जुगनू.. Saroj Verma द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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जुगनू..

आज कितने सालों बाद गाँव जा रहा हूँ,कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि क्षणदा की हालत ऐसी हो जाऐगी,कितना उछला कूदा करती थी वो,बस दिनभर हिरनियों की भाँति कुलाँचे भरती रहती थी और संग संग मुझे भी पकड़ ले जाती थी,उसी की वज़ह से हमेशा घर देर से जाने पर मुझे बहुत डाँट पड़ती थी,कितना शौक था रात में उसे जुगनूओं को पकड़ने का, फिर छोड़ भी देती थी कहती थी कि उसका साथी उसका इन्तजार कर रहा होगा,मुझसे हमेशा कहा करती ...
पता है राजू,मेरे नाम का मतलब होता है रात यानि की क्षणदा और तुम्हारे नाम का मतलब होता है चन्द्रमा यानि कि रजनीश और जब दोनों मिलते हैं तो जुगनू आते हैं....
मैं उसके इस भोलेपन पर हँस दिया करता और वो यूँ ही मुँह फुलाकर पूछती....
ऐ...तू हँसता क्यों हैं मेरी बात पर....
मैं कहता ,यूँ ही तू कितनी भोली है!
फिर वो कहती,सच!
मैं कहता ,सच! और तू हमेशा ऐसी ही रहना।।
फिर ना जाने क्यों वो अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर उन्हें निहारने लगती ,फिर कहती,
देख राजू! मेरे हाथ मेँ तो चाँद बन रहा है,मेरा दूल्हा बहुत सुन्दर होगा,
फिर मैं कहता, कि देख मेरी हथेलियों में तो चाँद बनता है।।
फिर वो कहती,तेरी दुल्हन सुन्दर ना होगी,काली-कलूटी होगी...
इतना कहकर वो भाग जाती और फिर मैं उसकी चोटी खीचने के लिए उसके पीछे भागता,वो दो चोटियांँ बनाती थी रिबन के संग,जो मैं खोल देता था और वो मुझसे रूठकर चली जाती.....
तभी झटके से बस रूकी और मैं अपने वर्तमान में फिर से लौट आया फिर बस से उतरा,ताँगा पकड़कर घर पहुँचा.....
द्वार पर पहुँचा तो उसका बड़ा बेटा कृष्णबदन मेरे पास आकर बोला....
आ गए आप चाचाजी!
मैनें फौरन उससे पूछा....
भाभी! कैसी है?
बिल्कुल ठीक नहीं है,वो बोला।।
डाक्टर क्या कहते हैं,मैनें पूछा।।
वो बोला,माँ बिल्कुल भी ठीक नहीं है किसी को नहीं पहचानती,किसी से नहीं बोलती,खाना खाते खाते भूल जाती है,कोई आ जाता है तो बस देखती ही रहती है,पहचान नहीं पाती,ना जाने कब ठीक होगी?शहर के डाँक्टर कहते हैं कि ये बिमारी कभी ठीक नहीं होती,अल्जाइमर का कोई इलाज नहीं है.....
ओह...,मैनें सिर्फ़ इतना कहा।।
वो बोला,चलिए ! भीतर चलिए! माँ से मिल लीजिए।।
मैं भीतर गया तो वो बिस्तर पर लेटी थी,अपनी साड़ी में छपी तितलियों को पकड़ने की कोशिश कर रही थीं और जब उसकी नज़र मुझ पर पड़ी तो मुझसे नज़र चुराकर वो खिड़की की ओर देखने लगी,मैं वहीं कमरें में पड़ी कुर्सी पर बैठ गया,तो फिर उसने अपना चेहरा मेरी ओर घुमाया और मुझे गौर से देखने लगी,फिर ना जाने उसे क्या सूझी,उसने अपनी दोनों हथेलियों को जोड़ा और उसमें बने चाँद को देखने लगी.....
उसे ऐसा करते देख,मैनें भी अपनी हथेली जोड़कर चाँद बनाया और कुर्सी से उठकर उसे दिखाने ले गया,वो पहले तो मुस्कुराई फिर रो पड़ी और क्षण भर में शांत हो गई शायद वो भूल गई थी कि क्यों रोई थी?
तभी कृष्णबदन कमरें मेँ आकर बोला.....
ये हमेशा ऐसा ही करतीं रहतीं ,कभी कपड़ो पर छपे फूलों को पकड़ने की कोशिश करतीं हैं तो कभी तितलियों को और रात को जब खिड़की के बाहर जुगनू दिखाई देते हैं तो अचानक जोर जोर से हँसने लगतीं हैं फिर सब भूल जातीं हैं.....
ये तो बहुत अजीब बात है,मैनें कहा...
कृषणबदन बोला.....
