यहां... वहाँ... कहाँ ? - 12 S Bhagyam Sharma द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

यहां... वहाँ... कहाँ ? - 12

अध्याय 12 

विवेक, विष्णु, कमिश्नर उपेंद्र तीनों आदिमूलम के घर जा पहुंचे तो रोने की आवाज के साथ एक घबराहट का वातावरण वहां पैदा हुआ था।

ए. सी. संतोष दिखाई दिए। कमिश्नर को सेल्यूट किया फिर बोले "सर! आदिमूलम बुरी तरह सदमे में हैं...."

"बॉडी को नीचे उतार दिया?"

"उतार दिया साहब....! प्लीज कम दिस साइड सर!"

"इस एरिया के इंस्पेक्टर कौन है?"

"वज्रवेल.... सर!"

"स्पाट पर आ गए?"

"आ गए सर! उन्होंने आकर ही उस बाडी को उतारा।"

बरामदे में चलते-चलते.... विवेक ए. सी. से पूछा।

"मिस्टर संतोष उनकी आत्महत्या को आपने सामने देखा?"

"देखा मिस्टर विवेक! मैं आदिमूलम को देखने आया तब वे मुझे रिसीव कर यहां डाले हुए कुर्सियों में बैठने को कहा । एक 10 मिनट के अंदर आदिमूलम को देख लेंगे ऐसा बोला। मैं बाहर बैठकर इंतजार कर रहा था......

"उसी समय ही वह घटना घटी। आदिमूलम को आश्वासन देने आए सभी लोगों को रिसीव कर कुर्सियों में बैठा रहें नेनछुट्टन अचानक मेरे सामने जो कमरा है उसके अंदर गए। कमरे को जोर से अंदर से बंद किया। उन्हें क्या इतना गुस्सा हैं मेरे देखते ही..…खिड़की में से वह दृश्य दिखाई दिया।

नेनछुट्टन अपने धोती को खोला। एक स्टूल को खींचकर डाल उसके ऊपर चढ़कर ऊपर के पंखे के राड पर धोती को डालकर.... धोती के दूसरे सिरे को गांठ बांध..... उसके अंदर सिर घुसा कर गले में डाल उसे कस दिया। मैं चिल्ला कर दौड़ा उसी समय उन्होंने स्टूल को लात मार दिया था । दरवाजा अंदर की तरफ से बंद था.... दरवाजे को तुरंत खोल नहीं सके। दरवाजे को तोड़कर अंदर जाने के पहले ही उनकी जान निकल गई सिर्फ उसकी बॉडी लटक रही थी।"

चार लोग दरवाजे को तोड़कर अंदर घुसे।

नेनछुट्टन की बॉडी कमरे में नीचे चद्दर बिछाकर उड़ाकर रखा था दिखाई दिया.... इंस्पेक्टर वज्रवेल दो कांस्टेबल के साथ पुलिस फॉर्मेलिटी को पूरा किया।

कमिश्नर को देखकर सब लोगों ने सामने आकर उन्हें सेल्यूट करके वहां से सरक गए। कमिश्नर के इशारे से इंस्पेक्टर को बुलाया। वे जल्दी से आकर सामने खड़े हुए।

"सर...!" है

"नेनछुट्टन के शर्ट के पॉकेट में आत्महत्या के बारे में कोई पत्र मिला क्या?"

"एक टुकड़ा कागज भी नहीं था सर!"

"कमिश्नर सर...."

अपने पीछे की तरफ से आवाज आते देख कमिश्नर ने मुड़कर देखा।

आदिमूलम थके हुए चाल से ढले हुए परेशान चेहरे से किसी दूसरे की सहायता से धीरे चल कर आ रहे थे। उनकी आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे। कमिश्नर को देखकर बड़े दुखी स्वर में बोले।

"ये....ये... मेरे कुटुंब में यह क्या हो गया मालूम नहीं! कल मेरा बेटा गोकुलन ने सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर लिया। आज मेरी वाइफ के भाई नेनछुट्टन ने। कल क्या होगा पता नहीं।"

"हॉस्पिटल में एडमिट मेरी पत्नी को अभी तक होश में नहीं आई है। वह कोमा स्टेज में चली गई ऐसा बोलकर डॉक्टर उसका इलाज कर रहे हैं। वह जिंदा लौटेगी या नहीं..... वह भी मुझे छोड़कर चली जाएगी क्या पता नहीं..... कोई एक कारण है इसीलिए ऐसा सब हो रहा है। वह कौन सा कारण है मुझे पता नहीं मेरे भाग्य में क्या है...?"

आदिमूलम आंसू टपकाते हुए बोल रहे थे.... तब ही विवेक और वज्रवेलू आए।

"नेनछुट्टन के सेल फोन को देखा क्या?"

"देखा साहब यूज़फुल कुछ नहीं है।"

"वह सेल फोन कहां है?"

वज्रावेल ने उसे संभाल कर रखा था उन्होंने उठा कर दिया।

विवेक ने सेल फोन को लेकर उसे ऑन किया।

आखिर में किसने इन्हें फोन किया?"

कांटेक्ट ऑप्शन में जाकर रिसीव कॉल को देखा।

ठीक 6 घंटे पहले एक कॉल आया था।

एक्स मिनिस्टर श्रीनिवास राघवन। इनकमिंग कॉल।

कॉल डेकोरेशन 3 मिनिट्स 25 सेकेंड्स बात की थी।

उसके बाद उन्होंने किसी को फोन नहीं किया। किसी का आया भी नहीं ना इन्होंने किया।

क्यों इतनी देर लंबी दूरी?

धीरे के मन में आश्चर्य हुआ।

'पिछले 6 घंटे में ना कोई आउटगोइंग फोन ना इन कमिंग फोन'।

'ऐसे कैसे हो सकता है?'

विवेक के बुद्धि के एक कोने में सायरन की आवाज बजने लगी।

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