ममता की परीक्षा - 10 राज कुमार कांदु द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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ममता की परीक्षा - 10


' ............और फिर तुम्हारा उसके पिताजी के बारे में झूठ बोलना कि वो तुमसे मिले थे और तुमसे ये सब बातें की थीं। क्या मिलेगा तुम्हें उससे झूठ बोलकर ? वो झूठ जो उसे पता चल ही जायेगा।' तभी उसके दिल ने सरगोशी की थी।

' यह झूठ बोलने में भी मेरी आगे की सोच है। मैं जब कोई फैसला करता हूँ तो बहुत आगे तक का सोच समझकर करता हूँ। तुम नहीं समझोगे, बस देखते जाओ.. आगे आगे क्या होता है, सब समझ जाओगे।' उसके दिमाग ने इतराते हुए कहा।

अमर के दिल ने उसके दिमाग के सामने एक तरह से हथियार डालते हुए बस इतना ही कहा, 'तुम चाहे जितने पैंतरे बदल लो, सोच समझ कर आगे बढ़ो लेकिन होता वही है जो कुदरत ने निर्धारित कर रखा है। अभी तो तुम्हें अपनी समझ पर बड़ा भरोसा है लेकिन आखिर में जीत सच की और भरोसे की ही होती है।'

दिल और दिमाग के इस अंतर्द्वंद से परेशान अमर अचानक कानों पर हाथ रखकर चीख उठा,, "नहीं !"

और फिर अगले ही पल कुर्सी की पुश्त पर पीठ टिकाए लंबी लंबी साँसें लेने लगा, ऐसे जैसे मिलों दौड़कर आया हो। धीरे धीरे उसकी साँसें सामान्य होती गईं और आँखें बंद किये वह गहन विचार में डूब गया।
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बड़ी देर तक रजनी यूँ ही कार की पिछली सीट पर औंधे मुँह पड़ी रोती रही। रोते रोते उसकी हिचकियाँ बँध गईं थीं। दीन दुनिया से बेखबर रजनी को यह भी ध्यान न रहा कि कोई उसके आसपास भी खड़ा है। रुदन का आवेग थोड़ा कम होने पर उसे अपनी स्थिति का भान हुआ। सिर उठाकर उसने सामने की तरफ देखा, वहाँ कोई नहीं था।

अपने आपको सँभालती रजनी काऱ के पिछले हिस्से से बाहर निकली कि तभी उसकी नजर उन चारों पर पड़ी जो सवालिया निगाहों से उसी की तरफ देख रहे थे। बाहर धूप इतनी तेज थी कि चारों लड़कों के भीगे हुए कपड़े पूरी तरह से सूख गए थे।

रजनी की मनोदशा भाँपने के उद्देश्य से बिरजू आगे बढ़कर उससे मुखातिब हुआ, " क्या हुआ बहन ? लगता है कोई दुःखद खबर पढ़ने लगी थीं आप ?"

अपनी बड़ी बड़ी आँखों में छलक आये आँसुओं को रुमाल के कोनों से पोंछती हुई रजनी ने एक नजर चारों लड़कों की तरफ देखा और फिर धीरे से बिरजू से मुखातिब होते हुए बोली, " हाँ भैया ! मेरे लिए बहुत दुःखद है यह खबर ! लेकिन ......! "

अभी वह आगे कुछ और कहना चाहती थी कि तभी बिरजू बीच में ही टपक पड़ा, " भैया ! ....ओह ! यही तो सुनना चाहता था मैं बहन तुम्हारे मुँह से। तुम अंदाजा नहीं लगा सकतीं आज मैं कितना खुश हूँ। अगर आज बसंती जिंदा होती तो शायद तुम्हारे उम्र की ही होती। मुझे लगता है मुझे तुम्हारे रूप में मेरी छोटी सी गुड़िया बसंती वापस मिल गई है।"

भावावेश में बिरजू और पता नहीं क्या क्या कहता रहता कि तभी रजनी ने उसे टोकना ही मुनासिब समझा और कहा, " भैया ! खुशकिस्मती तो मेरी है जो आज भगवान ने बिन माँगे मेरी मुराद पूरी कर दी। मुझे इतना प्यारा सा भैया दे दिया। सोचती हूँ भगवान की लीला भी अपरंपार है। अभी थोड़ी देर पहले जो जिंदगी भर का दाग लगाने पर आमादा थे वही अब मेरे आँसुओं का सबब पूछ रहे हैं। आप सब भाइयों का बहुत बहुत धन्यवाद, लेकिन ये आँसू मेरे कुछ निजी जख्मों की देन हैं जो अभी मैं आप लोगों से साझा नहीं कर सकती।"
कहते हुए रजनी ने कार के डैशबोर्ड से विजिटिंग कार्ड निकालकर बिरजू की तरफ बढ़ाते हुए बोली, " भैया ! कभी शहर आओ तो मेरी कोठी पर जरूर आना। रविवार को मेरे पापा भी घर पर ही होते हैं, तुमसे मिलकर बहुत खुश होंगे। इसमें मेरा पता लिखा हुआ है और मेरा फोन नंबर भी। आने से पहले एक बार फोन अवश्य कर देना।"

