जीवन का गणित - भाग-8 Seema Singh द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

जीवन का गणित - भाग-8

भाग - 8

आयुषी और वैभव अब साथ-साथ एक नई दुनिया में प्रवेश कर रहे थे।

आयुषी के वक्त का एक बड़ा हिस्सा वैभव के साथ बीतने लगा। अब न हॉस्पिटल की ड्यूटी उन्हे थकाती थी, ना देर तक चलने वाली क्लासेस। पहले भी लंच अक्सर कॉलेज कैंटीन में किया करते थे, सभी दोस्तों के साथ। मगर अब आते जरूर दोस्तों के साथ, मगर बैठते आस पास ही थे। भीड़ के बीच भी आयुषी हमेशा वैभव के लिए जगह बचाकर रखती और वैभव सबको पीछे छोड़ आयुषी की बगल में जा बैठता।

उनके बीच की नजदीकियां अब क्लासमेट्स भी नोटिस करने लगे थे। ग्रुप में होने वाली पार्टियों का हिस्सा होकर भी वे अपने लिए अलग जगह तलाश ही लेते। अजीब सी कशिश थी जो दोनों को एक दूसरे की ओर खींचती चली जा रही थी आयुषी और वैभव एक दूसरे से और गहराई से जुड़ते जा रहे थे।

दिन जैसे पंख लगाकर उड़ने लगे थे। व्यस्तता में भी अपना ही सुकून था।

"बड़ा रोमांस चल रहा है आज कल," आयुषी की रूममेट के कर्कश स्वर ने आयुषी का उसके हॉस्टल रूम में स्वागत किया।

एक थकी हुई सांस छोड़ कर, वह बिना जूते उतारे ही अपने बिस्तर पर धम्म से पीठ के बल गिर पड़ी। बाहों को फैलाकर, ऊपर घूमते हुए पंखे पर नजरें टिकाए, उसने धीरे-धीरे मनाही के अंदाज़ में सर हिलाया। "यार, केतकी… कल से वो मॉर्निंग ट्रेनिंग स्टार्ट हो रही है… कैसे मैनेज होगा?"

"क्यों, उसमें क्या परेशानी है? तुम्हें पता है ना क्लास में से बस पांच लोगों को सिलेक्ट किया गया है इसके लिए? उसकी वैल्यू करो।"

"हां, हां, पर तू लकी है जो सिलेक्ट नहीं हुई। सुबह चार बजे से उठना पड़ेगा।" आयुषी ने कल्पना कर के हौले से अपना सर झटका। "बहुत ज्यादा ही हेक्टिक हो जाएगा, यार…"

केतकी की तरफ से “हुंह” की आवाज़ आई। "तो और करना ही क्या है कॉलेज में? पढ़ने ही तो आई हो, प्रॉब्लम कहां है? पता नहीं प्रोफेसर्स भी उनको ऐसे काम क्यों देते हैं जिन्हें बोझ लगे… ऐसे स्टूडेंट्स को क्यों नहीं देते जो इसको अप्रेशिएट करेंगे!"

आयुषी को समझ आ रहा था कि केतकी जान बूझ कर ऐसे हल्के-हल्के कटाक्ष कर रही है। रात-दिन किताबों में डूबी रहने के बाद भी केतकी का स्कोर कभी उस लेवल तक नहीं पहुंचता था जिस पर आयुषी का बिना भूत की तरह पढ़े रहता था।

खैर, आयुषी को तो इस तरह जलते रहने वाले लोगों की हमेशा से ही आदत थी। तेज़ दिमाग के साथ-साथ तेज़ याद्दाश्त के साथ बड़ी हुई थी वह। स्कूल में भी उसके इतने हंसमुख स्वभाव के बावजूद बस गिने-चुने दोस्त बन पाते, क्योंकि ज्यादातर तो उसके हर एक फील्ड में एक्सपर्ट होने से चिढ़े ही रहते।

केतकी की जली-भुनी बातों पर आयुषी ने ध्यान दिए बिना ही उठकर अपनी टेबल अरेंज करना शुरू कर दिया। वीकेंड नज़दीक आने से पहले जितनी एक्साइटेड थी, वीकेंड आते-आते उतने ही खौफ में आ गई थी वह। शुक्रवार को मिले नोटिस ने उनकी क्लास में से पांच स्टूडेंट्स को सुबह छः बजे हाल में गैदर होने को कहा था। वैसे तो यह स्पेशल कोर्स उनके रिज़्यूमे में चार चांद लगा देगा, मगर इस समय केवल स्ट्रेस बढ़ाने का ही काम कर रहा था।

"इसीलिए रिलेशनशिप्स से दूर रहना चाहिए मेडिकल वालों को… टाइम किधर है?"

