जीवन का गणित - भाग-10 Seema Singh द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

जीवन का गणित - भाग-10

भाग- 10

वादे के मुताबिक़ आयुषी दस ही मिनट में तैयार होकर सामने आकर खड़ी हो गई। रेड कलर की नेट की घुटनों से ज़रा सी नीची जाती हुई स्लीवलेस ड्रेस, दूधिया रंगत की बाहों से फिसलती हुई नज़र उसी की मैंचिंग के ब्रेसलेट पर जा अटकी थी वैभव की।

लंबे खुले हुए बाल पीठ पर आराम से टिके हुए थे जिनकी एक लट करीने से आगे कंधे पर झूल रही थी। गहरी आंखों के काजल ने उनकी गहराई को और बढ़ा दिया था। कानों में लटकते लंबे से इयररिंग्स भी ब्रेसलेट के साथ के ही दिख रहे थे। ब्लैक कलर का स्लिंग बैग और हल्की सी हील वाली ब्लैक बैलीज।

वैभव मुंह खोले आयुषी को देखता ही रह गया।

"तू वही है ना जो अभी अभी शॉर्ट्स और टीशर्ट में मेरे पास से गई थी?" आयुषी के पास आते ही वैभव ने उसे छेड़ने के अंदाज़ में कहा।

कोई और दिन होता तो आयुषी उसे इतनी सी बात पर पीट देती पर आज वह सिर्फ़ मुस्कुराकर रह गई।

वैभव उसे उसके जन्मदिन पर बाहर ले जा रहा था। आयुषी समझ गई थी यह वैभव की तरफ से पहली ऑफिशियल डेट है। अब वह अपने मन में किसी तरह का कोई प्रेशर नहीं रखना चाहती थी। वह मन ही मन खुश हो रही थी कि उसने वैभव के साथ जाने का निर्णय ले लिया था, अब उसके मन में कोई तनाव नहीं था, ना घर से दूर बिना परिवार के जन्मदिन मनाने का, और न ही अपने प्रोजेक्ट और एग्जाम का। अब वह अपना समय सिर्फ और सिर्फ अपने प्यार के साथ बिताना चाहती थी, जिसे उसने तकरीबन तीन-चार सौ साथी स्टूडेंट्स में से चुना था।

हॉस्टल के मेन गेट के बाहर ही खड़ी बाइक स्टार्ट कर वैभव ने आयुषी को सिर झटक कर पीछे बैठने का इशारा किया। सकुचाती-मुस्कुराती आयुषी हौले से बाइक पर बैठी और अपनी दोनों बाहों को वैभव के इर्दगिर्द लपेट कर सुकून से उसकी पीठ पर अपना चेहरा एक ओर कर, गाल टिका दिया।

इतने करीब वे शायद इससे पहले कभी नहीं आए थे। वैभव आयुषी की बाहों की नरमी और चेहरे की गरमी को महसूस कर रहा था। और आयुषी वैभव के डिओ की भीनी-भीनी खुश्बू में खोई मदहोश हुई जा रही थी। दो जवां दिल बहकते, संभलते अपने गंतव्य की ओर बढ़े चले जा रहे थे।

लगभग दस पंद्रह मिनट लगातार चलते रहने के बाद भी बाइक अपने ठिकाने नहीं पहुंची, तो आयुषी पूछ बैठी, "वैभव, हम कहां जा रहे हैं?"

"क्यों, डर लग रहा है क्या?" वैभव ने सवाल के बदले सवाल किया और खिलखिलाकर हंस पड़ा। थोड़ी ही देर पहले हुई मान-मनौव्वल और नाराज़गी का उसके ऊपर कोई असर दूर दूर तक नहीं दिख रहा था।

"तू भी ना! पता नहीं क्या-क्या बोलता है!" आयुषी ने वैभव की पीठ पर एक धौल जमाई और उसकी हंसी में शामिल हो गई। "दरसल, अपने मुल्ला जी चाट वाले और मुन्ना स्वीट हाउस सब कब के निकल गए, इसलिए पूछा।"

आयुषी ने मासूमियत से कहा तो वैभव ने प्यार से उसके हाथ को चूम लिया। आयुषी के लिए उसके मन में भरा प्यार आज छलका सा जा रहा था।

"तू चल तो सही, तुझे अच्छा लगेगा।" कहकर वैभव ने मुड़कर आयुषी का चेहरा देखा जो डूबते सूरज की पीली पीली रोशनी में नहाया हुआ सोने जैसी चमक बिखेर रहा था।

वैभव ने बाइक की स्पीड कम करते हुए एक बड़े से रेस्टोरेंट के आगे रोक दी। बाइक रुकते ही आयुषी कूदकर एक ओर खड़ी हो गई। रेस्टोरेंट का नाम पढ़कर खुशी से किलक उठी। "तू मुझे ‘मुगलई हट’ लेकर आया है! सच में, कबसे मुगलई खाना नहीं खाया है!"