उनसे बात करती हुई रजनी अब बिल्कुल सामान्य सी लग रही थी। उसके हाथ से कार्ड थाम कर बिरजू और उसके साथी जाने के लिए मुड़े ही थे कि तभी जैसे रजनी कोअचानक कुछ याद आया 'अरे कितनी बेवकूफ हूँ मैं ! जिसने उसकी इज्जत की खातिर अपने दोस्तों की भी परवाह नहीं की, उसका शुक्रिया अदा करना तो छोड़ो उसका परिचय तक नहीं पूछा।'

अचानक रजनी पुकार उठी, " भैया !"

बिरजू अभी ज्यादा दूर नहीं गया था। रजनी की पुकार उसके कानों में पड़ते ही उसने पलट कर पीछे देखा। रजनी उसी की तरफ आ रही थी। अगले ही पल दोनों एक बार फिर आमने सामने थे। रजनी ने मुस्कुराते हुए बिरजू के कंधे की तरफ इशारा किया। बिरजू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन रजनी की मुस्कुराहट देखकर उसके चेहरे पर भी मुस्कान फैल गई थी।

उसके बिल्कुल नजदीक आते हुए उसके कंधे पर रखा अपना दुपट्टा लेते हुए रजनी शरारत से बोली, " भैया ! ये मेरा दुपट्टा आपके कंधों पर अच्छा नहीं लग रहा था ! बस .....!"

उसकी बात समझते ही सभी लड़के ही ही कर हँस पड़े, और झेंपते हुए बिरजू भी मुस्कुरा पड़ा। उसके मुँह से निकल पड़ा, " माफ़ करना बहना ! मैं तो भूल ही गया था।"

बनावटी नाराजगी जाहिर करते हुए रजनी बोल पड़ी, "क्या भैया ! ये भाई बहन के बीच माफी और धन्यवाद को जगह कैसे मिल गई ? मैं तो तुममें से किसी को धन्यवाद भी नहीं कहनेवाली ! नहीं तो काहे के भाई और काहे की बहन ? "

" कह तो तुम ठीक रही हो। वो क्या है न कि हम लोग ठहरे निरे देहाती, ऊपर से अनपढ़। तो हमारी खोपड़ी इतनी तेज नहीं चलती न। .. आगे से ऐसी गलती नहीं होगी, अबकी माफ कर दो।" अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए बिरजू ने इतनी मासूमियत से यह बात कही कि सब एक बार फिर खिलखिलाकर हँस पड़े।

हँसते हुए अचानक रजनी बिरजू से पूछ बैठी, " अब तनिक आप सब का परिचय भी हो जाय।"

" हाँ..हाँ ! क्यों नहीं ? अभी बताए देते हैं आपको।" अबकी बिरजू की जगह सुधीर ने मुँह खोला था ," वो आगे जो दोराहा है कच्चे रास्ते पर जहां से बाएं घूम कर तुम इस झील की तरफ आई हो वही सीधे जानेवाला रास्ता हमारे गांव को जाता है नाम है सुजानपुर । वहां गांव में आ जाइये और किसीसे भी चौधरी रामलाल का नाम पूछ लीजिये । कोई भी लाकर आपको घर तक पहुंचा जाएगा । चौधरी रामलाल बिरजू भैया के पिताजी हैं और इलाके में उनकी बड़ी इज्जत है । हम सब भी वहीं आसपास रहते हैं । बस ये समझ लो हम सब लंगोटिया यार हैं और बिरजुआ हम सबकी जान । " उसकी बात खत्म होते ही सब एक बार फिर खिलखिलाकर हंस पड़े । उनसे विदा लेकर रजनी अपनी कार के पास पहुंची । खिलखिलाहट के बीच भी उसे अमर के लिखे संदेश बराबर उसकी दिमाग में घूम रहे थे । उसने जानबूझकर बिरजू और उसके साथियों को अमर के बारे में कुछ न बताने का फैसला कर लिया था ।
कार में बैठकर ड्राइविंग सीट संभालते हुए भी अमर का संदेश उसके कानों में गूंज रहा था । अभी तो उसने पूरा संदेश पढ़ा भी नहीं था । आखिर में पढ़ा गया वाक्य उसके जेहन में शोर मचाने लगा था ' और मेरा फैसला ये है कि मैं हमेशा हमेशा के लिए तुम्हारी जिंदगी से दूर चला जाऊं ! ' और बार बार इन्हीं शब्दों के दुहराव ने उसके सब्र का बांध तोड़ दिया और फिर उसकी नजरें भर आईं । अब तक वह कच्चे रास्ते का सफर पूरा कर चुकी थी । शहरी भीड़भाड़ में सही ड्राइविंग के लिए उसने गाड़ी एक तरफ खड़ी करके अपनी आंखों को रुमाल से साफ किया और फिर मुख्य सड़क की भीड़ में खो गई ।

क्रमशः