और ऊपर से यह महारानी, जो थोड़ी-थोड़ी देर में तीर छोड़ कर आयुषी को और चिंता में डाल देती। उसी सब में डूबे हुए, आयुषी अपनी फाइल का काम पूरा करने बैठ गई।

शनिवार की सुबह से रात हो गई, ना तो आयुषी ने अपना फोन देखा, ना ही कमरे से बाहर निकली। उसको कहीं ना कहीं खयाल था कि उसके परिवार वाले समझ भी जाएं कि वो बिज़ी है, पर वैभव ज़रूर चिंता करेगा। पर अपने आने वाले रूटीन से घबराई हुई आयुषी पर ज़्यादा से ज़्यादा काम निपटा लेने का भूत सवार था।

वैभव…

उसको तो मिस भी बहुत कर रही थी वह। शायद उससे बात कर लेनी चाहिए थी? रोल नंबर्स दूर होने की वजह से वैभव और उसका बैच अलग-अलग था। और वैभव के बैच में से भी वैभव सहित पांच लोग सिलेक्ट हुए थे। उससे आइडिया लेना चाहिए था आयुषी को, वह चीज़ें मैनेज करने में अच्छा है।

और अब तो उसका बॉयफ्रेंड भी है!

"वाह… यह इतना एक्साइटिंग क्या है पैथोलॉजी की फाइल में?"

केतकी की खिल्ली उड़ाती सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी, तो दांत वापस अंदर कर उसने गुस्से से सर झटका।

"तू अपना काम कर ना," आयुषी ने खीज कर बिना सर घुमाए बोला। "हर समय नज़र रखती है, बॉडीगार्ड है क्या मेरी? या जासूस? मेरी फैमिली ने हायर किया है क्या तुझे?"

केतकी का मुंह पहले कुछ देर खुला रहा, फिर उसे गुस्से से बंद कर वह बड़बड़ाते हुए दूसरी ओर घूम के बैठ गई।

आठ बजे के करीब दरवाजे पर दस्तक हुई। केतकी ने जा कर देखा, तो सारा थी। वैभव और आयुषी की दोस्त।

"गॉड, आयुषी! कहां है तू सारे दिन से? ब्रेकफास्ट के लिए नहीं आई, एक्स्ट्रा क्लास स्किप कर दी, फिर लंच पर भी नहीं आई! कुछ खाया है तूने सुबह से? ये सब क्या लिख रही है?"

"अरे, हां हां, सारा…" आयुषी अटक गई।

उसने वाकई सुबह से कुछ भी नहीं खाया था! खयाल आते ही पेट में जोर की गुड़गुड़ाहट हुई।

"पागल है क्या तू? चल मेरे साथ!"

सारा ने वैसे ही नाइट सूट पहने, फैले बालों वाली, बिना नहाई आयुषी का हाथ पकड़ा और घसीटते हुए उसे सीधा कमरे से और फिर हॉस्टल से बाहर लेती चली गई।

"यार! कैप ही लगा लेने देती! परफ्यूम डाल लेने देती! सारा!"

मगर सारा ने कुछ न सुना, सीधा हॉस्टल के सामने वाली सड़क पार कर, पेड़ के नीचे ले जा कर छोड़ा आयुषी को। सकपकाई आयुषी ने घूम कर देखा, तो लाल मुंह, चढ़ी भवें, और सिकुड़ी आंखों वाले वैभव को खुद को घूरते पाया।

उसकी लगभग चीख ही निकल गई थी।

"ओह वैभव, हीही… हाय! तुम? हेहे, यहां?"

"वैभव, मेरी चाय मत भूलना!" पीछे से सारा ने आवाज लगाई, और हाथ हिलाते हुए वहां से भाग ली।

"चल, घूसखोर!" वैभव ने एक पल हंसते हुए उसे संबोधित किया, मगर जब आयुषी की तरफ देखा तो फिर उतने ही गुस्से से। "और तुम। ज़्यादा हीही, हेहे करने की ज़रूरत नहीं है। कहां थी सुबह से? पता है कितने फोन किए मैंने?"

