निर्वाण--भाग(४) Saroj Verma द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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निर्वाण--भाग(४)

देखते ही देखते समय पंख लगाकर उड़ गया,भामा ने बाहरवीं भी पास कर ली थी और वो काँलेज भी पहुँच गई थी,साथ साथ उसने उत्तर प्रदेश लेडी काँन्सटेबल के लिए आवेदन भी भरा और वो उसने क्वालीफाई भी कर लिया,इसलिए उसने अपनी आगें की पढ़ाई प्राइवेट करने की सोचीं.....
भामा की नौकरी की खबर से माखनलाल जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया और सम्पदा के अरमानों को तो जैसे पंख ही मिल गए थे,वो खुशी के मारें फूली ना समा रही थी,आखिरकार उसकी और उसकी बेटी की मेहनत सफल जो गई थी,दोनों पति पत्नी ने सारे मुहल्ले और रिश्तेदारों में पेड़े बाँटें,
भामा ने रिटर्न इग्जाम तो क्वालीफाई कर लिया था और अब बारी थी मेडिकल टेस्ट और इण्टरव्यू की,वो भी भामा ने क्वालीफाई कर लिए और वो अब दो साल की ट्रेनिंग के लिए चली गई,दो साल की ट्रेनिंग के बाद भामा को इलाहाबाद के पास एक छोटे से कस्बें में महिला कान्स्टेबल के पद पर नियुक्त भी कर दिया गया,जहाँ भामा ने ईमानदारी के साथ अपने इस कर्तव्य को निभाने की सौगन्ध खाई,अब भामा को लगने लगा था कि वो इस काबिल हो गई है कि जरूरतमन्दो की मदद कर सकती है,उसने मन में सोचा कि वो अब किसी भी अबला असहाय नारी का शोषण नहीं होने देगी और जिनके साथ अन्याय होगा वो उन्हें न्याय दिलवाने के लिए अपनी आखिरी साँस तक लड़ेगी,ऐसा उसने दृढ़ संकल्प लिया था,
भामा ने बड़े अरमानों के साथ अपना पद ग्रहण किया,अपनी वर्दी पहनते हुए उसे स्वयं पर बड़ा गर्व महसूस हुआ,उसे अपने ही पुलिस थाने के पीछे बने क्वार्टरों में से एक क्वार्टर भी मिल गया जहाँ उसने अपना सामान जमा लिया,उस थाने के थानेदार पुरूषोत्तम यादव थे,साथ में दो तीन हवलदार भी थे लेकिन उनमें से किसी का भी परिवार वहांँ बनेँ क्वार्टर में नहीं रहता था,सबने अपने अपने परिवारों को अपने अपने गाँव में रख छोड़ा था और थानेदार पुरूषोत्तम यादव का परिवार इलाहाबाद में ही रहता था,भामा को वहांँ बहुत अजीब लगता था लेकिन वहाँ रहना उसकी मजबूरी थी,जिसे वो नकार नहीं सकती थी।।
कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा क्योंकि वो वहांँ नई थी,लेकिन तभी उसे ये महसूस होने लगा कि थानेदार पुरूषोत्तम यादव का व्यवहार उसके प्रति बड़ा ही अनैतिक है,वो थाने में मौजूद और हवलदारों से काम के लिए नहीं कहता था बल्कि जब देखों तब वो भामा को ही अपने पास बुलाकर तरह तरह के काम सौंपकर उसे अभद्रतापूर्वक स्पर्श करने की कोशिश करता,ये सब भामा के लिए नया और अनुचित था,लेकिन तब भी वो मन मानकर पुरूषोत्तम यादव के आदेशों का पालन करती रहती,
इसी तरह एक दिन उसके थानें में एक गरीब माँ बाप रोते हुए आएं और थानेदार से कहने लगें...