वैभव को अच्छी तरह से पता था आयुषी को नॉनवेज खाना कितना पसंद है, पर मैस के एक से स्वाद वाले नॉनवेज से तंग आकर वह पूरी तरह से शाकाहारी बन गई थी। हालांकि शाकाहारी खाने के स्वाद में भी लगभग वही एकरसता थी मैस के खाने में। पर नॉनवेज से बेहतर होता है। सच कहा जाए तो नॉनवेज की इतनी बेज्जती कहीं और हो नहीं सकती थी। आयुषी के चेहरे पर बिखरी खुशी ने वैभव को भी खुश कर दिया था। उसका प्लान सही सिद्ध हो रहा था।

कोने वाली टेबल पर वैभव और आयुषी के नाम का कार्ड लगा था। सामने ही म्यूजिशियन लाइट म्यूजिक बजा रहे थे। धीमा-धीमा संगीत और मद्धम रौशनी माहौल को रुमानी बना रहे थे।

वैभव आयुषी का हाथ थाम कर टेबल तक लेकर आया। वेटर ने चेयर खिसकाकर आयुषी को बैठने की जगह बना दी। आयुषी तो जैसे सपना देख रही थी। उसकी मुस्कान बढ़ती ही चली जा रही थी। वैभव ने वेटर को इशारा किया तो वह वहां से चला गया, फिर तुरंत ही ट्रे में रखकर दो गिलास सॉफ्ट ड्रिंक के ले आया और बारी-बारी से दोनों की बाईं ओर जाकर पहले आयुषी और फिर वैभव को ड्रिंक सर्व की। दोनों ने अपने-अपने गिलास उठाकर मुस्कुरा कर एक दूसरे की ओर देखा और गिलास हवा में ऊंचे उठाकर ‘चीयर्स’ करने के साथ वैभव आयुषी की आंखों में देखते हुए बोला, "चीयर्स फॉर अवर न्यू बिगनिंग!" आयुषी के गाल गुलाबी हो उठे,उसने भी पलकें झपकाते हुए तेज़ी से सिर हिलाकर हामी भरी और हौले से ड्रिंक सिप करना शुरू कर दिया।

वैभव की निगाहें आयुषी के चेहरे से हट ही नहीं रही थी और आयुषी... वह तो जैसे किसी और ही दुनिया में पहुंच गई थी। वह भौचक्की सी चारों ओर देखती, और फिर खुश होकर वैभव की ओर देखती। वैभव को अपनी और देखता पाकर लजा सी जाती, अपनी निगाह इधर-उधर घुमा लेती। यही क्रम लगातार चलता जा रहा था।

वेटर फिर से टेबल पर आ खड़ा हुआ। आगे हाथ बांधकर, झुककर खड़े वेटर को वैभव ने फिर से सिर हिलाकर इशारा किया।

इस बार वह केक लेकर प्रकट हुआ। छोटा सा कलात्मक चाकू आयुषी की ओर बढ़ाकर, वेटर फिर उन्हे अकेला छोड़कर चला गया था। केक आयुषी की पसंद का था, स्ट्रॉबेरी वनीला रेड वेलवेट केक, जिसपर दो दिल बने हुए थे साथ ही बहुत कलाकारी से उसका नाम लिखा था।

वह डूब कर केक की खूबसूरती निहार रही थी कि अचानक उसका ध्यान गया, म्यूजिशियन बर्थ डे की धुन बजा रहे थे। वैभव ने केक पर लगी मोमबत्ती जलाकर आयुषी को बुझाने के इशारा किया। आयुषी ने फूंक मार कर मोमबत्ती बुझाई और केक काटा। उसी के साथ बर्थडे की धुन बजाकर सारे म्यूजिशियन ताली बजाने लगे। आयुषी ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा और अपने सिर को हल्के से हिलाकर उनका आभार व्यक्त किया।

वैभव ने केक का पीस उठाकर आयुषी के मुंह में खिलाया। आयुषी की आंखें छलक गई। उसे अब भी कहीं न कहीं अफ़सोस हो रहा था कि उसने वैभव को इतना इनकार क्यों किया कितनी तैयारियां किए बैठा था वह,अगर आयुषी नहीं आती तो उसका कितना दिल टूटता।

