वायरस मारेगा- अंकित वर्मा राजीव तनेजा द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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वायरस मारेगा- अंकित वर्मा


किसी ने भी नहीं सोचा था कोरोना महामारी के कहर से भयभीत हो..हम सब इसके मकड़जाल में इस कदर घिर जाएँगे कि हमें आपस में ही एक दूसरे से हमेशा इस बात का डर सताता रहेगा कि कहीं इसकी या उसकी वजह से हम भी वायरस के लपेटे में ना आ जाएँ। उस वक्त कमोबेश दूसरे की भी हालत हमारे जैसी ही हो रही होती है कि कहीं हमारी वजह से वह खुद इस कमबख्त कोरोना की चपेट में ना आ जाए।

दरअसल यही डर बने बनाए काम बिगाड़ भी सकता है और यही डर, बिगड़े हुए काम बना भी सकता है। अगर किसी चीज़ या व्यक्ति से हम डर गए तो वो कमज़ोर होते हुए भी हम पर हावी होने की कोशिश करेगा और अगर किसी के आगे हमने अपने डर को हावी ना होने दिया तो हम से बढ़ कर सूरमा और कोई नहीं।

दोस्तों..आज मैं इसी डर को केन्द्र बना कर लिखे गए एक तेज़ रफ़्तार थ्रिलर उपन्यास की बात कर रहा हूँ जिसे 'वायरस मारेगा' के नाम से लिखा है अंकित वर्मा ने।

इस उपन्यास में मूलतः कहानी है शहर के विभिन्न अस्पतालों में रहस्यमयी जानलेवा वायरस से संक्रमित दस लोगों की एक लिस्ट के साथ सलंग्न धमकी भरी गुमनाम ईमेल के एक प्रतिष्ठित टीवी चैनल एवं पुलिस मुख्यालय में पहुँचने की। एक ऐसा रहस्यमयी वायरस जिसके बारे में धमकी में दावा किया जा रहा है कि वो किसी भी टैस्ट में डिटेक्ट नहीं होगा और उससे लगातार लोग मरते रहेंगे।

इस रहस्यमयी वायरस की गुत्थी को सुलझाने की ज़िम्मेदारी एसीपी राघवेन्द्र राठौड़ के साथ इंस्पेक्टर जयकिशन एवं इंस्पेक्टर मीरा को सौंपी तो जाती है मगर परत दर परत खुलती इस रहस्यमयी कहानी में तहक़ीक़ात के दौरान स्वयं एसीपी राठौड़ भी उस वक्त शक के घेरे में आ जाता है जब सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल एक मुजरिम मरने से ठीक पहले एसीपी राठौड़ का नाम ले कर मर जाता है।

** ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ख़तरनाक वायरस से अपनी पत्नी तक को गंवाने वाला डीसीपी राठौड़ सच में गुनहगार है अथवा वह स्वयं भी किसी गहरी चाल का शिकार?

** क्या एसीपी के दोनों जूनियर साथी इस बात को यहीं दबा अपने अफ़सर का साथ देंगे या फिर अपने कर्तव्य का पालन करेंगे?

ऐसी ही कई छोटी बड़ी गुत्थियों को सुलझाती यह तेज़ रफ़्तार कहानी कब खत्म हो जाती है..पता ही नहीं चलता। हालांकि अंत से पहले ही क्लाइमैक्स का कुछ कुछ अंदाज़ा पाठकों को होने लगता है मगर फिर भी यह कहानी अपने आरंभ से ले कर अंत तक पाठकों को बाँध कर रखने में सक्षम है।

कुछ जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना थोड़ा खला। प्रूफरीडिंग के स्तर पर भी कुछ जगहों पर ग़लत शब्द छपे हुए दिखाई दिए। जिन्हें ठीक किया जाना जरूरी है।

हालांकि यह उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहारस्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा कि इस 150 पृष्ठीय थ्रिलर उपन्यास के पैपरबैक संस्करण को छापा है राजमंगल प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 209/- रुपए जो कि कंटैंट के हिसाब से मुझे थोड़ा ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।