हुजूर!दो दिन हो गए हमारी बच्ची खेतों से घर लौट रही थी लेकिन वो घर नहीं पहुँची,ना जाने उसे किसने खेतों से उठवा लिया,
पहले अपना नाम तो बता? थानेदार पुरूषोत्तम यादव ने किसान से पूछा।।
हुजूर!हम किशना और इ हमार जोरू रामजानकी,किसान बोला
हाँ!तो किशना!क्या उम्र है तेरी छोरी की?थानेदार पुरूषोत्तम ने पूछा।।
यही कोई पन्द्रह-सोलह साल,किशना बोला।।
तो जवान है तेरी छोरी,क्या पता जवानी के जोश में किसी छोरें संग भाग गई हो?पुरूषोत्तम यादव बोला।।
ना!हुजूर!हमरी छोरी ऐसी ना है,उसका इन सब से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है,रामजानकी बोली।।
तुझे क्या पता रामजानकी!तू तो बाहर काम करने चली जाती होगी,तेरी पीठ पीछे घर में क्या होता है वो तुझे थोड़े ही मालूम चलता होगा?पुरूषोत्तम यादव बोला।।
ऐसे कैसे कुछ भी अपनी मनमानी करेगी,उसके साथ घर में उसकी एक छोटी बहन और भाई भी रहते हैं,ऐसा कुछ होता तो दोनों बच्चे हमें बताते?रामजानकी बोली।।
अच्छा!ठीक है मान ली तेरी बात,अब ये बताओ रपट कैसें लिखी जाएं ,छोरी का कोई फोटो-ओटो है,पुरूषोत्तम यादव ने पूछा।।
हुजूर!हम गरीब आदमी है,दो बखत की रोटी तो बड़ी मुश्किल से जुट पाती है,फोटू-ओटू कैसें खिंचाऐगें?किशना बोला।।
तो फिर छोरी का हुलिया ही बता दें!हवलदार भगवतीप्रसाद बोला।।
बस!अपनी माँ जैसी दिखें हैं,ऐसई कद-काठी और रंग है,किशना अपनी पत्नी रामजानकी की ओर इशारा करते हुए बोला।।
तेरी जोरू तो बड़ी खबसूरत है रे किशना! नमक बहुत है इसमें, तो जरा सोचो तेरी छोरी तो अभी जवान है तो वो तो बिल्कुल मक्खन मलाई होगी,दूसरा हवलदार टीकराम बोला।।
हुजूर!ये कैसें बातें करते हों?किशना बोला।
ऐ...चुप...ज्यादा जुबान मत लड़ा ,छोरी चाहिए या नहीं,हवलदार भगवती प्रसाद बोला।।
हाँ!हुजूर!किशना बोला।।
रपट लिख गई है अब तुम दोनों घर जाओ,हवलदार टीकाराम बोला।।
बस!हुजूर!हमारी छोरी ढूढ़ दो तो बड़ी कृपा होगी,किशना बोला।।
कह दिया ना कि रपट लिख गई है,अब घर जाओ,बात समझ में नहीं आती क्या?पुरूषोत्तम यादव चिल्लाते हुए बोला।।
पुरूषोत्तम यादव का चिल्लाना सुनकर किशना और रामजानकी आँखों में आँसू लिए अपने घर की ओर चल दिए,ये सब तमाशा भामा वहीं पास में खड़े होकर देख रही थी लेकिन बोली कुछ नहीं,लेकिन फिर उसने पुरूषोत्तम यादव को उन दोनों हवलदारों के साथ बात करते सुना,पुरूषोत्तम यादव ने टीकाराम से पूछा.....
कुछ अन्दाज़ा हैं कि ये काम किसका हो सकता है?
