था|

उस दिन श्रीवाल जी के कहने से काबरा जी घर आ गए और फिर मेरे बारे में काफ़ी कुछ बातें होतीं रहीं| मैंने अपना वह उपन्यास भी उनको दिखाया जो मैं विवाह से पूर्व लिख रही थी, उसे मायके से अपने साथ ले आई थी | फिर गृहस्थी की गाड़ी आगे चली गई और वह बेचारा कोने में बैठा अपनी व्यथा-कथा कहता रहा होगा | उसका शीर्षक था ‘मोती जो बिखर गए’अब स्मृति नहीं लेकिन ज़रूर उनमें कुछ उन मोतियों की चर्चा होगी जिन्हें पाया न जा सका | काबरा जी ने कहा भी था ;

“क्यों बहन ! पहले उपन्यास का शीर्षक ही इतना नकारात्मक !” कुछ चर्चा भी की थी उस पर और कुछ नए संदर्भ उसमें डालने के लिए प्रेरित किया था लेकिन वह सचमुच बिखर गया | लंबी कहानी है, बस--–बात इतनी सी है कि वह बिखर ही गया, जो प्रकाशित होने गया तो मेरे पास आया ही नहीं |

कहाँ तो मैं कत्थक, संगीत, लेखन और साथ ही कई समाज सेवा के कामों से, शरारतों से भी जुड़ी थी, 

कहाँ ऐसी जगह आ गई थी जहाँ न मैं किसीको अपनी व्यथा-कथा कह पाती, न सुना पाती|मायके में मेरी संस्कृत की अध्यापिका माँ मेरी सबसे प्यारी दोस्त थीं |

उसी दिन काबरा जी ने मेरे घर बैठे-बैठे ही मुझे ‘साहित्यालोक’ संस्था का सदस्य घोषित कर दिया | जो गुजरात की एकमात्र कवियों, रचनाकारों की संस्था थी | उस समय उसके अध्यक्ष स्व.रामचेत वर्मा जी थे जो खादी ग्रामोद्योग में कार्यरत थे | संस्था की पहली गोष्ठी में जब खादी ग्रामोद्योग में मैं पहुँची, पता चला कि उस समय तक संस्था में केवल 6/7 सदस्य ही थे | बहुत स्नेह से सबने स्वागत किया और क्रमश: संस्था की उतरोत्तर प्रगति होती गई |

काबरा जी से विद्यापीठ में मिलती ही रहती थी | न जाने किन क्षणों में उन्हें ‘बड़े भैया’कहने लगी | मैं जिस मूड में उन्हें ‘बड़े भैया’ कहती, उसी मूड में मुस्कुराते हुए उनसे ‘छोटी बहना’ सुनने की आदी हो गई थी |

लगभग हर बार ही वे कहते ;

“मैं तो प्रभातकाल से ही आपका नाम जपना शुरू कर देता हूँ |”सबके सामने वे कहते |

“बस, जपते रहिए, तर जाएँगे ---“ और सब ज़ोर से हँस पड़ते |

अब मेरा नाम प्रणव है, मुझे अपने ऊपर गर्व होना ही था |मैं उनसे हर बार यही कहती और हम ठठाकर हँस पड़ते | ऐसे ही दिन गुज़रते रहे, हम उनसे विद्यापीठ में, साहित्यलोक में, मंचों पर लगातार मिलते रहे |

इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि काबरा जी के हृदय में डॉ.अंबाशंकर नागर जी का क्या स्थान था ? ‘हिन्दी साहित्य परिषद’ का गठन हुआ था, विद्यापीठ में ‘हिन्दी भवन’ का निर्माण और साहित्य अकादमी की माँग भी शुरू हुई | डॉ.किशोर काबरा डॉ. नागर जी के पास विद्यापीठ प्रतिदिन आते और बहुत से महत्वपूर्ण कार्यों पर चर्चा होती, उन पर कार्य होता |हिन्दी भवन में डॉ.नागर के साथ डॉ. काबरा बैठते, साथ ही डॉ.रामकुमार गुप्त जी, आचार्य रघुनाथ भट्ट जी, श्री गिरधारी लाल सराफ जी और भी कई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तित्व वहाँ होते | हम सब लोग भी अपनी-अपनी हैसियत से कार्य करते|काबरा जी का साहचर्य व उनका आशीष सदा बना रहा |

जीवन किसीका भी समतल नहीं होता, कुछ न कुछ ऊबड़-खाबड़ तो चलते ही हैं लेकिन उनके जीवन में जिस प्रकार की परेशानियाँ आईं, उन्होंने किस प्रकार से जूझकर उन्हें पार किया उन सब घटनाओं, दुर्घटनाओं से हम सब परिचित हैं |

कुछ बातें कभी नहीं भुलाई जा सकतीं, वे दर्पण के समान न जाने किसी भी समय न जाने कैसे आ खड़ी होती हैं| जिमखाना में एक कवि-सम्मेलन था | मैं भी आँखों की बीमारी से निकली थी | आत्मविश्वास जैसे कमज़ोर पड़ गया था |जिमखाना के गेट पर पहुँचते ही काबरा जी को आते देखा, मैं ठहर गई | मेरे पति मेरे साथ थे, हम दोनों ही उन्हीं दिनों उनके साथ हुई बेटे की भयानक दुर्घटना से परिचित थे | काबरा जी हमारे समीप आ चुके थे, उनकी आँखें पनीली थीं| उन्हें देखते ही मेरी रुलाई फूट गई और वो जो हिचकियाँ भरकर रोए, हम हतप्रभ रह गए|उनका सिर मेरे कंधे से आ लगा, मैं उन्हें एक छोटे बच्चे की भाँति पुचकार रही थी|एक युवा एकमात्र बेटे को खोया था उन्होंने !कई क्षणों तक वे इसी प्रकार रोते रहे उनका वह रुदन मैं कभी नहीं भूल पाई | फिर भी उन्होंने स्वयं को किस प्रकार संभाला यह बहुत महत्वपूर्ण है| भाभी जी की मृत्यु के पश्चात वे रहे-सहे भी टूट गए |

