उजाले की ओर---संस्मरण Pranava Bharti द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

उजाले की ओर---संस्मरण

उजाले की ओर --संस्मरण

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नमस्कार स्नेही मित्रों !

बहुत ज़रूरी लगता है इस जीवन में प्रेम बाँटकर जाना | प्रेम ,स्नेह वह संवेदना है जिसके बिना जीवन कुछ है ही नहीं |

इस तथ्य से सब वाकिफ़ हैं कि प्रेम के अतिरिक्त केवल किसी और भावना से जीवन की गाड़ी नहीं चल पाती |

प्रेम के दो मीठे बोलों में सामने वाले के प्रति ईमानदार परवाह हो तो मनुष्य सूखी रोटी खाकर भी मस्ती से जी सकता है |

यदि सोने के थाल में सौ व्यंजन भी क्यों न हों और परोसने वाला या खिलाने वाला हमारे सामने पटककर चला जाए तो क्या हमें संतुष्टि मिल सकती है ?

हो सकता है कि सामने रखे हुए भोजन का हम अपने संस्कारों के वशीभूत अपमान न कर सकें अथवा भूखे होने के कारण हमें उससे अपना पेट भरना ही पड़े

लेकिन यह तो सोलह आने सच है कि हम उससे संतुष्ट नहीं हो सकेंगे |

जीवन में सभी संवेदनाओं का होना बहुत आवश्यक है | हमें अपने जन्म से ही वे संवेदनाएँ प्राप्त हुई हैं , एक आशीष के रूप में |

हाँ,यह बात ज़रूर है कि हमने उनको अलग-अलग भागों में बाँटकर समझना शायद कुछ देर में शुरू किया हो |

जैसे --बेशक हम कुछ चीज़ों को समझते न हों लेकिन वे हमारे अंग तो तब से ही थे जब से मनुष्य ने इस धरती पर जन्म लिया था |

उसे भूख-प्यास लगती थी ,उसे अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के बारे में एहसास होता था ,बेशक एक व्यवस्थित रूप मनुष्य के सामने न आया हो |

लेकिन वह अपनी आवश्यकताएँ तो पूरी करता ही था | जैसे -जैसे मनुष्य की बुद्धि विकसित होती गई वह उन सभी संवेदनाओं को विस्तार से समझने लगा ,

उनको अलग-अलग भागों में परिवर्तित करके देखने लगा ,उनका उपयोग करने लगा |

कहने का भाव है कि स्नेह से, प्रेम से किसीके भी दिल में उतर जाना बेहद स्वाभाविक व आसान है न कि अपनी शानो-शौकत या दिखावे से

हम किसी के मन में अपने प्रति कोई कोमल ,स्नेहिल भाव महसूस करा सकते हैं |

कोई नहीं जानता मित्रों ,ज़िंदगी का रुख कब ?किस ओर पलट जाए ? हमें पता भी न चले और हमारे महल-दुमहले किस समय हमारी आँखों के सामने ही ढह जाएँ |

न तो हम अपने जीवित रहने के दिनों से वाकिफ़ होते हैं और न ही अपने जीवन के बदलाव से !

बेहतरी व समझदारी तो इसीमें है कि हम अपने रिश्तों ,अपने उन सभी लोगों में एक प्यार का संदेश प्रसारित कर सकें ,बिना किसी शर्त के बिना किसी स्वार्थ के |

बिना अपेक्षा के ,बिना उपेक्षा के |

कठिन है लेकिन असंभव नहीं है यदि हम सोचने की कोशिश करें |

और दोस्तों ! कोशिश करने में क्या हर्ज़ है ? कोई नुकसान तो नहीं न ?

मुझे किसी भी समय में कबीर की याद आ जाती है ,वे कबीर जो तथाकथित शिक्षित नहीं थे लेकिन उन्हें जन्मजात ही इस भावना से सजाकर भेजा गया होगा |

तभी वे इस प्रेम की भावना को सूत कातते-कातते ही सबमें प्रेषित कर सके |

वही प्रेम तो हमारे भीतर भी है मित्रों ,बस --ज़रा सा संभलने की,सजग होने की आवश्यकता है |

तो आइए ,हम सब कबीर के कथनानुसार शिक्षित यानि पंडित बन जाएँ

'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय !'

इस विषय पर सोचते हैं और अगली बार फिर से बात करते हैं जीवन से जुड़े किसी अहं मुद्दे पर अथवा किसी ऐसे संस्मरण से जुड़ते हैं जो हमें अनजाने में ही कुछ सिखाकर

चुपचाप हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाए |

सबको स्नेह ---

आप सबकी मित्र

डॉ . प्रणव भारती

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Pramila Kaushik

Pramila Kaushik 3 महीना पहले

Pranava Bharti

Pranava Bharti मातृभारती सत्यापित 3 महीना पहले