अपंग - 29 Pranava Bharti द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अपंग - 29

29

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यानि जिसके पास अपनी ज़िंदगी का कोई हल न हो, वह दूसरों के लिए हल खोजने की बात कर रहा था | उसे याद आया, रिचार्ड अक्सर कहता है ;

"लाइफ़ इज़ लाइक दिस ओनली, जो चीज़ें तकलीफ़ दें उन्हें छोड़कर आगे बढ़ो |"

वह भी कुछ ऐसा ही सोचने लगी है कि रोते हुए ज़िंदगी नहीं काटी जा सकती और काटना भी क्यों? जीवन में एक बार मिलने वाली ज़िंदगी को रोकर काटो, क्या बकवासबाज़ी है ?कुछ तो सोचना ही होगा | 

"तू पढ़ती क्यों नहीं लाखी ?" अचानक भानु ने कहा तो वह अचकचाकर उसकी गोदी से बाहर निकल आई | उसके गालों पर आँसुओं के निशान पड़ चुके थे जो पोंछने के बाद भी मिट नहीं सके थे, सूख गए थे | 

"क्या मज़ाक कर रही हो दीदी ?" लाखी ने पूछा | 

"क्यों ? इसमें मज़ाक की क्या बात है ? मज़ाक नहीं कर रही| "

"कैसे ? और कौन पढ़ाएगा मुझे ?" लाखी ने पूछा | 

"हाँ---ये तो सोचा ही नहीं था मैंने ?" 

"हाँ, माँ से बात करती हूँ न ! तू तैयार हो तो कुछ न कुछ हो ही जाएगा |" 

 "बेकार है दीदी, वो मुझे आने थोड़े ही देगा रोज़ ---कहीं भी जाती हूँ तो जब आता है, मुझे पीटता है | कहता है, मेरे किसी और से संबंध हैं | कमब्खत को ये समझ में नहीं आता कि मेरे शरीर को वो अकेला तोड़ने के लिए काफ़ी है वो, मैं संबंध कहाँ से और क्यों कर लूंगी | खाने-पीने की कोई कमी नहीं है मुझे और मन का संबंध मुझसे कौन बनाएगा | ये ऐसे ही थोड़े ही बन जाता है ?"

कैसी समझदारी की बातें करने लगी थी लाखी ! पढ़ी-लिखी नहीं है तब तो इतनी समझदार है, पढ़ी-लिखी होती तो ---? 

"हाँ, सुना तो मैंने भी था ---ऐसा ही कुछ --" 

"आपको किसने बताया ?" 

"अरे! इतनी दूर बैठे माँ के अलावा और कौन बताएगा मुझे ?" 

 "आप यहाँ होतीं तो आपको बताती बद्री की बात ---" लाखी ने झेंपते हुए से भानु से कहा | 

"कौन बद्री ?" 

"वो रिक्शा चलाता है न --वोई जो जब ड्राइवर चाचा नहीं होते थे तो आपको छोड़के आता था न वह अपनी रिक्शा में ---" 

"अच्छा, वो ---वो तो बड़ा अच्छा लड़का है !तू जानती है क्या उसे ?" 

"एक बार अकेली देखकर कुछ लड़के मेरे पीछे पड़ गए थे तो उसने देख लिया था और उनसे लड़कर मुझे बचा लिया था | "

"मुझे तो बहुत बार ले गया है वो ---अब तो वो भी काफ़ी बड़ा हो गया होगा |" 

"अरे! इतना भी कोई बड़ा नहीं हुआ ---" अचानक लाखी के मुंह से निकला | 

 "प्यार करती है क्या उसे ?" 

"पता नहीं दीदी, प्यार क्या होता है पर अच्छा तो लगता ही है ---" कहकर वह चुप हो गई | 

"एक बार ---" कहकर वह फिर से चुप हो गई |

"देख लाखी बता दे, शायद तेरे लिए कुछ कर सकूँ, बेकार ही बात मन में रखकर घुटती है ?"

"न दीदी --आप गुस्सा होंगी " 

"पगली है तू, क्यों गुस्सा होऊँगी मैं ?" 

"तू पहचानती नहीं मुझे, तेरा सारा बचपन यहाँ बीता है, फिर भी ---" 

"बात ही कुछ ऎसी है " 

"बता --चल " 

अब लाखी के लिए रुकना मुश्किल था | 

"दीदी, मेरे ब्याह से पहले की बात है | माँ सदाचारी पंडित जी के यहाँ चौका-बर्तन करने लगी थीं ---" 

  लाखी फिर से चुप हो गई जैसे किसी पिछले चलचित्र को आँखों के सामने देख रही हो ----||