वैभव ने अपनी चेयर से उठकर आयुषी का माथा चूम लिया।

"हैप्पी बर्थडे, डियर," कान के पास होंठ लाकर वैभव हौले से फुसफुसाया।

उत्साहित सी आयुषी उठकर उसके गले लग गई। कुछ पल दोनों ऐसे ही खड़े रहे, पर जैसे ही अहसास हुआ कि वे पब्लिक प्लेस पर हैं, तुरंत अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ गए। दोनों के चेहरे खुशी से दमक रहे थे। ये वे लम्हें थे जिनका वैभव को कबसे इंतज़ार था और शायद आयुषी को भी।

केक के बाद डिनर लग गया। सलाद से लेकर बादाम फिरनी तक सब कुछ आयुषी की पसंद का था।

डिनर के बाद वैभव ने आयुषी की ओर गिफ्ट बढ़ाया तो आयुषी कह उठी, “अब इसकी ज़रूरत ही कहां बची!”

"तू खोल तो सही फिर बताना है या नहीं इसकी ज़रूरत!" वैभव की बेताबी को उसका स्वर और चेहरे के भाव दोनों में साफ़ साफ़ जता रहे थे। गुलाबी रंग के चमकीले रैपर को हटाते ही एक छोटी सी गहरे मरुन कलर की गोल डिब्बी निकली। आयुषी ने उसे खोलने से पहले सब तरफ से घुमाकर देखा और वैभव की ओर देखने लगी।

“ इसे भी तो खोल!” वैभव टकटकी लगाकर आयुषी को देख रहा था उसके चेहरे के एक भी एक्सप्रेशन को मिस नहीं करना चाहता था। आयुषी ने डिब्बी खोली, डिब्बी खोलते ही तेज़ रोशनी से नन्हा सा डायमंड जड़ी अंगूठी चमचमा उठी। आयुषी की आंखों में भी दो दीपक जल उठे थे। वैभव ने एक भी पल खोए बिना लपककर अंगूठी आयुषी की उंगली में पहना दी।

दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हुए बिना कुछ भी बोले सौ सौ वादे कर रहे थे। आयुषी का हॉस्टल दस बजे लॉक हो जाना था सो मन न होते हुए भी उन्हे वहां से निकलना पड़ा। हॉस्टल से यह रेस्टोरेंट थोड़ा दूर था,वहां तक पहुंचने में कम से कम बीस पच्चीस मिनट लग जाने थे वैसे भी ये टाइम ज्यादा ट्रैफिक वाला था।

हॉस्टल के गेट पर आयुषी को छोड़ते वक्त वैभव ने उसे फिर से कस के गले लगा लिया।आयुषी ने भी अपने आप को वैभव की बाहों में समा जाने दिया। उनके रिश्ते की सचमुच एक नई शुरुआत हो चुकी थी।

हॉस्टल के लिए बढ़ती हुई आयुषी अचानक ठिठक कर पलटी, “अरे वैभव! तुम्हें एक बात बताना भूल गई मैं!”

“क्या?”

“मेरे दादाजी के गांव में शादी है और कुलदेवी की पूजा भी। जिसमें पूरा परिवार शामिल होता है।”

वह कुछ और बोलती उससे पहले ही ‍वैभव बोल उठा, “मुझे भी चलना है क्या?”

आयुषी ने मुस्कुरा कर कहा, “नहीं, इस बार नहीं। इस बार मैं जाऊंगी ला‌‍स्ट एग्जाम वाले ही दिन छोटे चाचू आयेंगे मुझे ले जाने के लिए।”

“कितने दिन के लिए जाएगी?” वैभव ने तुरंत पूछा।

“कम से कम चार पांच दिन लगा जायेंगे।”

“टच में रहना!”

“गांव में जाना है, पॉसिबल ही नहीं है। हम सब अपने-अपने मोबाइल ऑफ करके एक बैग में रख देते हैं हर बार।”

“फिर मैं कैसे रहूंगा?” वैभव एकदम से उदास हो गया।

“चार-पांच दिन की तो बात है।”

“अब तुझसे एक पल भी दूर रहना अच्छा नहीं लगता।” वैभव ने कहा तो आयुषी की आंखे चमक उठी।

तभी गेट के गार्ड ने सीटी बजा दी। यह गेट लॉक करने का संकेत था। आयुषी भागकर गेट के अंदर हो गई, और वैभव धीरे धीरे बंद होते फाटक के ठीक बीच में बची संध में से तब तक आयुषी को ताकता रहा जब तब वह उसकी आखों से ओझल नहीं हो गई।

जब आयुषी दिखना बंद हो गई तब वैभव ने दाएं-बाएं देखा, और अपनी ही हरक़त पर उसे खुद ही हंसी आ गई। हंसते हुए वह तेज कदमों से बाइक की ओर बढ़ गया।

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