एक बार की घटना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है | हम कई मित्र जिनमें डॉ.काबरा, डॉ.ऋषिपाल धीमान, गुजराती कवि भट्ट भाई आदि कवि-सम्मेलन के लिए अगरतल्ला गए| अहमदाबाद लौटते समय कोलकता से मेरी और काबरा जी की सीट विमान में साथ-साथ थीं | काफ़ी देर तो हम बातें करते रहे | फिर अचानक उन्हें न जाने क्या सूझा, बोले ; “बहन ! साधना में बैठेंगी ?” मेरी और उनकी बात बहुत बार ‘प्रणव’ व साधना पर आकर टिक जाती थी |

हम दोनों सहर्ष मेडिटेशन में बैठ गए | वो कुछ बोलते जा रहे थे और मुझे जैसे कोई आकाशवाणी सुनाई दे रही थी | लगभग 50 मिनट से भी अधिक समय तक हम मेडिटेशन में बैठे रहे, जैसे किसीऔर ही लोक में थी मैं ! बिलकुल ध्यान नहीं था कि हम हज़ारों फीट की ऊँचाई पर थे |संभवत उससे अधिक समय भी बैठते यदि हमारे लिए भोजन न आ गया होता |

उसके कुछ दिनों बाद वे अजमेर चले गए थे | एक बार वहाँ से आने पर मित्र मंजु महिमा के घर एक गोष्ठी हुई जिसमें रणछोड़ जी के बड़े से चित्र के नीचे खड़े होकर उन्होंने रचना पाठ किया | सब इस तथ्य से परिचित हैं कि वे अजमेर में बहुत प्रसन्न नहीं थे और वापिस अहमदाबाद आना चाहते थे | अहमदाबाद आने के बाद उन्होंने कई लोगों से यह बात साझा की कि भगवान रणछोड़ जी ने उनकी सुन ली थी और उनका मंजु जी के घर पाठ्य करना सफ़ल हो गया था |

क्रमश: उनके बहुत से शिष्य बनते गए और उन्होंने न जाने कितने गीत लेखन सीखने के इच्छुकों को छंद-विधान सिखाया| इसके लिए किसीके कहने भर की देरी थी, वे सिखाने के लिए हरदम तैयार रहते थे| उनके शिष्यों की संख्या बढ़ती जा रही थी |

कभी ज़िक्र होने पर वे कई बार मुझसे कहते ; आपने तो मुझसे कभी भी छंद-विधान सीखा ही नहीं | आप मेरी शिष्या नहीं रहीं कभी” तब मैं उन्हें याद दिलाती कि गुजरात में आने के बाद मेरे बंद डैने उनके ही कारण खुले थे |इसके अतिरिक्त अभी कोविड में मुझे रिंग देकर मेडिटेषन के लिए उन्होंने कई माह उठाया | बाद में मैंने ही उन्हें मना किया कि अब मैं जाग ही जाती हूँ अत: अब वे परेशान न हों |

वर्षों पूर्व काबरा जी बीमार पड़े थे और साबरमती की ओर किसी अस्पताल में उन्हें भर्ती करवाया गया था

तब में पति के साथ उनको देखने गई थी लेकिन इस बार मुझे काफ़ी देर बाद उनकी बीमारी का पता चला, मैं अस्पताल तो न जा सकी लेकिन घर वापिस आ जाने के बाद डॉ. माल्टी दुबे और डॉ.गायत्री दत्त के साथ उनके दर्शन कर सकी | उनकी सबसे छोटी बेटी व दामाद, उनके भाई के बेटे उस समय वहाँ उपस्थित थे | उस दिन पुरानी बातें याद दिलाकर मैंने उन्हें बहुत हँसाया| लगभग दो घंटों का समय उनके साथ गुज़ारा| अगले सप्ताह ही उनके महायात्रा पर जाने की सूचना मिल गई |

जाना तो हम सबको ही है लेकिन एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी एक ऐसी छाप छोडकर जाए कि बरसों उसकी स्मृति ताज़ा बनी रहे, बहुत विरला ही होता है | काबरा जी किसी एक के नहीं, सबके थे | जो कोई उनसे मिलता, उसे महसूस होता कि वे उसके हैं | एक व्यक्ति में यह बहुत बड़ा गुण होता है, जो काबरा जी में निश्चय ही था |

अब तक लिखता रहा वही सब, जो कुछ मन करता है |

मन के बारे में लिखने को अब कुछ मन करता है || (डॉ.किशोर काबरा)

और मन के धरातल पर बहुत कुछ लिखकर एक योगी ने अपने गंतव्य की ओर प्रयाण किया | उन्हें शत शत नमन ! उनके जाने से जो स्थान रिक्त हो गया है, वह तो कभी नहीं भरेगा किन्तु एक संस्थान के रूप में जो उन्होंने समाज को दिया है, वह संस्थान कभी रिक्त नहीं होगा | उनकी स्मृतियों से सदा भरा रहेगा व उनकी स्मृतियाँ सभी के मनोमस्तिष्क पर सदा बनी रहेंगी |

अस्तु 

स्नेह मित्रों 

डॉ.प्रणव भारती