हाँ !चाचाजी !डाँक्टर कहते हैं कि शायद ये उनकी जिन्दगी के सबसे अच्छे पल रहें होगें,जब ये कभी किसी के साथ जुगनू पकड़तीं होगीं,तभी तो ये जुगनुओं को देखकर खुश होतीं हैं....
मैनें मन में सोचा....
इस अल्जाइमर की बिमारी में भी क्षणदा मेरे संग बिताएं लम्हों को नहीं भूली,शायद बहुत चाहती थी वो मुझे,लेकिन कभी कह नहीं पाई.....और....मैं....क्या मैं भी कभी कह पाया उससे कि मैं उसे चाहता हूँ,शायद कह दिया होता तो आज उसकी ये हालत ना होती.....
तभी मेरे ध्यान को तोड़ते हुए कृषणबदन बोला....
चाचाजी! चलिए आप स्नान करके भोजन कर लीजिए,इसके बाद आराम कीजिए,शाम को बातें करते हैं,
मैनें कहा, ठीक है।।
और फिर मैनें स्नान करके भोजन किया और आराम करने मेहमानों वाले कमरें में आ पहुँचा,शिवानी की चौदह फेरे अपने बैग से निकाली और बिस्तर पर आ लेटा,किताब पढ़ते पढ़ते ना जाने क्यों अतीत की यादों ने मुझे घेर लिया...
और मैं सोचने लगा ये वही क्षणदा है जो कितनी चंचल हुआ करती थी और आज उसका ये हाल देखकर मेरा तो मन पसीज गया,झुर्रियोंभरा चेहरा,सफेद सन जैसे बाल और गुम होती याददाशत,कभी भी उसे आराम करने की आदत नहीं थी,खेलना....खेलना...बस खेलना और आज बेचारी की किस्मत में केवल आराम.... आराम ही रह गया है.....
यही सोचते सोचते मैं फिर अतीत के पन्ने पलटने लगा,शहर वाले मुहल्ले में हम दोनों का परिवार पड़ोसी हुआ करता था,फिर मेरे पिताजी का ट्रांसफर हो गया और हम दूसरे शहर पहुँच गए लेकिन हमारे बीच रिश्ते वैसे के वैसे ही बने रहें,इसी बीच कभी कभी मेरी और क्षणदा की मुलाकात हो जाती,अब क्षणदा जवान हो रही थी और मैं नौकरी की तैयारी में था,क्षणदा के घर वाले एक अच्छे लड़के की तलाश कर रहे थे और फिर एक दिन मेरी माँ मेरे पास आकर बोलीं......
मन करता है कि क्षणदा को अपनी बहु बना लूँ!!
मैनें कहा,माँ ! ये तो बहुत अच्छा विचार है,मैनें सोचा शायद माँ मेरे मन की बात समझ चुकी है....
तब माँ बोली.....
वही तो मैनें तेरे पिता जी से कहा कि तेरे बड़े भाई प्रकाश और क्षणदा की जोड़ी खूब जमेगी,अब तूने भी इस रिश्ते पर मोहर लगा दी है तो बस अगले महीने ही क्षणदा को अपनी बहु बनाकर इस घर में ले आऊँगीं...
तब ना मैनें क्षणदा से कुछ कहा और ना ही वो अपने मन की बात बोल पाई,बस उसने भी मेरे बड़े भइया से चुपचाप शादी कर ली,अब क्षणदा मेरी भाभी बन गई थी,फिर मेरी नौकरी लग गई तो मैं दूसरे शहर चला गया,बहुत कम गाँव आता था इसके बाद मैनें ब्याह भी नहीं किया,क्योंकि मैं क्षणदा को कभी भूल नहीं पाया....
और आज इतने दिनों बाद क्षणदा को देखकर अफसोस होता है,उसे कुछ भी याद नहीं लेकिन जुगनू याद हैं इसका मतलब है कि वो मुझे ऐसी हालत में भी नहीं भूली.....
और यही सोचते सोचते मेरी आँख लग गई......
शाम को चाय पीकर मैं टहलने निकल गया और फिर रात का खाना खाकर मैं क्षणदा के कमरें में पहुँचा,वो मुझे देखते ही खिड़की की ओर देखने लगी,फिर उसने अपने झुर्रियों वाली हथेलियों को मिलाकर चाँद बनाया,फिर खिड़की के बाहर कुछ देखकर वो बहुत खुश हुई,मैनें बाहर नजर डाली तो जुगनुओं का झुण्ड था.....
जुगनुओं को देखकर मुझे क्षणदा के बचपन वाली याद आ गई वो कहती थी कि.....
क्षणदा यानि की रात और रजनीश यानि के चन्द्रमा के मिलने से जुगनू आते हैं.....हम दोनों साथ थे इसलिए जुगनू आएं थे शायद....

समाप्त......
सरोज वर्मा...