और कौन होगा ?वो ईटों का भट्टा चलाने वाला मण्टू पटेल होगा साहब!जो बालू माफिया भी तो है,रातोंरात उसके आदमी नदी किनारे की बालू खोदकर ले जाते हैं,बड़ा खतरनाक आदमी है साहब!उससे पंगा लेकर हमें क्या मिलेगा?मैं तो कहता हूँ आप भी चुप्पी साध लो,कह देना कि तुम्हारी बेटी किसी लड़के के संग मुँह काला करके भाग गई है,टीकाराम बोला।।
यही सही रहेगा,वैसे भी हमें क्या लेना देना दुनियादारी से?हमें तो यहाँ बैठने की सरकार तनख्वाह दे ही रही है,अगर इस बात को दबाने के हमें मण्टू पटेल पैसें देगा तो ऊपरी कमाई में बुराई कैसीं? हम लोगों का भला करने के लिए थोड़े ही बैठें हैं ,अपना भला करने के लिए यहाँ बैठें हैं,पुरूषोत्तम यादव बोला।।
हाँ!हुजूर और क्या?हम पुलिसवालों ने दुनिया जहान का ठेका थोड़े ही ले रखा है,भगवतीप्रसाद बोला।।
तो अब इस केस का क्या करें?टीकाराम ने पूछा।।
वही करेगें जो पिछले साल किया था,पुरूषोत्तम यादव बोला।।
हुजूर!वही ना जो हमने उस बुढ़िया की पोती के केस में किया था,भगवती प्रसाद बोला।।
हाँ!बिल्कुल!उस बुढ़िया की पोती का किसी ने बलात्कार करके उसका गला दबाकर उसकी लाश को नदी के किनारे फेंक दिया था,जब बुढ़िया रपट लिखाने आई तो हमने समझाकर उसे घर भेज दिया,लेकिन जब दोबारा रपट लिखाने आई तो उसे हम लोगों ने इतना बेइज्जत किया कि फिर दोबारा थाने आने की उसकी हिम्मत ही ना पड़ी,षुरूषोत्तम यादव बोला।।
हाँ!और फिर हमने उस बलात्कारी जो कि काँलेज के छात्रसंघ का नेता था,उससे और उसके बलात्कारी दोस्तों से मनमाने पैसें वसूल कर उस केस को रफादफा कर दिया,टीकाराम बोला।।
लेकिन उसकी सारी दुनिया और अपना काँलेज छोड़कर इस गाँव की लड़की ही क्यों पसंद आई?भगवती प्रसाद ने पूछा।।
शहर के छोरें हैं,ऊपर से अमीरजादे,माँ बाप के पास मनमाना पइसा है तो अपनी अय्याशियों पर उड़ाते फिरते हैं,शहर की लड़कियांँ पढ़ी लिखीं होतीं हैं तो जाल में आसानी से नहीं फँसती इसलिए मुँह मारने गाँव चले आते हैं,पुरूषोत्तम यादव बोला।।
हाँ!हुजूर !बिल्कुल यही बात है और उन सबके चक्कर में हमारा फायदा हो जाता है,टीकाराम हँसते हुए बोला।
भामा ने ये सब सुना तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई,उसने सोचा कहाँ आकर फँस गई?यहाँ से इतनी जल्दी ट्रांसफर भी नहीं हो सकता और नौकरी भी नहीं छोड़ सकती,माँ बाप को क्या जवाब दूँगी? उन्होंने कितने अरमानों के साथ मुझे यहाँ भेजा था,ये थानेदार तो केवल नाम का पुरूषोत्तम है,ये तो पुरूषों और थानेदार के नाम पर कलंक है,अब कैसें इससे पीछा छुड़ाऊँ,मुझे ही सावधान रहना होगा,भामा ये सोचते सोचते अपने कमरें में आ गई....
बैचेन और परेशान सी होकर वो कुर्सी में बैठ गई,कब उसे नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला,तभी कुछ देर बाद उसे अपने गाल पर किसी का स्पर्श महसूस हुआ और उसने फौरन ही अपनी आँखें खोलकर देखा तो वहाँ थानेदार पुरूषोत्तम खड़ा था,थानेदार को देखकर भामा चटपटाकर कुर्सी से खड़ी हो गई और उससे कहा.....
सर!आप!और यहाँ!
हाँ!तुम बहुत देर से थाने में नहीं दिखी इसलिए तुम्हें देखने चला आया,पुरूषोत्तम बोला।।
कोई जरूरी काम था सर?भामा ने पूछा।।
नहीं!तुम्हें देखने का मन किया तो चला आया,तुम्हें अच्छा नहीं लगा क्या?पुरूषोत्तम ने पूछा।।
जी!ऐसी कोई बात नहीं,भामा बोली।।
तो फिर ज्यादा देर मेरी नजरों से ओझल मत रहा करों,मन तड़प जाता है,पुरूषोत्तम बोला।।
जी!मैं कुछ समझी नहीं,भामा बोली।।
बड़ी नासमझ हो तुम हो,इसलिए तो मुझे पसंद हो,समझदार लोंग मुझे पसंद नहीं आते,पुरूषोत्तम बोला।।
जी!सर!मुझे राशन का सामान लेने बाजार जाना था,भामा बहाना बनाते हुए बोली।।
तो जाओ,किसने रोका है और इतना कहकर थानेदार पुरूषोत्तम वहाँ से चला गया और इधर भामा ने राहत की साँस ली......

क्रमशः....
सरोज वर्मा.....