अपराधी की तरह मुंह लटकाए, आयुषी हौले से बुदबुदाई, "सॉरी। वो आज फाइल बनाने में…"

"यार, आयुषी," वैभव ने चिंता जताते हुए उसके उलझे बाल पीछे को धकेले। "कैसी शक्ल हो रही है तेरी? क्यों इतना थका रही है खुद को, क्या करती रही सारे दिन?"

वैभव के सवालों की झड़ी से आयुषी पलकें झपकाते हुए हड़बड़ा गई। "वो… मैं…"

"मॉर्निंग ट्रेनिंग की टेंशन ले रही है, ना?"

पता नहीं कैसे उसकी हर अनकही उलझन समझ लेने में महारत हासिल कर ली थी वैभव ने। आयुषी की आंखें जलने लगी, मन एकदम से भारी हो आया।

"ए, तू रो रही है?" चिंता मिश्रित आश्चर्य से वैभव दोनों हाथों के बीच उसका चेहरा पकड़, उसके गाल थपथपाए। "क्या हो गया मेरे शेर को?"

भीगी सी हंसी के साथ आयुषी ने अपनी आंखें बंद कर, वैभव से नजर बचानी चाही। "पागल हो गया है तेरा शेर। कुछ समझ नहीं आ रहा कैसे होगा…"

"ऐसा क्या करना है, भई? बस जल्दी उठना और जल्दी सोना, बच्चों वाले रुटीन में आ जाएंगे! इतना भी क्या सोचना है?"

"पर तू…" आयुषी ने पलकों के नीचे से झांक कर वैभव की आंखों में देखा। "अभी तो तेरी वाली डेट भी नहीं हुई, अभी से इतने बिज़ी हो जायेंगे तो फिर…"

"तो फिर क्या? तूने ही तो कहा था, इट्स आवर जॉब। हो जायेगा मैनेज, पगलू!" वैभव ने एक बांह के घेरे में आयुषी के कंधो को थामा, और दूसरे हाथ से उसके माथे पर टीप उड़ाई। "एंड डोंट यू फॉरगेट, कल का दिन भी बीच में है। और फिर अगले वीकेंड वो बिग डे भी तो है?"

आयुषी ने शर्मीली से मुस्कान के साथ एक हाथ से अपना चेहरा ढक लिया। "क्या बिग डे! हर साल आता है…"

"हर साल तू बीस साल की थोड़ी ना होगी," वैभव ने मुस्कुराते हुए कहा।

हां, अगले हफ्ते आयुषी का जन्मदिन था। जिसको लेकर वह ज़रा सी भी उत्साहित ना थी।

बचपन से लेकर कॉलेज आने तक, उसका जन्मदिन उसके परिवार वालों ने एक त्यौहार की तरह मनाया था, जैसे कि बाकी सबका आज भी मानते थे। कई बार तो आयुषी अपने खुद के लिए रखी गई पार्टी में सबसे मिलते मिलते इतनी थक कर पस्त हो जाती, कि उसकी तबियत खराब हो जाती। धीरे धीरे, बड़े होते होते, उसको बर्थडे पार्टी की उत्सुकता कम और खौफ ज़्यादा होने लगा।

"सारा दिन वीडियो कॉल्स में जाएगा, अभी से पता है मुझे," आंखें बंद कर आयुषी ने थकी हुई आवाज में कहा।

वैभव ने उसकी पीठ थपथपाई। "कोई बात नहीं, काम से कम बड़े से हॉल में घूम-घूम कर सबको हेलो, थैंक यू तो नहीं बोलना होगा!"

आयुषी ने हंस कर हामी भरी, लटका हुआ चेहरा अब थोड़ा खिल गया था।

"चल, डिनर के लिए कहीं बाहर चलते हैं। रेडी हो जा जल्दी से!"

"क्या? अभी?"

"आठ ही तो बजे हैं!" वैभव ने अपना फोन आयुषी की नजरों के सामने घुमाया। "तेरा हॉस्टल दस तक ओपन रहेगा ना? चल, नो एक्सक्यूज़िज़!"

मुस्कुराते हुए आयुषी ने कूद कर वैभव को गले लगा लिया। "यार, तू कितना अच्छा है!"

"मुझे पता है!" उसकी पीठ थपथपाते हुए वैभव ने कहा, तो उसकी बांह पर धौल जमाते हुए आयुषी खिलखिला कर हंस पड़ी।

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कैप्टन धरणीधर

कैप्टन धरणीधर मातृभारती सत्यापित 3 महीना पहले

अद्भुत लेखन